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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min2860

 मनोज भावुक

सोरह साल हो गइल। सोरह साल सुन के त बहुत लोग के मन बासंती हो जाला। सोरहवा साल पर त ना जाने केतना फ़िल्मी गीत बा। बॉलीवुड में गीत गूँजल कि ‘’सोलह बरस की बाली उमर को सलाम’’ त भोजीवुड में गाना बनल, ‘’सोरहे में सुन्नर सामान भइलू’’ ..

सोरह पर हमरो एगो शेर बा –

भउजी सोरह के बाड़ी आ साठ बरिस के भईया
बाज के चोंच में देखीं अंटकल बिया एक गौरइया

त हमरा कबो-कबो लागेला कि हमार भोजपुरी कई गो अइसने बाज के चोंच में अंटकल बिया।

एक बेर हिंदी के एगो महापंडित गरियावत रहलें, रे भोजपुरी के कुछ बा? आपन कवनो शब्दावली नइखे। खाली हिंदी में क्रिया पद लगा के भोजपुरी थोड़े बनेला? बहुत देर ले गप्प चलत रहल। हम लइका रहनी। लइका त आजो बानी, बुद्धि से। तब उमिरो से रहनी। चुपचाप सुनत रहनी।

पंडित जी नोकर पर चिचिअइनी- रे, चाह अभी ले ना बनल ?

बन गइल बा ए मलिकार बाकिर गिलसवा में गिलसवा अड़स गइल बा।

हमरा हँसी छूटल कि कादो भोजपुरी में कुछु नइखे। पंडी जी हमरा के खिसिया के देखनी।

बाकिर बड़ भइनी। तनी आँख खुलल त लागल कि साँचो, आपन भोजपुरी कहीं अड़स गइल बा।

फेर लागल कि ना ई हमार लड़िकबुद्धि बा। हमरा ठीक से भोजपुरी बुझाते नइखे। जेकरा बुझाता-बुझsता, उ खेलsता-खाता। ओकरा घर में रेड कार्पेट बा। हम चटाई पर के चटाइये पर रह गइनी। केतना लोग के ई नायक-महानायक, सांसद-विधायक बना दिहलस आ भावुक आदमी हम, हमरा  भोजपुरी अड़सल लागsतिया ? .. अड़सल त हम बानी?

हमहीं ना, उ सब लोग अड़सल बा जे भोजपुरी खातिर अपना के होम कइले बा, स्वाहा कइले बा।

त सोरह साल पहिले गइल त रहनी प्लांट मैनेजर बन के बाकिर भोजपुरी के कीड़ा भी हमरा साथे लंदन पहुंचल रहे। अब किड़वा के कवन बीजा-पासपोर्ट लागे के रहे कि ना जाव। लंदन पहुंचते गीत लिखनी-

बदरी के छतिया के चीरत जहजवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया
लन्दन से लिखऽतानी पतिया पँहुचला के,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया

 

दिल्ली से जहाज छूटल फुर्र देना उड़ के,
बीबी बेटा संगे हम देखीं मुड़ मुड़ के।
पर्वत के चोटी लाँघत, बदरी के बीचे,
नीला आसमान ऊपर, महासागर नीचे
लन्दन पँहुच गइल लड़ते पवनवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया

हीथ्रो एयरपोर्टवा से बहरी निकलते,
लागल कि गल गइनी थोड़ दूर चलते।
बिजुरी के चकमक में देखनी जे कई जोड़ा,
बतियावें छतियावें जहाँ तहाँ रस्ते।
हाल चाल पूछनी हम अपना करेजवा से,
अइलीं फिरंगिया के गांवे हो संघतिया

खैर, गीत लम्बा बा। फेर कबो सुनाएम। मेन मुद्दा प आवssतानी। भोजपुरी में लिखे-पढ़े आ कार्यक्रम करे के जवन कीड़ा रहे उ अउर तेजी से काटे लागल। हमरा किताब ‘’ चलनी में पानी’’ में के अधिकांश गीत लंदने में लिखाइल बा। चूंकि लंदन में भोजपुरी के भा भोजपुरी खातिर कुछु रहे ना त हम यूके हिंदी समिति, लंदन आ गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक समुदाय, बर्मिंघम से जुड़ गइनी बाकिर भोजपुरी के साथे लेके, छोड़ के ना। लंदन से प्रकाशित पत्रिका ‘पुरवाई’ के कभर पेज पर हमार भोजपुरी गजल छपल। ई बात 2006 के ह। फगुआ के आसपास हम लंदन पहुंचल रहनी।

देखीं, फगुनी बयार बहssता त याद के पुरवाई मन के छू-छू के निकल जाता। हमार फैक्ट्री लंदन से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर हादम में रहे। हम सपरिवार गइल रहनी उहाँ। पत्नी अनिता सिंह अउर ढाई महिना के बेटा हिमांशु के साथे। बेटा अब इन्टर में पहुँच गइल बा अउर पत्नी सफ़र में हमसफ़र बन के सोरहवां साल में।

त साल 2006 में हम पत्नी आ बेटा के साथे भोजपुरी के भी लेके लंदन पहुंचल रहनी। ओकरा पहिले युगांडा, पूर्वी अफ्रीका में रहनी। उहाँ भी ई बेमारी रहे त 2005 में भोजपुरी एसोसियेशन ऑफ़ युगांडा के स्थापना कइनी। स्थापना में हमरा साथे आजमगढ़ के अजय सिंह भी रहलें। हम त युगांडा से भाया लंदन इण्डिया आ गइनी बाकिर स्वामी नारायण के भक्त अजय भाई त उहाँ जमीन-जायदाद खरीद के बसिये गइल बाड़न। खैर, भोजपुरी एसोसियेशन ऑफ़ युगांडा के स्थापना के बाद उहाँ तमिल, तेलगू, गुजराती, मराठी विंग के साथे भोजपुरी के भी एगो विंग खुलल। फगुआ-चइता उहवों गूँजल। दियरी-बाती आ छठ शुरू हो गइल। कई गो स्वीमिंग पूल आ विक्टोरिया लेक के किनारे छठ भइल। हम कई लोग के भोजपुरी पत्र-पत्रिकन के सदस्यो बनवनी।

मन बढ़ल रहे त लंदन में भी भोजपुरी समाज के स्थापना भइल। दरअसल 2006 में हमरा भोजपुरी गजल-संग्रह ‘ तस्वीर जिंदगी के ‘ के पर सिनेहस्ती गुलजार आ ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी के हाथे भारतीय भाषा परिषद सम्मान मिलल। ई खबर बीबीसी समेत तमाम अखबारन आ वेबसाइटन के सुर्खी बनल। बीबीसी लंदन, रेडियो खातिर मुकेश शर्मा जी (जे अभी बीबीसी दिल्ली के संपादक बानी ) हमार इंटरव्यू कइनी। ओकरा बाद हम लाइम लाइट में आ गइनी। फेर यूके के भोजपुरिया लोग हमरा संपर्क में आवे लागल आ अंततः हम भोजपुरी समाज, लंदन के स्थापना कइनी अउर लंदन के हाईड पार्क में एगो कार्यक्रम रखाइल। तय ई भइल कि सब केहू अपना-अपना घर से एगो भोजपुरिया डिश बना के ले आई त लंदन में केहू किहाँ पुआ पाकल, केहू किहाँ ठेकुआ बनल, केहू दाल में के दुलहा बना के ले आइल रहे त केहू लिट्टी त केहू मकुनी त केहू फुटेहरी .. माने अजबे-गजब हाल रहे। सितम्बर के महीना रहे। हाइड पार्क में जब गुनगुनी धूप में गीत-गजल के साथे लोक राग छिड़ल त ब्रिटेन में आरा-बलिया-छपरा लउके लागल आ पूस के देहसुख वाला घाम जइसन लागे लागल।

अब नू जेके देखीं, सेही लंदन पहुँच जाता शूटिंग करे भा प्रोग्राम करे। 15-16 साल पहिले अइसन ना रहे। एह से लोग में उत्साह ज्यादा रहे अउर अफ्रीका आ यूके में भइल भोजपुरी गतिविधि के भारतीय मीडिया में भी अच्छा कवरेज मिलल।

तीन साल पहिले 2018 में हमरा के गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक समुदाय, बर्मिंघम द्वारा भोजपुरी नाइट्स खातिर आमंत्रित कइल गइल। भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद द्वारा हमरा के यूके भेजल गइल अउर एक बेर फेर यूके के भोजपुरियन के भारी जुटान भइल। ई हमरा खातिर आनंद आ गर्व के पल रहे। उहाँ हमरा के गीतांजलि साहित्य व संस्कृति बर्मिंघम सम्मान से नवाजल गइल।

अइसे त युगांडा, यूके के अलावा दुबई, मॉरिशस आ अउर कई गो देश में जाए आ भोजपुरिया लोग से मिले-जुले-जोड़े-जुड़े के अवसर मिलल लेकिन एगो सवाल बरिसन से सालत आ रहल बा कि भोजपुरिया लोग त आगे बढ़ गइल, जे मजदूर बनके गइल, उहो मालिक बन गइल। मॉरिशस में सरकारी मान्यता भी मिल गइल बाकिर अपना देश में भोजपुरी खातिर अभी पचरे गवाता। भोजपुरी एगो सियासी मुद्दा बन गइल बा आ भोजपुरिया लोग के बतावे-जतावे के पड़sता कि भाई हो जनगणना में आपन मातृभाषा भोजपुरिये बतइहा। माई आ मउसी में फरक होला ए चनेसर .. बाकी सम्मान त सभकर बा। सवाल पहचान के बा आ पहचान अपने मातृभाषा से होला। ना त अधभेसर बन जाए के पड़ी। सवाल अस्मिता के भी बा। जेतना रोटी जरुरी बा ओतने इज्जत।

देखीं, अड़सल आ छटपटात भोजपुरी के कब खुला आकाश मिलsता ?


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min2350

डॉ. ( प्रोफेसर) अनिल प्रसाद

बहुत उत्साहित आ भयभीत। अनजान जगह आ अनजान लोग, नया परिवेश, नया देस, नया भेस आ बोली, एक अलग संस्कृति। बाबा के खुशी, आँख  में चमक, चेहरा पर मुस्कराहट – हमरा मन में उहाँ के कहल बात – हथुआ राज के कचहरी के घंटाघर के लेखा बाजत रहे – ‘लागल रहा कहीं ना कहीं होइए जाई!’

हम नवंबर 1991 में पटना छोड़नी आ दिल्ली पहुँच गइनी। एक हफ्ता रहला के बाद जरूरी  कागज-पत्तर लेके  मुंबई आ उहाँ से टिकट लेके सना’, यमन के राजधानी। नौकरी करे, कालेज में पढ़ावे के नौकरी, अंग्रेजी भाषा आ साहित्य के सहायक प्राध्यापक!

हम 29 नवंबर के भोर में सना’ एयरपोर्ट पर पहुँचनी, साथ में 13-14 लोग के जत्था रहे, सभे शिक्षक, सबका अपना अपना गंतव्य पर जायेके रहे। हमनी के यूनिवर्सिटी गेस्ट हाउस में ले जाइल गइल । हमार प्राचार्य (डीन) फोन कइले कि चार बजे शाम के अइहें, आ हमरा के अपना साथे ले जइहें। ठीक चार बजे शाम के एक हंसमुख आ तेज तर्रार आदमी गेस्ट हाउस के लाबी में दाखिल भइल आ हमार नाम पुछल, अब हमार एक दूसर यात्रा के शुरुआत होखे के रहे !

हम अभी यमन के राजधानी सना’ में रहनी, सना’ जे शायद समुद्र तल से  2,300 मीटर (7,500 फीट ) के ऊँचाई  पर बसल दुनिया के अनूठा राजधानी बा । इहाँ से हमरा जहां तक हमार अनुमान रहे दक्खिन के तरफ जायेके रहेl हमनीके यात्रा फेर शुरू भइल, पहाड़ से घीरल शहर, शाम के गुनगुनी धूप के बीच, फिलिप लारकिन के कविता इयाद परल जब हम देखनी की ‘मकानन के शांत लीलार पर शाम के धूप पड़ रहल बा ।‘ एह कविता में  उ मन  में बसंत के आगमन के बात करsतारें जब आदमी अपना पिछला दुख के सांत्वना के,आवे वाला समय से मिले के उम्मीद हो जाला  । हमहूँ आपन पिछला संघर्ष के दिन भुला के नया जीवन में प्रवेश करत रहनी, अइसन लागत रहे ।

पहाड़ी रास्ता, पहाड़ में बसल गाँव, आ चौड़ा सड़क पर लोग आ विदेशी गाड़ियन के अनवरत आना जाना के बीच हमनी के बात करत आगे बढ़त रहनी । प्राचार्य, डॉ अहमद अलवान अल-मदहगी (जे अब इ संसार में नइखन) के आत्मीय बात-चित से नया परिवेश-जनित हमार डर धीरे-धीरे कम होत गइल । अब हमनी के अपना गंतव्य से कुछ दूरी पर रहनी । हमरा लागल जइसे देहरादून से मसूरी जा रहल बानी । सना’ से 154 किलोमीटर (driving distance करीब 198किलोमीटर) दूर  इब्ब शहर, हमार गंतव्य, एक खूबसूरत शहर, चारों ओर से पहाड़ी से घीरल, इ जनपद के हरीतिमा देख के एकर उपनाम ‘अलोआल अखदर’ बा  जेकरा के अंग्रेजी में ‘The Green Governorate’ कहल जाला । जेतना सुंदर मनमोहक जगह ओतने सुंदर, सहज, सरल आ सभ्य लोग । प्रवासी खातिर मन में बहुत आदर सत्कार के भाव, ओहुमे भारतीय खातिर सबका से ज्यादा !आज एक दशक से ज्यादा समय हो गइल इब्ब से वापस अइले  लेकिन अभी भी ओहिजा के लोग, सहकर्मी  आ लड़ीका (students) हर मौका पर हमनीके इयाद करेला l

इब्ब शहर पहुँचत पहुँचत साँझ  हो गइल। डॉ अल-मदहगी शहर में एगो अपार्टमेंट बिल्डिंग के सामने आपन गाड़ी रोकले आ हमार सामान उतारे में मदद कइले, आ हमरा हाथ में चाभी देके इशारा से बतवले कि नीचे वाला अपार्टमेंट में हमरा रहे के व्यवस्था बा।  दूसरा दिन हम कॉलेज गइनी आउर हमार बहुत गर्मजोशी से स्वागत भइल। हम कॉलेज में पहिला भारतीय शिक्षक रहनी। कुछ समय  के बाद के बाद  आउर भारतीय लोग के नियुक्ति भइल।

कॉलेज में दूसरा देस के लोग भी रहे जेहिमे, सूडानी, मस्री, इराक़ी, टूनिशियन, कूबन, ब्रिटिश आ अमेरिकन लोग भी रहे। यमनी विद्यार्थी के शिक्षक के प्रति आदर भाव आ ओह लोग के अभिप्रेरणा के स्तर देख के अपना इहाँ के पुरनका गुरु-शिष्य परंपरा के इयाद आवे। शिक्षक लोग में  आपस में काफी आत्मीय आ सामाजिक संबंध रहे। बाजार में अचानक केहु सामने आके ‘नमस्ते’ कह के अभिवादन कर के मुस्कुरात आगे बढ़ जाई। अच्छा लागी कि घर से एतना दूर एह देस में कुछ अइसन बा जे मन के छु लेता।

जनवरी- फरवरी 1992 में हम अपना परिवार के साथे रहे लगनी। ज्योत्स्ना जी इब्ब शहर में कुछ दिन तक अकेली भारतीय महिला रहली। ओह समय में टीवी चैनल ना रहे। मनोरंजन के साधन में वीसीआर पर भारतीय फिल्म देखल जा  सकत रहे। कुछ दूरी पर अमेरीकन अस्पताल रहे जेहिमे कुछ भारतीय नर्स आ डॉक्टर लोग रहे, ओह लोग से परिचय भइल। उ लोग इब्ब से 6 किलोमीटर दूर जिबला में रहत रहे लोग जेकर काफी ऐतिहासिक महत्व बा। एक समय में इ यमन के राजधानी रहे आ इहाँ के रानी रहली रानी अरवा बिंत अहमद  अस्सुलेही। आज भी भारत से बोहरा लोग ओहिज जाला लोग।

यमन के प्राचीन समय से ही रोमन लोग Arabia Felix (The Fortunate Arabia/Happy, or Flourishing Arabia) कहे जेकरा  के अरबी में ‘यमन अल-साईद’ कहल जाला । खुशहाल, सम्पन्न, धर्मपरायण आ दानिशमंद लोग जहाँ रहल लोग । जहाँ बिलकिस आ अरवा जइसन रानी लोग भइल । जहां जबीद में Classical Arabic के केंद्र रहे, जहाँ के कॉफी (मोचा/मोका कॉफी – अल-मखा के नाम पर ) आज भी विश्व में प्रसिद्ध बा, उ देस में इब्ब शहर आ ओकर अगल बगल में काफी घूमे वाला जगह रहे । हमनी हर सप्ताह के अंत में कहीं ना कहीं घूमें निकाल जाईं । जबल (= पहाड़ी ) अररब्बी, जबल बादान, जबल सबर ( Taiz Governorate में ) वादी (=valley ) बना, वादी अल-जन्नl, अल-मशवरा आदि कइ जगहन पर प्रकृति के बहुत मनोरम दृश्य देखे के मौका मिलल । बादान के हमार साथी शेख अमीन नो’मान ( पिछला बर्ष के स्वर्गवासी हो गइलन) के आदर सत्कार आ स्नेह अभूतपूर्व रहे !

कॉलेज ऑफ एजुकेशन जहाँ हम कार्यरत रहनी आउर जे सना’ विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहे 1996-97 में इब्ब विश्वविद्यालय बना दिहल गइल। एकर पहिलका प्रेसीडेंट भइले डॉ नासेर  अल-औलकी (पिछला महीना  उनकर स्वर्गवासी भइला के दुखद खबर आइल रहे )। डॉ अल-औलकी, यमन के पूर्व कृषि मंत्री,  एक  सरल, सहज आ सजग व्यक्तित्व के मालिक रहले, सही अर्थ में एक  अनुभवी शिक्षाविद। उनका डॉ अब्दुसलाम अल-जऊफी जइसन तेज आ प्रो–ऐक्टिव आदमी ( जे बाद में यमन के स्कूल  एजुकेशन के शिक्षा मंत्री भइले ) के सहयोग मिलल आ दूनू आदमी मिल के इब्ब इनिवर्सिटी के बहुत विकास कइल लोग । ओहलोग के टीम में डॉ हसन अब्दु अल-मलिक जइसन उच्च शिक्षा प्राप्त अनुभवी आ डॉ अब्देल शाफी ( अब स्वर्गवासी ) जइसनअनुभवी प्रशासक  लोग रहे । एह लोग के साथ हमरा भी एक दशक से ऊपर अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष के रूप में काम करे के अवसर मिलल।

अगर एह लेख में हम यमन के शहर अदन के चर्चा ना करीं त उ उचित ना होई। यमन के खूबसूरत शहर अदन ब्रिटिश कालोनी रहे जेकर के बाम्बे से कंट्रोल कइल जात रहे। जब हमार बाबूजी आ ससुरजी यमन घूमे आइल लोग त एडन जाएके के कहल लोग! ओहलोग स्कूल में अदन के बारे में पढ़ले रहल लोग। बहुत लोग जे E M Forster के  A Passage to India पढ़ले होई ओकर जानकारी होई कि ओह उपन्यास के एगो पात्र Mrs. Moore के मौत इंग्लैंड  जात में अदन में हो जाता। जे भी भारत से इंग्लैंड जात रहे ओकरा अदन होके ही जाएके रहे। हमनीके अदन गइनी आ उहाँ गाँधी जी से संबंधित सब जगह देखनी आउर हमनी के देखावे वाला रहनी प्रो जयराम सिंह जी जे अभी नई दिल्ली में रहिले । अदन में भारतीय मूल के रहेवाला  लोग के जनसंख्या काफी बा । उहाँ हिन्दू देवी देवता के मंदिर भी बा । जहाँ बाबूजी लोग के जाके बहुत खुशी आ संतोष भइल । आज भी अदन में ‘सीधा’, ‘चटनी’, ‘अचांर’, ‘खिछुरी’ ‘धोबी’, ‘जलेबी’, ‘बनिया’, ‘बनियानी’ (अदन में एगो मोहल्ला के नाम )  आदि शब्द ओहिजा  के अरबी भाषा के हिस्सा बा !

यमन प्रवास हमरा आ हमरा परिवार के जीवन  यात्रा के एक अहम मुकाम बा। यमन से वापस अइला के बाद हम लीबिया आ सऊदी अरबिया में एक दशक तक काम कइनी लेकिन जवन आदर आ स्नेह भारतीय आउर भारतीय संस्कृति से जुड़ल चीजन से यमन में रहे उ कहीं दुसर जगह ना देखे में आइल। वइसे भारतीय शिक्षक के आदर सब जगह बा । आउर मध्य-पूर्व के देशन के अपेक्षा यमन आर्थिक दृष्टि से बहुत समृद्ध नइखे (आज यमन के स्तिथि आउर खराब हो गइल बा ) लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से उ बहुत उत्कृष्ट देस ह। प्राचीन समय से skyscrapers(माटी के बनावल ) यमन के ही शिबाम तरीम में ही बा !अरबी कविता आ संगीत इहाँवा के आम लोग के जबान पर रहेला । यमन के पहाड़ी एलका में सीढ़ीनुमा खेती पर्यटक खातीर अभूतपूर्व दृश्य बा । इहाँके मकान बनावे के तरीका वस्तु-कला के एक अनूठा उदाहरण बा।

स्मृति में बहुत बात बा लेकिन समय आ स्पेस के सीमा बा ! आपन संस्मरण के अंत हम एह बा से करे के चाहब की सरहद त हमनी बाँट लेले बानी लेकिन हवा, बादल, बरखा, बूनि, चिरई-चुरुङ के केहु अभी ले नइखे  बाँट सकल। हमनी नौकरी के खोज में (as a part of work diaspora )धरती के कोना-कोना छानमारतानी  सन। दूर  से दूर गइला पर इ बुझाता कि उहाँ भी आपने लोग बा, उहे अपनापन, उहे स्नेह बा जे दू देस, भाषा, परिवेश आ संस्कृति के आदमी के नजदीक कर देता । जेतना लोग हमरा 17 – 18 बरिस के यमन के प्रवास में हमरा संपर्क में आइल ओह लोग के हम इयाद करीले, उ लोग हमरा स्मृति में इब्ब शहर के हरियाली अइसन हमेशा ताजा रहेला लोग । काहे ना रही ? आखीर ओ जमीन के टूकड़ा पर के सुरुज तs आपने रहले!


