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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min1400

भगवती प्रसाद द्विवेदी 

करीब-करीब पनरह-सोरह बरिस भइल होई, तीन-चार बेर साहित्यिक जलसन में रोहतास (बिहार) के नायाब शहर नोखा के जातरा करेके मोका मिलल रहे। उहे नोखा, जवन कबो गढ़ नोखा का नांव से जानल-पहिचानल जात रहे। आजु भलहीं पहाड़ियन के बेरहम मशीनन से भुरकुस कऽके पथल के रोजगार आ चाउर मिलन के भरमार ओह इलाका के बैपारिक सम्पन्नता के पहिचान बनि गइल होखे, बाकिर नोखा के सही माने में सांस्कृतिक पहिचान रहलन-उहवां के जीवंत कवि कुंजबिहारी कुंजन, जे तमाम संघर्षन से अकेलहीं जूझत भोजपुरी के झंडा ताजिनिगी थम्हले रहे आ यादगार रचनाशीलता का जरिए आपन अमिट छाप छोड़ि गइल।

नोखा में पहिल बेर हम तब गइल रहलीं, जब पुन्नश्लोक कुंजन के पावन इयाद में एगो कवि सम्मेलन आयोजित भइल रहे, जवना के उद्घाटन के बहाना हम कुंजन जी के बेमिसाल व्यक्तित्व-कृतित्व पर दू शब्द बोलिके आपन सरधा के फूल चढ़वले रहलीं आ ओह ऐतिहासिक अवसर के इयाद करत आजुओ हम आपन अहोभागि मानींले। बाकिर एह से बढ़िके विडम्बना अउर का हो सकेला कि जवन शख्स नोखा के पहिचान रहे, साहित्य के नामी-गिरामी हस्तियन के पग-धूर से ओह धरती के धन्य करे में जेकर अविस्मरणीय योगदान रहे, ओही अनमोल रतन के, अपना पहिचान के नोखावासी भुलवा दिहलन। तबे नू कुंजन के इयाद में नोखा में आजु अइसन किछऊ नइखे बांचल, जवना चिन्ह से ओह कवि के चिन्हिके सरधा-सुमन अर्पित कइल जा सके। एगो महत्वपूर्ण साहित्यकार का प्रति कतना एहसान फरामोस बा ई मतलबी समाज!

एह बात के अंदाज बुझिला महाकवि कुंजन अपना जिनिगिए में लगा लेले रहलन। उन्हुकर रेघरिआवे जोग अवदान आ आंतर के उदबेग एह पांती में बखूबी देखल जा सकेला-

जे नोखा के चमका देलस अपना के तलफा के

भोजपुरी के जे निहाल कर देलस देह गला के

ओह कुंजन खातिर नोखा में कहवां कुछ चरचा बा

ओह कुंजन बिन जइसे केहू के ना कुछ हरजा बा!

कुंजन जी के दिली लालसा रहे कि नोखा में ‘भोजपुरी भवन’ के निरमान होखो आ एह खातिर ऊ जीव-जान से लागलो रहलन,बाकिर उन्हुकर साध पूरा ना हो पावल। एह खातिर ऊ भोजपुरी साहित्य-कला परिषद् के गठन कइले रहलन आ कविसम्मेलन आउर महामूरख सम्मेलन के आयोजनो करवावत रहलन,बाकिर देह के अवसान होते ई जालिम दुनिया उन्हुकर मए कइल-करावल पर पानी फेरत भोजपुरी भवन बनवावे के बात के कहो,खुद उन्हुके के भुला-बिसरा दिहलस।

जिनिगी में जीए-जूझे खातिर कुंजन आखिर कवन अधातम ना कइलन! रोजी-रोटी खातिर ऊ बीड़ी बनावे के काम कइलन। दरजीगिरी सीखिके दरजी के काम कइलन। कहे के मतलब ई कि कवनो काम के ऊ छोट भा निकृष्ट ना बुझलन। बाकिर उन्हुका जिनिगी के असली मकसद त कवि-कर्म रहे,जवना में ऊ आपन सोरहो आना कामयाब रहलन। बड़प्पन आ विनम्रता अइसन कि जब उन्हुका कृति के तारीफ आ आकलन होखे लागे,त ऊ हाथ जोड़िके कहसु-‘तीसरा दरजा पास कुंजन से अइसन अपेक्षा मत राखीं सभे!’

अपना के ‘थर्ड किलसिया’ मानत ऊ कहलहूं रहलन-

अधिका नीमन के झूठे नू लवले बानीं आस

जानते बानीं, कुंजन बाड़े तीने दरजा पास!

एह तरी, ‘दरजा तीन’ पास कुंजन खाली स्कूली शिक्षा आ आखरे ज्ञान में ना,बलुक तेवरो में कबीर आ भिखारी ठाकुर के परंपरा के बहुआयामी रचनाकार रहलन। हाजिरजवाबी आ आशुकवित्व के गुन उन्हुका में कूटि-कूटि के भरल रहे। ओइसे त ऊ मूलतः कवि रहलन,बाकिर उन्हुका सिरिजन के विविध आयाम रहे- एगो व्यंगकार के, प्रबंधकाव्यकार के,गीतकार के,ग़ज़लगो के आउर एकांकीकार के।

कुंजन जी रामकथा के कुशल पारखी रहलन आ एह विषय पर उन्हुकर दूगो यादगार प्रबंधकाव्य अइलन स-‘सीता के लाल’ आउर ‘कुंजन रामायण’। ‘सीता के लाल’ के स्तरीयता आ लोकप्रियता के अंदाजा एही से लगावल जा सकेला कि ओकरा पर महेश्वराचार्य के समीक्षा के किताबो प्रकाशित भइल रहे। ‘कुंजन रामायण’ के प्रकाशन कवि के जीवनकाल में त ना हो सकल रहे,बाकिर सासाराम के डॉ नंदकिशोर तिवारी जी के सौजन्य से एकरा प्रकाशन के सूचना मिलल रहे। चोट आ कचोट से लैस व्यंग के दूगो संग्रह ‘कुरकुरहट’ आ ‘कुनैन के गोली’ के कविता , कवि के व्यंग कविता के बेजोड़ नमूना बाड़ी स। गीत-संग्रह ‘रसबुनिया’ आ ‘कुंजन के पाती’ के भावप्रवणता, ताजगी पढ़निहारन के मरम के छूवे बेगर नइखे रहत। हिन्दी ग़ज़ल-संग्रह ‘महफिले ग़ज़ल’ के बांकपन आ एकांकी ‘शिवटहल काका’ के सम्प्रेषणीयता देखते बनत बा। अचरज होला कि कतना पोढ़ आ असरदार रहे उन्हुकर सिरिजना!

बाकिर एह अप्रतिम कवि के सार्थक मूल्यांकन आजुओ बाकी बा। एकरा खातिर समालोचक आ शोध-निदेशक के आगा आवे के चाहीं। बाकिर आजु भोजपुरी का,हिन्दिओ में आलोचना के जवन हाल बा,ऊ केहू से छिपल नइखे। खुद कुंजनो जी एह तथ से वाकिफ रहलन।

तबे नू सेसरो रचना के निजी राग-द्वेष का चलते धज्जी उड़ावल देखिके ऊ कहले रहलन-

बेकटले ना छोड़ी,रचना कतनो होखे रोचक

बानि परल काटे-भोंके के,बनि गइलीं आलोचक!

कुंजन जी के रचनाशीलता के स्थायी भाव रहे-व्यंगपरकता आ आशुकवित्व। समाज के विसंगति-विद्रूपता के खुलासा कऽके ऊ अइसन गहिर चोट करत रहलन कि पढ़े-सुनेवाला के आंतर घाही भइला बेगर ना रहत रहे। आजु के अर्थ केन्द्रित समाज में बूढ़ बाप-महतारी का प्रति बेटा-नाती के का सोच बा,एकर खुलासा करत कवि कहले रहलन-

का हो पूज्य पिताजी, बोलऽ,आखिर कहिया ले जियबऽ तूं,

कहिया ले खा च्यवनप्राश आ ऊपर से गोरस पियबऽ तूं?