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20213min2870

मनोज भावुक

भूमध्य रेखा पर बसल पूर्वी अफ्रिका के एगो छोट देश युगाण्डा (UGANDA ) अपना पूर्व राष्ट्रपति इदी अमीन के क्रूर, खौफनाक, तानाशाही आ आदमखोर चरित्र के चलते विश्व के मानस पटल पर ओही तरे छा गइल, जइसे हिटलर के चलते जर्मनी आ ओसामा बिन लादेन के चलते अफगानिस्तान।

इदी अमीन के चलते युगाण्डा के छवि पर जवन दाग लागल वर्तमान राष्ट्रपति वाई. के. मुसेवनी अपना उदार स्वभाव आ दूरदर्शी व्यक्तित्व से काफी हद तक ओकरा के धो देले बाड़न, जवना के सुफल बा कि विश्व के तमाम देशन के लोग, जवना में भारत सबसे आगे बा, आपन बिजनेस आ इण्डस्ट्री लगाके बहुत शांति आ सुकून के जिन्दगी जी रहल बा।  हमरा ई कहे में तनिको गुरेज नइखे कि युगाण्डा में एगो छोट गुजरात बसल बा। सब कइल-धइल ओही लोग के ह। उहे लोग सबसे पहिले आइल इहाँ। बाद में तमिल आ तेलुगु भाषी लोग भी पसर गइल। अब त राजस्थानी, पंजाबी, मराठी आ मलयालयी लोग भी नीमन संख्या में बा। बस, मुठ्टीभर अगर केहू बा त ऊ भोजपुरिया लोग (उत्तर-प्रदेश आ बिहार के लोग)। एह लोग के खोजल मरूथल में पानी खोजला लेखा बा। ‘ईद के चाँद’ लेखा कौनो खासे मौका पर एह लोग के दीदार होला। मंदिर में, क्लब में या कवनो सभा समारोह मे एह लोग (भोजपुरिया लोग) के पहचानलो  मुश्किल बा। दोसरा कवनो भाषा के लोग के आप आसानी से पहचान लेब, बाकिर इहाँ भोजपुरिहा के खोजल अन्हार मे सूई खोजला लेखा बा। दूगो मराठी, दूगो बंगाली, दूगो पंजाबी या दूगो गुजराती होइहें त ऊ अपना-अपना भाषा में बतिअइहें, खट से पहचान हो जाई। बाकिर दूगो भोजपुरिहा होइहें त या त हिन्दी बोलिहें या अंगरेजी छटिहें। रउरा पासे में खड़ा रहिहें बाकिर रउरा  हवा ना लागी कि ई हमरा घर के सवाँग हउएँ। ‘लगही पियवा परिचय नाहीं’। हिन्दी त हिन्दुस्तान के हरके राज्य के लोग बोलेला, एह से ई कहल मुश्किल बा कि पास में खड़ा आदमी जे हिन्दी में बतिया रहल बा, उत्तर प्रदेश या बिहारे के होई। अइसना में भोजपुरी एसोसिएसन के बारे में सोचल पागलपने होई। बाकिर बिना पागलपन के कवनो चुनौती भरल काम होखबो ना करे।

आज से साल भर पहिले ठीक 21 अगस्त के ऑल इण्डिया एसोसियसन ऑफ युगाण्डा के तत्वाधान में ‘स्वतंत्रता दिवस’ पर एगो सांस्कृतिक कार्यक्रम (INDIA DAY CELEBRATIONS-2004 ) होत रहे। दर्शकदीर्घा में हमहूँ रहनी। केरला समाज, मराठा मण्डल, राजस्थानी ग्रुप, पंजाबी समाज सभे अपना-अपना क्षेत्र के लोकगीत, लोकनृत्य प्रस्तुत कइलस। हमरा मन में टीस उठल कि का उत्तर-प्रदेश आ बिहार से केहू फगुओ गावे वाला नइखे। हमनी के एतना कंगाल बानी जा कि हमनी के पास देखावे खातिर कुछुओ नइखे?  हमनी के पास आपन कल्चर नइखे कि गीत-संगीत नइखे? आ जब सब बा त हम इहाँ का करत बानी?….हमरा भीतर के भोजपुरी के कीड़ा काटे लागल हमरा के। …. साँच पूछीं त ओही समय हमरा  मन के भीतर  Bhojpuri Association of Uganda  के बीजारोपण हो गइल।….. आ फेर तलाश शुरू हो गइल युगाण्डा में भोजपुरियन के। नगरे-नगरे, द्वारे-द्वारे। बाकिर हमरा कवनो खास सफलता ना मिलल। …..हँ, एने मई महिना में कुछ भोजपुरिया परिवार समेत कम्पाला के सुप्रसिद्ध( S.D.M. Temple) हनुमान मन्दिर में एक-दूसरा से मिलल जरूर रहलें आ हमरा विचार के कुछ बल मिलल रहे।  तबो हम भीतर से सशंकित रहनी।

हमरा सपना के ठोस धरातल मिलल आजमगढ़ के रहनिहार बाबू अजय सिंह से मुलाकात के बाद। अजय बाबू बहुते मिलनसार आ सामाजिक आदमी। ऊ कहलें कि ‘बाबू साहेब अब हमनी के एक से दू हो गइनी जा, ई काम जरूर होई।   2  जुलाई के रात हमनी दूनू आदमी भोजपुरिहा लोगन के एगो लिस्ट बनइनी जा। संस्था के नाम ( जवन कि हम अपना मन में पहिलहीं से सोच के रखले रहनी) धराइल- भोजपुरी एसोसियसन ऑफ युगाण्डा (BAU)।  BAU के पहिला मेम्बर हम (मनोज ‘भावुक’) बननी। दूसरा अजय सिंह। तीसरा हमार पत्नी अनिता सिंह आ चउथा अजय बाबू के पत्नी संध्या सिंह।   ऊ एसोसियसन के पहिला मीटिंग रहे। स्थापना समारोह खातिर भोजपुरियन के खोज-बीन शुरू हो गइल।

संयोग देखीं आज से साल भर पहिले जवना तारीख के ( 21 August ) INDIA DAY CELEBRATION- 2004 के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भोजपुरियन के भागीदारी ना रहला से हमरा मन में टीस उठल आ ओह टीस से  (BAU) के स्थापना के बीजरोपण भइल, ठीक ओही तारीख के यानी 21 अगस्त 2005 के BAU के स्थापना के घोषण हो गइल।

21 अगस्त 2005 दिन रविवार, कोलोलो, युगाण्डा में ‘भोजपुरी एसोसियसन ऑफ युगाण्डा के ‘स्थापना समारोह’  के अवसर पर उमड़ल भीड़ देख के हमार आँख छलक गइल। ढेर लोग के जुबान पर इहे बात रहे कि ‘ हम त जानत रहनी ह कि इहाँ हमहीं अकेले भोजपुरिहा बानी’।    समारोह में कुल 41 आदमी शिरकत कइलें। 10-12 आदमी फोन कइल कि आज हमार ड्यूटी बा, बहुत जरूरी काम पेण्डिग बा। हम आ ना सकब, एकर अफसोस बा, बाकिर हम मन से कार्यक्रम मे शामिल बानी। घरी-घरी ऊ लोग पूछे कि अभी का चल रहल बा। केतना लोग आइल बा। कहाँ-कहाँ से लोग जुटल बा। हमरा जिला के केहू बा कि ना?  कुछ लोग ड्यूटी छोड़ के भाग आइल। कुछ लोग नाइट ड्यूटी कइले रहे, आँख लाल रहे, तबो आइल रहे। कार्यक्रम के शुरू होखे से पहिलहीं पीट-पीट के बरखा होखे लागल शायद भोजपुरियन के ई प्रेम, उत्साह आ उमंग देख के भगवानो के आँख झरे लागल। भोजपुरिया जवान बरखा-बूनी के परवाह ना कइलें। भींज-भींज के लोग-बाग आइल।   समारोह में शामिल 41 आदमी हमरा खातिर 41लाख आदमी रहलें। हम खुशी से पागल रहनी। 41 में एगो भाई उतरांचल के, एगो मिथिलांचल के आ एगो कानपुर के रहलें। शेष 38 खाँटी भोजपुरिया, जवना में सात जानी भउजाई रहली आ एगो हमार पत्नी। यानी 8 गो मेहरारू आ 30 गो मरदाना। अभी हम बाल-बच्चा के गिनबे ना कइली ह। एहू लोग के संख्या आधा दर्जन से कम ना रहे।   कार्यक्रम के शुरूआते मे हम कहनीं कि आज त मन करता कि भाई लोग फागुवा-चइता गावे आ भउजाई लोग कजरी-झूमर। सभे ठठा के हँसल। हँसी के एह फुलझड़ी से कार्यक्रम के शुरूआत हो गइल। दोपहर के एक बजत रहे। लंच के टाइम रहे। भोजन समारोह से कार्यक्रम के शुरूआत भइल। खा-पी के सभे आपन-आपन सीट धके जमके बइठ गइल। सभे चकचिहाइल रहे कि अब का होई?  एह युगाण्डा के धरती पर ई कवन करिश्मा हो रहल बा। भोजपुरियन के मिलन हो रहल बा। ई मिलन समारोह ह। अंग्रेजी में कादो एकरे के गेट-टुगेदर कहल जाला। बाकिर हम सोच लेले रहनी कि हम एकरा के खाली गेट-टुगेदर ना रहे देब। एकरा के एगो यादगार समारोह बनाएब। जे मिलल बा ओकरा के बिछड़े ना देब। सब कोई बकायदे फार्म भरके सदस्य बनल, सदस्यता शुल्क जमा कइलस यानी कि संस्था के फाइल में सबकर नाम, पता, गाँव,जिला, फोन, ई-मेल दर्ज हो गइल। अब केहू कहाँ जाई आ जाये खातिर ई संस्था थोडे बनता। इ त आवे खातिर बनत बा। आवत जाईं जुटत जाईं…. दोसरों के जोड़त जाईं। ई त युगाण्डा के भोजपुरियन खातिर एगो कामन प्लेटफार्म बनत बा, जवना के सख्त जरूरत रहल ह।

घीव के दीया जराके भगवान के पूजन भइल आ ठीक दू बजे महफिल पर भोजपुरिया रंग चढ़े लागल। सभा के संचालन मनोज ‘भावुक’ स्वागत भाषण शुरू कइलें। (BAU) यानी कि ‘भोजपुरी एसोसिएसन आफ युगाण्डा’  के स्थापना खातिर मन मे परल बीज के अँखफोर होखे के कहानी सुनवलें। सबके हार्दिक स्वागत कइलें आ फेर आज के कार्यक्रम के अध्यक्षता खातिर Mukwano group of companies  के जनरल मैंनेजर आजमगढ़ के रहनिहार श्री वी.पी.त्रीपाठी आ मुख्य अतिथि के रूप में  Polysac Industry के मैंनेजर श्री  अखिलेश मिश्रा के मंच पर आमंत्रित कइलें। एकरा बाद अजय सिंह सभा में आइल सब भोजपुरियन के एक-दोसरा से परिचय करवलें। लोग जान गइल कि के कवना जिला से आइल बा, कवना कम्पनी में आ कवना पोस्ट पर काम करेला वगैरह-वगैरह आ फेर ऊ मंच मनोज ‘भावुक’ के सुपुर्द कर देले। एकरा बाद ‘भावुक’ के लमहर भाषण भइल।  ‘भावुक बतवलें कि (BAU) के स्थापना के का जरूरत बा।

  1. कॉमन प्लेटफार्म
  2. ऑल इण्डिया एसोसियसन ऑफ युगाण्डा के कार्यक्रम में भोजपुरियन के उपस्थिति।
  3. तीज त्यौहार पर एकजुट होके गावल-बजावल, मिलल-जुलल।
  4. विश्व के तमाम देशन मे बनल भोजपुरी संगठन से जुड़ल। सूचना, योजना, विचार आदि के आदान-प्रदान।
  5. विश्वजाल(internet) पर फइलल भोजपुरी में युगाण्डा के भी एगो अध्याय जोड़ल।
  6. भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन से जुड़ल आ जोड़ल। (हरेक भोजपुरिया के कम से कम एगो भोजपुरी पत्रिका, खरीद के मंगावे के चाहीं, पढ़े के चाहीं आ चिट्ठी-पत्री करेके चाहीं। एह से ज्ञान आ मनोरंजन के अलावा भोजपुरी पत्रकारिता के बल मिली, भोजपुरी के प्रचार-प्रसार होई)।

भोजपुरी साहित्य के चर्चा करत ‘भावुक’ कहलें कि भोजपुरी क्षेत्र के दिग्गज साहित्यकार लोग माई के फाड़ में से निकाल-निकाल मउसी के आँचर भरत रहल लोग। एकरा के अइसे समझीं कि ऊ लोग यशोदा मइया( हिन्दी) के सेवा में अइसे अझुराइल लोग कि देवकी मइया( भोजपुरी) एकदम से बिसर गइली। ना त आज भोजपुरी के कुछ दोसरे तस्वीर रहित। एकरा बावजूद भोजपुरी में जवन साहित्य-सृजन हो रहल बा, ओकरा के लेके हमनी कवनो भाषा के समकक्ष खड़ा होखे में समर्थ बानी। हिन्दी खातिर जौन हमनी के कुर्बानी देहनी जा आ दे रहल बानी जा, ओकर कवनो अफसोस नइखे। ओकरा खातिर हमनी के छाती उतान बा। बाकिर मातृभाषा के भूलल-बिसरावल या ओकरा प्रति ना सोचल शर्म के बात बा। मातृभाषा महतारी लेखा होले आ महतारी के स्थान देवता-पीतर से ऊपर बा। पहिले घर में दीया बार के मन्दिर में दीया जराईं। घर में अन्हार रही त ओह में दलिदर घुस जाई। भाई हो एही दलिदर ले भगावे के बा। एकरे खातिर (BAU) के स्थापना कइल जा रहल बा।  भोजपुरी देश-विदेश पर चर्चा के अंतर्गत खास क के दूगो देश मारिशस आ गुयाना में भोजपुरियन के स्थिति पर बड़ी विस्तार से चर्चा भइल।  मारिशस के नाम ‘मारिच द्वीप’ कइसे पड़ल। इहाँ भोजपुरिया कइसे अइलें। 12 लाख आबादी वाला मारिशस में आठ,साढ़े आठ लाख आबादी वाला भोजपुरी भाषा के आज का स्थिति बा। भोजपुरी बहार (मारिशस टी.वी के कार्यक्रम ), मारिशस में भोजपुरी के किताब, नाटक प्रतियोगिता आदि पर रोचक ढंग से चर्चा करत सरिता बुधु (महात्मा गाँधी संस्थान), श्रीमती सुचिता रामदीन, श्रीमती सीतारामयाद आ श्री दीमलाला मोहित आदि के योगदान के भी चर्चा भइल।  एह तरे गुयाना के राष्ट्रपति भरत जगदेव जे कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हउवन, के चर्चा करत बतावल गइल कि केह तरे  169 साल पहिले गुयाना पहुँचल गिरमीटिया शासन-सत्ता पर आपन कब्जा जमा लेले बाड़न।  भोजपुरी के पढ़ाई-लिखाई के बारे में बात-चीत करत मनोज ‘भावुक’  कहलें कि भोजपुरी अब इनार-पोखरा, खेत-खलिहान आ बँसवारी-घोंसारी से यूनिवर्सिटी आ पार्लियामेंट तक में पहुँच गइल बिया। एह में एम.ए. आ पी.एच.डी. हो रहल बा। लगभग हरेक विधा-कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, यात्रा वृतांत, गजल, संस्मरण, व्याकरण, शब्दकोष, मुहावरा-कोष आदि पर उच्च श्रेणी के किताब उपलब्ध बा। भोजपुरी के आठवीं अनुसुची में शामिल करे खातिर संसद में माँग उठावल गइल बा। इहो दुनिया के एगो अचरज बा कि एगो भाषा (भोजपुरी) दुनिया के 14 गो देश में 16 करोड़ लोग बोलेला, तबो एकरा के 8 वीं अनुसुची में शामिल नइखे कइल गइल।   भोजपुरी पत्रकरिता के चर्चा कई बेर भइल। एह बात पर बहुत जोर देहल गइल कि हरेक भोजपुरिया के ई नैतिक जिम्मेवारी बा कि उ कम से कम एगो भोजपुरी पत्रिका खरीद के जरूर पढ़ो। भोजपुरी के लगभग सब महत्त्वपूर्ण पत्रिकन के चर्चा भइल आ साथही विश्व भोजपुरी सम्मेलन, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद, भोजपुरी संस्थान, रंगश्री आदि भोजपुरी के कई गो महत्त्वपूर्ण संस्थान के योगदान पर भी मनोज भावुक प्रकाश डललन।   एकरा बाद चर्चा भइल इलेक्ट्रानिक मीडिया के- भोजपुरी के कैसेट, भोजपुरी सिनेमा, धारावाहिक आ टेलिफिल्म के।   ‘भावुक’ कहले कि भोजपुरी के बर्बाद करे में भोजपुरी के अलूल-जलूल कैसेटन के सबसे बड़ हाथ बा। एह कुकुरमुत्ता नियर फइलत भकचोन्हर गीतकारन के बियाइल कैसेटन में लंगटे होके नाचत बिया भोजपुरी संस्कृति। एहनिये के चलते भोजपुरी के नाम पर लोग नाक-भौंह सिकोड़ेला। एह पर रोक लागल जरूरी बा, आ साथ ही जबाब में भोजपुरी के उच्च श्रेणी के गीत जवना में भोजपुरिया संस्कृति के दुलहिन सज-धज के आवस आ सबकर मन मोह लेस, अइसन गीतन के कैसेट बाजार में आवे के चाहीं।  भोजपुरी सिनेमा पर चर्चा करत ‘भावुक’ जानकारी दिहलें कि भोजपुरी सिनेमा के विकास-यात्रा’ नामक उनकर एगो शोध-पुस्तक बा, जवना में लगभग दौ सौ (200) भोजपुरी फिल्म के कथा, गीत-संगीत, कलाकार आदि के डिटेल्स बा, साथ ही भोजपुरी सिनेमा के इतिहास, भोजपुरी धारावाहिक, टेलीफिल्म आ सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक-अभिनेता जइसे कि अमिताभ बच्चन, सुजीत कुमार, राकेश पाण्डेय, कुणाल सिहं, निर्माता मोहन जी प्रसाद, अशोक जैन, विनय सिन्हा, आदि के साक्षात्कार भी शामिल बा।  साथ ही एह घरी के कुछ नया फिल्मन के चर्चा भइल जइसे कि ‘पण्डी जी बताई ना बियाह कब होई’। ई फिल्म एह घरी पश्चिम बंगाल में खूबे धूम मचवले बा।  के डी एम प्रोडक्शन के शिवम श्याम त्रिपाठी के फिल्म ‘दुलहिनिया चलल ससुराल’ में हिन्दी मूवी के मशहूर हिरोइन जूही चावला एगो विधवा के रोल में बाड़ी। ‘पण्डीजी बताई ना बियाह कब होई’ में भी हिन्दी हिरोइन नगमा काम कर रहल बाड़ी।   बिग बी के भी एगो भोजपुरी फिल्म में आवे के खबर सुनाता।   एकरा अलावा ‘नइहर के चुनरी’ पिया के साड़ी’ जवना के शूटिंग बलिया में भइल आ श्री उमेश कुमार सिंह (नई दिल्ली) के देख-रेख में निर्माणाधीन फिल्म ‘सती-बिहुला’ के भी चर्चा भइल। भोजपुरी सिनेमा खातिर कहानी के बारे मे ऊ कहलें कि सोरठी वृजाभार, सीत-वसंत या आचार्य पाण्डेय कपिल के उपन्यास ‘फुलसुंघी’ मे एतना फिल्मी मटेरियल बा कि अगर एह पर ढंग से फिल्म बने त एह में कवनो शक नइखे कि ऊ भोजपुरी सिनेमा खातिर मील के पत्थर साबित होई। ‘फुलसुघीं’ त भोजपुरी के एगो अइसन उपन्यास बा, जेके जेतने पढ़ी, कम बा। हम एकर नाट्य रूपांतर कइले बानी, मंचन भी भइल बा। एह पर फिल्म या धारावाहिक जरूर बने के चाहीं।  भोजपुरी सिनेहस्ती से भेंटवार्ता आ फिल्म शूटिंग के रोचक आ हास्य संस्मरण भी सुनवलें ‘भावुक’, जवना के सुन के लोग लोट-पोट हो गइल।   आ सबसे अंत में चर्चा भइल (Internet ) पर। ‘भावुक’ सूचित कइले कि भोजपुरी के एगो बेवसाइट ( www.bhojpuri.org) अभी निर्माणाधीन बा, तबहूं ओह पर बहुत सामग्री उपलब्ध बा। देश-विदेश के भोजपुरियन से बात-चीत करे के त ई एगो बहुत बढ़िया प्लेटफार्म बा। एही प्लेटफार्म के जरिये यू-एस ए, यू.के, सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिण अमेरिका, मारिशस  आ दुबई जइसन जगह से (BAU) के स्थापना समारोह पर शुभकामना आ बधाई से भरल कई गो चिट्ठी आइल बा। (BAU) के स्थापना के घोषणा के ई असर भइल कि अमेरिका में भी एगो भोजपुरी एसोसिएसन (Bhojpuri association of America) के निर्माण शुरू हो गइल। लेकिन ई प्रयास अभी इण्टरनेटी बा, लोग सिर्फ (e-mail) से  ही एह ग्रूप (Bhojpuri-usa) से जुड़ल बा। भोजपुरी के मुख्य बेवसाइट (www.bhojpuri.org) के (A apna log- Database of Bhojpuri) पेज मे आप जाईं आ जवना देश के भोजपुरिया से बात-चीत करे के बा या आप ओह देश में जात बानी आ सम्पर्क करे के बा त आप इहाँ ओह देश में रहे वाला भोजपुरी भाई-बहिन के नाम, पता, इमेल फोन आदि एह (Database) पेज पर खोज सकत बानी। एह साइट से जुड़ल सिंगापुर के भाई शाशिभूषण राय के भी एगो साइट बा ‘भोजपुरी नालेज कल्चर। एहू पर भोजपुरी के कुछ सामग्री बा। … हम सिंगापुर से ही जुड़ल एगो ताजा खबर सुनावत बानी कि भाई नीरज चतुर्वेदी के नेतृत्व में सिंगापुर गर्वनमेण्ट के खाता में ‘सिंगापुर भोजपुरी रजिस्टर्ड हो गइल। ई हमनी खातिर एगो अच्छा खबर बा। एकरा वास्ते (BAU) के तरफ से नीरज भाई के बधाई। त कहे के मतलब कि इण्टरनेट पर बहुत काम हो रहल बा। लोग छटपटाता आपस में बतियावे खातिर, एक दूसरा के जाने खातिर। इहाँ तक कि कुछ लोग जे सौ-दू सौ साल पहिले भारत छोड़ के दोसरा देश गइल ( गिरमिटिया) ऊ अपना पूर्वज के पता लगावे खातिर तड़प रहल बा। अइसन कई गो चिट्ठी हमरा पास आइल बा। भोजपुरी बेवसाइट पर एह समस्या के निदान के भी उपाय हो रहल बा।….. भोजपुरी साहित्य के इण्टरनेट पर ले आवल जरूरी बा ताकि दुनिया के लोग एकर लाभ उठा सके। भोजपुरी बेवसाइट पर मात्र एगो साहित्यिक किताब मनोज ‘भावुक’ के गजल-संग्रह ‘तस्वीर जिन्दगी के’ उपलब्ध बा, उहो रोमन में। दरसल भोजपुरी में एगो पूर्णत साहित्यिक बेवसाइट के जरूरत बा।   ‘भावुक’ आपन भाषण एह अनुरोध के साथ खतम कइलें कि हमनी इहाँ एकजुट होके  BAU  के  मजबूत करीं जा। एकरा के विश्वजाल(Inaternet) पर फइलल भोजपुरियन से जोड़ीं जा, कम से कम एगो भोजपुरी पत्रिका अवश्य पढ़ीं जा। आज जवन कामन प्लेटफार्म बनता, समय-समय पर आके फगुआ,कजरी, चइता गाईं जा। आन्नद मनाईं जा। … हमनी में केहू गायक या कलाकर निकले त युगाण्डा के कार्यक्रम में भोजपुरी के भी उपस्थिति दर्ज कराई जा। समय-समय पर विचार गोष्ठी करी जा। … (BAU) के सुचारू रूप से संचालन खातिर जुझारू आ दुधारू यानी कि श्रम देवे वाला आ धन देवे वाला दूनू तरह के लोगन के अधिक से अधिक संख्या में जोड़ी जा। अगिला समारोह में संस्था के एगो समिति बने, एगो कमेटी बने, एगो रणनीति बने… आ हमनी के भोजपुरी के मशाल जरा के चल पड़ीं जा। ….. जै भोजपुरी….. जै भोजपुरी संसार।

एक-डेढ़ घण्टा के ई लमहर भाषण कइसे खतम हो गइल लोगन के पते ना चलल। दरअसल युगाण्डा के भोजपुरिया खातिर ई सब बातचीत एकदम नया रहे। सभे अपना के एक नया अनुभव से गुजरत महसूस कइल। एकरा बाद कार्यक्रम के विराम दिहल गइल। लोग चटनी आ समोसा के साथे कोकोकोला के चुसकी लिहल। फेर मनोज ‘भावुक’ (BAU)  स्थापना समारोह पर देश-विदेश से आइल कुछ चुनिन्दा चिट्ठियन( शुभकामना आ बधाई) के पढ़ के सुनवलें।…. देश से आइल चिट्ठियन में भोजपुरी संस्थान, सम्मेलन आ परिषद के अध्यक्ष आ नामी-गिरामी साहित्यकार लोग के आशिर्वाद रहे त विदेशन से विभिन्य देश के भोजपुरी संगठन के अध्यक्ष, साइट के माडरेटर आ भोजपुरी के खोजबीन करें वाला भाई बहिन के उद्गार आ विचार रहे।

मारिशस से श्रीमती सुचीता  रामदीन त अपना चिट्ठी में (BAU) खातिर एगो बड़हन लेख भेजे के वादा कइली। साथही ईहो सूचना देली कि मारिशस में भी अगिला भोजपुरी सम्मेलन के विचार बा। रंगश्री, दिल्ली अध्य्क्ष श्री महेन्द्र सिंह सास्कृतिक कार्यक्रम करत रहे के सुझाव भेजनी। विदेश से एगो भाई सतीश उपाध्याय सवाल कइले कि हम दार-ए-सलाम आ तंजानिया में भोजपुरी एसोसियशन बनावल चाहत बानी, कुछ रास्ता बतावल जाय कि हम कइसे का करीं। मलेशिया से श्री रमांशकर सिंह ई. मेल कइले कि भाई तू लोग कइसे एसोसियशन बना ले ल लोग, हम त खूब कोशिश के बावजूद 5 आदमी से बेसी ना जुटा सकनी। पिछला साल होली मनइनी जा बाकिर ओमे खाली भोजपुरी ना पूरा उत्तर भारतीय रहले। बाकिर हमनी पूरा प्रयास में बानी जा। सिंगापुर से भाई नीरज चतुर्वेदी के पत्र गौर करें लायक बा- (Manoj Bhai, that Graet work done by you in Uganda. I was just thinking if we can replicat this “Bhojpuri Group” across  world  e.g. we have already  Bhojpuri Group in Singapore, Bangalore, and Delhi and it easily replicated to Guyana, Surinam ,south Africa, Thailand,Malaysia, Canada etc. ) श्री दीपेन्द्र सिन्हा के प्रयास सराहनीय बा-( It is interesting to know that these is a Bhojpuri samaj in Uganda. I run a Bihari organization in San Francisco Area and invite all bihari People and Bhojpuri group to join me at the following-group. yahoo.com/group dipendra sinha ). अमेरिका से शैलेश मिश्रा (USA) में रहे वाला भोजपुरियन खातिर एगो ग्रुप बनवले बाड़न । Group name- Bhojpuri- USA Group home page – group.yahoo.com/group/bhojpuri-USA Group Email-bhojpuri-usa@yahoogroups.com  एही तरे युनाइटेड किंगडम(U.K.) में भोजपुरी के एगो ग्रुप बनवले बाड़न राजेश पाण्डेय।      bhojpuri_ukgroup@yahoo.com     दक्षिणी अमेरिका से एगो बहिन के ग्रिटिंग्स आइल बा- (Pranam, Manoj Bhaiya. Greetings from a Bhojpuri bahan from south America. I am 4th generation PIO. I see that you are from Uganda are you a descendant of immigrants (girmitya) like myself or are you all just Indian who have there to live/work? I am Searching for descenants of Girmityas around the Globe. with kind rigands- Nanda.  कोलकाता से पहरूवा के सम्पादक भाई विमल राय फोन से हमरा के बधाई आ शुभकामना देहले।  करीब 30-35 गो मेल हमरा पास आइल बा, सबसे समेटल संभव नइखे। दरअसल हम डाक या फोन से केहू के BAU  के स्थापना के सूचना ना देले रहीं । भारत से कुछ साहित्यिक मित्र लोग के शिकायत आइल बा कि तू हमरा के खबर ना देल। हम क्षमा चाहब। ई सूचना ओही लोग के दीहल गइल रहे जे (Internet) से हमरा सम्पर्क में बा। डाक विभाग के कछुआ चाल के चलते पत्राचार के मन ना बनल पर आगे से हम ध्यान राखब।   मनोज भावुक चिट्ठी पढ़ला के बाद कहले कि आप सब देखत हई कि केह तरे दुनिया भर में भोजपुरी के ग्लोबलाइजेशन हो रहल बा। एही सिलसिला में एगो कड़ी के रूप में BAU के स्थापना कइल जा रहल बा। BAU एगो कामन प्लेटफार्म बा युगाण्डा के भोजपुरियन खातिर। Internet पर Bhojpuri website  एगो कामन प्लेटफार्म बा दुनिया भर के भोजपुरियन खातिर। हम एगो बात इहाँ कहल चाहब कि पत्र-पत्रिका भी एगो कामन प्लेटफार्म ही होला। हमनी ( BAU) आज जवन कर रहल बानी,  पत्रिका में छपी, भारत के लोग जान जाई। दुनिया भर के लोग जवन करता, ऊ पत्रिका में छ्पता त हमनी के जान जात बानी। एह से पत्र-पत्रिका से जुड़ल त अनिवार्य बा। हम विश्व के तमाम भोजपुरी संगठन के एगो ई-मेल करे जा रहल बानी, जवना में भोजपुरी के समस्त पत्र-पत्रिकन के सूची(आ पता) जारी करब आ सबसे निहोरा करब कि एह पत्रिका से, प्रिंट मीडिया के एह कामन प्लेटफार्म से अवश्य जुड़ीं, ना त हमनी के (Organisation) अधूरा रह जाई आ हम आप सबसे भी उम्मीद करत बानी कि आप बहुत जल्दी भोजपुरी पत्र-पत्रिकन के सदस्य बनब ।….Internet पर एगो भोजपुरी पत्रिका निकालल बहुत जरूरी बा। हम भोजपुरी पत्रिकन के सम्पादक लोग के भी एगो चिट्ठी लिखे जा रहल बानी कि अगर सम्भव होखे त आपन पत्रिका के  Internet से अवश्य  जोड़ी।   एकरा बाद मनोज भावुक सभा में उपस्थित भाई लोग के आपन उद्गार व्यक्त करें खातिर आमंत्रित कइलें। मात्र दूगो नाम आइल। अधिकांश लोग के इहे कहनाम रहे कि अगिला बार। कुछ लोग इहो कहत सुनाइल कि हम त सोचनी कि खाली दाल-भात यानी कि भाई के भवधी होई, बाकिर इहाँ आके त आँखे खुल गइल। उद्गार व्यक्त करें वाला दूगो भाई लोग दुइये शब्द में बहुत बड़ बात कह गइल-‘आपन भोजपुरी एतना ऊपर उठ गइल आ हमनी सुतले बानी जा।… अब हमनी के जाग जाये के चाहीं। एह दूनू भाई लोग के बोलला के बाद कुछ लोग अउर जोशिआइल। ऊ लोग मंच पर आके भोजपुरी के नाम के नारा लगावल, प्रणाम कइल आ संकल्प लीहल कि हमनी भोजपुरी खातिर कुछ करब ।

स्थापना समारोह के दूसरा चरण सांस्कृतिक कार्यक्रम रहे। बहुत जोर लगावल गइल कि भाई लोग में से केहू कुछ कढ़ावे खातिर राजी हो जाय। बाकिर सभे इहे कहल कि ‘अगिला बार ढोलक-झाल आई।…हमनी के का मालूम रहल ह कि एतना महफिल जमीं, एतना भीड़ होई’।…अंत में कुछ करीबी मित्र लोग के जिद्द आ अध्यक्ष जी के विशेष आग्रह पर सभा के संचालक मनोज ‘भावुक’ के ही एकल काव्य-पाठ खातिर तइयार होखे के पड़ल । ‘काचर-कूचर कउवा खाई, घीव के लोदा बबुआ खाई’ से ‘भावुक’ आपन काव्य-पाठ शुरू कइलें।… फेर गजल के दौर चलल- ‘शेर जाल में फँस जाला त सियरो आँख देखावेला’।…… ‘मुहब्बत खेल ह अइसन कि हारो जीत लागेला’।…..आ… ‘जिनिगी के जख्म,पीर जमाना के घात बा’,… के बाद एगो गीत ‘बबुआ भइल अब सेयान कि गोदिये नू छोट हो गइल’।  लोग त भुलाइये गइल रहे कि हम देश से बहुत दूर ……सात समुन्दर पार युगाण्डा में बानी। लागल कि सभे अपना घर-अँगना में बइठल गावत-बजावत बा।…. बाहर के टिप-टिप बन्द हो गइल रहे। घड़ी के सुई टिक-टिक करत शाम के साढ़े चार पर पहुँच गइल रहे। हम जनता-जनार्दन से इजाजत लेके आपन काव्य-पाठ बन्द क देनी। अब बारी रहे आज के मुख्य अतिथि आ अध्यक्ष के।

मुख्य अतिथि श्री अखिलेश मिश्रा आपन भाषण में अत्यंत ‘भावुक’ होके बस अतने कह पवनी कि ‘आज के कार्यक्रम देख के हमरा त अचरज होता कि जब मनोज ‘भावुक’ टेक्निकल फिल्ड में होके,एगो इंजीनियर होके आपन एतना प्रभाव डाल रहल बाड़न कि मन नइखे करत कि कार्यक्रम खतम होखे, बात खतम होखे…. त जे भोजपुरी के योद्धा होई, जे दिन-रात भोजपुरी खातिर काम करत होई, ऊ सामने आई त का हाल होई। धन्य बा भोजपुरी। हम एह भोजपुरी के शत-शत प्रणाम करत हईं।   अध्यक्षीय भाषण करत श्री वी.पी. त्रिपाठी जी कहनी कि युगाण्डा में रहत हमरा एगारह साल हो गइल। हम आइल रहनी त हम अकेला रहनी, आज हमनी 41 बानी, काल्ह 100 होखीं आ फेर हजार। ई संख्या धटो मत, जोश कम मत होखे। जइसे आज BAU के स्थापना पर देश-विदेश से बधाई आइल बा, हमनी के अइसन काम करी जा कि देश-विदेश के लोग हमनी से प्रेरणा लेबे।

श्री अजय सिंह धन्यवाद ज्ञापन कइलें। कार्यक्रम समाप्त हो गइल। लोग पर्दा हटा के खिड़की से झाँकल। आकाश साफ हो गइल रहे। बदरी छट गइल रहे। सभका चेहरा पर रौनक, उमंग आ खुशी झलकत रहे। लोग सभागार से निकल के पहिले भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन आ पोस्टरन के अवलोकन कइल। हम भोजपुरी के कई गो पत्र-पत्रिका के कवर पेज, भारत आ विश्व के भोजपुरी क्षेत्र के मानचित्र, आ इण्टरनेट से डाउनलोड कइल भोजपुरी के कई गो महत्वपूर्ण सूचना दीवार पर चिपका देले रहीं। लोग पढ़ल। कुछ लोग कुछ नोट कइल। लोग के जिज्ञासा ओराते ना रहे। सवालन के झड़ी लाग गइल। बाहर के खुला मैदान में हम अपना लोगन से घिरल रहनी। कुछ लोग अपना-अपना कार के सीसा पोछे में लागल रहे। कुछ भउजाई लोग अपना-अपना मरद के चिन्हावत रहे। एगो भउजाई हमरा ओर इशारा क के हमरा मेहरारू के मटकियावत रहली। धीरे-धीरे चुप्पी आ सन्नाटा पसरे लागल। कार गेट से बहरी निकले लगली सन। गेट के एगो कोना पर हम आ दूहरा पर अजय भाई हाथ जोड़ के खड़ा रहलें। धीरे-धीरे सभे निकल गइल। हमनी दूनो आदमी एक दोसरा के मुँह निहारे लगनी जा। केहू-केहू  से कुछ बोलल ना। वापस सभागार में अइलीं जा। भीतर घुसे के मन ना करत रहे। भीतर साँय-साँय, भाँय-भाँय के आवाज रहे। अचानक आँख जाके सामने के बोर्ड पर टँगा गइल -भोजपुरी एसोशिएसन आफ युगाण्डा स्थापना समारोह 21 अगस्त 2005


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min2000

ज्योत्स्ना प्रसाद

जवाना घड़ी हमार शादी भइल, ओह घड़ी हमार पासपोर्ट अभी बनल ना रहे। पासपोर्ट खातिर अप्लाई कइला से पासपोर्ट हाथ में अइला तक करीब-करीब दू महीना के समय लाग गइल। पासपोर्ट बनते हमार पति छुट्टी लेके अइलन आ हम उनके साथे रिपब्लिकन ऑफ यमन आ गइनीं। जब कभी कवनों अइसन प्रसंग चलेला त ऊ आजो बहुत गर्व से कहेलन कि हम त तहरा के हनीमून खातिर विदेश लेके आ गइनीं।

हमरा यमन अइला के रउआ हनीमून कह लीं, पति के नौकरी पर आवल कह लीं या फिर मजबूरी ही कह लीं। काहेकि जवना घड़ी हमार बिआह भइल, ओह घड़ी हमरा ससुराल में कोई अपनहिअन में के औरत घर में स्थाई रूप से रहत ना रहे। सब लोग शादी में आइल रहे। शादी के सब विधि समाप्त होते ही सबका अपना-अपना मंजिल पर लौट जायेके रहे। कारण हमरा सास के देहावसान बहुत पहिले ही हो गइल रहे। ननद अपना ससुराल से शादी खातिर आइल रहली। हमार जेठानी भी शादी में ही आइल रहली, जिनका कुछ दिन हथुआ में रहके वापस लौट जायेके रहे। ई सब बात त हम जानत ना रहनीं। एह से एह बात पर कभी सोचले भी ना रहनीं। बाकिर एक दिन हमार ससुर जी, हमरा के बुलाके कहनीं कि दुलहिन अभी ई जे अपना घर में चहल-पहल देखतारु ई सिर्फ चन्द दिन के ही मेहमान बा। एकरा बाद घर में सन्नाटा छा जाई। काहेकि मिट्ठन अपना पति के पास लौट जइहें आ बड़की दुलहिन अपना पति के पास। अब बचलू तू। तहार पति त इण्डिया में बाड़न ना जे तू उनका लगे चल जइबू। एह से, अब तहरा सोचे के बा कि तहरा एइजा रहे के बा कि अपना नइहर? अपना ससुर जी से अचानक ई बात सुनके हम बड़ी असमंजस में पड़नी कि हम उहाँ से का कहीं आ का ना? काहेकि हमरा सामने अकस्मात अइसन परिस्थिति उत्पन्न हो गइला रहे जवना के चलते हमरा कुछऊ समझ में ना आवत रहे। हमरा अपना सपना में भी एह बात के एहसास ना रहे कि अपना ससुराल पहुँचते ही हमरा अइसन परिस्थिति से सामना करे के पड़ी। एतने भर ना, हमरा अइसन आदमी त एकर कभी कल्पना भी ना कर सकत रहे। दोसर बात ई भी रहे कि एह तरह के कौनो बोल्ड निर्णय लेबे के हमरा कभी जरूरत ही ना पड़ल रहे। संस्कार भी अइसन रहे कि अपना बाबूजी से भी कभी खुलके अपना मन के बात ना कइनीं त अपना ससुर जी से भला का करतीं? एह से चुप रहल ही श्रेयस्कर समझनीं। सोचनी वइसे भी हमरा कहला-ना-कहला से फर्क भी का पड़े के बा? जइसन होई देखल जाई। जब जइसन घर के बड़-बुजुर्ग लोगन के निर्णय होई, ओइसन कइल जाई। खैर, दू-ढाई महीना के समय रहे, नइहर-ससुरा करत गुजर गइल।

हमरा पति के ईब्ब यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग में यूनिवर्सिटी टीचर के नौकरी रहे। वैसे शुरू में ईब्ब स्वतंत्रत यूनिवर्सिटी ना रहे बल्कि सना यूनिवर्सिटी के पार्ट रहे। बाद में स्वतंत्रत यूनिवर्सिटी भइल। ईब्ब रिपब्लिकन ऑफ यमन के एगो गवर्नरेट के हेड क्वाटर ह, जवना के नाम पर ओह गवर्नरेट के नाम पड़ल बा। ई एगो हिल स्टेशन ह। जे काफी उँचाई पर बा। एह शहर के विशेषता ई बा कि एह शहर में एके समानान्तर में कइगो सड़क बा। बाकिर कवनों सड़क एक लेबल में नइखे। कवनों पाँच फीट ऊँचा बा त कवनों चार फीट नीचा।

हम फरवरी के अंत में यमन गइल रहनीं। जून के अंत ले कॉलेज में इम्तिहान खत्म होखे के रहे। काहेकि जुलाई से काॅलेज में साठ दिन के सलाना छुट्टी होखे के निश्चित रहे। एह से जून के अंतिम सप्ताह में हमनी अपना सामान के पैकिंग आ घर के लोगन खातिर उपहार आदि के खरीदारी में व्यस्त हो गइनीं सन।

भारत लौटला पर एक सप्ताह भी अस्थिर से ना रह सकनी सन। नइहर-ससुरा आ रिश्तेदारे लोगन से मिलत-जुलत पूरा छुट्टी खत्म हो गइल। बाकिर एह बीच एक काम अच्छा भइल कि हम अपना पीएचडी के रजिस्ट्रेशन खातिर पटना यूनिवर्सिटी में अप्लाई क देहनीं आ अपना टॉपिक के अनुरूप किताब आदि भी अपना साथे लेते गइनीं।

हमरा अपना शोध के दौरान पूरा सत्र् स्थाई रूप से पटना में ना रहला के कारण, अपना शोध के समय स्वयं ही अधिक मेहनत करे के पड़ल। एकर नतिजा ई भइल कि हमरा कवनो कठिन चीज़ समझे खातिर ओकरा के बार-बार पढ़े के पड़े। इहे आगे चलके हमरा खातिर वरदान साबित भइल। हम बड़ा मनोयोग से आपन थीसिस पूरा कइनीं। हमार थीसिस  सन् 1999 में समिट हो गइल। थीसिस लिखत समय हमार स्वाभाविक रूप से व्यस्तता रहे। बाकिर ओकरा जमा भइला के बाद एक रिक्तता सा आगइल। हमरा बुझइबे ना करे कि हम आपन समय के सही तरीका आ सृजनात्मक ढंग से कइसे व्यतीत करीं ? एह से एक-के बाद एक कइगो प्रोजेक्ट पर काम करे लगनीं। जवना में अरबी भाषा के सीखला से लेके ‘रिपब्लिकन ऑफ यमन’ पर किताब के पाण्डुलिपि तइयार करे तक के काम शामिल हो गइल। हमार ‘रिपब्लिकन ऑफ यमन’ पर लिखल किताब के पाण्डुलिपि हमार आदरणीय गुरु आ मार्गदर्शक स्व. नंदकिशोर नवल के बहुत पसंद रहे। उहाँ के ओकरा खातिर बहुत शुभ कामना भी देहले रहनीं। बाकिर दुर्भाग्य से ऊ पाण्डुलिपि अभी तक पुस्तकाकार में ना आ सकल। बाकिर ओही पाण्डुलिपि के आधार पर हम रउआ लोगन से यमन के कुछ जानकारी शेयर करतानीं।

रिपब्लिकन ऑफ यमन विश्व के प्राचीन देशन में से गिनल जाला। ई क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से सऊदी अरबिया के बाद दूसरा सबसे बड़ा अरब देश ह। प्राचीन काल के ज्ञात इतिहास में यमन के अधिकांश हिस्सा पर देशी राज्य शबा के अधिकार रहे। जेकर राजधानी रहे माऽरीब। यमन के एह शबा राज्य आ माऽरीब राजधानी के बहुत नाम रहे। ओह राज्य के भग्नावशेष आ पुरातात्त्विक साक्ष्य कई जगह मिलल बा। जवना के देखले से ई पता चल जाला कि यमन के इतिहास बहुत गौरवशाली रहे। बाइबिल के कई परिच्छेद में दसवीं शती B.C. के King Solomon आ माऽरीब के रानी शिवा के जिक्र बा। कुरान में भी Queen of Sheba के King Solomon से मिले के घटना के उल्लेख बा। इहाँ तक कि Queen of Sheba के प्रसंग में कुरान में सबसे ज्यादा यमन के ही चर्चा बा।

सिर्फ यमन में ही ना, ओकरा आस-पास के देशन में भी रानी शिवा के नाम आजो बहुत सम्मान से लेहल जाला। हालाँकि कुछ इतिहासकारन के रानी शिवा के मूल स्थान पर मतभेद बा। बाकिर अरब परम्परा में उनका के माऽरीब के ही मानल जाला, जे यमन के ही एगो भाग ह। ‘Qeen of Sheba’ के अरब परम्परा में Bilqis कहल जाला। ई ऐश्वर्य आ धन के प्रतीक रहली। उनकर राज्य सुख-संपदा आ वैभव से परिपूर्ण रहे। काहेकि उनका शासन काल में यमन महत्त्वपूर्ण वैपारिक-मार्ग रहे। जवना से होके ही धूप,लोहान,बखूर जइसन सुगंधित पदार्थ दूसरा अरब देशन में जात रहे। एह से एह मार्ग के  सुगंधित मार्ग कहल जात रहे। एह मार्ग पर रानी शिवा के ही अधिकार रहे। एह से ‘कर’ के रूप में राज्य के काफी आमदनी हो जात रहे।

सैकड़ों बरिस बाद, काॅफी यमन के आय के मुख्य साधन हो गइल। यमन के जवना बंदरगाह से काॅफी के निर्यात होत रहे, ओह बंदरगाह के नाम ह मोखा (Mukha) ।  इहे बंदरगाह यूरोपियन खातिर मोचा (Mocha) हो गइल। विश्व प्रसिद्ध मोचा काॅफी यमन के एही मोखा बन्दरगाह से निर्यात होत रहे। एही से एह बंदरगाह के नाम पर मोचा काॅफी कहाये लागल।

यमन एगो प्रायद्वीप ह। एकर जलवायु भी बहुत बढ़िया बा। जे एकरा के संपन्नता प्रदान करेला। अन्य खाड़ी देशन के विपरीत यमन के कुछ हिस्सा प्राकृतिक रूप से काफी हरा-भरा बा। कवनो-कवनो क्षेत्र में त साल में दू बार बरसात के मौसम आवेला। जवना के चलते पूरा यमन के ही ‘Green Yemen’ कहल जाला। खासकर ओह क्षेत्रन के जहाँ बहुत हरियाली बा, ओकरा के पूरा खाड़ी देशन में ‘लोआल अखदर’ यानी ‘ग्रीन बेल्ट’ के नाम से पुकारल जाला।

यमन के एगो प्रसिद्ध नगर ह Aden. ई नगर अरब सागर के तट पर बसल बा। इहाँ बहुत अधिक गर्मी पड़ेला । एह से Aden के ‘White man’s grave’ भी कहल जाला। बावजूद एकरा, एकर भौगोलिक स्थिति के देखते हुए ब्रिटिश साम्राज्य एकरा के आपन ‘colony’ बना लेहलस। काहेकि समुद्र-मार्ग से एडेन से इण्डिया आइल-गइल बहुत आसान बा। एह से ई इण्डिया आवे खातिर सेतु के काम करत रहे।

यमन पहाड़ आ रेत के देश ह। एह से इहाँ आवा-गमन के समुचित साधन ना रहे। विज्ञान के एतना तरक्की भइला के बावजूद आज भी यमन के कइगो अइसन क्षेत्र बा जहाँ पहुँचल बहुत कठिन बा। एह से ई दुनिया के नज़र में ओइसन ना आइल जइसन आवे के चाहीं। फिर भी कई जाबांज खोजी प्रकृति के लोग यमन के खोज में लागल। जवना में कई अरब भी रहलन। जवना में इब्बन रूस्ता आ इब्बन बतूता के नाम प्रसिद्ध बा। बाद में इंग्लैंड, डेनमार्क आ जर्मन यात्री भी यमन आइल।

यमन के इस्लामिक इतिहास में Queen Arwa bint Ahmad के नाम बहुत सम्मान से लेहल जाला।  उनका के लोग सम्मान से अल सइदा अल-हुरा अल मलिका कहेला। रानी अरवा के पति, सन् 1086 में अपना पत्नी पर आपन सारा राज-काज छोड़ के, स्वयं अपना के संगीत आ शराब में डूबा लेहले। सत्ता पर काबिज होते ही रानी अरबा अपना राज्य के संवृद्धि आ शान्ति खातिर, आपन राजधानी जिबला बनवली। ई एक कुशल आ योग्य शासिका रहली। जिबला के इलाका पहाड़ी ह। जबना के कारण बरखा के चलते इनका राज्य के खेती चौपट हो जात रहे। एह से ई अपना सूझ-बूझ के परिचय देत अपना राज्य में ‘terrace farming’ शुरू करववली। जवना के चलते उनकर राज्य आउर समृद्ध होत गइल। एह से उनका के second Qween of Sheba कहल जा सकेला।

हमनी के यमन के राजकुमार हातिमताई के किस्सा त अपना बचपने से ही सुनत आवतानी सन। उनका पर हिन्दी में फिल्म भी बनल बा। उनकर नेकी के किस्सा त जग-जाहिर बा। फिर भी ई बात अलग बा कि पहिले ई बात ना बुझाइल रहे कि ई कहानी केहू व्यक्ति के जीवन के सत्य घटना पर आधारित बा कि कोरा कल्पना भर ह। वास्तविकता जे भी होखे बाकिर यमन के लोग एकरा के सत्य घटना पर आधारित मानेला।

हमनी किहाँ के बच्चा-बच्चा ‘अली बाबा अरबाइन हरामी’ यानी ‘अली बाबा चालीस चोर’ के किस्सा जानता। एह विषय पर हिन्दी में एक ना अनेक फिल्म बन चुकल बा। रउआ लोगन के ई बात जानके आश्चर्य होई कि इहो किस्सा यमन के ही ह। हमरो बहुत आश्चर्य भइल रहे,  जब हमनी के ड्राइवर हमनी के अली बाबा के किस्सा के ‘अलबाब’ यानी दरवाजा के प्रत्यक्ष देखवलस। साच पूछी त पहिले हमरा विश्वास ना भइल। बाकिर हमरा विश्वास कइला भा ना कइला से सचाई बदल त  जाये के ना रहे। एह से विश्वास करहीं के पड़ल।

ईब्ब आ ताईज़ के रास्ता में हरियाली विहीन पहाड़ के ऊपरी हिस्सा में हल्का नीला रंग से रंगल एगो सामान्य आकार के दरवाज़ा रहे, जे दूर से थोड़ा छोटा ही लउकत रहे। उहे अली बाबा के अलबाब रहे। हमनी के ड्राइवर ही बतवलस कि एह दरवाज़ा में ई लोहा के बनल मजबूत अलबाब(दरवाज़ा) के पल्ला पहिले ना लागल रहे। एह से धन के लोभ में लोग ओह खुलल दरवाज़ा से अंदर चल जात रहे। बाकिर जे एक बार ओह दरवाजा के अंदर प्रवेश कर जात रहे, ऊ वापस लौट के ना आ पावत रहे। एह से सरकार के ओर से ओह दरवाज़ा के अंदर जायेके सबके मनाही रहे। बाकिर लोग सरकार के रोक के बावजूद अपना लालच से बाज कहाँ आवत रहे ? एह से अंत में हार के सरकार के ओर से ओह खुलल अलबाब में लोहा के बनल मजबूत पल्ला लगा के, ओकरा में  ताला लगा देहल गइल। आजो ऊ ओही स्थिति में बा।

यमन के इतिहास के प्राक् ऐतिहासिक काल से, यानी Bronze आ Stone  काल से जोड़ के देखल जाला। वइसे यमन के ज्ञात इतिहास के रानी शिवा के समय से  मानल जाला। ई उहाँ के बहुचर्चित रानी रहली। इनका शासन काल में यमन बहुत विकसित रहे। उनकर भी समय 1000 बी. सी. रहे।

यमन के क्षेत्र में इस्लाम धर्म के आगमन के पहिले उहाँ के लोग मूर्ति पूजक रहे। आज भी उहाँ माऽरीब के इलाका में कइगो मंदिर के अवशेष मौजूद बा। एतने भर ना उहाँ बलि प्रथा के भी रिवाज़ रहे। एह से एगो बलि-वेदी भी मिलल बा।

अइसे त यमन में अपना-अपना रुचि के अनुसार बहुत कुछ अइसन बा जे आदमी के आकर्षित करेला। बाकिर हम इहाँ उहे स्थान के चर्चा करेब, जे अधिकांश लोगन के पसन्द आवेला। एह में हम सबसे पहिले यमन के राजधानी सनांऽ ( Sana’a) से आपन बात शुरू करतानी। ई संसार के सबसे पुरान महानगर में से एगो ह। समय समय पर एकर कइगो नाम पड़ल जवना में एकर एगो नाम ह अज़ाल। ई ऊँचाई पर बसल एगो महानगर ह जे अपना उत्कृष्ट वास्तुकला खातिर प्रसिद्ध बा। Sana’a के ओल्ड सीटी के इतिहास इस्लाम के पहिले के ह। ई पूरा शहर एगो चहारदीवारी के अंदर बा। एह चहारदीवारी में सातगो दरवाज़ा बा, ओह महानगर में प्रवेश करे खातिर। जवना में सबसे प्रसिद्ध बा ‘बाब अल यमन’ यानी यमन के दरवाज़ा। एही महानगर से करीब-करीब 15 किलो मीटर दूर वादी धार में एगो ‘राॅक पैलेस’ बा । जे उहाँ के पूर्ववर्ती राजा के एगो महल ह । ई सात मंजिला महल बा । एह महल के खासियत ई बा कि ई महल सिर्फ पहाड़ पर बनल ही नइखे बल्कि एह महल के कई फ्लोर के कुछ हिस्सा मानव-निर्मित बा आ कुछ हिस्सा प्रकृति निर्मित। यानी पहाड़ के हिस्सा ही ओह महल के कई कमरा आदि के दीवार भी ह।

शाबाम आ कवकाबान नगर भी सना’ऽ के करीबे बा। ई नगर पुरातात्त्विक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण बा। काहेकि एकरा बारे में कहल जाला कि एकर निर्माण एगो प्राचीन मंदिर के अवशेष पर भइल बा।

एडेन (Aden) यमन के सबसे महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह ह। चूँकि व्यापारिक दृष्टि से एकर बहुत महत्त्व बा,एह से एकरा समय-समय पर कई साम्राज्यवादी राष्ट्रन के उपनिवेश बने के पड़ल। जवना में सबसे प्रमुख रहे- तुर्क आ ब्रिटिश। 19 वीं शदी में ई संसार के तीसरा सबसे व्यस्त बंदरगाह रहे। इहाँ के दर्शनीय स्थल में से महत्त्वपूर्ण बा- प्राकृतिक एलिफैंट रॉक आ कृत्रिम गुलमोहर बीच, हौज़ पार्क। एह हौज़ में प्राकृतिक रूप से बरखा के पानी इकट्ठा होला आ एक हौज़ से दूसरा हौज़ में चल जाला। साचो मानी, ई मन के मोह लेला। ई कोई आम हौज़ ना ह, बल्कि कई लेयर में बा। ई हौज़  कब बनल रहे, एकर केहू के जानकारी नइखे। बाकिर ई बहुत बढ़िया बा आ अभी भी अच्छा स्थिति में बा। अंग्रेज एकरा के ढूँढलस लेकिन केकर बनावल ह एकर ठीक-ठीक जानकारी अभी ले नइखे भइल। कुछ इतिहासकार लोग एकर संबंध  रानी शिवा के समय से जोड़ेला।