बाकिर बेरोजगारी झेलत नवकियो पीढ़ी आखिर का करो! चरम पर पहुंचल महंगी

बाप-महतारी के बहंगी के कान्ह प से उतारे खातिर अलचार कऽ देत बिया। कवि के कहनाम बा-

कान्ह पर के कांवर के उतार दिहले भार,

महंगी के बहंगी ढोवे लगले सरवन कुमार!

‘सीता के लाल’ प्रबंधोकाव्य में हालांकि उत्तरार्ध करुन रस,वीर रस आ वीभत्स रस से सराबोर रहे,बाकिर पूर्वार्ध में हासे-व्यंग के प्रधानता रहे।

आजु जबकि भोजपुरी गायकी चंद फूहर धंधेबाजन का चलते दागदार हो रहल बिया, कुंजन जी के जियतार गीत सहजे इयाद आवत बाड़न स, जवनन के भावभूंइ

सुननिहारन के झूमे खातिर अलचार कऽ देत रहे। अइसने भरत शर्मा व्यास के गावल एगो गीत में प्रकृति के मानवीकरन देखते बनेला। सबेरे के ललकी किरिन धरती पर एह तरी उतरत बिया,जइसे ससुरा में उतरल लजात-सकुचात कनिया गते-गते दउरा में डेग डालत होखे-

ससुरा में आवे जइसे नई दुलहिनिया,

लजात आवे हो तइसे ललकी किरिनिया।

हालांकि सिरिजना का संगें-संगें कुंजन जी ‘सुर-सरिता’ आ ‘कल्लोलिनी’ के संपादनो कइले रहलन आउर अक्तूबर, 1985 में ‘कुंजन स्मारिका’ छापल गइल रहे, बाकिर जब ले ‘कुंजन रचनावली’ के प्रकाशन ना होई आ जब ले नोखा में ‘भोजपुरी भवन’ ना बनी,तब ले का महाकवि कुंजन के दिवंगत आत्मा के अमन चैन आ चिरशांति मिलि पाई?


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पांडेय कपिल

आचार्य पांडेय कपिल हमार साहित्यिक गुरु रहल बानी। पटना प्रवास के दौरान ( 1996 -2000 ) उहाँ से निकटता बढ़ते चल गइल। पटना छोड़ला के बाद उहाँ के हमार अभिभावक के भूमिका में भी रहीं। 2005 में हमरा शादी में उहाँ का सपरिवार रेणुकूट आइल रहीं। 2 नवंबर 2017 के उहाँ के निधन भइल त हम पटना पहुँचल रहीं। अंतिम भेंट ओकरा डेढ़-दू साल पहिले भइल रहे तब उहाँ के आशीर्वाद स्वरुप आपन किताब लेखांजलि देले रहीं। कहनी ई किताब पढ़िह जरूर।  एह से अंदाजा मिली कि भोजपुरी के इहाँ तक ले आवे में हमनी के का-का करे के पड़ल बा आ कइसन-कइसन उद्भट विद्वान एह अनुष्ठान में लागल बाड़न। आज, जब ” हम भोजपुरिआ/ भोजपुरी जंक्शन ”  पत्रिका में ” भोजपुरी साहित्य के गौरव ”  स्तम्भ खातिर भोजपुरी साहित्य के स्मृतिशेष योद्धा लोग पर आलेख मँगा रहल बानी, खोज रहल बानी, लिख-लिखवा रहल बानी त पांडेय कपिल जी के लेखांजलि के महत्व आ जरुरत समझ में आवत बा। डॉ. उदय नारायण तिवारी जी पर प्रस्तुत ई संस्मरण ओही किताब से लिहल गइल बा। – संपादक

भाषावैज्ञानिक दृष्टि से, हिंदी क्षेत्र से बाहर के भाषा के रूप में भोजपुरी के मुखर स्वीकृति देवेवाला आ ओकरा साहित्यिक विकास में रुचि आ रस लेवेवाला हिंदी के पुरनकी पीढ़ी के मूर्धन्य विद्वान में सबसे ऊपर अगर कवनो नाम हो सकत बा, त उ नाम ह डॉ. उदयनारायण तिवारी।

तिवारी जी भोजपुरी के परम हिमायती रहीं। भोजपुरी भाषा के उद्भव आ विकास विषय पर आपन शोध-प्रबंध उहाँ के ओह घड़ी प्रस्तुत कइलीं जवना घड़ी पढ़ल-लिखल समाज भोजपुरी के पुछवइया कमे लोग मिले। उहाँ के डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी के परम शिष्य आ अनन्य अन्तेवासी रहीं आ उनके निर्देशन में आपन शोध प्रबंध प्रस्तुत कइले रहीं। एह शोध प्रबंध के प्रशंसा गियर्सन आ टर्नर जइसन विद्वान कइले रहले।

तब हिंदी के विद्वान लोग ई मानत जानत आ घोषित कइले रहे कि भोजपुरी हिंदी के ही एगो विभाषा ह आ उ लोग ग्रियर्सन के एह मान्यता के एगो गंभीर साज़िश करार देत रहे कि भोजपुरी भाषी क्षेत्र हिन्दी भाषी क्षेत्र से बाहर पड़त बा। ग्रियर्सन आई. सी. एस. अधिकारी रहले आ फूट डाल के शाषण करे वाली जाति के एगो अंग रहले, एह से जनात रहे कि समूचा राष्ट्र के एक सूत्र में बाँधे में समर्थ हिन्दी के छोटे छोटे क्षेत्र में बाँटे में उनकर इहे नीति सहायक रहल होई। बाकिर पचासन बरिस तक भाषा-शास्त्र के गहन अध्ययन आ शोध के बाद डॉ. उदयनारायण तिवारी जी अंततः ग्रियर्सन के परिश्रम, ज्ञान आ मेधा के लोहा मानत, उनकर पक्षपातरहित विवेचना आ निष्कर्ष के सही ठहरवलीं, आ भोजपुरी के भाषिक स्थिति के मुखर मान्यता देत, ओकरा साहित्यिक विकास के मनसा-वाचा-कर्मणा स्वागत कइलीं।

तब, आचार्य शिवपूजन सहाय जी बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक रहलीं, आ परिषद के ओर से सन 1951 में,16 मार्च से 20 मार्च तक पटना विश्वविद्यालय परिसर में ” भोजपुरी भाषा और साहित्य” विषय पर डॉ. उदयनारायण तिवारी के व्याख्यानमाला आयोजित कइले रहीं। पाँच दिन चले वाला एह व्याख्यानमाला खातिर पाँच गो संगोष्ठी के अध्यक्ष क्रमशः बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री आचार्य बद्रीनाथ वर्मा, शिक्षा सचिव श्री जगदीश चंद्र माथुर, पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. शंखधर सिंह, पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ प्रसाद आ हिन्दी के स्वनामधन्य लेखक संपादक रामवृक्ष बेनीपुरी कइले रहले। एह हाई प्रोफइल आयोजन में, हिन्दी के सारस्वत समुदाय के बीच में, तिवारी जी के ई व्यख्यानमाला भोजपुरी के सही भाषिक स्वरूप आ साहित्यिक उन्मेष के बहुते प्रभावशाली उदघोष रहे जवना के बहुते प्रभाव, कम से कम बिहार में, हिन्दी के विद्वानन आ साहित्यकारन पर पड़ल, आ भोजपुरी के रचनात्मक सक्रियता के प्रति आदर के भाव जागे लागल। तब हम पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहीं, आ श्रद्धेय तिवारी जी के प्रथम दर्शन आ स्वल्प संपर्क के सौभाग्य एही संगोष्ठियन के दैरान भइल रहे। आगे चलके तिवारी जी के वृहदाकार शोधग्रंथ भोजपुरी भाषा और साहित्यबिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित भइल, जवना से विद्वत समुदाय में भोजपुरी के भाषिक आ साहित्यिक स्वीकृति के बहुते बल मिलल।

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के स्थापना आ पहिलका अधिवेशन के सिलसिला में 1973-75 के दौरान हमरा तिवारी जी से पत्राचार के कुछ अवसर मिलल रहे। एह सम्मेलन के संविधान तैयार करके ओकरा मोताबिक पहिलका अधिवेशन आयोजित करावे खातिर जे तदर्थ समिति बनल रहे ओकर सदस्य रहले- श्री द्वारिका सिंह(अध्यक्ष), आचार्य महेंद्र शास्त्री, श्री रघुवंश नारायण सिंह, श्री पांडेय नर्मदेश्वर सहाय, श्री गणेश चौबे, श्री बिपिन बिहारी सिंह, श्री सत्यनारायण लाल, श्री सिपाही सिंह श्रीमंत, आचार्य विश्वनाथ सिंह, डॉ. वसंत कुमार आ पांडेय कपिल (संयोजक-सदस्य)।

1973-75 के दौरान तदर्थ समिति के बीसों बैठक भइल, आ जब सम्मेलन के संविधान तैयार हो गइल त पहिलका अधिवेशन के अध्यक्षता खातिर डॉ. उदयनारायण तिवारी के नाम पर सभे एकमत हो गइल। चूँकि सम्मेलन के कार्यालय पटना में राखे के तय भइल रहे, आ हमनी के पटना में पहिला अधिवेशन करावल सुविधाजनक बुझात रहे एह से एकर तइयारी खातिर पटना में भोजपुरी प्रेमियन के एगो बड़ बैठक बोलावल गइल। तिवारी जी के स्वीकृति प्राप्त करे के जिम्मा हमनी इलाहाबाद में रहेवाला कवि भोलानाथ गहमरी के दिहलीं, आ तिवारी जी के नाँवें अनुरोध-पत्र गहमरी जी के पास भेज के उनका से अपेक्षा कइलीं कि उ तिवारी जी से स्वीकृति पत्र ले के पटना आवस आ ओह तइयारी बैठक में शामिल होखस।

तदनुसार, तिवारी जी के स्वीकृति पत्र के साथ गहमरीजी पटना पहुँचले आ ओह तइयारी बैठक में तिवारी जी के स्वीकृति पत्र के साथ हीं प्रयाग के भोजपुरी परिषद के ओर से पहिला अधिवेशन प्रयाग में करावे  के निमंत्रण पत्र भी प्रस्तुत कर दिहले जे कि हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के प्रधानमंत्री श्री श्रीधर शास्त्री (अध्यक्ष, भोजपुरी साहित्य परिषद प्रयाग ) के हस्ताक्षर से लिखल गइल रहे। गहमरी जी के तर्क रहे कि ई अखिल भारतीय संस्था ह जवना के मुख्यालय पटना में रही त एकर पहिलका अधिवेशन प्रयाग में आयोजित कइला से एकर अखिल भारतीय स्वरूप उजागर होई, आ हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के परिसर में भोजपुरी के ई महाकुंभ आयोजित होखे त ई हिंदी के ओर से भोजपुरी के स्वीकृति मानल जाई। एह तर्क से सभे सहमत हो गइल आ पहिला अधिवेशन प्रयाग में, हिंदी साहित्य सम्मेलन के परिसर में करे के दिन तारीख सब तय हो गइल।

बाकिर जब डॉ. उदय नारायण तिवारी के ई सूचना मिलल कि अधिवेशन प्रयाग में होखे जा रहल बा त उहाँ के अध्यक्ष होखे से इनकार करे लगनी। गहमरी जी बहुत चिंतित होके चिट्ठी लिखले। फेर, तिवारी जी के भी चिट्ठी हमरा मिलल, जवना में उहाँ के लिखले रहीं कि हम इलाहाबाद में घर बना के रहे लागल बानी, इलाहाबाद में बस गइल बानी, एह से हम इलाहाबाद में होखे वाला सम्मलेन के अध्यक्षता ना करब। अइसने चिट्ठी उहाँ के पंडित गणेश चौबे किंहा भी लिखले रहीं।

समय कमे बाचल रहे। अधिवेशन के नियत तिथि नियराइल जात रहे, आ अब दोबारा बैठक बोलावे के आ दोबारा अध्यक्ष चुने के समय ना रहे। एह से, हम तिवारी जी के तुरंत चिट्ठी लिखनी कि अब एह सर्वसम्मत निर्णय में बदलाव ले आइल संभव नइखे, काहेकि एकर घोषणा हो चुकल बा, आ अब एह निर्णय के बदले खातिर जवन प्रक्रिया अपनावे के पड़ी ओह खातिर समय नइखे। हम इहो लिखनी कि सम्मेलन के संविधान के मोताबिक अध्यक्ष के कार्यविधि अधिवेशन से शुरू होके अगिला वार्षिक अधिवेशन के एक दिन पहिले तक खातिर बा, एह से सिर्फ दु दिन तक होखे वाली प्रयाग अधिवेशन के चलते, सालभर तक मिलेवाला अपना मार्गदर्शन से एह सम्मेलन के वंचित मत करीं, आ आपन इनकारी वापस लेवे के कृपा करीं। अंत में, हम इहो लिखनी कि अगर जे अमुक तारीख तक अइसन कृपा ना करब त हम पंडित गणेश चौबे आ श्री सिपाही सिंह श्रीमंत के साथे इलाहाबाद पहुँच के रउआ घरे भूख हड़ताल पर बइठ जाइब। एह चिट्ठी के प्रति चौबे जी आ श्रीमंत जी के भेजत हम इहाँ सभे से अनुरोध कइलीं कि इलाहाबाद चले खातिर तइयार होक रउआ अमुक तारीख तक पटना पहुंचे के कृपा करीं।

ई चिट्ठी मिलते श्रद्धेय तिवारी जी इनकारी के फैसला वापस ले लिहनीं आ गहमरी जी के सूचित कइलीं कि हम अध्यक्षता स्वीकार करत बानी। गहमरी जी टेलीफोन से एकर सूचना दिहले त मन हलुक हो गइल। तब तक श्रीमंत जी इलाहाबाद चले खातिर आ गइल रहले, आ ऊहे चौबे जी किहाँ बंगरी(चंपारण) में आदमी भेज के ई सूचना देवे के व्यवस्था कइले कि तिवारी जी अध्यक्षता करे के सँकार ले ले बानी आ अब इलाहाबाद जाए के जरूरत नइखे

एह तरे, हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के मंच पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पहिलका अधिवेशन 8-9 मार्च 1975 के डॉ. उदय नारायण तिवारी जी के अध्यक्षता में विधिवत समपन्न भइल, जवना में डॉ. रामकुमार वर्मा समेत इलाहाबाद के रहवइया लगभग सभे हिंदी के विशिष्ट साहित्यकार लोग शामिल भइल रहे। मॉरीशस के राजदूत श्री रवींद्र घरभरन एह अधिवेशन के उद्घाटन कइले रहले। सम्मेलन के महामंत्री हमहीं बनावल गइलीं। सम्मेलन के काम बढ़ावे में तिवारी जी के हर संभव सहयोग हमरा बराबर मिलत रहल।

भोजपुरी के रचनात्मक आ संगठनात्मक विकास से तिवारी जी बड़ा हुलसित होत रहीं। सम्मेलन के प्रयास से जब बिहार सरकार भोजपुरी अकादमी के स्थापना कइलस त उहाँ के हुलास देखे में आवत रहे। अकादमी के स्थापना के कुछुवे दिन बाद जब उहाँ के पटना अइलीं त उहाँ के सम्मान में अकादमी के ओर से संगोष्ठी आयोजित भइल। एह संगोष्ठी में अकादमी के सदस्य लोगन के संबोधित करत उहाँ के भोजपुरी के एह उपलब्धि पर आपन आत्मिक प्रसन्नता व्यक्त कइलीं आ बतवलीं कि अकादमी पर कइसन जिम्मेदारी आ दायित्व बा अउर कइसन कइसन काम अकादमी के करे के चाहीं। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन आ भोजपुरी अकादमी के काम के हिगरावत उहाँ के परस्पर तालमेल से काम करे पर विशेष जोर दिहलीं।