एडेन चूँकि ब्रिटिश कॉलोनी रहे। एह से इहाँ अपेक्षाकृत अधिक खुला समाज बा। हालाँकि पूरा खाड़ी देशन में सिर्फ यमन ही ‘रिपब्लिकन ऑफ यमन’ के नाम से जानल जाला। जबकि शेष खाड़ी देशन में राजतंत्र बा। एह से इहाँ सिर्फ कॉलेज आदि में ही को-एजुकेशन नइखे बल्कि शिक्षिका से लेके कुलपति या मंत्री तक के पद पर औरत के कार्यरत देखल जा सकेला। ई सब संभव एह से भइल बा, काहेकि इहाँ स्त्री-पुरुष दूनू के मताधिकार के बराबर के अधिकार बा।

पूरा खाड़ी देशन में एकमात्र एडेन ही अइसन स्थान बा जहाँ हिन्दू के मरला के बाद लाश जलावे के व्यवस्था बा। इहाँ आधा दर्जन से ऊपर मंदिर भी बा । जवना में अधिकांश में पूजा-पाठ नियमित रूप से होला। इहाँ एगो गाँधीजी के नाम पर हॉल भी बा।

ताईज़ (Taiz)- ताईज़ यमन के राजधानी रह चुकल बा। जवना घड़ी ई यमन के राजधानी रहे, ओह घड़ी यमन के बहुत विकास भइल रहे। ई महानगर भी एक चौड़ा दीवार से घिरल बा। जवना में चारगो दरवाज़ा बा।

ईब्ब (Ibb)- ईब्ब ‘The capital of the fertile province’ के नाम से जानल जाला। एकरा आस-पास के भूमि बहुत उपजाऊ बा। ईब्ब से 10 किलोमीटर के दूरी पर ऐतिहासिक स्थान जिबला बा। ई रानी अरवा बिंत अहमद अल-सुलायही के राजधानी रहे। एह रानी के किला भूकम्प में अब खण्डहर जइसन हो गइल बा। बाकिर ओह किला में 365 कमरा रहे। कहल जाला कि ओह किला के प्रत्येक कमरा से अलग-अलग दिन के सूर्योदय देखल जा सकत रहे।

ज़बीद ( Zabid)-  ज़बीद भी बहुत पुराना नगर ह। एकरा, विश्व के प्रथम इस्लामिक विश्व विद्यालय के गौरव भी प्राप्त बा। एह विश्व विद्यालय के देश से बाहर भी बहुत नाम रहे । कहल जाला कि अलजबरा के आविष्कार भी एही जा भइल रहे आ शून्य के भी।

हादरामउत (Hadramaut)- हादरामउत के भारत से बहुत पुराना आ मजबूत संबंध रहल बा। इहाँ के लोगन के कहनाम बा कि जवना घड़ी हैदराबाद के निजाम के ई बुझाइल कि ऊ जहाँ शासन करतारे ऊ हिन्दू बहुल क्षेत्र ह आ ऊ मुसलमान हउअन त कही भविष्य में उनका कौनो तरह के परेशानी ना हो जाय। एह से ऊ लगले जहाँ-तहाँ से मुसलमान लोगन के बुलाके हैदराबाद में बसावे। वइसे भी उनका मुसलमान लोगन पर अधिक विश्वास रहे। एह से ऊ अपना सेना में मुसलमान के ही प्राथमिकता देत रहले आ उनका शासन-क्षेत्र में ओतना मुसलमान रहे ना। एह से ऊ दोसरा मुस्लिम देशन से लोगन के बुलाके अपना सेना में भर्ती करे लगलन। एह से हैदराबाद से यमन के लोगन के भी निमंत्रण रहे। एह से यमन के हादरामउत से निजाम के सेना में बहुतायत में लोग भर्ती भइल। आज भी हादरामउत के लोग उहाँ अधिक संख्या में बा। कुछ लोग त उहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी से रहता। हादरामउत के खजूर,शहद आ प्राकृतिक सौंदर्य भी सबके आकृष्ट करेला।

शहारात अल-अमीर आ शहारात अल-फिश ( Shaharat Al-Amir and Shaharat Al-Fish) सहारा क्षेत्र के दूगो अइसन पहाड़ बा जवना के मध्य भाग के आपस में जोड़े वाला पैदल चले वाला पुल सबके अचम्भित कर देला।

अल-उदयन के काॅफी आ प्राकृतिक सौंदर्य भी सबके सहज ही अपना ओर खींच लेला। ई सब त चन्द उदाहरण ही बा। केतना ले गिनाई? बस ई समझ लीं कि एह सब के संजो के रखल भी यमन खातिर एक चुनौती बा। बाकिर अधिकांश प्रचीन धरोहर यूनिसेफ के कवनों ना कवनों तरह के संरक्षक में बा।

घर हो चाहे देश, आन्तरिक कलह ओकर नींव हिला के रख देला। यमन भी आज आन्तरिक कलह के शिकार  हो गइल बा। पता नइखे कि ऊँट कवना करवट बइठी।ऊँट चाहे कवनों करवट बइठे, बाकिर एह खींच-तान में नुकसान त देशे के हो रहल बा । विश्व इतिहास एह तरह के घटनाक्रम से भरल बा। ओकरा नतिजा से भी हम भली-भाँति अवगत बानीं। फिर भी हम इतिहास से सबक ना लेनी । काहेकि हमरा ज्ञान आ विवेक के हमार स्वार्थ आ अहंकार अइसन कसके दबइले बा कि ओह दूनू के उर्ध्व साँस चल रहल बा। पता ना कब प्राण-पखेरू उड़ जाय ?

हमरा यमन छोड़ला करीब-करीब दस-ग्यारह साल हो गइल । बाकिर आज भी हम ओह लोगन से मिलल आदर आ स्नेह के मिठास के महसूस करेनीं। हम यमन से आवत घड़ी अपना भाव के अभिव्यक्त करत आपन विचार लिखले रहनीं –

” कल हम यहाँ नहीं रहेंगे

चले जायेंगे दूर, बहुत दूर

पीछे मुड़कर देख नहीं पायेंगे

इस धरती पर लौट नहीं पायेंगे

पर सहेज लूंगी मैं ढेरों यादें –

कुछ धुंधली कुछ मान- सम्मान

छोड़ जायेंगी जो मेरे हृदय पर

इस धरती के अमिट निशान ।”

 


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min2200

डॉ० ब्रज भूषण मिश्र

      –  ” हई देखबे नू काबुल के मोरचावालू के चटकवाही!
अइसन मरद त देखबे ना कइनी।”

–  ” तू का जानो बड़का इमदी कइसन होखता है।
तोहरा नइहर में एको गो बड़का इमदी पैदे नहीं
हुआ।”

– ” आ मार बढ़नी रे ! बड़का अदमी रउआ इहाँ पैदा
होखत होइहें। हमरा नइहर के गाँवे त सिसोदिि पैदा
लेवेला।”

ई ह अपना समय के बड़ा प्रसिध्द आ कहीं त विश्व प्रसिद्ध नाटक  ‘ लोहा सिंह ‘ के पात्र ‘ खदेरन के मदर ‘ आ ‘ लोहा सिंह ‘ के संवाद। एह रेडियो नाट्य श्रृंखला के लेखक, निदेशक आ मुख्य पात्र लोहा सिंह के किरदार निबाहेवाला रहीं ‘ पद्मश्री प्रोफेसर रामेश्वर सिंह ‘ काश्यप ‘। काश्यप जी के नाम के बड़ा शोर रहे, सोहरत रहे। बाकिर ई शोहरत रहे ‘ लोहा सिंह ‘ के नाम से। पटना रेडियो पर रोजे साँझ के साढ़े छव बजे आवे वाला  कार्यक्रम ‘ चौपाल ‘ में एतवार के दिन एह नाटक के  प्रसारण होत रहे आ ओही के मंगर के रात में नाटक कार्यक्रम में दोहरिआवल जात रहे। हम होश सम्हरनी त एह नाटक के प्रति लोग में गजब के आकर्षण रहे। गाँवा गाँई रेडियो त कम रहे। जेकरा दुआर पर रहे, सुने खातिर भीड़ लागत रहे। अपना भोजपुरिआवल अंगरेजी आ हिंदी के फेंट-फाट से बनल सिपहिया भाषा से लोहा सिंह के पात्र त प्रभाव छोड़ते रहे; खदेरन के मदर, खदेरन, बुलाकी, भगजोगनी, फाटक ( पाठक ) बाबा आ कवि जी के पात्र निखालिस भोजपुरी में चुटिला संवाद से सीधे जन साधारण से जुड़ जात रहे। भारत – चीन युद्ध के पृष्ठभूमि में श्रृंखला बद्ध नाटक अलग मोर्चा बना के लड़ल रहे, आ पेकिंग रेडियो कई बेर ई कह चुकल रहे कि नेहरू पटना रेडियो में एक भैंसा पाल रखा है जो चीन की दिवार को सिंह से टक्कर मारकर गिरा देना चाहता है। आम जनता चीन युद्ध के जानकारी खातिर समाचार से बेसी लोहा सिंह नाटक पर विश्वास करत रहे। आगे चल के जनता के जागरूक बनावे खातिर एह नाटक के प्रसारण होत रहल आ अपना भाव-भाषा-शैली से संवाद करके संदेश देवे में कामयाब रहल। कबहीं-कबहीं चौपाल कार्यक्रम में काश्यप जी तपेसर भाई के नाम से भोजपुरी के कम्पीयरर बन के आवत रहीं। ओह समय हम का जानत रहीं कि आगे चल के काश्यप जी के सम्पर्क में आवे आ आशीर्वाद पावे के अवसर भेंटाई।

 

काश्यप जी के सही से आ साक्षात दर्शन हमरा अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के नौंवा अधिवेशन राँची ( 25-26 अक्तूबर, 1985 ई.) में भइल। हमार पहचान ओह तरह के ना रहे पहिले से, बाकिर राँची अधिवेशन के अध्यक्ष पं० गणेश चौबे जी के घर से ले के राँची ले जाए के आ साथे रहे के जिम्मेवारी मिलला के बाद लोग कुछ कुछ हमरो के जाने लागल। राँची अधिवेशन में कवि सम्मेलन के अध्यक्षता काश्यप जी कइलीं। काश्यप जी काव्यपाठ कइलीं आ व्यापक प्रभाव छोड़लीं। अधिवेशन के दुसरका रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम रहे, जवना में गीत-गवनई-नृत्य-धोबिया नाच आ नाटक रहे। एक से बढ़ के एक कार्यक्रम। ओही में अनुरोध पर काश्यप जी द्वारा लोहा सिंह नाटक के प्रसंग आ संवाद अविस्मरणीय बन गइल। हमरा के सम्मेलन के कार्य समिति में संगठन मंत्री बनावल गइल। एक तरह से हमार पहिचान तनि मनी बने लागल रहे। मानीं त काश्यप जी से जुड़े के शुरुआत ओतहीं से हो गइल।

बात 1988 ई. के ह। मार्च के महीना रहल होई। समस्तीपुर जिला के अनुमंडल रोसड़ा में भोजपुरी कवि सम्मेलन आ सांस्कृतिक कार्यक्रम रहे। आयोजक रहीं अनुमंडलीय जन संपर्क अधिकारी विश्वनाथ सिंह। सिंह जी गोपालगंज निवासी रहीं आ भोजपुरी के बढंती के भाव से भरल रहीं। मैथिली लोग एह कार्यक्रम के विरोधी रहे, बाकिर कार्यक्रम भइल त एगारे बजे दिन से बइठल लोग एगारह बजे रात ले बइठल रहल। दिन के कवि सम्मेलन में अक्षयवर दीक्षित, अनिरुद्धजी, अंजनजी, सोमेशजी, कुबोध जी, सतीश जी, डॉ. रिपुसूदन श्रीवास्तव, कुमार विरल जइसन मंच जमाऊ कवि लोग रहे। हमहूँ रहीं। कवि सम्मेलन समाप्त होखते सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरुआत भइल। काश्यप जी रहीं आ ब्रजकिशोर दूबे के टीम गवनई खातिर। ( ब्रजकिशोर दूबे का भारत के राष्ट्रपति जी के हाथे संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिल चुकल बा)। कार्यक्रम शुरु होखते जम गइल। हमनी त सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरु भइला पर लवट गइल़ीं। बिहान भइला काश्यप जी मुजफ्फरपुर आ गइलीं आ रिपुसूदन श्रीवास्तव जी के इहाँ ठहरलीं। साँझ के हमरा आवास पर काश्यप जी के सम्मान में एगो गोष्ठी भइल, जवना में दीक्षित जी, अनिरुद्ध जी, सतीश्वर सहाय वर्मा सतीश जी, नागेन्द्रनाथ ओझा, विरल जी वगैरह सामिल रहीं। अध्यक्षता रिपुसूदन बाबू कइनी। एह गोष्ठी में भोजपुरी के ले के बात बतकही भइल। हमरा त मन में एही बात के उछाह रहे कि काश्यप जी हमरा आवास पर अइलीं। काश्यप जी हमरा बहिन प्रियंवदा के निहोरा पर लोहा सिंह के संवाद सुना के मन जीत लेहनी। एगो संवाद के कुछ पाँति हमरा आजुओ इआद बा –

” जानते नू हैं फाटक बाबा ! मरद दिन भर अपना दिमाग का इस्तेमाल करके मगजमारी करती है, एही से ओकरा माथा के बार उड़िया जावता है आ मेहरारू सब अपने मुँहवा का इस्तेमाल कर दिन भर चर-चर-चर-चर करती रहती है, एही से उसको दाढ़ी मोछ नहीं होखता है।”

ओह दिन हमरा इहाँ सम्मान गोष्ठी के बाद अक्षयवर दीक्षित के आ काश्यप जी के महाकवि आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री आ प्रख्यात आलोचक कामेश्वर सिंह शर्मा से मिले के कार्यक्रम बनल आ हम साथे गइनी। झुलफुलाह साँझ रहे, बिजुरी गायब रहे। पहुँचते बात बतकही से जे  रोचक प्रसंग बनल, जवन भुलइले ना भुलाए। पहिले शास्त्री जी के इहाँ पहुँचलीं जा। शास्त्री जी पूछलीं – ” कौन ” ? काश्यप जी उत्तर देलीं – “काश्यप “। शास्त्री जी — “आइये, आइये, हमारे यहाँ की कुरसी में अँट सकिये तो बैठिये। ” काश्यप जी — ” गुरुदेव ! कुरसी में अँटने की बात  कहाँ से आ गई ? ” शास्त्री जी फेर व्ंयग्यात्मक बोललीं- ” आप प्राचार्य हैं ओर मेरे यहाँ तो प्राचार्य की कुर्सी नहीं है।”

बइठला के साथे हाल-चाल, कुशल-क्षेम भइल। आ लगले शास्त्री जी पत्नी के हाँक लगवनी- ” भाई साहब कहाँ है? (शास्त्री जी पत्नी के बड़े चाहे भाई साहेब ही कहत रहीं) आइये, देखिए तो भला कौन आया है? आप दिन भर कान से रेडियो लटकाये चलती हैं। देखिये देखिये लोहा सिंह जी आये हैं। ” तब तक हाथ में लालटेन लिहले शास्त्री जी के पत्नी छायादेवी निकलली आ लालटेन के अँजोर काश्यप जी के चेहरा ओर करके झुक के अभिवादन करत कहली – “आप लोहा सिंह कह रहे हैं, ये तो बिल्कुल सोना सिंह लग रहे हैं। ” कहे के बात ना बा कि रौशनी में काश्यप जी के गोर भभूका चेहरा सचहूँ सोना लेखा दमक उठल रहे। कुछ देर तक पुरान-पुरान बात के इआद कइल जात रहल। हँसी ठहाका लागत रहल। बेकतीगत बात होत रहल। शास्त्री जी पूछनी कि कहाँ ठहरे के बा, त काश्यप जी बतवनी कि रिपुसूदन बाबू के इहाँ। शास्त्री जी एहू पर चुटकी लिहनी कि इस शहर में तो भोजपुरी के ठिकेदार रिपुसूदन जी ही हैं। ” ठहाका लागल। ओकरा बाद कामेश्वर सिंह शर्मा किहाँ काश्यप जी के ले के गइनी। दुनों लोग बैचमेट रहलें। घर परिवार से लेके नौकरी-चाकरी, लेखन-प्रकाशन के बारे में बात होखल। उहाँ से लेके विश्वविद्यालय परिसर, रिपुसूदन बाबू के आवास पर। आठ बजे से रात एगारह बजे रात तक कवि गोष्ठी। काश्यप जी के अलावे सतीश जी, अनिरुद्ध जी, दीक्षित जी, विरल जी, हम आ दू चार लोग हिन्दी-उर्दू वाला। बिहान भइला काश्यप जी पटना बस से वापस भइलीं। बस में शारदा सिन्हा के गीत बाजत रहे। सासाराम वापस भइला पर रिपुसूदन बाबू किहाँ सकुशल वापसी के चिट्ठी लिखनी आ लिखनी– ” बस में शारदा सिन्हा के गीत सुनत अइनी ह, क्या गाती है, मुआ घालती है।”

विश्वविद्यालय सेवा से निवृत्ति के बाद बिहार सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा स्थापित भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष बनावल गइलीं, काश्यप जी। आ ओह पद पर रहते उहाँ के निधन भइल। एह कालावधि में उहाँ से चार पाँच बेर भेंट भइल आ संगे रहे आ जतरा करे के अवसर भेंटाइल। सन् 1990 ई. के बात होई। एक बेर भोरे-भोर हम प्रसिद्ध कवि-कथाकार-लोक गायक भाई ब्रजकिशोर दूबे जी के संगे पटना से उहाँ के सासाराम आवास पर पहुँचनी, विश्वविद्यालय के चिट्ठी देके, पी-एच० डी० के परीक्षक बने के स्वीकृति लेवे खातिर। उहाँ से भेंट भइल। हल्का-फुल्का खाये खातिर आ चाय लेके उहाँ का खुद अइनी। दूबे जी उहाँ के विद्यार्थी रह चुकल रहीं, आ लोहा सिंह नाटक में कवि जी के भूमिका निबाहत रहीं। तनिक खुलल रहीं। पूछनी जे गुरुदेव अपनहीं कष्ट काहे उठावत बानी। काश्यप जी कहनी, मेहरारु इहाँ नइखी। दाइए से काम चलत बा आ लगवनी ठहाका। हमनिओ का आपन हँसी ना रोक सकनी। एही जतरा में काश्यप जी के कलम प्रेम के अँखियान कइलीं। कई-कई खाना वाला दू गो रैक में ट्रे में सजा के राखल सैकड़न तरह के सैकड़न कलम। बैठकी में आनंद आइल। तरह तरह के बात आ बीच-बीच में ठहाका। अविस्मरणीय रहल।

1991 ई. के गरमी के दिन में पटना में उहाँ के निजी आवास पर फेर भेंट भइल। हम कवनो काम से पटना गइल रहीं। दूबे जी से पता चलल कि काश्यप जी पटना में बानी। दुनों भाई उहाँ पहुँचनी। प्रणाम करके बइठ गइनी। मामला गम्हीर बुझात रहे। काश्यप जी कवनो संचिका में डूबल रहीं। अकादमी के निदेशक विक्रमादित्य मिश्र के चेहरा पर तनाव झलकत रहे। दू तीन अउर लोग रहे। उहो लोग चुपचाप बइठल रहे। हमनियो मौन बइठ गइलीं। काश्यप जी के मकान भाड़ा पर लागल रहे आ किरायादार रहत रहे। कुछ हिस्सा काश्यप जी अइला गइला पर अपना उपयोग लागि रखले रहीं। ऊ किरायादार किरायादार कम, परिवार जइसन रहे आ काश्यप जी के रहला पर अभिभावक सरूप धेयान राखत रहै। राखो काहे ना, काश्यप जी त धरोहर रहीं। हँ त एह गम्हीर वातावरण में खलल डरलस एगो तरकारी बेचेवाली- ” सब्जी लिआई, सब्जी? गोभी, टमाटर, भींडी, करैला, धनिया पत्ता, मिरचाई।”  केहू कुछ ना बोलल। सब्जी वाली हल्ला करत बरामदा के गेट तक आ गइल। तब ले घर के भीतर से एगो लरिका तेजी से निकलल आ चुप रहे के इशारा करत कहलस- ” ना लिआई।”  सब्जीवाली चुप रहे के इशारा पर धेयान ना देत ओतने तेज आवाज में बोलल- ” काहे ना लिआई ? इहाँ त बरमहल लिआला।”  ऊ माथ के टोकरी नीचे उतार के रखलस। लरिकवा धीरहीं खिसिया के बोलल- ” जा तारू कि ना। ”  काश्यपजी के धेयान भंग हो चुकल रहे। उहाँ का फाइल टेबुल पर राखत कहनी- ” ई मानी ना।” अब बिना ठहाका के रह सकत रहे। गम्हीर वातावरण हल्लुक हो गइल।

हमरा पी-एच० डी० के मौखिकी रहे 21 सितम्बर, 1991 ई. के। हमरा छुट्टी के अभाव रहे। हम परीक्षा के एक दिन पहिले पटना से सुपर फास्ट पकड़ के राँची साँझ में पहुँचनी। बूथ से अपना गाइड आ राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के आचार्य आ अध्यक्ष डॉ० दिनेश्वर प्रसाद जी के फोन कइनी, त उहाँ का होटल के नाम बतवनी, जवना में उहाँ का कवनो शिष्य के भेज के बुकिंग करवा देले रहीं। उहाँ का बतवनी कि काश्यपो जी ओही ट्रेन से आ रहल बानी आ ओही होटल में बुकिंग बा। ई डॉ० दिनेश्वर प्रसाद जी के सहजता, सरलता आ अपना शिष्यन के प्रति ममत्व रहे कि ओकरा काम के हल निकालत रहीं। खैर उहाँ के प्रति अउर कबहीं। होटल पहुँचनी त स्वागत काउन्टर पर ही काश्यप जी, उहाँ के पत्नी आ भाई ब्रजकिशोर दूबे मिल गइनी। काश्यप जी ओह घरी दूबे जी के साथ लेके कतहीं आवत-जात रहीं। प्रणामा पाती भइल आ आपन-आपन रूम पकड़ाइल। बिहने सबेरे उठ के तैयार भइनी आ दिनेश्वर बाबू के इहाँ गइनी। उहाँ का कहनी कि दुपहर में हिन्दी विभाग में परीक्षा होई। 30-35 आदमी जुट सकत बा। छात्र लोग के वर्ग नइखे चलत एह से जादे लोग ना जुटी। हम छोट भाई के जे पतरातू से  उहाँ के हमरा साहित्यिक मित्र लोग के साथ आइल रहस पैंतीस लोग के बढ़िया नाश्ता के पैकेट के आर्डर देवे के कहनी आ होटल लवट गइनी। दूबे जी से पता चलल काश्यप जी बेटी के आवास पर पत्नी के छोड़े गइल बानी। जल्दीए आइब। भोजन एतहीं करब। काश्यप जी अइनी, उहाँ का भोजन अपना रूम में मँगा के करत रहीं त हम गइनी, त उहाँ का कहनी कि ‘ भोजन विजय ‘ कर रहल बानी। उहाँ के बतवनी कि भोजन के आज्ञा आ बीजे असल में आज्ञा लेके भोजन तैयार करावल ह आ बिजे करावल के मतलब भोजन विजय खातिर अनुरोध कइल ह। उहाँ के कहनी भोजन विजय सब लोग ना कर सके, ओह में मैथिली लोग पारंगत होला आ एह संदर्भ के एगो किस्सा सुनवलीं कि पटना विश्वविद्यालय के उहाँ के एगो प्रोफेसर मित्र कइसे कवनो होटल के साढ़े तीन ट्रे चंद्रकला मिठाई खा गइल रहस।

खैर, हमरा शोध निदेशक आ हिंदी के हेड दिनेश्वर बाबू के उमेद से अधिका, लगभग साठहन लोग मौखिकी कक्ष में उपस्थित रहलें। जेकरे पता चलल कि भोजपुरी के विषय पर वाइवा बा आ काश्यप जी परीक्षक बानी, ऊ जुम गइल। जेकर नाम हमरा इआद बा, ओह में विभाग के अध्यापकगण- डॉ. सिद्धनाथ कुमार, डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी, प्रो. सिद्धेश्वर आ दोसरा दोसरा कॉलेज के कई लोग, जेह में डॉ. श्रवण कुमार गोस्वामी, डॉ. ऋता शुक्ला आदि नाम प्रमुख रहे। एह लोग के उपस्थिति हमरा मन में डरो पैदा करत रहे आ गरिमो भरत रहे। हम नावाकिफ रहीं कि मौखिकी कइसे होला। हमरा ई रहे कि परीक्षक के अलावहूँ अउर लोग पूछ सकत बा। बाकिर कागजी औपचारिकता पूरा कइला के बाद काश्यप जी चार गो सवाल कइनी। तीन सवाल के हम आसानी से जवाब देनी। चउथा सवाल समझे में कठिनाई भइल त उहाँ का फरिअवनी। हमार जवाब सुनला के बाद उहाँ के कहनी कि उहाँ का संतुष्ट बानी, अउर केकरो पूछे के होखे त पूछे। दिनेश्वर बाबू कहनी कि इहाँ ई परिपाटी नइखे। तब उहाँ का कहनी – ” तो मिश्र जी को बधाई दी जाए, आज से डॉ. मिश्र।”  दिनेश्वर बाबू हमरा से कहनी- ” सबसे आशीर्वाद लीजिए।” हमरा सबकर आशीर्वाद मिलल। ब्रजकिशोर दूबे के बारे में कई लोग जानत रहे। अनुरोध भइल त काश्यप जी के आदेश पर दूबे जी भोजपुरी के दू गो गीत सुनवलीं। पहिला गीत रहे महेन्दर मिसिर के पूरबी – ‘ अंगुरी में डँसले बिया नगीनिया ‘ आ दोसर गीत रहे भिखारी ठाकुर के जँतसार – ‘ डगरिया जोहत ना ‘। ई दूनों गीत दूबे जी के पहचान बनावेवाला गीत रहे। लोग गद्-गद् हो गइल। तब सभे एक सुर में काश्यप जी से लोहा सिंह के कवनो प्रसंग आ संवाद सुनावे के निहोरा कइलस। उहाँ का सुना के माहौल के खुशनुमा बना देहलीं। उहाँ के सुनवलीं –