भोजपुरी के हर प्रकाशन के अवलोकन तिवारी जी बड़ा चाव से करत रहीं आ आपन शिष्य शोधकर्ता लोगन के ओकरा बारे में निर्देश कइल भुलात ना रहीं। भोजपुरी के हर गतिविधि पर उहाँ के नजर रहत रहे, आ भोजपुरी के लेखक आ कार्यकर्ता लोगन के उहाँ से आशीर्वाद आ प्रोत्साहन मिलत रहे। भोजपुरी के बारे में उहाँ के नजरिया सुलझल आ जबान साफ़ रहे। उहाँ के जमाना के हिंदी के विशिष्ट विद्वान लोगन में, भोजपुरी के जेतना खुलल आ व्यक्त समर्थन आ प्रोत्साहन उहाँ से मिलत रहे, उहाँ के पीढ़ी के कमे लोगन से मिलत होई।

तिवारी जी से व्यक्तिगत निकटता के अवसर हमके 1998 में मिलल जब उहाँ के पटना विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कुछ महीना खातिर पटना आ के रहे लागल रहीं। पटना आवे के एक हफ्ता भर के भीतरे उहाँ के हमरा आवास पर पधारे के कृपा कइलीं आ अपना आशीर्वाद से हमरा घर परिवार के कृतकृत्य कइलीं। उहाँ के हमरा से अपेक्षा कइलीं कि हफ्ता दु हफ्ता पर हम उहाँ के पटना आवास पर आवत जात रहीं। उहाँ के एह आदेश के हम सहर्ष शिरोधार्य कइलीं आ समय समय पर तिवारी जी के सेवा में पहुँचे लगलीं। हमरा साथे, जब तब भोजपुरी के नवका साहित्यकारो लोग उहाँ के लगे पहुँचल करे आ उहाँ के वचनामृत के लाभ लिहल करे।

पटना प्रवास के दौरान तिवारी जी राजेन्द्र नगर मोहल्ला में किराया के घर मे रहे लगनीं। ओही मुहल्ला में थोड़ीके दूर पर उहाँ के बेटी दामाद के मकान रहे। ऊ लोग बहुत कोशिश कइल कि तिवारी जी ओही लोग के साथ रहीं। तिवारी जी के दामाद श्री प्रमोद नारायण तिवारी हमार मित्र रहले। ऊ हमरो से कहववले कि बुढापा में अकेले रहल ठीक नइखे। बाकिर तिवारी जी के पुरान संस्कार, बेटी के घरे रहल आ बेटी के अन्न खाइल, मंजूर ना रहे।

एक दिन हम भोर के बेरा तिवारी जी के आवास पर पहुँचलीं त तिवारी जी तावा पर रोटी सेंकत रहीं। हम कहलीं कि अपने के अकेले में त बड़ा कष्ट बा, अपने हाथे भोजन बनावे के पड़त बा। तिवारी जी मुस्कुरात कहलीं कि हम ब्राह्मण नु हईं, आ ब्राह्मण के हर बालक के स्वयंपाकि होखे के संस्कार मिलल रहेला।

अपना व्यस्तता के बावजूद तिवारी जी भोजपुरी के ओइसन किताबन के अवलोकन ठीक से करत रहीं जवन उहाँ के पास उपहार के रूप में पहुँचत रहे। पढ़ला के बाद उहाँ के लेखक लोगन के प्रति लिखित भा मौखिक रूप से आपन प्रतिक्रिया व्यक्त करत रहीं। हमरा उपन्यास फूलसूंघी के उहाँ के बहुत प्रशंसक रहीं। कविवर जगन्नाथ जी के ग़ज़ल संग्रह ‘लर मोतिन के’ पढ़त उहाँ के आघात ना रहनीं। एह ग़ज़ल संग्रह पर कवनो हिंदी पत्रिका में एगो लमहर लिखे के उहाँ के विचार रहे, बाकिर व्यस्तता के चलते ई काम ना हो सकल। सत्यवादी छपरहिया के निबंध संग्रह ‘ कलमिया नाहीं बस में’ पढ़के उहाँ के एतना प्रभावित भइलीं कि सत्यवादी जी से मिले के इच्छा व्यक्त कइलीं। अपना रचना के तारीफ तिवारी जी के मुँहे सुनके सत्यवादी जी के आँखिन में लोर छलछला आइल।

ओह घड़ी हम भोजपुरी संस्थान पटना के त्रैमासिक मुखपत्र ‘ उरेह ‘ के संपादन करत रहीं। ‘उरेह’ के हर अंक तिवारी जी बड़ा मनोयोग से पढ़त रहीं। ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’ के पहिलका साल के पहिलका अंक के बारे में ‘उरेह’ (जिल्द 4, अंक 1) के हमार सम्पादकीय टिप्पणी पढ़ के उहाँ के हमरा के बहुत बधाई देलीं आ भाषा विषयक हमार विचार के हार्दिक समर्थन कइनीं।

हमरा अनुरोध पर उहाँ के दोसर दोसर जरूरी काम रोक के ‘उरेह’ खातिर ‘भोजपुरी के प्रेमी ग्रियर्सन ‘ शीर्षक लेख लिख के देले रहीं, जे कि ‘उरेह’ के तिसरका जिल्द के चउथा अंक में प्रकाशित भइल रहे। तिवारी जी के उ लेख वस्तुतः डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी आ ग्रियर्सन से संदर्भित एगो रोचक संस्मरण रहे, जवना के कुछ अंश अपना एह संस्मरण में इहाँ पर उद्धृत करे के लोभ-संवरण हम नइखी कर पावत-

“हमारा गुरु डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ग्रियर्सन साहेब के बहुत बड़ा भक्त रहले। जब उ लंदन यूनिवर्सिटी में ‘बंगला भाषा के उद्गम आ विकास’ पर आपन डी लिट् के थीसिस लिखत रहले त ओमें सबसे ज्यादा सहायता ग्रियर्सन साहेब दिहले। कलकत्ता में जब हम सुनीति बाबू के छात्र रहलीं त उ हमरा से कहले कि ग्रियर्सन साहेब के भोजपुरी दही बहुत पसंद रहे। सुनीति बाबू बीच बीच मे ग्रियर्सन साहेब किहाँ जब मिले जास त ग्रियर्सन साहेब कहस कि दुनिया में सबसे मलाईदार दही भोजपुरी लोग खाला।

ग्रियर्सन साहेब लंदन से तीन चार स्टेशन पर राथफार्महम में रहत रहले। उनकरा एक मात्र पुत्र के जर्मनी वाली लड़ाई में निधन हो गइल रहे। ग्रियर्सन साहेब आ उनकर पत्नी ओकरा बहुत दिन बाद तक जियत रहे लोग। सुनीति बाबू बतावस कि ग्रियर्सन साहेब के पत्नी दही जमावे के ढंग भोजपुरी क्षेत्र से सीख के गइल रहली। ग्रियर्सन साहेब दु ठो भँईस रखले रहले। ओकरा दूध के गोइठा पर गरम करके दही बने आ फिर, ग्रियर्सन साहेब चूड़ा दही चीनी के जलपान करस। सुनीति बाबू इहो बतावस कि उ अपना घर पर एगो काकातुआ रखले रहले, जवन की बीच बीच मे बोले ‘ राम नाम मनवाँ राम-नाम बोल’।”

सन 1981 में, हम सारण जिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के तेरहवाँ अधिवेशन के अध्यक्षता कइले रहीं। हमरा मुद्रित अध्यक्षीय भाषण के जब एक प्रति तिवारी जी के मिलल, त ओकरा के पढ़ के उहाँ के हमरा के आशीर्वाद देत चिट्ठी में लिखले रहीं कि ” अइसन सुंदर आ तर्कपूर्ण भाषण अबहीं ले केहू भोजपुरी भाषी नइखे देले। मन करता कि एकरा बार-बार पढ़ीं। एह भाषण खातिर रउआ के बार-बार बधाई। भाई, भाषा के समस्या पर स्पष्ट ढंग से सोचे के बा। आ रउरा सोचे के ढंग नितांत समीचीन आ मौलिक बाटे।”

श्रद्धेय तिवारी जी के अपना वार्धक्यशिथिल देह के अंत के कुछ आभास होखे लागल रहे। एह से उहाँ के अपना के समेटे लागल रहीं, आ प्रयाग ना छोड़े के मन बना चुकल रहीं। उहाँ के ई आध्यात्मिक इच्छा रहे कि जब ई देह छूटे, त तीर्थराज प्रयाग के माटी ही मिले। सन 1981 में उहाँ के ई अंतिम इच्छा पूरा त हो गइल, बाकिर उहाँ के ना रहला पर, भोजपुरी के नेही छोही लोगन के ई महसूस त भइबे कइल कि भोजपुरी के भाषिक अस्मिता के नेंव के एगो मजबूत ईंटा खरक गइल। उहाँ के पुण्य स्मृति के सादर नमन।


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min830

मार्कण्डेय शारदेय

पाण्डेय कपिल जी के आगे पुण्यश्लोक जोड़त गजिबे लागत बा। बाकिर दिव्यलोकी होखला से उहाँ का आपन यशःशरीरे से नु एहिजा बानीं! भर्तृहरि जी कहलहूँ बानी-

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाःकवीश्वराः।

नास्ति तेषां यशःकाये जरा-मरणजं भयम्।।

अर्थात्  रस में पगाइल  ओह कवियन के जय होखे, जेकर यश रूपी शरीर बुढ़ापा आ मृत्यु से दूर रहेला। दुनिया में केहू भा कुछुओ अइसन नइखे, जे मृत्यु देवी से बचि जाउ। आजु ना त काल्हु ऊ उठाइये ले जइहें। जे मरियो के जीये, ओकरे जीयल जीयल ह।

कपिल जी अपने खातिर ना; साहित्य देवता खातिर, भोजपुरी माता खातिर आ साहित्यकार बन्धुअनो खातिर जीयत रहलीं। उहाँ का राजभाषा विभाग में उपनिदेशक रहलीं, बाकिर सहित के भाव से अतना ओतप्रोत रहलीं कि एगो छोटो साहित्यसेवी उहाँ के पास चलि जाउ अपनत्व से ओकरा के खींच लेत रहीं।

बात 1983 के ह। हम भोजपुरी में ‘पाशुपत-प्राप्ति’(खण्ड काव्य) लिखले रहीं। जब पाण्डुलिपि पर सम्मति खातिर कविवर विश्वनाथ प्रसाद ‘शैदा’ के पास गइलीं त उहाँ का आपन सम्मति देला के बाद यशस्वी साहित्यकार रासबिहारी राय शर्मा जी से भी अभिमत ले लेबे के परामर्श कइलीं। एके गाँव के बात रहे। हम ओही घरी ऋषितुल्य शर्मा जी किहाँ पहुँच गइलीं। अस्सी ऋतुअन के षट्चक्र से तपल साधुवृत्ति के कारण सस्नेह बइठा के पढ़लीं आ टटके आपन शुभाशंसा लिख देलीं। देखीं, सत्संगति कइसे कइसे जोड़त जाले! उहाँ का कहलीं जे रउरा पटना जाईं त श्रीरंजन सूरिदेव, रामदयाल पाण्डेय आ पाण्डेय कपिल से भेंट करबि। युवा मन उत्साह से भर गइल। कुछे दिन बाद हम पुरनका सचिवालय में स्थित राजभाषा विभाग में पहुँचि गइलीं। कपिल जी अपना चेम्बर में श्री कृष्णानन्द कृष्ण आ श्री भगवती प्रसाद द्विवेदी के साथे बइठल रहलीं। शर्मा जी के नाम लेके आपन परिचय देलीं त उहाँ के स्नेहपूर्वक बइठइलीं आ हमार काव्य सुनलीं। उहाँ का छपवावे के उपायो सुझइलीं, बाकिर हम सफल ना हो पइलीं। खैर, ई प्रथम साक्षात्कार रहे। बाकिर उहाँ के मुँहे आपनि कृति के प्रशंसा सुनि के संतुष्टि मिलल आ लेखन में गतियो आइल। ओही साले हमार एगो लेख ‘कवि कविता आ काव्य’ भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका के अक्तूबर (शायद) अंक में छापि के मनोबलो बढ़इनी।

दुसरका संक्षिप्ते भेंट हमरा डुमराँवे में कवि-सम्मेलन में भइल। ओह घरी साहित्यिक बन्धु श्री रामेश्वर चौधरी के प्रशंसनीय प्रयास से महाकवि रामदयाल पाण्डेय के साथे पटना के कतने शीर्षस्थ कवि पधरले रहीं सभे। ओही में हमार भोजपुरी कविता-संग्रह ‘गठरी’ के रामदयाल जी के करकमलन से लोकार्पणो भइल रहे। कविवृन्द में बइठल कपिल जी के ओर हमार ध्यान ना गइल, बाकिर उहाँ के तुरते बोलाके अपना सौहार्द से हमरा के सुगन्धित आ आर्द्र कर दीहलीं।

1994 से हम पटने रहे लगलीं त सान्निध्य सुख में वृद्धि भइल।

हम एगो व्यक्ति के रूप में पाण्डेय जी के सदा सरल आ सहज पइलीं। उहाँ के रचल साहित्यो खूब पढ़लीं, ओहू में व्यक्तित्व के जवन सुगन्धि रहल, ऊ समाइल रहे। साहित्य-सृजन एगो अलग काम ह आ संगठन चलावल बहुते अलग। बाकिर कुशल, कर्मठ, जुझारू, दूरदर्शी आ परिपक्व लोगन खातिर कुछुओ असम्भव आ बेमेल ना होला, पाण्डेय कपिल जी के देखि के हमरा अतने बुझाइल। भोजपुरी के उत्थान में उहाँ के योगदान के कबो भुलाइल ना जा सकेला। उहाँ के कीर्ति खाली कृतियन से ना, सम्पादकीय कौशलो से सदैव पसरल रही आ उहाँ का अमर रहबि-कीर्तिर्यस्य स जीवति।


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Hum BhojpuriaDecember 20, 20211min1000

गरिमा बंधु

आपन जन्मदाता, अम्मा बाबूजी पर कुछ लिखल हमरा बस में नइखे। जे हमरा के जनम देहल आ पाल पोस के जिनीगी संवार देहल ओकरा के हम शब्दन में का बांधेव। मतारी-बाप आ वड़ बुजुर्ग त भगवान के प्रतिनिधि हउए। काहे कि, भगवान खुद उतर के ना त हमरा के आशीष दिहें ना प्यार करिहें ना, ना हमरा गलतियन पर हमरा के डांट फटकार लगइहन।

अइसे त हमार बाबूजी श्री पाण्डेय कपिल जी आ अम्मा श्रीमति सुशीला पाण्डेय के साथ बितावल ढेर सारा संस्मरण बा। जे में से कुछ साझा कर रहल बानी। आज ओह लोग के बारे में सोचत खा आँख लोरा जा रहल बा। 2 नवम्बर के हमरा बाबूजी के पुण्यतिथि ह। 2 नवम्बर 2017 के उँहा के बैकुंठ धाम सिधार गइल रहीं आ अब त 19 अप्रैल 2021 के अम्मा भी स्वर्ग लोक सिधार गइली। अब त वोह लोग के स्मृति शेष ही रह गइल बा।