धान के बिकरी करके जे रोपेया मिलल बा, कोठरी में बइठ के लोहा सिंह बेर-बेर गिन रहल बाड़न। खदेरन के माई पूछत बाड़ी त भगजोगनी बतावत बिया कि मलिकार कोठारी में बइठ के रूपया गिनत बानी। खदेरन के माई जा के टोकत बाड़ी- ” अजी सुनब कि ना रउआ। आ मार बढ़नी रे।”  लोहा सिंह खिसिआइले बोलत बाड़न- ” काहे अतिना हल्ला करके हमरा हिसाब-किताब के ममिला में गड़बड़ेसन मारती है खदेरन को मदर।”  खदेरन के माई जवाब देत बाड़ी- ” हम काहे हाला करत बानी, ई रउरा बुझात नइखे ? आ मार बढ़नी रे। ”  तब लोहा सिंह बोलत बाड़न-  ” हम कौनो अगमजानी है जे तोहरा मन के बात बूझ जाएगी। हमको त बुझइबे नहीं करता है कि तुम मेम है कि मेमिन है, टेलिफूँक है कि फेनूगिलास है। काबुल के मोरचा पर हम एक से एक मेम अउर मेमिन देखा, बाकिर तुम्हारा डिजैन का एको नहीं था। लगता है नू कि भगवान तुमको बनाने के बाद सँचवे तूड़ दिया जवना से कि तुम्हारा डिजैन का जनाना पैदे नत होखे।”

लागल ठहाका पर ठहाका। ताली पर ताली। आखिर में लगले काश्यप जी ई कहे में ना चुकलीं – ” मिसिर जी, ई राउर ‘ भाइभा ‘ ना, ‘ भा – भा ‘ भइल ह।”  फेर से लागल ठहाका। ओतहीं ई जानत कि तेईस तारीख के वापसी के टिकट बा,  तेइस के दुपहर में अपना आवास पर अभिज्ञान परिषद के एगो कार्यक्रम कै योजना डॉ० ऋता शुक्ला बना देहली। दोसरा दिन बाइस तारिख के काश्यप जी का बेटी किहाँ बितावे के रहे। हम दूबे जी के संगे पतरातू के प्रोग्राम बना दिहलीं।

मौखिकी के बाद हमनी का होटल वापस हो गइनी। अभी पूरी तरह आराम ना मिलल रहे कि राँची एक्सप्रेस, प्रभात खबर, आज वगैरह के पत्रकार लोग जुट गइल। बतिआवे के चाहत रहे। केहू के हिम्मत ना होत रहे जगावे के। आखिर कार दूबे जी जगवनी आ बतवनी कि पत्रकार लोग आइल बा त उहाँ का तैयार ना भइलीं। दूबे जी कहनी कि असरा लगा के आइल बा लोग, लवट जाई त अच्छा ना लागी। हम बइठावत बानी। अपने इत्मिनान से फ्रेस होके सबका संगही चाय पिअल जाई आ इंटरव्यू दिआई। काश्यप जी सहमत हो गइलीं। फ्रेस होके बइठनी
त सबका खातिर चाय मँगावल गइल। सवाल आ जवाब से काश्यप जी के जिनिगी के परत दर परत खुलत गइल। कइसे उहाँ का कोलकाता में नाटक करे के सीखनी। ओह समय के मुजफ्फरपुर के नाट्य कलाकार ललित सिंह नटवर से संपर्क भइल। कइसे जब आकाशवाणी, पटना में बिहार के लोकभाषा में कुछ रोचक लिखे के निर्णय भइल त उहाँ का ‘ तसलवा तोर कि मोर ‘ शीर्षक रेडियो रूपक लिखलीं। ओह नाटक के मुख्य पात्र लोहा सिंह रहे, जवना के भूमिका खुद काश्यप जी कइलीं। ऊ श्रोतालोग का बहुते पसन पड़ल। रिकार्डेड नौ सै से बेसी चिट्ठी प्रशंसा के आइल पटना रेडियो में। एह चिट्ठिया मे बेसी लोग इहे लिखले रहे कि ‘लोहा सिंह  नाटक फिर से सुनवाया जाए ‘। इहे कारण भइल कि लोहा सिंह नाटक के सिलसिला शुरु हो गइल। एह बीचे भारत पर चीनी आक्रमण भइल। चीन के करतूत के पोल खोलेवाला आ भारत के पक्ष के मजबूती से राखेवाला रूपकन के प्रसारण हर हफ्ता होखे लागल। ई पूछला पर कि लोहा सिंह के किरदार रउरा कहाँ से आ कइसे सूझल, त उहाँ का बतवनी कि उहाँ के पिता जी मुंगेर में डी. एस. पी रहीं त उनके अधीन एगो हवलदार रहे जे सेना से रिटायर्ड रहे। ऊ धोती के ऊपर कमर में बेल्ट बान्हत रहे। ऊपर वर्दीवाला खाकी कमीज पेन्हत रहे। माथे मुरेठा बान्हत रहे आ हाथ में भर पोरसा के लाठी लेके चलत रहे। ऊ टूटल-फूटल अंगरेजी आ हिन्दी के भोजपुरिया के बोलत रहे। बाते-बात में मोर्चा के कहानी भा दृष्टांत सुनावत रहे। ऊ चरित्र भावल आ हम ओकर किरदार लिखनी। ई बात पूछला पर कि जिनगी में कवनो बात के अफसोस बा। उहाँ का बतवलीं कि उहाँ के एह बात के अफसोस बा कि ‘ लोहा सिंह ‘ के प्रभाव में रामेश्वर सिंह काश्यप के पहचान दब गइल। साँचहू ई बात सोचे पर मजबूर करेला कि हिंदी के आलोचना आ ललित निबंध लेखन आ भोजपुरी कवि-कथाकार काश्यप जी के कम चरचा भइल बा। पत्रकार लोग के पूछला पर उहाँ का बतवलीं कि पटना से प्रिंसपल रूप में सासाराम आ गइला आ कार्यभार बढ़ला से लोहा सिंह वाला सिलसिला भी कमजोर पड़ल, काहे से कि रिहर्सल्स वगैरह खातिर पटना में हफ्ता दस दिन रुकल जरूरी होला। उहाँ का बतवनी कि दूरदर्शन नेशनल चैनल खातिर तेईस एपिसोड बनावे पर बात चल रहल बा, कुछ औपचारिकता पूरा करके ओह में हाथ लागी।

बाइस तारीख के सबेरे हम आ दूबे जी पतरातू गइनी आ काश्यप जी अपना बेटी के आवास पर। उहाँ के पत्नी बेटिए किहाँ रहस। हम आ दूबे जी साँझ पहर राँची वापस हो गइलीं। तेइस तारीख के साँझ में साउथ बिहार एक्सप्रेस से पटना खातिर टिकट रहे। दिन में डॉ० ऋता शुक्ला जी के आवास पर काश्यप जी के सम्मान में अभिज्ञान परिषद के ओर से कार्यक्रम रहे, जवना में दूबे जी के गवनई तय रहे। तेइस के सबेरे हमनी तैयार होके होटल में बइठल रहीं। काश्यप जी अइलीं। भोजन पत्तर के बाद थोड़ा आराम। ऋता दीदी के इहाँ जाये के तैयारी। घनघोर वर्षा भइल। हमनी के दिनेश्वर बाबू के लेके ऋता दीदी किहाँ जाए के रहे। खैर विलम्ब हो गइल उहाँ पहुँचे में। काश्यपजी के सम्मान आ दूबे जी के गवनई कार्यक्रम के कमे समय में निबटावे के पड़ल। लिट्टी चोखा के बेवस्था रहे। छव बजे ट्रेन रहे, हमनी के दीदी के इहाँ से सीधे स्टेशन खातिर प्रस्थान कइनी। दीदी आपन गाड़ी निकलववली जे में काश्यप जी, दिनेश्वर बाबू आ दीदी, बालेन्दुशेखर जी, सिद्धेश्वर जी दोसरा सवारी से। हम दूबे जी ऑटो से। घर से निकले के पहिले ऋता दीदी आग पर के सेंकल लिट्टी, चोखा, अँचार आ मिठाई के झोरा थमा दिहली आ कहली कि रास्ता में खइह लोगन। चाचा जी खातिर ठीक रही। उहाँ का चीनी बा। लिट्टी से हरज ना होई। काश्यपजी ऋता दीदी के पिता जी प्रो. रामेश्वरनाथ तिवारी के बैचमेट रहीं। एही से चाचा भतीजी के रिश्ता रहे। स्टेशन पर दामाद के साथ काश्यपजी के पत्नी पहुँचली। विदाई के बेरा डाँ दिनेश्वर प्रसाद, डॉ. बालेन्दुशेखर तिवारी, प्रो० सिद्धेश्वर, डॉ० श्रवण कुमार गोस्वामी के अलावे अउर कई लोग रहे। ट्रेन से सफर करेवाला कई लोग प्लैटफॉर्म पर काश्यप जी से भेंट घाट कइल। कइसे कवनो धरोहर बेकती के सम्मान मिलेला देखते बनत रहे।

ट्रेन आइल। घुसला पर बर्थ पर डबल नम्बर देख के माथा चकराइल। हेर-फेर रहे, नयका चढ़ गइल रहे, पुरनका मेटल ना रहे। हमरा हिसाब से जे काश्यपजी के दू गो बर्थ रहे, एगो महिला कूपा में आ एगो अलग। महिला कूपा वाला बर्थ पर केहू औरत बइठल रहे। हम उहाँ से बतवनी त उहाँ का कहनी कि ना पूछनी ह कि रउए काश्यप जी के मेहरारू हईं का? लागल ठहाका। खैर सही बर्थ भेंटाइल, सामान सरिआवल गइल। अदमी अहथिर भइल। तबले दू गो संभ्रात महिला बोगी में घुसली आ महिला कूपा में बर्थ पकड़ली। ऊ दुनों जनी रहली- आकाशवाणी पटना के प्रोग्राम एग्जेक्यूटिव सरिता शर्मा आ लोकगायिका सिसोदिनी सिंह। सब एक दोसरा के पहचान वाला। नमस्कार अभिवादन, जतरा के बारे में एक दोसरा के बतावल। दुनों जनी शिष्टाचारवश काश्यप जी से मिलली। आकाशवाणी के बारे में बात चीत चलत रहल। ओही में चाय के दौर चलल। काश्यप जी पान के शौकीन रहनी ह। पनबट्टा राखत रहलीं ह।  चाय के बाद पान के तलब भइल। पान बना के पहिले सरिता शर्मा आ सिसोदनी जी के तरफ बढ़वलीं। सिसोदिनी जी पान ले लिहली। सरिता शर्मा कहली कि ऊ ना खाली। काश्यप जी कहनी कि हर चीज कबहीं ना कबहीं पहिल बेर खाइल जाला। आज पहिल बेर पान खा लीं। तब सरिता जी पान ले लिहली। एही बीच बोकारो स्टील सीटी कॉलेज के प्रिंसपल पहुँचनी। उहाँ के पता चल गइल रहे कि काश्यप जी एही ट्रेन से जतरा कर रहल बानी त ढूढ़ँत पहुँच गइनी आ बोकारो तक बातचीत करत गइनी। काश्यप जी के दृष्टि बड़ा खोजी रहे। कवनो एगो स्टेशन पर गाड़ी रूकल। दोसरका प्लेटफार्म पर नजर गइल आ उहाँ का चिहाइले बोलनी- ” हउ देख रहे हैं, मेहरारू मरद को छनौटे-छनौटे मार रहा है। ” साँचहू कवनो मजदूरनी रहे जे कुछ रीन्हत-पकावत रहे आ कवनो बात पर मरद के छनौटा से दू चार छनौटा लगा देलस।

काश्यप जी के पत्नी काश्यप जी के बड़ा खेयाल राखत रहली। एकर प्रमाण मिलल एह बात से कि काश्यप जी के चेहरा पर कुछ लाग गइल रहे। ऊ अपना अँचरा से पोंछ दिहली। काश्यप जी मधुमेह के रोगी रहीं। उहाँ के भोजन-पत्तर संयमित रहे आ समय पर होत रहे। भोजन के कुछ समय पहिले इन्सुलिन के इंजेक्शन उहाँ के लेत रहीं। ऊ इआद करवली की खाये के बेर हो रहल बा, इंजेक्शन ले लिहीं। काश्यप जी इंसुलिन ले लिहनी। थोड़े देर बाद कहली कि इंजिनियर साहेब, इहाँ के दुइये गो लिट्टी दीं। इहाँ के रात में हम दुइए गो रोटी दीहिले खाये के। काश्यप जी के पत्नी हमरा के इंजिनियर साहेब कहत रहस, काहे से कि हम थरमल में कार्यरत रहीं। हम दूगो लिट्टी, चोखा, अचार प्लेट में निकाल के देनी। काश्यप जी कहनी कि रउओ लोग खाईं आ प्रिंसपल साहेब, सरिता जी अउर सिसोदनी जी के भी लिट्टी खिआईं। हमनी कहनी कि अपने खा लिहल जाव त हमनी खायेब। काश्यप जी का लिट्टी बढ़िया लागल। कहनी कि ऋता लिट्टी त बढ़िया बनववले रहली ह। दू गो लिट्टी खतम होखते हम पूछनी कि अउर लिआव त उहाँ का कहनी कि दीं। उहाँ के पत्नी कहली- ” ना – ना, अब ना। इहाँ का दू गो से बेसी नइखे खाये के।”  काश्यप जी कहलीं कि आरे एगो खाये द नीक लागत बा। ऊ कहली कि अच्छा इंजिनियर साहेब एगो दे दीं। हम लिट्टी उहाँ का प्लेट में डलनी। उहो खइला के बाद काश्यप जी कहनी- ” मिसिर जी, एगो अउर दीं।” हम लिट्टी निकालतहीं रहीं कि काश्यपजी के पत्नी तनि तेजे आवाज़ में बोलली- ” ना ना इंजिनियर साहेब, बेलकुल ना। इहाँ का पहिलहीं तीन गो खा चुकल बानी।”  हमार लिट्टी लिहल हाथ बढ़ल रह गइल, स्टैचू लेखा। ना बुझाए का करीं। खाएवाला माँगत बा, खाएवाला के खेयाल राखेवाला मना करत बा, हम का करीं ? किंकर्तव्यविमूढ़ हो गइनी। काश्यप जी पत्नी से कहनी – ” ए, लिट्टिया बढ़िया नू लागत बा, एगो अउर खाये ना द।” पत्नी साफ मना कइली- ” ना इंजीनियर साहेब, मत दीं।” आ काश्यप जी के ओर ताकत मना कइली- ” अब मत खाईं, हरज कर जाई। ” काश्यप जी के लोहा सिंह अतना सुनते जाग गइल रहे, बोलनी – ” हई देखते हैं नू , ई हमारा मेहरारू है कि थाना का हवलदार? ” पड़ल ठहाका। जतना लोग सुनत रहे सभे हँसे लागल आ आखिरकार आधा लिट्टी पर समझौता भइल। ओकरा बाद हमनियो खा लेनी। बोकारो स्टेशन नियराइल रहे। प्रिंसिपल साहेब कहनी कि अब बोकारो आ रहल बा, एह से उतरब। दूबे जी कहनी कि आखिर बोकारो के मतलब का होई ? काश्यप जी के जवाब  हाजिर रहे — “जहाँ बोका लोग रो (row ) में रहेला। ” फेर ठहाका लागल। ओकरा बाद सभे सुत गइल। भोरे पटना पहुँचल। काश्यप जी दुनों बेकती अपना आवास पर गइनी। दूबे जी अपना आवास पर आ हम जतरा के सुखद स्मृति लिहले मुजफ्फरपुर खातिर बस पकड़नी। आगे चल के फेर कबो पटना में भेंट भइल त उहाँ का कहनी कि नेपाल जाए के मौका मिले त उहाँ कवनो खास तरह के पेन मिलेला, ले ले आइब। हम कहनी कि हम बीरगंज जा के ले आइब आ अपने के पहुँचा देब। ई हमरा खातिर सौभाग्य के बात रहे। बाकिर अवसर ना मिलल। कुछुए दिन बाद उहाँ के निधन हो गइल। अगर उहाँ का जीवित रहतीं त वीरकुँवर सिंह विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर भइल रहितीं। उहाँ के प्रतिउत्पन्नमतित्व के जवाब ना रहे। उहाँ का जवन शैली इजाद कइनी, लोग लाख कोशिश कइल, आगे ना बढ़ा सकल। काश्यप जी के इआद कबहीं भोराए ना।


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min2170

निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव        

बात सन्‍ १९५५ के हs जब हम आठवाँ क्लास में पढ़त रहनी। महीना कवन रहे ई इयाद नइखे। लेकिन ई इयाद पड़sता कि जाड़ा के दिन रहे। बोर्ड मिडिल स्कूल, मशरक का प्रांगण में मशरक के स्कूल सब-इंस्पेक्टर स्व० सिपाही सिंह पागल (ओ घड़ी उ आपन उपनाम ‘पागल’ लिखस) का सौजन्य से कवि-सम्मेलन भइल रहे। कवना अवसर पर ई कवि-सम्मेलन भइल रहे ई इयाद नइखे पड़त। राति के दस बजे के बाद एगो कविजी आपन कविता सुनावे खातिर मंच पर अइलें आ आपन कविता सुनावे के शुरू कइलें-

रतिया के घुंघटा उघारे असमनवा, हँसेला मिलनवा में प्यार।

ई कविता से ज्यादा गीत रहे। आवाज ओतने मधुर। श्रोता लोग ए गीत का रस में डूब गइल। जब इ गीत खतम भइल त पूरा पंडाल ताली का गड़गड़ाहट से गूँज उठल। कविवर अनिरुद्ध के सुने के हमरा जिनगी के  ई पहिला मौका रहे। ओ घड़ी हम तेरह बरिस के रहीं। गीत के भाव आ बिम्ब त ओह उमिर में ना बुझाए के रहे, ना बुझाइल। लेकिन हमरा किशोर मन पर गीत के स्वर आ लय के बहुत गहिर असर पड़ल। समय बीतत गइल। आठ बरिस बीत गइल। सन् १९६३ में हम बी० ए० ऑनर्स के वार्षिक परीक्षा दे के रिजल्ट का इन्तजार में गाँव में रहत रहीं। ओही घड़ी एगो बिआह में हमरा अपना मौसी का इहाँ जाये के मौका लागल। संयोग देखीं कि ओ में अनिरुद्ध जी भी आइल रहन। परिचय भइल त आठ बरिस पहिले के उनकर जवान चेहरा उ गीत मन में कौंध गइल। बारात दरवाजे लाग के चल गइल त कविता के महफिल जमल जवना में कविता सुनावे वाला कवि अकेले अनिरुद्ध जी रहनी हमनीका  श्रोता। साहित्य के विद्यार्थी रहे का वजह से तबतक कविता के समझ कुछ विकसित हो गइल रहे। एह वजह से जब हम १९६३ में जब हम दोबारा उहाँ के सुननी तब बुझाइल इ उ केतना बड़ कवि बाडन। ‘लाल पगड़िया लाल चुनरिया रंगे नगरिया लाल रे/बगिया में चइता रस मातल रंगे नजरिया लाल रे’ आ ‘दुनिया नाचे मन पहिया के घुंघरू बाजे झुनुन- झुनुन/ भइल भोर जागs बिला के घंटी बजे टुनुन-टुनुन/ फुटल किरन पनिघट पै छलके लाल गगरिया रे/ उड़े पाल जिनगी पुरवइया उछिले किरन लहरिया रे/चल रे मैना कइला  बाते दूर डगरिया रे’ सुनके लोग झूम उठल।

२५ अगस्त, १९६३ के हमार रिजल्ट निकलल आ १३ सितम्बर, १९६३ के हम अमनौर उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में नौकरी शुरू कइनी। पता चलल कि अनिरुद्ध जी नौतन बेसिक स्कूल में शिक्षक बानी। अमनौर उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय के उपप्राचार्य चन्द्रशेखर सिंह से अनिरुद्ध जी का बड़ा नजदीकी रहे। कभी-कभी स्कूल का होस्टल का रूम नंबर तीन में गोष्ठी जम जात रहे। अनिरुद्ध जी का अथक प्रयास से १९६५ में मकेर में कवि सम्मेलन के आयोजन भइल जवना में भिखारी ठाकुर आ जानकी बल्लभ शास्त्री दुनू जने शामिल रहे लोग। जब भिखारी ठाकुर के कवि सम्मेलन के अध्यक्ष बनावे के प्रस्ताव आइल त जानकी बल्लभ शास्त्री एकर कड़ा विरोध कइनी आ कवि सम्मेलन के बहिष्कार के धमकी दे देनी। तब अनिरुद्ध जी बड़ा निहोरा करके शास्त्री जी के मनवनी आ राम-राम कर के कवि सम्मेलन शुरू भइल आ बहुत सफल रहल। इयाद पड़ता कि ओ कवि सम्मेलन में अनिरुद्ध जी आपन बहुते मार्मिक कविता ‘हरना-हरिनी’ सुनवले रहीं- ‘हरना ताके हरिनी  रोये अंसुअन धार, हाय! बंसुरिया सुनि धोखवा से पड़ि गइलीं जाल/ हाय बिहनिया जानि धोखवा से पड़ि गइलीं जाल’ सुनवले रहीं। सभकर आँख लोरा गइल रहे। फेरु १९६७ में मशरक में लोक संस्कृति मंच का बैनर में कवि सम्मेलन के आयोजन भइल रहे। ओह कवि-सम्मेलन में उनकरा के सुने के मौका मिलल।

हम १९६८-६९ में आयोजित बिहार लोक सेवा के संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में उत्तीर्ण भइनी आ हमार चयन बिहार उत्पाद सेवा खातिर हो गइल। अमनौर छूटल त बहुत संगी-साथी लोग भी छुट गइल। चिट्ठी-पत्री का माध्यम से एक-दोसरा के समाचार मिल जात रहे।  अमनौर  स्कूल आ ओह स्कूल के साथी-संघाती लोगन से कभी संपर्क ना छूटल। सन् १९८१ का अक्टूबर में पूर्वी चम्पारण (मोतिहारी) का अधीक्षक उत्पाद के रूप में हमार पदस्थापन भइल। संयोग देखीं कि अगिले  साल सन् १९८२ में २९ से ३१ अक्टूबर तक अमनौर में अखिल भोजपुरी साहित्य के सातवाँ सम्मेलन भइल रहे। हम मोतिहारी से डॉ० ब्रजनाथ चौबे  (अंग्रेजी के रीडर, एम० एस०  कॉलेज मोतिहारी), राजीव रंजन चतुर्वेदी (अधिवक्ता,मोतिहारी सिविल कोर्ट), योगेन्द्र सिंह (एम० एस० कॉलेज मोतिहारी के प्राचार्य प्रो० भोलानाथ सिंह के आप्त सचिव आ हमार दोस्त राजेन्द्र सिंह कश्यप के छोट भाई ) आ बेतिया के बैजू हलुवाई आ उनकर दस गो कारीगर के लेके मोतिहारी पहुंचनी। ओह सम्मेलन में अनिरुद्ध जी बहुत सक्रिय रहीं। ३० अक्टूबर के कवि सम्मेलन रहे। मोती बी० ए०, गहमरी जी, जगन्नाथ प्रसाद, मुंहदुबर जी, लक्ष्मण पाठक प्रदीप, सतीश्वर सहाय सतीश, प्रो० उमाकांत वर्मा, डॉ० प्रभुनाथ सिंह आ अनिरुद्ध जी सहित बहुत कवि लोगन के जुटान भइल रहे। हम, डॉ० ब्रजनाथ चौबे आ रजीव रंजन चतुर्वेदी एके साथ बइठल रहीं। ओह कवि सम्मेलन में अनिरुद्ध जी ‘शरद गीत’ सुनवले रहीं-

ओस बुंदिया के बान्हे पयलिया, झुनुर-झुनुर नाचेली भोर

माथ बिंदिया छिंटाइल टिकुलिया, झुनुर-झुनुर नाचेली भोर

झरे नील नभवा से हीरा वो मोती

अंखिया का मेला में बांटेली जोती

दूध बुंदिया नेहाइल नगरिया, झुनुर-झुनुर नाचेली भोर

झनक ताल-ताल जड़े दरपन अंगनवा

चांदी के चदर पै नीलम गगनवा

हंस पंखवा पै उतरल शरदिया, झुनुर-झुनुर नाचेली भोर

खरलिच के नयना लुकाइल बदरिया

झर गइल तरेंगन नभ लरकल फुनुगिया

रूप महकेला महके उमिरिया, झुनुर-झुनुर नाचेली भोर

ई कविता सुनके डॉ० ब्रजनाथ चौबे खड़ा होके कविता के सराहना कइनी। उहाँ का हमरा से कहनी कि ‘शायद ही किसी भाषा के किसी कवि ने इतने दुलार से भोर को सहलाया हो।’ एह कविता में गजब के चाक्षुष बिम्ब के गुम्फन त बरले बा, रूप महकेला महके उमिरिया’ में जवन गंध्य बिम्ब बा उ अद्भुत बा। बिम्ब के अइसन प्रयोग बिरले देखे में आवेला।

हम मोतिहारी में  जून १९८५ तक पदस्थापित रहीं। अनिरुद्ध जी से पत्र का माध्यम से संपर्क बनल रहे। एगो आउर बात के जिक्र करे के चाहतानी। १४ जुलाई, १९८४ के मोतिहारी के एल० एन० डी० कॉलेज में राष्ट्रीय एकता आ साम्प्रदायिक सद्भावना का सन्दर्भ में एगो विराट् सर्व भाषा कवि-सम्मेलन के आयोजन के निर्णय लेहल गइल। अनिरुद्ध जी एक-दू बार मोतिहारी आ के हमरा इहाँ ठहरल रहीं आ हमारा आवास पर काव्य-गोष्ठी भइल रहे। एह वजह से हमरा आ अनिरुद्ध जी के आत्मीय संबंध के बारे में लोग जानत रहे। ओह आयोजन के संयोजक सुरेन्द्र कुमार जी रहनी। उहाँ का ओह कवि-सम्मेलन में अनिरुद्ध जी के बोलावे के जिम्मा हमरा के संउपनी। हम ४ जुलाई के अनिरुद्ध जी के पत्र लिख के कवि सम्मेलन में भाग लेवे खातिर निहोरा कइनी आ उहाँ का मान गइनी।

जुलाई, १९८५ में हम सहायक आयुक्त उत्पाद का पद पर प्रोन्नति पा के रांची आ गइनी।  अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के नउवां अधिवेशन रांची में नधाइल। तारीख तय भइल २६ आ २७ अक्टूबर, १९८५। स्वगत समिति के अध्यक्ष पशुपतिनाथ सिंह जी रहीं। उहाँका हमरा से पता लेके अधिवेशन में भाग लेवे खातिर अनिरुद्ध जी के नेवता भेजले रहीं लेकिन कवनो कारण से अनिरुद्ध जी शामिल ना हो सकनी।

सन् १९५० से १९८६ तक बेसिक स्कूल में पढ़वला का बाद  १९८६ में उहाँ का प्रधानाध्यापक का रूप में सेवा निवृत भइनी। सेवा निवृत शब्द पर उहाँका एतराज रहे। उहाँ के कहनाम रहे कि नौकरी के मियाद खतम भइला का बादो आदमी त सेवा करबे करेला-अपना परिवार के, समाज के।  रिटायर खातिर सही शब्द नौकरी निवृत होखें के चाहीं। खैर, सेवा निवृत्त का बाद फुर्सते-फुर्सत रहे। उहाँ बड़ भाई कथारा कोलियरी में वर्क सुपरवाइजर रहीं आ बडका बेटा ओम प्रकाश फुसरो में भूमि विकास बैंक में काम करत रहस। ओम प्रकाश जी का अपना बड़का बाबूजी के डेरा आवंटित हो गइल रहे। सेवा निवृत भइला का बाद अनिरुद्ध जी साल में तीन-चार बेरा बेटा किहाँ जाईं त हमारो इहाँ आ जाईं आ हफ्ता-दस दिन जरुर रूकीं। ई क्रम १९८७ से १९८९ का अप्रैल-मई तक चलल। ओह समय हमारा इत्मिनान से उनकर पूरा कविता पढ़े-सुने आ ओपर विचार-विमर्श करे के अवसर मिलल। रात के ११-१२ बजे तक उनकरा कविता पर चर्चा होखे। बहुत कम लोगन का ई बात के जानकारे होई कि अनिरुद्ध जी का शास्त्रीय संगीत के बहुत आछा ज्ञान रहे। एकरा वजह से उनकरा गीतन में भा कविता में गजब के लयात्मकता रहे आ प्रस्तुती आ सस्वर पाठ भी संगीतमय होत रहे। ई हमार सौभाग्य बा कि उनकरा रांची प्रवास के दौरान उनकर पूरा के पूरा  रचना उनकरा से सुने के अवसर मिलल। ओही घड़ी मालूम भइल कि उनकर कविता संग्रह के छपे के संपराह बहुत पाहिले  भइल रहे लेकिन प्रकाशक का धोखा देला का करण संग्रह ना छप सकल। ई साचहूँ दुख के बात रहे कि भोजपुरी का सेवा में आपन पूरा उमिर दांव पर लगा देला के बादो उनकरा अपना कविता के प्रकाशन के सुख ना मिल रहे। हमरा बहुत दुःख भइल आ हम मने-मने संकल्प कइनी कि चाहे जइसे उनकर कविता के संग्रह जरुर छपी।

जब हम आपन मन के बात अनिरुद्ध जी से बतवनी त उनकरा सहजे विश्वास ना भइल। जब विशवास भइल त उनकर चेहरा पर अइसन खुसी छलकल जइसन आपन भुलाइल खेलौना मिलला पर लड़िकन का चेहरा पर छ्लकेला। अनिरुद्ध जी के समूची रचना एगो मोट पुरान कॉपी में रहे। अलग-अलग विषय पर सैंतीस-अडतीस बारिस का कालखंड में लिखल कविता में से ६८ गो रचना के चयन भइल। विषय का अनुसार ओह सब रचना के छव खंड में बाँटल गइल-‘गीत भोर के’, ‘गीत साँझ के’, गीत रितु के’, ‘गीत देस के’ ‘गीत खेत-खरिहान के’ आ ‘विविध गीत’। समग्र रूप से संग्रह में प्रकृति वर्णन, रितु गीत, खेत-खरिहान आ देस की गीत संकलित भइल। संग्रह के नांव रखाइल ‘पनिहारिन’। संग्रह में अनिरुद्ध जी के पचास का दसक में तहलका माचवे वाला ‘पनिहारिन’ शीर्षक गीत संकलित बा। पाण्डुलिपि हमारा ऑफिस में हमार स्टेनो टंकित कइलें। ओह घड़ी हम दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के उपायुक्त उत्पाद का पद पर पदस्थापित रहीं। हमार ऑफिस डोरंडा में नेपाल हॉउस में रहे। अशोक पागल से हमारा जान-पहचान रहे। उ बहुत आछा कवि आ नाटककार आ नाट्यकर्मी रहस। रांची के युवा कवि लोग के कविता-संग्रह ‘सोलह सफे’ उनकरा सुकृत प में छपल रहे। हम अशोक जी से बात कइनी आ पाण्डुलिपि उनकरा के संउप देनी। हम  हिन्दी कहानी में युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार से विभूषित कहानी लेखिका ऋता आ सेंट कोलम्बस कॉलेज, हजारीबाग के हिन्दी विभाग के स्नातकोत्तर केंद्र के अध्यक्ष आ हिंदी के विख्यात समीक्षक डॉ० नागेश्वर लाल से संग्रह के भूमिका लिखववनी। हम रोज अपना ऑफिस से लौटे का बेरा सुकृत प्रेस जा के प्रूफ देख लीं। ओह घड़ी सुकृत प्रेस में हाथ से कम्पोजिंग होखे। अनिरुद्ध् जी आवरण पृष्ठ के स्केच तैयार कइले रहीं। ओकरे आधार पर विश्वनाथजी आवरण पृष्ठ तइयार कइलें। हम आ एगो मित्र दुनु आदमी मिलके छपाई के खर्चा के व्यवस्था कइनी जा। १९८९ का अप्रैल-मई में पनिहारिन छप के आ गइल।

एह बीच हमनी का संस्कार भारती से निकल के रांची में ‘अभिज्ञान परिषद’ नाम से एगो साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था के स्थापना कइनी जा। ऋता शुक्ल केअध्यक्ष, हमार मित्र हिन्दी के प्रोफेसर डॉ० सिद्धेश्वर सिंह के सचिव आ विजय मित्र के कोषाध्यक्ष बनावल गइल। हम संस्था के संरक्षक मंडल में रहीं। हमहीं संस्था के संविधान तैयार कइनी आ एक दिन में ओकर निबंधन करवनी। ओह घड़ी उत्पाद विभाग के आयुक्ते निबंधन विभाग के महानिरीक्षक होखस। रमाशंकर तिवारी जी उत्पाद  आयुक्त–सह-सचिव आ निबंधन महानिरीक्षक रहीं। हमरा अनुरोध कइला पर दू घंटा में हमारा के निबंधन के प्रमाण पत्र उपलब्ध करा देनी। ओह संस्था का तत्वावधान में जून, १९८९ में  रांची का जवाहरनगर प्रेक्षागृह में ‘अंधायुग’ नाटक के सफल मंचन भइल। अभिज्ञान परिषद का तत्वावधान में डॉ० शंकर प्रसाद का निर्देशन में रांची में नृत्य नाटिका के कार्यक्रम आयोजित रहे। एह सिलसिला में डॉ० शंकर प्रसाद का ८ से १० जुलाई, १९८९ तक रांची में रहे के रहे। अभिज्ञान परिषद का कार्यकारिणी में निर्णय लिआइल कि १० जुलाई के ‘पनिहारिन’ के विमोचन के होई । हम २६ जून, १९८९ के अनिरुद्ध जी के चिठ्ठी लिख के एह बात के सूचना देनी आ ओह तिथि के विमोचन में उपस्थित रहे खातिर अनुरोध कइनी लेकिन कुछ पारिवारिक उलझन का कारण उहाँ का उपस्थित ना हो सकत रहीं। एह वजह से ‘पनिहारिन’ कविता संग्रह के विमोचन ना हो सकल। ‘पनिहारिन’ बन्डल में बन्हाइल पड़ल रह गइल।

अभिज्ञान परिषद का कार्यकारिणी में सन् १९९० में कवि- सम्मलेन आयोजित करे के निर्णय भइल। ओह कवि-सम्मेलन में  स्थानीय कवि लोगन का अलावा हिन्दी के मशहूर गीतकार वीरेंद्र मिश्र, माहेश्वर तिवारी, भारत भूषण, जानकी बल्लभ शास्त्री आ उर्दू के मशहूर शायर बशीर बद्र आइल रहे लोग।ओ कवि-सम्मेलन में भाग लेवे खातिर हम अनिरुद्ध जी के चिठ्ठी लिखनी। अनिरुद्ध जी रांची अइनी आ कवि-सम्मेलन में भाग लिहलीं आ आपन इ गीत सुनवनीं-

‘सरसों  फूल बसंती पगिया पीत चुनरिया रंग दे रे

नैन गुलाबी चटक प्रेम रंग मीत नजरिया रंग दे रे

धरती धानी  बसन फसिल जब पके, कनक रंग काया

कांटा-फूल कुसुम रंग चोला, ई माटी के माया

उड़े बिहग बिसरे ना भुंइया नेह अॅँचरिया रंग दे रे ‘

गीत खतम भइला पर बहुत देर तक जवाहर नगर प्रेक्षगृह श्रोता लोगन का ताली से गड़गड़ात रहल। बशीर बद्र अनिरुद्ध जी के अपना अँकवार में भर लेहलन। देश के नामी गीतकार लोगन का उपस्थ्ति में एह बात पर मोहर लाग गइल कि भोजपुरी में भी ओतने नीमन गीत लिखा सकता जतना कि हिंदी भा उर्दू में आ गीतकार का रूप में सब लोग अनिरुद्ध जी के सराहना कइल। अब समय के खेल कहीं आ आउर कुछ एकरा बाद अनिरुद्ध जी से करीब २१ बारिस ले संपर्क टूटल रहल। २०१३ में जब पटना में आयोजित अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के पच्चीसवां अधिवेशन में उनकरा के सम्मानित करे के बारे में महामाया प्रसाद विनोद से सूचना मिलल। विनोदजी से उनकर मोबाइल नंबर लेके हम उनकरा से संपर्क कइनी। २१ बारिस से टूटल कड़ी फेरु जुड़ल। हमरा खातिर ई बहुते खुसी के बात रहे।

२९ अक्टूबर, २०१८ के पं० गणेश चौबे पुण्य तिथि के अवसर पर लंगट सिंह कॉलेज का भोजपुरी विभाग में अनिरुद्ध जी के दू गो भोजपुरी काव्य-संग्रह ‘गीतां के गाँव में’ आ ‘कृष्ण बाल लीला आ दोहावली  के विमोचन भइल। ओह कार्यक्रम में शामिल होखे खातिर रांची से हम, हरेराम त्रिपाठी चेतन आ कामेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव निरंकुश मुजफ्फरपुर गइल रहीं जा। ओह विमोचन समारोह में अनिरुद्ध जी का कविता पर मुख्य वक्तव्य हमार रहे। फरवरी। २०१९ में मुजफफरप[उर में हमरा भतीजा के बिआह रहे। हम मुजफ्फरपुर गइल रहीं। निरंकुश जी भी पहुंचल रहस। पता चल कि अनिरुद्ध जी के तबियत खराब बा। हमनी उनकरा से भेंट करे पैगम्बरपुर स्थित उनकरा आवास पर पहुंचनी जा। उहाँ का बिछावन पकड़ लेले रहीं आ  उठे-बइठे में बहुत तकलीफ रहे। फिर भी, बेटा से उठा के बइठावे के कहनी। उहाँ का बोले में भी तकलीफ रहे लेकिन अपना लड़खड़ात आवाज में दू गो कविता सुनवनी।  ई उहाँ से अंतिम मुलाकात साबित भइल। ७ मार्च, २०१९ के ९२ बारिस का उमिर में उहाँ का चल बसनी। ई दुखद समाचार हमरा ओही दिन विनोदजी आ ब्रजभूष्ण मिश्र जी से मिलल। अन्तरंग लोग  कतनो लमहर जिनगी जी के चल बसे, ओकरा ना रहला के दुःख रह-रह के सालेला आ जिनगी भर पीड़ा देवे ला। गेहुंआ रंग, कुर्ता-धोती में लिपटल दुबर –पातर काया, छोट-छोट बिखरल केस, गोद में चप्पल भा बाटा के जलसा जूता, झुकल गरदन, चेहरा पर मुस्कान आ हमेश कुछ बुदबुदात-गुनगुनात- अनिरुद्ध जी के ई छवि मन का एल्बम में हमेशा खातिर संजो के रखा गइल बा।

अनिरुद्ध जी के जनम सारण जिला का डीहीं गाँव में ९ मार्च, १९८६ के भइल रहे। ई गाँव गंडक नदी का किनारे बसल बा। गंडक के नारायणी, सदानीरा आ हिरण्यवती भी कहल गइल बा। कसया (कुशीनगर), जहाँ का खुदाई शिविर में अज्ञेय जी के जनम भइल रहे उ हिरण्यवती नदी पर बसल बा। सेंट लुइस, जहाँ अंग्रेजी के मशहूर कवि टी० एस० एलियट  के जनम भइल रहे, मिसौरी नदी पर बसल बा। टी० एस० एलियट का नदी से बहुत लगाव रहे। नदी के बारे में उनकर दु गो उक्ति इयाद आ रहल बा। पहिलका कि ‘नदी हमनी का भीतर बिया’ (‘द रिवर इस विदीन अस’) आ दोसरका कि ‘कवनो बड़ नदी का किनारे जनम लिहला में कुछ बात त जरुर बा जे उ नइखे समझ सकत जेकर जनम नदी का किनारे ना भइल होखे’ (‘देयर इस समथिंग इन हैविंग बीन बोर्न बाई थे साइड ऑफ़ अ बिग रिवर व्हिच इस इन्कम्युनिकेबल टू दोज हु हैवे नॉट’)। हमारा बुझाला कि शालिग्रामी नारायणी का किनारे पर बसल गाँव में अनिरुद्ध जी के जनम भइला में भी कुछ त बात बा। नदी के किनार पर बसल गाँव, ओह गाँव के चेंचर-चांचर, डीह-डीहवार, पेड़-पौधा, चिड़ई-चुरुंग, फल-फूल, साँझ-बिहान, खेत-खरिहान, रितु आ सबका उपर आदमी जन उनकर अनुभूति आ कविता के बिम्ब के स्रोत रहल बा। इहे कारण बा कि उनका अधिकतर कविता प्रकृति से संबंधित बा आ एकरा अलावे ओमे जन-जीवन की झांकी आ माटी के महक भी मौजूद बा।

बात-चीत का सिलसिला में अनिरुद्ध जी बतवले रहीं कि जब उ १९४७-४८ में राजेन्द्र कॉलेज, छपरा में आई० कम० के छात्र रहस ओही घड़ी गीत आ कविता का और उनकर रुझान रहल। शुरू में उहाँ का हिंदी में छिटफुट कविता लिखत रहीं। कॉलेज के प्राचार्य मनोरंजन बाबू के अध्यक्षता में बराबर कवि गोष्ठी भइल करे। ओमें ई आपन हिन्दी के कविता सुनावस। स्तीश्वर सहाय वर्मा सतीश आ उमाकांत वर्मा इनकर समकालीन रहे लोग। ई तीनो जने एकउमिरिया भी रहे लोग। सभे हिन्दी में कविता लिखे। एक दिन मनोरंजन बाबू संझिया पहर अनिरुद्ध जी के अपना डेरा पर बोलवलें आ भोजपुरी में गीत आ कविता लिखे खातिर प्रोत्साहित कइलें। एह तरह अनिरुद्ध कि सन् १९४९ से भोजपुरी में कविता लिखे के शुरू कइलीं आ ई सिलसिला उनकरा २०१९ में उनकरा बिछावन पकड़े तक चलल। एह तरह अनिरुद्ध जी के रचना-आयुष्य सत्तर बरिस के बा। एक बेर के बात हs कि छपरा के नन्दन लाइब्रेरी में हिन्दी के विकास पर आयोजित गोष्ठी साँझ के कवि –सम्मलेन में बदल गइल। ओह कवि-सम्मेलन में अनिरुद्ध् जी के भोजपुरी कविता श्रोता लोग के मोह लेहलस। ई बात उहाँ के हिन्दी साहित्यकार लोगन के अखर गइल। उ लोग भोजपुरी के गंवारू भासा कह के अनिरुद्ध जी के उपेक्षा कइल। ओह मंच पर सतीश्वर सहाय  सतीश भी रहीं जेकरा इ बात ना सहाइल। सभे के सामने उहाँ का प्रतिज्ञा कइनी कि आज से सतीश के रचना खाली भोजपुरिये में होई। अइसने एगो घटना सिंदरी के कल्याण केंद्र में आयोजित हिन्दी के कवि-सम्मेलन में घटल रहे जवना में  सतीश जी, उमाकांत वर्मा आ अनिरुद्ध् जी के कविता पाठ खातिर आमंत्रित कइल गइल रहे। ओह कवि-सम्मेलन के अध्यक्षता दिनकर जी केरे के रहे लेकिन अचानक उनकरा दिल्ले चल जाए का वजह से नागार्जुन जी अध्यक्षता कइनी। ओह कवि सम्मेलन में आसनसोल से आइल हिन्दी के कवि भोलानाथ ‘बिम्ब’ जन श्रोता के मूर्ख भोजपुरी भासा के गंवार के भासा कह के आलोचना करे लगलन। नागार्जुन जी उनकरा के कस के डांट देनी आ कहनी कि ‘तुम्हारी कविता में  क्या है, कुछ भी नहीं। उमाजी की कविताओं में क्या नहीं है?कविता वही है जो जन साधारण की जिंदगी से जुड़ी हो, जो जन-मानस को छू ले, अपनी और खींच ले और हृदय सरोवर में हलचल मचा कर आंदोलित करे।’ अनिरुद्ध जी के कविता नागार्जुन का ए कसौटी पर एकदम खड़ा उतरताs।

अनिरुद्ध जी का कविता से गुजरला पर ई अनुभव होला कि पढ़े आ सुने वाला रस में सराबोर हो गइल। चारों और फूल फूला गइल आ भक् से दिया बर गइल। एकर कारण इ बा कि अनिरुद्ध जी का कविता में छंद, लय, नाद आ ध्वनि के सौन्दर्य, प्रकृति आ आदमी के सुंदर आ मनोहर छवि आ ओकरा से जुड़ल भाव सब एके साथ देखे के मिल जाला। ‘पनिहारिन’ का भूमिका में अनिरुद्ध जी के कविता का बारे में हिन्दी के लब्ध-प्रतिष्ठित प्रोफेसर आ विख्यात आलोचक डॉ० नागेश्वर लाल के संस्मरण उल्लेख करे लायक बा-

बात सन् १९५१ की है जब उन्हें आरा के एक कवि सम्मेलन में देखा था। वे अपनी ‘पनिहारिन’ कविता सुना रहे थे। पूरे वातावरण पर जादुई सम्मोहन छाया हुआ था। यह विशेष अनुभव का विषय था। उस कविता की एक पंक्ति मेरे भीतर रह-रह के प्रतिध्वनित होती रहती है-‘अँचरा के सब पाल उडवले भूँइए नाव चलेला।’ इसमें दो दृश्यों का समीकरण है और उसके बाद धरती पर नाव चलने की असंभव कल्पना के सहारे एक अपूर्व उन्मेष है। यह अपूर्व उन्मेष ही सर्जनशीलता का प्रमुख संकेत माना जा  सकता है। यह साधारण बात नहीं कि अनिरुद्ध की कई कविताओं में यह अपूर्व उन्मेष है।’ उहाँ का आगे कहले बानी, ‘ अनिरुद्ध की कविताएँ सहजपण से जातीय संस्कृति के कर्म में सौन्दर्य, संवेदना और सार्थकता का प्रीतिकर संप्रेषण करने में समर्थ हैं। इससे एक रास्ता खुलने की आशा होती है, ऐसा रास्ता जिससे सौन्दर्य और सार्थकता की एक साथ यात्रा हो सके।’ ई अनिरुद्ध जी के कविता पर बहुत बड़ प्रशस्ति बा।

रामबृक्ष बेनीपुरी, राम विलास शर्मा, हंस कुमार तिवारी, जानकी बल्लभ शास्त्री, राहुल संकृत्यायन, श्याम नारायण पाण्डेय आ डॉ० हरिवंश राय बच्चन अनिरुद्ध जी का कविता के प्रशंसा कइले बा। बच्चन जी के टिप्पणी भी उल्लेख करे लायक बा- “अनिरुद्ध जी की रचना ‘पनिहारिन’ सुना। उसमें ग्राम को छू करे बहती नदी का प्रवाह है। स्वाभाविकता के साथ माधुर्य की जो छटा  कवि ने भर दी है उससे ऐसा प्र्तीत होता है जैसे, फूलों के साथ-साथ दीप भी जलते बह रहे हों। उनकी गूँज मेरे कानों में बहुत दिनों तक बनी रहेगी।”

अनिरुद्ध जी के कविता भोजपुरी कविता के एगो नया मोड़ दिहलस, भोजपुरी कविता का लेखन-शैली नया दिशा लउकावल। ‘पनिहारिन’ में संकलित देस गीत भी बेजोड़ बा। जब १९६२ में चीन के आक्रमण भइल त सर्व भासा कवि-सम्मेलन में उनकर बढ़ावा गीत ‘आज महाधार में देश के पुकार बा, क्रम के गोहार बा/ सामने पहाड़ बा, तूँ जवान चढ़ चलs झूम-झूम बढ़ चलs /बाण पबन कमान पर सनसनात चल चलs’ होखे चाहे १९६७ के सूखा आ अकाल में मेघ के मनुहार, ‘ तू ही कन्हैया राजा, बिजरी राधा रानी/ बरसा बरसs हो, बरससs हो, हो बदरा बरससs हो, अनिरुद्ध के भीतर के कवि अपने कवि-कर्म के प्रति हमेशा सजग रहल

अनिरुद्ध जी के गद्य-लेखन भी ओतने गहिर आ धारदार रहे। भोजपुरी कविता आ साहित्य के बारे में उनकर जानकारी अद्भुत रहे। कुतुबपुर में २०-०२-१९८३ के आयोजित सारण जिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पन्द्रहवां अधिवेशन में उनकर अध्यक्षीय अभिभाषनण पठनीय बा, संग्रहनीय बा। बढ़ पन्ना के एह अभिभाषण में भोजपुरी कविता आ साहित्य के पूरा इतिहास बा भोजपुरी के संत कवि से लेके आज तक कवि लोगन के बारे में। एही तरह ६-७ अप्रैल, १९९६ में गाजीपुर में आयोजित अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पन्द्रहवां अधिवेशन में अनिरुद्ध जी कवि सम्मेलन के अध्यक्षता कइले रहनी। उनकर अध्यक्षीय अभिभाषण के कुछ अंश प्रस्तुत करतानी, जवन कविsता आ कवि- कर्म से संबंधित बा-

मूलतः कविता शब्द कर्म ह। शब्द जड़ ना होला। ई चेतन सत्ता ह जेकरा पर परिवेश आ पर्यावरण के प्रभाव होला, जे परम्परा से जुड़ल होला आ प्रयोग से तरासल जाला। गितिशील जिनगी नीयर कविता के गतिशील बनावे दिसाईं, कवि समाज जागरूक रहे। कविता के सचाई का नगीचा ले आवे में कविता के कला आदर्श बिसरे के ना चाहीं।कविता कला के रूप ह आ कला चेतना के जगावेली आ उन्नत बनावेली। कहल गइल बा कला सत् -चित् -आनन्द देले। एह आनन्द के भावना लोक में श्रोता आ पाठक रंग जाए त कविता सार्थक हो जाले। कला अंतर से फूटेला। अंतरात्मा परमात्मा के अंश ह। आत्मा का वाणी में परम ब्रह्म परमेश्वर के दर्शन होला। कविता वाणी के वाणी हs। वीणा से नील स्वर हs। काव्य के रचनाकार के हम जदि ब्रह्म कहीं त गलती ना कहल जाई।”

कविता, कवि-कर्म आ कवि प्रस्थिति पर अतना सार्थक टिप्पणी बहुत कम नजर आवेला। अनिरुद्ध जी के ई टिप्पणी उनकर कविता का कर्मशाला के उप उत्पाद ( बाई प्रोडक्ट) कहल जा सकता।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन में ‘भोजपुरी भूषण’ , अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के पच्चीसवां अधिवेशन में भोजपुरी के सर्वतोभावेन विशिष्ट सेवा खातिर ‘माधव सिंह पुरस्कार’ भारतीय साहित्य परिषद्, मुजाफ्फरपुर का और से ‘कबीर सम्मान’ बहुत सारा सम्मान से सम्मानित अइसन महान कवि, साहित्यकार, भोजपुरी के वर्ड्सवर्थ आ पन्त आ आपन भोजपुरिया संस्कृति के ध्वजवाहक आ अपना बड़ भाई समान आ दोस्त के हम नमन करतानी।


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min3190

भगवती प्रसाद द्विवेदी 

करीब-करीब पनरह-सोरह बरिस भइल होई, तीन-चार बेर साहित्यिक जलसन में रोहतास (बिहार) के नायाब शहर नोखा के जातरा करेके मोका मिलल रहे। उहे नोखा, जवन कबो गढ़ नोखा का नांव से जानल-पहिचानल जात रहे। आजु भलहीं पहाड़ियन के बेरहम मशीनन से भुरकुस कऽके पथल के रोजगार आ चाउर मिलन के भरमार ओह इलाका के बैपारिक सम्पन्नता के पहिचान बनि गइल होखे, बाकिर नोखा के सही माने में सांस्कृतिक पहिचान रहलन-उहवां के जीवंत कवि कुंजबिहारी कुंजन, जे तमाम संघर्षन से अकेलहीं जूझत भोजपुरी के झंडा ताजिनिगी थम्हले रहे आ यादगार रचनाशीलता का जरिए आपन अमिट छाप छोड़ि गइल।

नोखा में पहिल बेर हम तब गइल रहलीं, जब पुन्नश्लोक कुंजन के पावन इयाद में एगो कवि सम्मेलन आयोजित भइल रहे, जवना के उद्घाटन के बहाना हम कुंजन जी के बेमिसाल व्यक्तित्व-कृतित्व पर दू शब्द बोलिके आपन सरधा के फूल चढ़वले रहलीं आ ओह ऐतिहासिक अवसर के इयाद करत आजुओ हम आपन अहोभागि मानींले। बाकिर एह से बढ़िके विडम्बना अउर का हो सकेला कि जवन शख्स नोखा के पहिचान रहे, साहित्य के नामी-गिरामी हस्तियन के पग-धूर से ओह धरती के धन्य करे में जेकर अविस्मरणीय योगदान रहे, ओही अनमोल रतन के, अपना पहिचान के नोखावासी भुलवा दिहलन। तबे नू कुंजन के इयाद में नोखा में आजु अइसन किछऊ नइखे बांचल, जवना चिन्ह से ओह कवि के चिन्हिके सरधा-सुमन अर्पित कइल जा सके। एगो महत्वपूर्ण साहित्यकार का प्रति कतना एहसान फरामोस बा ई मतलबी समाज!

एह बात के अंदाज बुझिला महाकवि कुंजन अपना जिनिगिए में लगा लेले रहलन। उन्हुकर रेघरिआवे जोग अवदान आ आंतर के उदबेग एह पांती में बखूबी देखल जा सकेला-

जे नोखा के चमका देलस अपना के तलफा के

भोजपुरी के जे निहाल कर देलस देह गला के

ओह कुंजन खातिर नोखा में कहवां कुछ चरचा बा

ओह कुंजन बिन जइसे केहू के ना कुछ हरजा बा!