हर साल अम्मा-बाबूजी जाड़ा से पहिले नवम्बर महिना में आवत रहे लोग आ जाड़ा बिता के मार्च महिना में लौटत रहे लोग। संयोग से हमनी के हमेशा अइसने जगह पर रहत रहीं जहाँ जाड़ा ना पड़त रहे। जइसे तमिलनाड़ु, केरल आ मुंबइ । पहिले त उ लोग अकेले आवत जात रहे बाकि उमिर बढ़ला पर हम खुद पटना जा के जाड़ा से पहिले लिया आवत रहीं आ जाड़ा ख़तम भइला पर पंहुचावत रहीं। जेतना दिन उ लोग के साथ रहे के मौका मिलत रहे, ओतना दिन बहुत आनंदमय गुजरत रहे। जब मौका मिलत रहे तव बाबूजी हमनी के साहित्यिक लोग के बारे में आ गाँव घर के बारे में किस्सा कहानी सुनावत रहीं। गाँव में कइसे कवि गोष्ठी होत रहे जेमे बड़-बड़ साहित्यिक लोग पहुँचत रहे। गाँव में नाटक होत रहे जेमें बाबूजी भी हिस्सा लेत रहीं। इ सब सुन के हमनी के बहुत आनंद आवत रहे। इहाँ रहला पर, हर एतवार के हमनी क़वनों ना क़वनों मंदिर घूमे जात रहीं।

ओह लोग के तीर्थाटन के हार्दिक इच्छा रहत रहे। एह से हमनी के, खासकर के हमार पति निरंजन नाथ बंधु एह बात के ध्यान हमेशा राखत रहीं। एह बात के ध्यान देत, बंधुजी जब मौका मिलत रहे तब कहीं ना कहीं तीर्थाटन के प्रोग्राम बना देत रहीं।

अम्मा बाबू जी के माता वैष्णो देवी दर्शन करे के हार्दिक इच्छा रहे। बाबूजी हमेशा कहेब, ऐ बेटा एक बेर वैष्णो देवी के प्रोग्राम बनो। अब हमनी के उमिर बढ़ रहल बा त पहाड़ी यात्रा मुश्किल होखी। बाकि अइसन मान्यता बा कि जब तक माता के बुलावा ना आइ तब तक हमनी माता के दरवार में ना पहुँच सकी, आ उहे भइल। 2006 में हमार बेटा अनुराग बंधु के 10वाँ के बोर्ड परीक्षा समाप्त भइल आ एकाएक प्रोग्राम बन गइल। ओ घड़ी, हम मुंबइ में रहत रहींl हम बाबूजी के फोन कइनी कि अपने लोग मुंबइ आ जाईं तब वैष्णो देवी के दर्शन करे चलल जाओ। सुनते बाबूजी जाये के तइ यार हो गइनी आ बहुत खुश भइनी।

अब बाबूजी के स्वीकृति मिलला के बाद बंधुजी ट्रैन के टिकट आ ठहरे खातिर कटरा में दू दिन आ जम्मू में एक दिन खातिर होटल में कमरा ऑन लाइन बुक करा लेहनी। ठाणे, महाराष्ट्र में विश्व भोजपुरी सम्मलेन के अधिवेशन रहे जेकरा में बाबू जी के शामिल होखे खातिर न्योता मिलल रहे। एह से बाबूजी थोड़ा पहिलहीं मुंबइ आ गइनी। ओह साल हमनी के होली के त्यौहार भी बहुत आनंद दायक रहल काहे कि अम्मा-बाबूजी भी साथ रहे लोग।

10 अप्रैल 2006 के हमनी सब आदमी बांद्रा स्टेशन से जम्मू पहुंचे खातिर ट्रेन पकड़नी। दू दिन के यात्रा तय करके हमनी के होत सवेरे जम्मू पहुँचनी। अब हमनी के कटरा जाय खातिर एक टैक्सी बुक कइनी। जम्मू से कटरा जाय में दू घंटा लागल। कटरा पहुंच के सबसे पहिले देवी के दर्शन खातिर पर्ची कटावल गइल। ओकरा बाद टैक्सी लेके हमनी के पहिले से बुक कइल होटल में पहुंच गइनी। उहाँ नहा धो के फ्रेश भइला के बाद नास्ता चाय भइल। ओकरा बाद हमनी अपना कमरा में दिन भर आराम कइ नी। शाम के समय शहर में कुछ घुमत फिरत रात के खाना खाके हमनी अपना होटल के कमरा में पहुंच गइनी। बिहान भइला सुबह सवेरे नहा धो के नास्ता कइ ला के बाद भवन जाये के तैयारी भइल। कटरा से माता रानी के भवन जाये खातिर कोई पैदल जाला त कोई घोड़ा या पालकी से। हमनी घोड़ा के सवारी तय कइ नी काहे कि अम्मा-बाबूजी पैदल ना जा सकत रहे लोग। वाण गंगा से यात्रा शुरू भइल। हमार अम्मा त घोड़ा पर आराम से सबसे पहिले चढ़ गइली आ जय माता दी के बोल शुरू कर देली। बाबूजी के घोड़ा पर चढ़े में थोड़ा डर लागत रहे बाकिर चढला के बाद खूब आनंद उठवनी। रास्ता भर जय माता दी के नारा गूँजत रहे। बड़ा मनोरम दृश्य रहे। सब लोग में जोश आ उत्साह भरल रहे। दूसरका पड़ाव चरण पादुका रहे आ ओकरा बाद के पड़ाव अर्ध कुवारी। रास्ता के पूरा व्यवस्था माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा कइल जाला। रास्ता में भोजनालय आ चाय नास्ता के व्यवस्था रहे। अर्ध कुवारी पहुंच के हमनी चाय पियनी आ लगभग आधा घंटा विश्राम के बाद आगे बढ़ल गइल। कुछ देर के बाद हमनी वैष्णो देवी भवन पहुँच गइनी। उहाँ प्रसाद खरीदल गइल तथा जूता चप्पल श्राइन बोर्ड द्वारा बनावल लॉकर में रखल गइल। अब दर्शन के लाइन में लागल आदमी। आगे बढला पर प्रसाद के नारियल जमा करे के पड़त रहे ओकरा बदले टोकन मिलत रहेl आगे बढला पर माता रानी के पवित्र गुफा में हमनी के प्रवेश कइनी। उहाँ माता रानी के तीन पवित्र पिंड बनल बा। हमनी के माता रानी के आगे सिर झुका के प्रणाम कइनी। बाहर निकलला पर एक काउंटर बनल बा जहाँ टोकन देला पर नारियल आ माता रानी के एगो पवित्र सिक्का मिलल। उहाँ से निकल के बाबा भैरव नाथ के दर्शन खातिर हमनी के आगे के चढ़ाई घोड़ा से शुरू कइनी। लगभग आधा घंटा के चढ़ाई के बाद हमनी के बाबा भैरव नाथ के दर्शन भइल। इहाँ पर चढ़ाई  ख़तम हो गइल। अब नीचे उतरे के रहे। उतरत समय घोड़ा के सवारी से बहुत असुबिधा होत रहे। एह से हमनी के घोड़ा के सवारी छोड़ देहनी आ पैदल हीं नीचे कटरा तक आ गइनी। कटरा पहुँचत पहुँचत शाम हो गइल। वोह दिन हमनी के कटरा में हीं रुक गइनी। बिहान होके सुबह सवेरे जम्मू खातिर रवाना भइनी। जम्मू पहुंच के हमनी के पहिले से बुक कइल होटल में गइनी। दिन के भोजन कइला के बाद कुछ खरीदारी भइल आ शाम में जम्मू के सुप्रसिद्ध रघुनाथ मंदिर आ छोट मोट दूसरो मंदिर के दर्शन भइल। दूसरा दिन सुवह में हमनी के पटना खातिर ट्रेन पकड़नी।