कुंजन जी के दिली लालसा रहे कि नोखा में ‘भोजपुरी भवन’ के निरमान होखो आ एह खातिर ऊ जीव-जान से लागलो रहलन,बाकिर उन्हुकर साध पूरा ना हो पावल। एह खातिर ऊ भोजपुरी साहित्य-कला परिषद् के गठन कइले रहलन आ कविसम्मेलन आउर महामूरख सम्मेलन के आयोजनो करवावत रहलन,बाकिर देह के अवसान होते ई जालिम दुनिया उन्हुकर मए कइल-करावल पर पानी फेरत भोजपुरी भवन बनवावे के बात के कहो,खुद उन्हुके के भुला-बिसरा दिहलस।

जिनिगी में जीए-जूझे खातिर कुंजन आखिर कवन अधातम ना कइलन! रोजी-रोटी खातिर ऊ बीड़ी बनावे के काम कइलन। दरजीगिरी सीखिके दरजी के काम कइलन। कहे के मतलब ई कि कवनो काम के ऊ छोट भा निकृष्ट ना बुझलन। बाकिर उन्हुका जिनिगी के असली मकसद त कवि-कर्म रहे,जवना में ऊ आपन सोरहो आना कामयाब रहलन। बड़प्पन आ विनम्रता अइसन कि जब उन्हुका कृति के तारीफ आ आकलन होखे लागे,त ऊ हाथ जोड़िके कहसु-‘तीसरा दरजा पास कुंजन से अइसन अपेक्षा मत राखीं सभे!’

अपना के ‘थर्ड किलसिया’ मानत ऊ कहलहूं रहलन-

अधिका नीमन के झूठे नू लवले बानीं आस

जानते बानीं, कुंजन बाड़े तीने दरजा पास!

एह तरी, ‘दरजा तीन’ पास कुंजन खाली स्कूली शिक्षा आ आखरे ज्ञान में ना,बलुक तेवरो में कबीर आ भिखारी ठाकुर के परंपरा के बहुआयामी रचनाकार रहलन। हाजिरजवाबी आ आशुकवित्व के गुन उन्हुका में कूटि-कूटि के भरल रहे। ओइसे त ऊ मूलतः कवि रहलन,बाकिर उन्हुका सिरिजन के विविध आयाम रहे- एगो व्यंगकार के, प्रबंधकाव्यकार के,गीतकार के,ग़ज़लगो के आउर एकांकीकार के।

कुंजन जी रामकथा के कुशल पारखी रहलन आ एह विषय पर उन्हुकर दूगो यादगार प्रबंधकाव्य अइलन स-‘सीता के लाल’ आउर ‘कुंजन रामायण’। ‘सीता के लाल’ के स्तरीयता आ लोकप्रियता के अंदाजा एही से लगावल जा सकेला कि ओकरा पर महेश्वराचार्य के समीक्षा के किताबो प्रकाशित भइल रहे। ‘कुंजन रामायण’ के प्रकाशन कवि के जीवनकाल में त ना हो सकल रहे,बाकिर सासाराम के डॉ नंदकिशोर तिवारी जी के सौजन्य से एकरा प्रकाशन के सूचना मिलल रहे। चोट आ कचोट से लैस व्यंग के दूगो संग्रह ‘कुरकुरहट’ आ ‘कुनैन के गोली’ के कविता , कवि के व्यंग कविता के बेजोड़ नमूना बाड़ी स। गीत-संग्रह ‘रसबुनिया’ आ ‘कुंजन के पाती’ के भावप्रवणता, ताजगी पढ़निहारन के मरम के छूवे बेगर नइखे रहत। हिन्दी ग़ज़ल-संग्रह ‘महफिले ग़ज़ल’ के बांकपन आ एकांकी ‘शिवटहल काका’ के सम्प्रेषणीयता देखते बनत बा। अचरज होला कि कतना पोढ़ आ असरदार रहे उन्हुकर सिरिजना!

बाकिर एह अप्रतिम कवि के सार्थक मूल्यांकन आजुओ बाकी बा। एकरा खातिर समालोचक आ शोध-निदेशक के आगा आवे के चाहीं। बाकिर आजु भोजपुरी का,हिन्दिओ में आलोचना के जवन हाल बा,ऊ केहू से छिपल नइखे। खुद कुंजनो जी एह तथ से वाकिफ रहलन।

तबे नू सेसरो रचना के निजी राग-द्वेष का चलते धज्जी उड़ावल देखिके ऊ कहले रहलन-

बेकटले ना छोड़ी,रचना कतनो होखे रोचक

बानि परल काटे-भोंके के,बनि गइलीं आलोचक!

कुंजन जी के रचनाशीलता के स्थायी भाव रहे-व्यंगपरकता आ आशुकवित्व। समाज के विसंगति-विद्रूपता के खुलासा कऽके ऊ अइसन गहिर चोट करत रहलन कि पढ़े-सुनेवाला के आंतर घाही भइला बेगर ना रहत रहे। आजु के अर्थ केन्द्रित समाज में बूढ़ बाप-महतारी का प्रति बेटा-नाती के का सोच बा,एकर खुलासा करत कवि कहले रहलन-

का हो पूज्य पिताजी, बोलऽ,आखिर कहिया ले जियबऽ तूं,

कहिया ले खा च्यवनप्राश आ ऊपर से गोरस पियबऽ तूं?

बाकिर बेरोजगारी झेलत नवकियो पीढ़ी आखिर का करो! चरम पर पहुंचल महंगी

बाप-महतारी के बहंगी के कान्ह प से उतारे खातिर अलचार कऽ देत बिया। कवि के कहनाम बा-

कान्ह पर के कांवर के उतार दिहले भार,

महंगी के बहंगी ढोवे लगले सरवन कुमार!

‘सीता के लाल’ प्रबंधोकाव्य में हालांकि उत्तरार्ध करुन रस,वीर रस आ वीभत्स रस से सराबोर रहे,बाकिर पूर्वार्ध में हासे-व्यंग के प्रधानता रहे।

आजु जबकि भोजपुरी गायकी चंद फूहर धंधेबाजन का चलते दागदार हो रहल बिया, कुंजन जी के जियतार गीत सहजे इयाद आवत बाड़न स, जवनन के भावभूंइ

सुननिहारन के झूमे खातिर अलचार कऽ देत रहे। अइसने भरत शर्मा व्यास के गावल एगो गीत में प्रकृति के मानवीकरन देखते बनेला। सबेरे के ललकी किरिन धरती पर एह तरी उतरत बिया,जइसे ससुरा में उतरल लजात-सकुचात कनिया गते-गते दउरा में डेग डालत होखे-

ससुरा में आवे जइसे नई दुलहिनिया,

लजात आवे हो तइसे ललकी किरिनिया।

हालांकि सिरिजना का संगें-संगें कुंजन जी ‘सुर-सरिता’ आ ‘कल्लोलिनी’ के संपादनो कइले रहलन आउर अक्तूबर, 1985 में ‘कुंजन स्मारिका’ छापल गइल रहे, बाकिर जब ले ‘कुंजन रचनावली’ के प्रकाशन ना होई आ जब ले नोखा में ‘भोजपुरी भवन’ ना बनी,तब ले का महाकवि कुंजन के दिवंगत आत्मा के अमन चैन आ चिरशांति मिलि पाई?


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min3340

पांडेय कपिल

आचार्य पांडेय कपिल हमार साहित्यिक गुरु रहल बानी। पटना प्रवास के दौरान ( 1996 -2000 ) उहाँ से निकटता बढ़ते चल गइल। पटना छोड़ला के बाद उहाँ के हमार अभिभावक के भूमिका में भी रहीं। 2005 में हमरा शादी में उहाँ का सपरिवार रेणुकूट आइल रहीं। 2 नवंबर 2017 के उहाँ के निधन भइल त हम पटना पहुँचल रहीं। अंतिम भेंट ओकरा डेढ़-दू साल पहिले भइल रहे तब उहाँ के आशीर्वाद स्वरुप आपन किताब लेखांजलि देले रहीं। कहनी ई किताब पढ़िह जरूर।  एह से अंदाजा मिली कि भोजपुरी के इहाँ तक ले आवे में हमनी के का-का करे के पड़ल बा आ कइसन-कइसन उद्भट विद्वान एह अनुष्ठान में लागल बाड़न। आज, जब ” हम भोजपुरिआ/ भोजपुरी जंक्शन ”  पत्रिका में ” भोजपुरी साहित्य के गौरव ”  स्तम्भ खातिर भोजपुरी साहित्य के स्मृतिशेष योद्धा लोग पर आलेख मँगा रहल बानी, खोज रहल बानी, लिख-लिखवा रहल बानी त पांडेय कपिल जी के लेखांजलि के महत्व आ जरुरत समझ में आवत बा। डॉ. उदय नारायण तिवारी जी पर प्रस्तुत ई संस्मरण ओही किताब से लिहल गइल बा। – संपादक

भाषावैज्ञानिक दृष्टि से, हिंदी क्षेत्र से बाहर के भाषा के रूप में भोजपुरी के मुखर स्वीकृति देवेवाला आ ओकरा साहित्यिक विकास में रुचि आ रस लेवेवाला हिंदी के पुरनकी पीढ़ी के मूर्धन्य विद्वान में सबसे ऊपर अगर कवनो नाम हो सकत बा, त उ नाम ह डॉ. उदयनारायण तिवारी।

तिवारी जी भोजपुरी के परम हिमायती रहीं। भोजपुरी भाषा के उद्भव आ विकास विषय पर आपन शोध-प्रबंध उहाँ के ओह घड़ी प्रस्तुत कइलीं जवना घड़ी पढ़ल-लिखल समाज भोजपुरी के पुछवइया कमे लोग मिले। उहाँ के डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी के परम शिष्य आ अनन्य अन्तेवासी रहीं आ उनके निर्देशन में आपन शोध प्रबंध प्रस्तुत कइले रहीं। एह शोध प्रबंध के प्रशंसा गियर्सन आ टर्नर जइसन विद्वान कइले रहले।

तब हिंदी के विद्वान लोग ई मानत जानत आ घोषित कइले रहे कि भोजपुरी हिंदी के ही एगो विभाषा ह आ उ लोग ग्रियर्सन के एह मान्यता के एगो गंभीर साज़िश करार देत रहे कि भोजपुरी भाषी क्षेत्र हिन्दी भाषी क्षेत्र से बाहर पड़त बा। ग्रियर्सन आई. सी. एस. अधिकारी रहले आ फूट डाल के शाषण करे वाली जाति के एगो अंग रहले, एह से जनात रहे कि समूचा राष्ट्र के एक सूत्र में बाँधे में समर्थ हिन्दी के छोटे छोटे क्षेत्र में बाँटे में उनकर इहे नीति सहायक रहल होई। बाकिर पचासन बरिस तक भाषा-शास्त्र के गहन अध्ययन आ शोध के बाद डॉ. उदयनारायण तिवारी जी अंततः ग्रियर्सन के परिश्रम, ज्ञान आ मेधा के लोहा मानत, उनकर पक्षपातरहित विवेचना आ निष्कर्ष के सही ठहरवलीं, आ भोजपुरी के भाषिक स्थिति के मुखर मान्यता देत, ओकरा साहित्यिक विकास के मनसा-वाचा-कर्मणा स्वागत कइलीं।

तब, आचार्य शिवपूजन सहाय जी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक रहलीं, आ परिषद के ओर से सन 1951 में,16 मार्च से 20 मार्च तक पटना विश्वविद्यालय परिसर में ” भोजपुरी भाषा और साहित्य” विषय पर डॉ. उदयनारायण तिवारी के व्याख्यानमाला आयोजित कइले रहीं। पाँच दिन चले वाला एह व्याख्यानमाला खातिर पाँच गो संगोष्ठी के अध्यक्ष क्रमशः बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री आचार्य बद्रीनाथ वर्मा, शिक्षा सचिव श्री जगदीश चंद्र माथुर, पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. शंखधर सिंह, पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ प्रसाद आ हिन्दी के स्वनामधन्य लेखक संपादक रामवृक्ष बेनीपुरी कइले रहले। एह हाई प्रोफइल आयोजन में, हिन्दी के सारस्वत समुदाय के बीच में, तिवारी जी के ई व्यख्यानमाला भोजपुरी के सही भाषिक स्वरूप आ साहित्यिक उन्मेष के बहुते प्रभावशाली उदघोष रहे जवना के बहुते प्रभाव, कम से कम बिहार में, हिन्दी के विद्वानन आ साहित्यकारन पर पड़ल, आ भोजपुरी के रचनात्मक सक्रियता के प्रति आदर के भाव जागे लागल। तब हम पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहीं, आ श्रद्धेय तिवारी जी के प्रथम दर्शन आ स्वल्प संपर्क के सौभाग्य एही संगोष्ठियन के दैरान भइल रहे। आगे चलके तिवारी जी के वृहदाकार शोधग्रंथ भोजपुरी भाषा और साहित्यबिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित भइल, जवना से विद्वत समुदाय में भोजपुरी के भाषिक आ साहित्यिक स्वीकृति के बहुते बल मिलल।

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के स्थापना आ पहिलका अधिवेशन के सिलसिला में 1973-75 के दौरान हमरा तिवारी जी से पत्राचार के कुछ अवसर मिलल रहे। एह सम्मेलन के संविधान तैयार करके ओकरा मोताबिक पहिलका अधिवेशन आयोजित करावे खातिर जे तदर्थ समिति बनल रहे ओकर सदस्य रहले- श्री द्वारिका सिंह(अध्यक्ष), आचार्य महेंद्र शास्त्री, श्री रघुवंश नारायण सिंह, श्री पांडेय नर्मदेश्वर सहाय, श्री गणेश चौबे, श्री बिपिन बिहारी सिंह, श्री सत्यनारायण लाल, श्री सिपाही सिंह श्रीमंत, आचार्य विश्वनाथ सिंह, डॉ. वसंत कुमार आ पांडेय कपिल (संयोजक-सदस्य)।

1973-75 के दौरान तदर्थ समिति के बीसों बैठक भइल, आ जब सम्मेलन के संविधान तैयार हो गइल त पहिलका अधिवेशन के अध्यक्षता खातिर डॉ. उदयनारायण तिवारी के नाम पर सभे एकमत हो गइल। चूँकि सम्मेलन के कार्यालय पटना में राखे के तय भइल रहे, आ हमनी के पटना में पहिला अधिवेशन करावल सुविधाजनक बुझात रहे एह से एकर तइयारी खातिर पटना में भोजपुरी प्रेमियन के एगो बड़ बैठक बोलावल गइल। तिवारी जी के स्वीकृति प्राप्त करे के जिम्मा हमनी इलाहाबाद में रहेवाला कवि भोलानाथ गहमरी के दिहलीं, आ तिवारी जी के नाँवें अनुरोध-पत्र गहमरी जी के पास भेज के उनका से अपेक्षा कइलीं कि उ तिवारी जी से स्वीकृति पत्र ले के पटना आवस आ ओह तइयारी बैठक में शामिल होखस।

तदनुसार, तिवारी जी के स्वीकृति पत्र के साथ गहमरीजी पटना पहुँचले आ ओह तइयारी बैठक में तिवारी जी के स्वीकृति पत्र के साथ हीं प्रयाग के भोजपुरी परिषद के ओर से पहिला अधिवेशन प्रयाग में करावे  के निमंत्रण पत्र भी प्रस्तुत कर दिहले जे कि हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के प्रधानमंत्री श्री श्रीधर शास्त्री (अध्यक्ष, भोजपुरी साहित्य परिषद प्रयाग ) के हस्ताक्षर से लिखल गइल रहे। गहमरी जी के तर्क रहे कि ई अखिल भारतीय संस्था ह जवना के मुख्यालय पटना में रही त एकर पहिलका अधिवेशन प्रयाग में आयोजित कइला से एकर अखिल भारतीय स्वरूप उजागर होई, आ हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के परिसर में भोजपुरी के ई महाकुंभ आयोजित होखे त ई हिंदी के ओर से भोजपुरी के स्वीकृति मानल जाई। एह तर्क से सभे सहमत हो गइल आ पहिला अधिवेशन प्रयाग में, हिंदी साहित्य सम्मेलन के परिसर में करे के दिन तारीख सब तय हो गइल।

बाकिर जब डॉ. उदय नारायण तिवारी के ई सूचना मिलल कि अधिवेशन प्रयाग में होखे जा रहल बा त उहाँ के अध्यक्ष होखे से इनकार करे लगनी। गहमरी जी बहुत चिंतित होके चिट्ठी लिखले। फेर, तिवारी जी के भी चिट्ठी हमरा मिलल, जवना में उहाँ के लिखले रहीं कि हम इलाहाबाद में घर बना के रहे लागल बानी, इलाहाबाद में बस गइल बानी, एह से हम इलाहाबाद में होखे वाला सम्मलेन के अध्यक्षता ना करब। अइसने चिट्ठी उहाँ के पंडित गणेश चौबे किंहा भी लिखले रहीं।

समय कमे बाचल रहे। अधिवेशन के नियत तिथि नियराइल जात रहे, आ अब दोबारा बैठक बोलावे के आ दोबारा अध्यक्ष चुने के समय ना रहे। एह से, हम तिवारी जी के तुरंत चिट्ठी लिखनी कि अब एह सर्वसम्मत निर्णय में बदलाव ले आइल संभव नइखे, काहेकि एकर घोषणा हो चुकल बा, आ अब एह निर्णय के बदले खातिर जवन प्रक्रिया अपनावे के पड़ी ओह खातिर समय नइखे। हम इहो लिखनी कि सम्मेलन के संविधान के मोताबिक अध्यक्ष के कार्यविधि अधिवेशन से शुरू होके अगिला वार्षिक अधिवेशन के एक दिन पहिले तक खातिर बा, एह से सिर्फ दु दिन तक होखे वाली प्रयाग अधिवेशन के चलते, सालभर तक मिलेवाला अपना मार्गदर्शन से एह सम्मेलन के वंचित मत करीं, आ आपन इनकारी वापस लेवे के कृपा करीं। अंत में, हम इहो लिखनी कि अगर जे अमुक तारीख तक अइसन कृपा ना करब त हम पंडित गणेश चौबे आ श्री सिपाही सिंह श्रीमंत के साथे इलाहाबाद पहुँच के रउआ घरे भूख हड़ताल पर बइठ जाइब। एह चिट्ठी के प्रति चौबे जी आ श्रीमंत जी के भेजत हम इहाँ सभे से अनुरोध कइलीं कि इलाहाबाद चले खातिर तइयार होक रउआ अमुक तारीख तक पटना पहुंचे के कृपा करीं।

ई चिट्ठी मिलते श्रद्धेय तिवारी जी इनकारी के फैसला वापस ले लिहनीं आ गहमरी जी के सूचित कइलीं कि हम अध्यक्षता स्वीकार करत बानी। गहमरी जी टेलीफोन से एकर सूचना दिहले त मन हलुक हो गइल। तब तक श्रीमंत जी इलाहाबाद चले खातिर आ गइल रहले, आ ऊहे चौबे जी किहाँ बंगरी(चंपारण) में आदमी भेज के ई सूचना देवे के व्यवस्था कइले कि तिवारी जी अध्यक्षता करे के सँकार ले ले बानी आ अब इलाहाबाद जाए के जरूरत नइखे

एह तरे, हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के मंच पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पहिलका अधिवेशन 8-9 मार्च 1975 के डॉ. उदय नारायण तिवारी जी के अध्यक्षता में विधिवत समपन्न भइल, जवना में डॉ. रामकुमार वर्मा समेत इलाहाबाद के रहवइया लगभग सभे हिंदी के विशिष्ट साहित्यकार लोग शामिल भइल रहे। मॉरीशस के राजदूत श्री रवींद्र घरभरन एह अधिवेशन के उद्घाटन कइले रहले। सम्मेलन के महामंत्री हमहीं बनावल गइलीं। सम्मेलन के काम बढ़ावे में तिवारी जी के हर संभव सहयोग हमरा बराबर मिलत रहल।

भोजपुरी के रचनात्मक आ संगठनात्मक विकास से तिवारी जी बड़ा हुलसित होत रहीं। सम्मेलन के प्रयास से जब बिहार सरकार भोजपुरी अकादमी के स्थापना कइलस त उहाँ के हुलास देखे में आवत रहे। अकादमी के स्थापना के कुछुवे दिन बाद जब उहाँ के पटना अइलीं त उहाँ के सम्मान में अकादमी के ओर से संगोष्ठी आयोजित भइल। एह संगोष्ठी में अकादमी के सदस्य लोगन के संबोधित करत उहाँ के भोजपुरी के एह उपलब्धि पर आपन आत्मिक प्रसन्नता व्यक्त कइलीं आ बतवलीं कि अकादमी पर कइसन जिम्मेदारी आ दायित्व बा अउर कइसन कइसन काम अकादमी के करे के चाहीं। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन आ भोजपुरी अकादमी के काम के हिगरावत उहाँ के परस्पर तालमेल से काम करे पर विशेष जोर दिहलीं।

भोजपुरी के हर प्रकाशन के अवलोकन तिवारी जी बड़ा चाव से करत रहीं आ आपन शिष्य शोधकर्ता लोगन के ओकरा बारे में निर्देश कइल भुलात ना रहीं। भोजपुरी के हर गतिविधि पर उहाँ के नजर रहत रहे, आ भोजपुरी के लेखक आ कार्यकर्ता लोगन के उहाँ से आशीर्वाद आ प्रोत्साहन मिलत रहे। भोजपुरी के बारे में उहाँ के नजरिया सुलझल आ जबान साफ़ रहे। उहाँ के जमाना के हिंदी के विशिष्ट विद्वान लोगन में, भोजपुरी के जेतना खुलल आ व्यक्त समर्थन आ प्रोत्साहन उहाँ से मिलत रहे, उहाँ के पीढ़ी के कमे लोगन से मिलत होई।

तिवारी जी से व्यक्तिगत निकटता के अवसर हमके 1998 में मिलल जब उहाँ के पटना विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कुछ महीना खातिर पटना आ के रहे लागल रहीं। पटना आवे के एक हफ्ता भर के भीतरे उहाँ के हमरा आवास पर पधारे के कृपा कइलीं आ अपना आशीर्वाद से हमरा घर परिवार के कृतकृत्य कइलीं। उहाँ के हमरा से अपेक्षा कइलीं कि हफ्ता दु हफ्ता पर हम उहाँ के पटना आवास पर आवत जात रहीं। उहाँ के एह आदेश के हम सहर्ष शिरोधार्य कइलीं आ समय समय पर तिवारी जी के सेवा में पहुँचे लगलीं। हमरा साथे, जब तब भोजपुरी के नवका साहित्यकारो लोग उहाँ के लगे पहुँचल करे आ उहाँ के वचनामृत के लाभ लिहल करे।

पटना प्रवास के दौरान तिवारी जी राजेन्द्र नगर मोहल्ला में किराया के घर मे रहे लगनीं। ओही मुहल्ला में थोड़ीके दूर पर उहाँ के बेटी दामाद के मकान रहे। ऊ लोग बहुत कोशिश कइल कि तिवारी जी ओही लोग के साथ रहीं। तिवारी जी के दामाद श्री प्रमोद नारायण तिवारी हमार मित्र रहले। ऊ हमरो से कहववले कि बुढापा में अकेले रहल ठीक नइखे। बाकिर तिवारी जी के पुरान संस्कार, बेटी के घरे रहल आ बेटी के अन्न खाइल, मंजूर ना रहे।

एक दिन हम भोर के बेरा तिवारी जी के आवास पर पहुँचलीं त तिवारी जी तावा पर रोटी सेंकत रहीं। हम कहलीं कि अपने के अकेले में त बड़ा कष्ट बा, अपने हाथे भोजन बनावे के पड़त बा। तिवारी जी मुस्कुरात कहलीं कि हम ब्राह्मण नु हईं, आ ब्राह्मण के हर बालक के स्वयंपाकि होखे के संस्कार मिलल रहेला।

अपना व्यस्तता के बावजूद तिवारी जी भोजपुरी के ओइसन किताबन के अवलोकन ठीक से करत रहीं जवन उहाँ के पास उपहार के रूप में पहुँचत रहे। पढ़ला के बाद उहाँ के लेखक लोगन के प्रति लिखित भा मौखिक रूप से आपन प्रतिक्रिया व्यक्त करत रहीं। हमरा उपन्यास फूलसूंघी के उहाँ के बहुत प्रशंसक रहीं। कविवर जगन्नाथ जी के ग़ज़ल संग्रह ‘लर मोतिन के’ पढ़त उहाँ के आघात ना रहनीं। एह ग़ज़ल संग्रह पर कवनो हिंदी पत्रिका में एगो लमहर लिखे के उहाँ के विचार रहे, बाकिर व्यस्तता के चलते ई काम ना हो सकल। सत्यवादी छपरहिया के निबंध संग्रह ‘ कलमिया नाहीं बस में’ पढ़के उहाँ के एतना प्रभावित भइलीं कि सत्यवादी जी से मिले के इच्छा व्यक्त कइलीं। अपना रचना के तारीफ तिवारी जी के मुँहे सुनके सत्यवादी जी के आँखिन में लोर छलछला आइल।

ओह घड़ी हम भोजपुरी संस्थान पटना के त्रैमासिक मुखपत्र ‘ उरेह ‘ के संपादन करत रहीं। ‘उरेह’ के हर अंक तिवारी जी बड़ा मनोयोग से पढ़त रहीं। ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’ के पहिलका साल के पहिलका अंक के बारे में ‘उरेह’ (जिल्द 4, अंक 1) के हमार सम्पादकीय टिप्पणी पढ़ के उहाँ के हमरा के बहुत बधाई देलीं आ भाषा विषयक हमार विचार के हार्दिक समर्थन कइनीं।

हमरा अनुरोध पर उहाँ के दोसर दोसर जरूरी काम रोक के ‘उरेह’ खातिर ‘भोजपुरी के प्रेमी ग्रियर्सन ‘ शीर्षक लेख लिख के देले रहीं, जे कि ‘उरेह’ के तिसरका जिल्द के चउथा अंक में प्रकाशित भइल रहे। तिवारी जी के उ लेख वस्तुतः डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी आ ग्रियर्सन से संदर्भित एगो रोचक संस्मरण रहे, जवना के कुछ अंश अपना एह संस्मरण में इहाँ पर उद्धृत करे के लोभ-संवरण हम नइखी कर पावत-