बात जून 2012 के ह। ओह घड़ी हमार दीदी अंबुजा सिन्हा एजी कॉलोनी में रहत रही। बाबूजी के आवास पर अम्मा बाबूजी आ उनकर बड़ नाती अभिषेक रहत रहे लोग। एक दिन बाबूजी एकाएक बेहोश होके गिर पड़नी। अभिषेक ऊंहा के मुंह पर पानी के छींटा देलन आ होस अइला पर बिस्तर पर लेटवलन। ओकरा बाद अपना मम्मी अंबुजा सिन्हा के फोन से बतवलन। हमार दीदी अंबुजा आ जीजा जी तुरत पहुंचल लोग आ डॉक्टर से देखावल गइल। बाबूजी के हॉस्पिटल में भर्ती करे के पडल। 12 बजे दिन में दीदी हमरा के फोन से बतवली। इ बात हम अपना पति के ऑफिस में फोन करके बतवनी। उहां के पटना जाए खातिर फ्लाइट के टिकट बुक करा के ही घर अइनी। दूसरा दिन सुबह हम अपना पति के साथ पटना पहुंच गइनी। ओह घड़ी हमार छोटका चाचा चंद्रविनोद जी पटना में ही अपना बेटी पूजा के पास आइल रहीं। बाबूजी के प्रोस्टेट के ऑपरेशन करावे के पड़ल। चाचा जी के रहला से बहुत सहयोग भइल। बाबूजी के हॉस्पिटल से घर अइला के बाद हमार पति बंधु जी मुंबई लौट अइनी। अब बाबूजी के देख रेख करे वाला हम आ अभिषेक रह गइनी। बीमारी के कारण बाबूजी चिड़चिड़ा हो गइल रहीं। बीच-बीच में हमार दीदी तथा छोटका चाचा-चाची लोग आवत रहे। चाचा जी के देख के बाबूजी बहुत प्रसन्न हो जात रहीं। चाचा जी का साथ कविता कहानी भी होखे। हमार बुआ भी कभी-कभी आ जात रही। हमार बड़का चाचाजी पांडेय सुरेंद्र जी अपना बेटा राजीव नयन के साथ बाबूजी से मिले आइल रहीं। बाबूजी बहुत खुश भइनी। जब चारो भाइ बहिन जुटे लोग तब खूब जमत रहे। गांव घर के किस्सा कहानी होखे। बचपन के बात होखे। कभी-कभी सब कोई मिल के अम्मा के चुटकी लेत रहे। ओहमें हमनी के भी बहुत मजा आवत रहे। हमनी भी बीच-बीच में कुछ बोलत रहीं। ओह घड़ी हम बाबूजी का साथ तीन महीना रहके मुंबई आ गइनी।

ओकरा बाद जाड़ा आवे से पहिले नवम्बर में हम पटना जा के अम्मा बाबूजी के मुंबई ले अइनी। समय मजेदार गुजरत रहे एही बीचे मार्च 2013 में बाबूजी के तबियत कुछ ख़राब हो गइल। इहाँ तक कि हॉस्पिटल में भर्ती करावे के परल। हॉस्पिटल में भर्ती भइला पर प्रॉस्टेट के दोवारा ऑपरेशन करावे के पड़ल। इ सुन के हमार दीदी आ जीजाजी मुंबई आइल लोग आ एक सप्ताह रह के लौट गइल लोग। ओह साल अम्मा-बाबूजी एक साल मुंबई में रह गइनी। ओह बीच में उँहा के सेवा करे के मौका मिलल आ बहुत कुछ सीखे के भी मिलल। ओही समय बाबूजी हमरा के एक अनमोल उपहार दिहनी जे उहाँ के हस्त लिखित रहे। हम ओकरा के साझा कर रहल बानी।

2017 के बात ह, हमार बेटा अनुराग बंधु के शादी उपासना के साथ तय भइला के बाद हमनी के इंगेजमेंट के रस्म पूरा कर लेहनी। अम्मा-बाबूजी लोग बहुत ख़ुश रहे। मुंबई आवे के उत्साह में रहे लोग। बाबूजी कहनी कि शादी के समय हमार देख भाल के करी काहे कि तू लोग के त शादी के इंतजाम आदि में बहुत व्यस्तता रही आ अंबुजा चाहे आउर दोसर लोग शादी के रस्म रिवाज़ में लागल रही। बारात में हमरा साथे के रही? ऐ बात के हमरा भी चिंता रहे। हम मनोज भावुक जी के अनुराग के शादी के बारे में बतवनी। उनका के शादी में आवे खातिर आग्रह कइनी आ कहनी कि शादी के दरम्यान बाबूजी के देख रेख तोहरे जिम्मे रही। मनोज जी कहनी कि इ त हमार सौभाग्य होई कि बाबा के साथे रह के उनकर सेवा करे के मिली। इ जान के कि मनोज जी बाबूजी के साथे रहेब, बाबूजी बहुत खुश भइनी आ चिंता मुक्त हो गइनी। बाकि विधाता के लेख कुछ दूसरे रहे। 17 अक्टूबर, धनतेरस के दिन रात नौ बजे बाबूजी अपना कमरा में गिर गइनी जेसे उनकर एक पैर के हड्डी टूट गइलl एकर सूचना हमार दीदी विहान होत देली। 19 तारीख के दिवाली के पूजा करके अपना पति के साथ 20 तारीख के हमनी के पटना पहुंच गइनी। 25 तारीख के बाबूजी के पैर के ऑपरेशन भइल आ 27 के हमार पति मुंबई वापस आ गइनी काहे कि 3 दिसंबर के बेटा के शादी के तइयारी करे के रहे। बाकि हम पटने में रुक गइनी। जब बाबूजी हॉस्पिटल में रहीं, आ जब भेंट होखे तव कहीं कि तू इहंवा रहबू त शादी के तैयारी कइसे होइ। 1 नवम्बर के जब बाबूजी हॉस्पिटल से घर आ गइनी तब हम ओही दिन मुंबई आ गइनी। 2 नवम्बर के शाम 4 बजे बाबूजी एह दुनिया के छोड़ परलोक सिधार गइनी। हमार दीदी फोन करके इ दुःखद समाचार दिहली। हमनी के सुबह सबेरे के फ्लाइट से पटना पहुँच गइनी। हमार बेटा अनुराग भी आगरा से पटना पहुँच गइलन। हमार पूरा परिवार भी पटना पहुँच गइल लोग। इ समाचार सुन के बाबूजी के कुछ साहित्यिक मित्र भी पहुँच गइलन। मनोज भावुक भी भागल पटना पहुँचले जबकि एक दिन पहिले 1 नवंबर के उनका ससुर जी के देहांत भइल रहे बीचयू, बनारस में।

श्राद्ध कर्म निपटला के बाद हमनी के मुंबई वापस आ गइनी। वक्त के सामने आदमी केतना लाचार हो जाला, ई हमरा ओह घड़ी बुझाइल। दिल में एक तरफ बेटा के शादी के ख़ुशी रहे त दोसरा तरफ बाबूजी के मरला के गम। शादी के कार्य क्रम चलत रहे, हम खुश रहीं बाकि बाबूजी के इयाद सतावत रहे। हम खुल के रो भी ना सकत रहीं।

एकरा बाद हम छः सात महिना पर अम्मा से मिले खातिर पटना जरुरे जात रहीं। 2019 के जुलाई में हमनी के पटना गइल रहीं। ओकरा बाद 22 मार्च 2020 के हमनी के पटना जाये के टिकट कटल रहे। कोरोना महामारी के कारण 22 मार्च से लॉक डाउन भइला के कारण हमनी के पटना ना जा सकनी। कोरोना के चलते अम्मा से भेंट भइला डेढ़ साल हो गइल रहे। अब अम्मा फोन पर जनवरी से रोज कहत रही कि बहुत दिन हो गइल भेंट भइला। अबकी बार होली में जरूर आव। अइह त कुछ दिन हमरा लगे रहे के सोच के अइह। 2021 के 22 मार्च के अपना पति के साथे हम पटना पहुँच गइनी। होली खूब धूम धाम आ उत्साह से पूरा परिवार के साथे मानवल गइल। अम्मा तथा दीदी जीजाजी के साथे 20 दिन कइसे गुजरल, पता ना चलल। रात के एगारह बारह बजे तक बइठका लागे आ गप्प सप्प चलत रहे। 6 अप्रैल के शाम के फ्लाइट से हमनी पटना से मुंबई आ गइ नी। 7 अप्रैल के सुबह उठनी त हमरा कुछ बुखार आ गइल रहे। पहिले त बुझाइल कि रास्ता के थकान ह। बिहान भइला बुखार बढे लागल आ बंधुजी के भी बुखार आ गइल। कोरोना के जांच में दुनू लोग पॉजिटिव निकलल ओकरा बाद हमनी के हॉस्पिटल में भर्ती हो गइनी। हमार हालत बहुते ख़राब रहे। ई सुन के हमार बेटा अनुराग दिल्ली से मुंबई आ गइले आ डेढ़ दू महिना तक मुंबई में हीं रहले जब तक कि हमनी के पूरा ठीक ना हो गइनी। पटना में हमार दीदी जीजाजी के भी कोरोना हो गइल रहे। एही क्रम में हमार जीजाजी 15 अप्रैल के आ अम्मा 19 अप्रैल के स्वर्ग सिधार गइली। हमार हालत ख़राब देख के हमरा से ई सब ना बतावल गइल। कुछ दिन बाद हमरा के धीरे-धीरे बतावल गइल। आज भी अम्मा के साथ बितावाल पल ईयाद आवेला त आँख लोरा जाला।