“हमारा गुरु डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ग्रियर्सन साहेब के बहुत बड़ा भक्त रहले। जब उ लंदन यूनिवर्सिटी में ‘बंगला भाषा के उद्गम आ विकास’ पर आपन डी लिट् के थीसिस लिखत रहले त ओमें सबसे ज्यादा सहायता ग्रियर्सन साहेब दिहले। कलकत्ता में जब हम सुनीति बाबू के छात्र रहलीं त उ हमरा से कहले कि ग्रियर्सन साहेब के भोजपुरी दही बहुत पसंद रहे। सुनीति बाबू बीच बीच मे ग्रियर्सन साहेब किहाँ जब मिले जास त ग्रियर्सन साहेब कहस कि दुनिया में सबसे मलाईदार दही भोजपुरी लोग खाला।

ग्रियर्सन साहेब लंदन से तीन चार स्टेशन पर राथफार्महम में रहत रहले। उनकरा एक मात्र पुत्र के जर्मनी वाली लड़ाई में निधन हो गइल रहे। ग्रियर्सन साहेब आ उनकर पत्नी ओकरा बहुत दिन बाद तक जियत रहे लोग। सुनीति बाबू बतावस कि ग्रियर्सन साहेब के पत्नी दही जमावे के ढंग भोजपुरी क्षेत्र से सीख के गइल रहली। ग्रियर्सन साहेब दु ठो भँईस रखले रहले। ओकरा दूध के गोइठा पर गरम करके दही बने आ फिर, ग्रियर्सन साहेब चूड़ा दही चीनी के जलपान करस। सुनीति बाबू इहो बतावस कि उ अपना घर पर एगो काकातुआ रखले रहले, जवन की बीच बीच मे बोले ‘ राम नाम मनवाँ राम-नाम बोल’।”

सन 1981 में, हम सारण जिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के तेरहवाँ अधिवेशन के अध्यक्षता कइले रहीं। हमरा मुद्रित अध्यक्षीय भाषण के जब एक प्रति तिवारी जी के मिलल, त ओकरा के पढ़ के उहाँ के हमरा के आशीर्वाद देत चिट्ठी में लिखले रहीं कि ” अइसन सुंदर आ तर्कपूर्ण भाषण अबहीं ले केहू भोजपुरी भाषी नइखे देले। मन करता कि एकरा बार-बार पढ़ीं। एह भाषण खातिर रउआ के बार-बार बधाई। भाई, भाषा के समस्या पर स्पष्ट ढंग से सोचे के बा। आ रउरा सोचे के ढंग नितांत समीचीन आ मौलिक बाटे।”

श्रद्धेय तिवारी जी के अपना वार्धक्यशिथिल देह के अंत के कुछ आभास होखे लागल रहे। एह से उहाँ के अपना के समेटे लागल रहीं, आ प्रयाग ना छोड़े के मन बना चुकल रहीं। उहाँ के ई आध्यात्मिक इच्छा रहे कि जब ई देह छूटे, त तीर्थराज प्रयाग के माटी ही मिले। सन 1981 में उहाँ के ई अंतिम इच्छा पूरा त हो गइल, बाकिर उहाँ के ना रहला पर, भोजपुरी के नेही छोही लोगन के ई महसूस त भइबे कइल कि भोजपुरी के भाषिक अस्मिता के नेंव के एगो मजबूत ईंटा खरक गइल। उहाँ के पुण्य स्मृति के सादर नमन।


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min2030

मार्कण्डेय शारदेय

पाण्डेय कपिल जी के आगे पुण्यश्लोक जोड़त गजिबे लागत बा। बाकिर दिव्यलोकी होखला से उहाँ का आपन यशःशरीरे से नु एहिजा बानीं! भर्तृहरि जी कहलहूँ बानी-

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाःकवीश्वराः।

नास्ति तेषां यशःकाये जरा-मरणजं भयम्।।

अर्थात्  रस में पगाइल  ओह कवियन के जय होखे, जेकर यश रूपी शरीर बुढ़ापा आ मृत्यु से दूर रहेला। दुनिया में केहू भा कुछुओ अइसन नइखे, जे मृत्यु देवी से बचि जाउ। आजु ना त काल्हु ऊ उठाइये ले जइहें। जे मरियो के जीये, ओकरे जीयल जीयल ह।

कपिल जी अपने खातिर ना; साहित्य देवता खातिर, भोजपुरी माता खातिर आ साहित्यकार बन्धुअनो खातिर जीयत रहलीं। उहाँ का राजभाषा विभाग में उपनिदेशक रहलीं, बाकिर सहित के भाव से अतना ओतप्रोत रहलीं कि एगो छोटो साहित्यसेवी उहाँ के पास चलि जाउ अपनत्व से ओकरा के खींच लेत रहीं।

बात 1983 के ह। हम भोजपुरी में ‘पाशुपत-प्राप्ति’(खण्ड काव्य) लिखले रहीं। जब पाण्डुलिपि पर सम्मति खातिर कविवर विश्वनाथ प्रसाद ‘शैदा’ के पास गइलीं त उहाँ का आपन सम्मति देला के बाद यशस्वी साहित्यकार रासबिहारी राय शर्मा जी से भी अभिमत ले लेबे के परामर्श कइलीं। एके गाँव के बात रहे। हम ओही घरी ऋषितुल्य शर्मा जी किहाँ पहुँच गइलीं। अस्सी ऋतुअन के षट्चक्र से तपल साधुवृत्ति के कारण सस्नेह बइठा के पढ़लीं आ टटके आपन शुभाशंसा लिख देलीं। देखीं, सत्संगति कइसे कइसे जोड़त जाले! उहाँ का कहलीं जे रउरा पटना जाईं त श्रीरंजन सूरिदेव, रामदयाल पाण्डेय आ पाण्डेय कपिल से भेंट करबि। युवा मन उत्साह से भर गइल। कुछे दिन बाद हम पुरनका सचिवालय में स्थित राजभाषा विभाग में पहुँचि गइलीं। कपिल जी अपना चेम्बर में श्री कृष्णानन्द कृष्ण आ श्री भगवती प्रसाद द्विवेदी के साथे बइठल रहलीं। शर्मा जी के नाम लेके आपन परिचय देलीं त उहाँ के स्नेहपूर्वक बइठइलीं आ हमार काव्य सुनलीं। उहाँ का छपवावे के उपायो सुझइलीं, बाकिर हम सफल ना हो पइलीं। खैर, ई प्रथम साक्षात्कार रहे। बाकिर उहाँ के मुँहे आपनि कृति के प्रशंसा सुनि के संतुष्टि मिलल आ लेखन में गतियो आइल। ओही साले हमार एगो लेख ‘कवि कविता आ काव्य’ भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका के अक्तूबर (शायद) अंक में छापि के मनोबलो बढ़इनी।

दुसरका संक्षिप्ते भेंट हमरा डुमराँवे में कवि-सम्मेलन में भइल। ओह घरी साहित्यिक बन्धु श्री रामेश्वर चौधरी के प्रशंसनीय प्रयास से महाकवि रामदयाल पाण्डेय के साथे पटना के कतने शीर्षस्थ कवि पधरले रहीं सभे। ओही में हमार भोजपुरी कविता-संग्रह ‘गठरी’ के रामदयाल जी के करकमलन से लोकार्पणो भइल रहे। कविवृन्द में बइठल कपिल जी के ओर हमार ध्यान ना गइल, बाकिर उहाँ के तुरते बोलाके अपना सौहार्द से हमरा के सुगन्धित आ आर्द्र कर दीहलीं।

1994 से हम पटने रहे लगलीं त सान्निध्य सुख में वृद्धि भइल।

हम एगो व्यक्ति के रूप में पाण्डेय जी के सदा सरल आ सहज पइलीं। उहाँ के रचल साहित्यो खूब पढ़लीं, ओहू में व्यक्तित्व के जवन सुगन्धि रहल, ऊ समाइल रहे। साहित्य-सृजन एगो अलग काम ह आ संगठन चलावल बहुते अलग। बाकिर कुशल, कर्मठ, जुझारू, दूरदर्शी आ परिपक्व लोगन खातिर कुछुओ असम्भव आ बेमेल ना होला, पाण्डेय कपिल जी के देखि के हमरा अतने बुझाइल। भोजपुरी के उत्थान में उहाँ के योगदान के कबो भुलाइल ना जा सकेला। उहाँ के कीर्ति खाली कृतियन से ना, सम्पादकीय कौशलो से सदैव पसरल रही आ उहाँ का अमर रहबि-कीर्तिर्यस्य स जीवति।


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min2020

गरिमा बंधु

आपन जन्मदाता, अम्मा बाबूजी पर कुछ लिखल हमरा बस में नइखे। जे हमरा के जनम देहल आ पाल पोस के जिनीगी संवार देहल ओकरा के हम शब्दन में का बांधेव। मतारी-बाप आ वड़ बुजुर्ग त भगवान के प्रतिनिधि हउए। काहे कि, भगवान खुद उतर के ना त हमरा के आशीष दिहें ना प्यार करिहें ना, ना हमरा गलतियन पर हमरा के डांट फटकार लगइहन।

अइसे त हमार बाबूजी श्री पाण्डेय कपिल जी आ अम्मा श्रीमति सुशीला पाण्डेय के साथ बितावल ढेर सारा संस्मरण बा। जे में से कुछ साझा कर रहल बानी। आज ओह लोग के बारे में सोचत खा आँख लोरा जा रहल बा। 2 नवम्बर के हमरा बाबूजी के पुण्यतिथि ह। 2 नवम्बर 2017 के उँहा के बैकुंठ धाम सिधार गइल रहीं आ अब त 19 अप्रैल 2021 के अम्मा भी स्वर्ग लोक सिधार गइली। अब त वोह लोग के स्मृति शेष ही रह गइल बा।

हर साल अम्मा-बाबूजी जाड़ा से पहिले नवम्बर महिना में आवत रहे लोग आ जाड़ा बिता के मार्च महिना में लौटत रहे लोग। संयोग से हमनी के हमेशा अइसने जगह पर रहत रहीं जहाँ जाड़ा ना पड़त रहे। जइसे तमिलनाड़ु, केरल आ मुंबइ । पहिले त उ लोग अकेले आवत जात रहे बाकि उमिर बढ़ला पर हम खुद पटना जा के जाड़ा से पहिले लिया आवत रहीं आ जाड़ा ख़तम भइला पर पंहुचावत रहीं। जेतना दिन उ लोग के साथ रहे के मौका मिलत रहे, ओतना दिन बहुत आनंदमय गुजरत रहे। जब मौका मिलत रहे तव बाबूजी हमनी के साहित्यिक लोग के बारे में आ गाँव घर के बारे में किस्सा कहानी सुनावत रहीं। गाँव में कइसे कवि गोष्ठी होत रहे जेमे बड़-बड़ साहित्यिक लोग पहुँचत रहे। गाँव में नाटक होत रहे जेमें बाबूजी भी हिस्सा लेत रहीं। इ सब सुन के हमनी के बहुत आनंद आवत रहे। इहाँ रहला पर, हर एतवार के हमनी क़वनों ना क़वनों मंदिर घूमे जात रहीं।

ओह लोग के तीर्थाटन के हार्दिक इच्छा रहत रहे। एह से हमनी के, खासकर के हमार पति निरंजन नाथ बंधु एह बात के ध्यान हमेशा राखत रहीं। एह बात के ध्यान देत, बंधुजी जब मौका मिलत रहे तब कहीं ना कहीं तीर्थाटन के प्रोग्राम बना देत रहीं।

अम्मा बाबू जी के माता वैष्णो देवी दर्शन करे के हार्दिक इच्छा रहे। बाबूजी हमेशा कहेब, ऐ बेटा एक बेर वैष्णो देवी के प्रोग्राम बनो। अब हमनी के उमिर बढ़ रहल बा त पहाड़ी यात्रा मुश्किल होखी। बाकि अइसन मान्यता बा कि जब तक माता के बुलावा ना आइ तब तक हमनी माता के दरवार में ना पहुँच सकी, आ उहे भइल। 2006 में हमार बेटा अनुराग बंधु के 10वाँ के बोर्ड परीक्षा समाप्त भइल आ एकाएक प्रोग्राम बन गइल। ओ घड़ी, हम मुंबइ में रहत रहींl हम बाबूजी के फोन कइनी कि अपने लोग मुंबइ आ जाईं तब वैष्णो देवी के दर्शन करे चलल जाओ। सुनते बाबूजी जाये के तइ यार हो गइनी आ बहुत खुश भइनी।

अब बाबूजी के स्वीकृति मिलला के बाद बंधुजी ट्रैन के टिकट आ ठहरे खातिर कटरा में दू दिन आ जम्मू में एक दिन खातिर होटल में कमरा ऑन लाइन बुक करा लेहनी। ठाणे, महाराष्ट्र में विश्व भोजपुरी सम्मलेन के अधिवेशन रहे जेकरा में बाबू जी के शामिल होखे खातिर न्योता मिलल रहे। एह से बाबूजी थोड़ा पहिलहीं मुंबइ आ गइनी। ओह साल हमनी के होली के त्यौहार भी बहुत आनंद दायक रहल काहे कि अम्मा-बाबूजी भी साथ रहे लोग।

10 अप्रैल 2006 के हमनी सब आदमी बांद्रा स्टेशन से जम्मू पहुंचे खातिर ट्रेन पकड़नी। दू दिन के यात्रा तय करके हमनी के होत सवेरे जम्मू पहुँचनी। अब हमनी के कटरा जाय खातिर एक टैक्सी बुक कइनी। जम्मू से कटरा जाय में दू घंटा लागल। कटरा पहुंच के सबसे पहिले देवी के दर्शन खातिर पर्ची कटावल गइल। ओकरा बाद टैक्सी लेके हमनी के पहिले से बुक कइल होटल में पहुंच गइनी। उहाँ नहा धो के फ्रेश भइला के बाद नास्ता चाय भइल। ओकरा बाद हमनी अपना कमरा में दिन भर आराम कइ नी। शाम के समय शहर में कुछ घुमत फिरत रात के खाना खाके हमनी अपना होटल के कमरा में पहुंच गइनी। बिहान भइला सुबह सवेरे नहा धो के नास्ता कइ ला के बाद भवन जाये के तैयारी भइल। कटरा से माता रानी के भवन जाये खातिर कोई पैदल जाला त कोई घोड़ा या पालकी से। हमनी घोड़ा के सवारी तय कइ नी काहे कि अम्मा-बाबूजी पैदल ना जा सकत रहे लोग। वाण गंगा से यात्रा शुरू भइल। हमार अम्मा त घोड़ा पर आराम से सबसे पहिले चढ़ गइली आ जय माता दी के बोल शुरू कर देली। बाबूजी के घोड़ा पर चढ़े में थोड़ा डर लागत रहे बाकिर चढला के बाद खूब आनंद उठवनी। रास्ता भर जय माता दी के नारा गूँजत रहे। बड़ा मनोरम दृश्य रहे। सब लोग में जोश आ उत्साह भरल रहे। दूसरका पड़ाव चरण पादुका रहे आ ओकरा बाद के पड़ाव अर्ध कुवारी। रास्ता के पूरा व्यवस्था माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा कइल जाला। रास्ता में भोजनालय आ चाय नास्ता के व्यवस्था रहे। अर्ध कुवारी पहुंच के हमनी चाय पियनी आ लगभग आधा घंटा विश्राम के बाद आगे बढ़ल गइल। कुछ देर के बाद हमनी वैष्णो देवी भवन पहुँच गइनी। उहाँ प्रसाद खरीदल गइल तथा जूता चप्पल श्राइन बोर्ड द्वारा बनावल लॉकर में रखल गइल। अब दर्शन के लाइन में लागल आदमी। आगे बढला पर प्रसाद के नारियल जमा करे के पड़त रहे ओकरा बदले टोकन मिलत रहेl आगे बढला पर माता रानी के पवित्र गुफा में हमनी के प्रवेश कइनी। उहाँ माता रानी के तीन पवित्र पिंड बनल बा। हमनी के माता रानी के आगे सिर झुका के प्रणाम कइनी। बाहर निकलला पर एक काउंटर बनल बा जहाँ टोकन देला पर नारियल आ माता रानी के एगो पवित्र सिक्का मिलल। उहाँ से निकल के बाबा भैरव नाथ के दर्शन खातिर हमनी के आगे के चढ़ाई घोड़ा से शुरू कइनी। लगभग आधा घंटा के चढ़ाई के बाद हमनी के बाबा भैरव नाथ के दर्शन भइल। इहाँ पर चढ़ाई  ख़तम हो गइल। अब नीचे उतरे के रहे। उतरत समय घोड़ा के सवारी से बहुत असुबिधा होत रहे। एह से हमनी के घोड़ा के सवारी छोड़ देहनी आ पैदल हीं नीचे कटरा तक आ गइनी। कटरा पहुँचत पहुँचत शाम हो गइल। वोह दिन हमनी के कटरा में हीं रुक गइनी। बिहान होके सुबह सवेरे जम्मू खातिर रवाना भइनी। जम्मू पहुंच के हमनी के पहिले से बुक कइल होटल में गइनी। दिन के भोजन कइला के बाद कुछ खरीदारी भइल आ शाम में जम्मू के सुप्रसिद्ध रघुनाथ मंदिर आ छोट मोट दूसरो मंदिर के दर्शन भइल। दूसरा दिन सुवह में हमनी के पटना खातिर ट्रेन पकड़नी।

बात जून 2012 के ह। ओह घड़ी हमार दीदी अंबुजा सिन्हा एजी कॉलोनी में रहत रही। बाबूजी के आवास पर अम्मा बाबूजी आ उनकर बड़ नाती अभिषेक रहत रहे लोग। एक दिन बाबूजी एकाएक बेहोश होके गिर पड़नी। अभिषेक ऊंहा के मुंह पर पानी के छींटा देलन आ होस अइला पर बिस्तर पर लेटवलन। ओकरा बाद अपना मम्मी अंबुजा सिन्हा के फोन से बतवलन। हमार दीदी अंबुजा आ जीजा जी तुरत पहुंचल लोग आ डॉक्टर से देखावल गइल। बाबूजी के हॉस्पिटल में भर्ती करे के पडल। 12 बजे दिन में दीदी हमरा के फोन से बतवली। इ बात हम अपना पति के ऑफिस में फोन करके बतवनी। उहां के पटना जाए खातिर फ्लाइट के टिकट बुक करा के ही घर अइनी। दूसरा दिन सुबह हम अपना पति के साथ पटना पहुंच गइनी। ओह घड़ी हमार छोटका चाचा चंद्रविनोद जी पटना में ही अपना बेटी पूजा के पास आइल रहीं। बाबूजी के प्रोस्टेट के ऑपरेशन करावे के पड़ल। चाचा जी के रहला से बहुत सहयोग भइल। बाबूजी के हॉस्पिटल से घर अइला के बाद हमार पति बंधु जी मुंबई लौट अइनी। अब बाबूजी के देख रेख करे वाला हम आ अभिषेक रह गइनी। बीमारी के कारण बाबूजी चिड़चिड़ा हो गइल रहीं। बीच-बीच में हमार दीदी तथा छोटका चाचा-चाची लोग आवत रहे। चाचा जी के देख के बाबूजी बहुत प्रसन्न हो जात रहीं। चाचा जी का साथ कविता कहानी भी होखे। हमार बुआ भी कभी-कभी आ जात रही। हमार बड़का चाचाजी पांडेय सुरेंद्र जी अपना बेटा राजीव नयन के साथ बाबूजी से मिले आइल रहीं। बाबूजी बहुत खुश भइनी। जब चारो भाइ बहिन जुटे लोग तब खूब जमत रहे। गांव घर के किस्सा कहानी होखे। बचपन के बात होखे। कभी-कभी सब कोई मिल के अम्मा के चुटकी लेत रहे। ओहमें हमनी के भी बहुत मजा आवत रहे। हमनी भी बीच-बीच में कुछ बोलत रहीं। ओह घड़ी हम बाबूजी का साथ तीन महीना रहके मुंबई आ गइनी।

ओकरा बाद जाड़ा आवे से पहिले नवम्बर में हम पटना जा के अम्मा बाबूजी के मुंबई ले अइनी। समय मजेदार गुजरत रहे एही बीचे मार्च 2013 में बाबूजी के तबियत कुछ ख़राब हो गइल। इहाँ तक कि हॉस्पिटल में भर्ती करावे के परल। हॉस्पिटल में भर्ती भइला पर प्रॉस्टेट के दोवारा ऑपरेशन करावे के पड़ल। इ सुन के हमार दीदी आ जीजाजी मुंबई आइल लोग आ एक सप्ताह रह के लौट गइल लोग। ओह साल अम्मा-बाबूजी एक साल मुंबई में रह गइनी। ओह बीच में उँहा के सेवा करे के मौका मिलल आ बहुत कुछ सीखे के भी मिलल। ओही समय बाबूजी हमरा के एक अनमोल उपहार दिहनी जे उहाँ के हस्त लिखित रहे। हम ओकरा के साझा कर रहल बानी।

2017 के बात ह, हमार बेटा अनुराग बंधु के शादी उपासना के साथ तय भइला के बाद हमनी के इंगेजमेंट के रस्म पूरा कर लेहनी। अम्मा-बाबूजी लोग बहुत ख़ुश रहे। मुंबई आवे के उत्साह में रहे लोग। बाबूजी कहनी कि शादी के समय हमार देख भाल के करी काहे कि तू लोग के त शादी के इंतजाम आदि में बहुत व्यस्तता रही आ अंबुजा चाहे आउर दोसर लोग शादी के रस्म रिवाज़ में लागल रही। बारात में हमरा साथे के रही? ऐ बात के हमरा भी चिंता रहे। हम मनोज भावुक जी के अनुराग के शादी के बारे में बतवनी। उनका के शादी में आवे खातिर आग्रह कइनी आ कहनी कि शादी के दरम्यान बाबूजी के देख रेख तोहरे जिम्मे रही। मनोज जी कहनी कि इ त हमार सौभाग्य होई कि बाबा के साथे रह के उनकर सेवा करे के मिली। इ जान के कि मनोज जी बाबूजी के साथे रहेब, बाबूजी बहुत खुश भइनी आ चिंता मुक्त हो गइनी। बाकि विधाता के लेख कुछ दूसरे रहे। 17 अक्टूबर, धनतेरस के दिन रात नौ बजे बाबूजी अपना कमरा में गिर गइनी जेसे उनकर एक पैर के हड्डी टूट गइलl एकर सूचना हमार दीदी विहान होत देली। 19 तारीख के दिवाली के पूजा करके अपना पति के साथ 20 तारीख के हमनी के पटना पहुंच गइनी। 25 तारीख के बाबूजी के पैर के ऑपरेशन भइल आ 27 के हमार पति मुंबई वापस आ गइनी काहे कि 3 दिसंबर के बेटा के शादी के तइयारी करे के रहे। बाकि हम पटने में रुक गइनी। जब बाबूजी हॉस्पिटल में रहीं, आ जब भेंट होखे तव कहीं कि तू इहंवा रहबू त शादी के तैयारी कइसे होइ। 1 नवम्बर के जब बाबूजी हॉस्पिटल से घर आ गइनी तब हम ओही दिन मुंबई आ गइनी। 2 नवम्बर के शाम 4 बजे बाबूजी एह दुनिया के छोड़ परलोक सिधार गइनी। हमार दीदी फोन करके इ दुःखद समाचार दिहली। हमनी के सुबह सबेरे के फ्लाइट से पटना पहुँच गइनी। हमार बेटा अनुराग भी आगरा से पटना पहुँच गइलन। हमार पूरा परिवार भी पटना पहुँच गइल लोग। इ समाचार सुन के बाबूजी के कुछ साहित्यिक मित्र भी पहुँच गइलन। मनोज भावुक भी भागल पटना पहुँचले जबकि एक दिन पहिले 1 नवंबर के उनका ससुर जी के देहांत भइल रहे बीचयू, बनारस में।

श्राद्ध कर्म निपटला के बाद हमनी के मुंबई वापस आ गइनी। वक्त के सामने आदमी केतना लाचार हो जाला, ई हमरा ओह घड़ी बुझाइल। दिल में एक तरफ बेटा के शादी के ख़ुशी रहे त दोसरा तरफ बाबूजी के मरला के गम। शादी के कार्य क्रम चलत रहे, हम खुश रहीं बाकि बाबूजी के इयाद सतावत रहे। हम खुल के रो भी ना सकत रहीं।

एकरा बाद हम छः सात महिना पर अम्मा से मिले खातिर पटना जरुरे जात रहीं। 2019 के जुलाई में हमनी के पटना गइल रहीं। ओकरा बाद 22 मार्च 2020 के हमनी के पटना जाये के टिकट कटल रहे। कोरोना महामारी के कारण 22 मार्च से लॉक डाउन भइला के कारण हमनी के पटना ना जा सकनी। कोरोना के चलते अम्मा से भेंट भइला डेढ़ साल हो गइल रहे। अब अम्मा फोन पर जनवरी से रोज कहत रही कि बहुत दिन हो गइल भेंट भइला। अबकी बार होली में जरूर आव। अइह त कुछ दिन हमरा लगे रहे के सोच के अइह। 2021 के 22 मार्च के अपना पति के साथे हम पटना पहुँच गइनी। होली खूब धूम धाम आ उत्साह से पूरा परिवार के साथे मानवल गइल। अम्मा तथा दीदी जीजाजी के साथे 20 दिन कइसे गुजरल, पता ना चलल। रात के एगारह बारह बजे तक बइठका लागे आ गप्प सप्प चलत रहे। 6 अप्रैल के शाम के फ्लाइट से हमनी पटना से मुंबई आ गइ नी। 7 अप्रैल के सुबह उठनी त हमरा कुछ बुखार आ गइल रहे। पहिले त बुझाइल कि रास्ता के थकान ह। बिहान भइला बुखार बढे लागल आ बंधुजी के भी बुखार आ गइल। कोरोना के जांच में दुनू लोग पॉजिटिव निकलल ओकरा बाद हमनी के हॉस्पिटल में भर्ती हो गइनी। हमार हालत बहुते ख़राब रहे। ई सुन के हमार बेटा अनुराग दिल्ली से मुंबई आ गइले आ डेढ़ दू महिना तक मुंबई में हीं रहले जब तक कि हमनी के पूरा ठीक ना हो गइनी। पटना में हमार दीदी जीजाजी के भी कोरोना हो गइल रहे। एही क्रम में हमार जीजाजी 15 अप्रैल के आ अम्मा 19 अप्रैल के स्वर्ग सिधार गइली। हमार हालत ख़राब देख के हमरा से ई सब ना बतावल गइल। कुछ दिन बाद हमरा के धीरे-धीरे बतावल गइल। आज भी अम्मा के साथ बितावाल पल ईयाद आवेला त आँख लोरा जाला।

इत्र की शीशी खाली हुइ , खुशबू नहीं गइ ।

माँ तू स्वर्ग चली गइ , तेरी याद नहीं गइ ।।



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