इत्र की शीशी खाली हुइ , खुशबू नहीं गइ ।

माँ तू स्वर्ग चली गइ , तेरी याद नहीं गइ ।।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min1120

लेखक: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

१९७९ – १९८० के साल रहल होई , जब बुढ़िया माई आपन भरल पुरल परिवार छोड़ के सरग सिधार गइनी । एगो लमहर इयादन के फेहरिस्त अपने पीछे छोड़ गइनी , जवना के अगर केहु कबों पलटे लागी त ओही मे भुला जाई । साचों मे बुढ़िया माई सनेह, तियाग आउर सतीत्व के अइसन मूरत रहनी , जेकर लेखा ओघरी गाँव जवार मे केहु दोसर ना रहुए । जात धरम से परे उ दया के साक्षात देवी रहनी । सबका खाति उनका मन मे सनेह रहे , आउर छोट बच्चन खाति त उ सनेह के दरिया रहनी । बाक़िर उनकर  जीवन सुरुए से दुख आउर दरद के लमहर बवंडर ले के आइल रहे ।

बुढ़िया माई के बचपन के नाम त राजेश्वरी रहल । उनकर नइहर खुसहाल आउर भरल पुरल रहे। बालपन त सबही के हंसी-खुसी में बीतिए जाला , उनकरो बीत गइल । फिर गवें गवें उनका बियाह के खाति लइका के खोज होखे लागल । उनका दुनो भाई , बाबू , चाचा – पीती लोग जीउ  – जाँगर से जुट गइल रहे । आखिर एक दिन लइको मिल गइल , पढल – लिखल नीमन संस्कारी परिवार से रहल उहो । खूब धूम-धाम  से बरात आइल आउर उनकर बियाह  हो गइल । लेकिन ओहि दिन से जइसे उनका सुख चैन मे केहु के नजर लाग गइल । उ मरद जेकर उ मुहों ना देखले रहस , बियाहे के चार महीने के भीतरी मू गइलें । ओहि दिन से उनका नइहरे में बिधवा के बस्तर पहिने के पड़ गइल । अपना मरद के सुख आउर साथ का होला , उनका भीरी जीए के एको छन नसीब ना भइल ।

एक त बिधवा लइकी ऊपर से नइहर में रहल , गाँव जवार मे त बहुते शिकाइत के बात होला । उनकर भाई उनके ससुरारी जा के लइकी के बिदाई खाति निहोरा कइल लोग । बाकि आपन लइका खोवला क दरद आउर ऊपर से गाँव समाज मे होखे वाला खुसुर फुसुर से तंग उहो लोग हामी ना भरलस । थक हार के बात पंचइती में गइल , पंच लोग समहुत हो के ई निर्णय कइलस कि बात के लइकी के ऊपर छोड़ दिआव , लइकी चाहे त दुनों परिवार मिल के दोसर बियाह करावे या फेरु ससुरारी जाइल चाहे त ससुरारी वाला लोग बिदा करा के ले जाव । वैधव्य आउर सुहागिन होए क चुनाव रहल , बाक़िर ओकरे बादो उ बिधवा बन के रहल मंजूर कइली । बिधवापन के आपन किस्मत आउर ससुरारी के आपन करम भूमि मान के उ ससुरारी आ गइली

बुढ़िया माई अपना घरे यानि ससुरारी मे एगो बिधवा नीयन अइनी । उहवाँ अइला के बाद सबका के आपन बानवे ला सगरी उताजोग कइनी आउर कामयाबों भइनी । घर के दशा संभारे खाति उनका कई गो निरनय लेवे के परल । अपना साहस से उ हर लीहल निरनय सफल बनवली । उनकर पहिलका निरनय छोट देवर के बियाह करावल रहल । बुढ़िया माई घर मे सबसे बड़ रहली , से सभे केहु उनका से सउंजा जरूर करसु । उनका परयास से घर में खुसी लवटल । देवरानी के साल भर मे बेटा क जनम भइल , खूब खुसी मनावल गइल , सोहर गवाइल , बायन बटाइल । आपन कुले गोतिया दयाद नेवतबों कइली । बाक़िर बुढ़िया माई से बीपत के त जइसे चोली दामन के साथ रहे , बेटवा जब ४ बरीस के भइल तब उनकर देवरो साथ छोड़ गइलन । अब घरे मे दु गो बिधवा मेहरारू , एगो छोट बच्चा , एगो उनका सबसे छोटका देवर , अइसन हालत मे अइला के बाद घर सम्हारल आउर मुसकिल हो जाला । बुढ़िया माई त सती नीयन जीवन जीयते रहनी , उनका देख उनकर सबसे छोटका देवरो जिनगी भर बियाह न करे क ठान लीहने ।

बुढ़िया माई क समय के संगे संघर्ष जारी रहल । अब घर आउर बाहर ,खेती बारी के कुल्हि जीमवारी दुनों लोग अपना अपना सीरे ले लीहलस । एह तरे जिनगी के गाड़ी आगे घसके लागल । बुढ़िया माई दिन रात लइका के परवरिस करसु अउर घर सम्हारे में लाग गइलिन, काहे से कि उनका देवरानी आपन मानसिक संतुलन  अपना मरद के जइते खो चुकल रहनी । बुढ़िया माई ओह लइका पर आपन कुल्हे दुलार लूटा दिहली । अब उहे लइका पूरे घर खनदान के चिराग रहल । लइका के देख- भाल आउर ओकर नीमन परवरिस दीहल बुढ़िया माई के जीवन के सार बन गइल । बुढ़िया माई ओहमे सफलों भइनी । समय क चकरी त कबों न रुकेला । धीरे धीरे उ लइकवो बियाह जोग हो गइल। बुढ़िया माई फेनु अपना के एगो नवकी जिमवारी खाति तइयार कइली । लडिका क बियाह भइल , बुढ़िया माई लडिका के माँई आउर बाबू दुनों के फरज निभवलीन । बहुरिया के नचिगो न बुझाये दीहनि कि उ आपन सासु ना बानी । उ त बहुरिया खाति सग महतारी से बढ़ के हो गइनी ।

गवें-गवें समय बीतत रहे , बुढ़िया माई घर आउर बाहर के सगरी जिमवारी अपने सिरे ओढ़ लिहली , काहें से कि उनकर सबसे छोटकों देवर जवन ओह घरी घर मे अक्सरुआ  सवांग रहलन  , एगो दुर्घटना के चपेट मे आ गइलन । चलहूँ  फिरे जोग नाही बचलन । ओहि घरी घर मे एगो नवका मेहमानो आवे वाला रहल । नियति के का मंजूर बा, ई कोई ना जनेला । नवका मेहमान बेटवा के रूप में घर में आइल । ई समाचार एक बेरी फेरु से घर मे गीत गवनई , सोहर , बायन के दिन लउटा दीहलस । बाक़िर खाली दु – चार दिन खाति , पंचवे  दिन उनका छोटको देवर उनका साथ छोड़ गइलन । शायद इहो दुख बुढ़िया माई के ओतना नाहीं दुखी कइलस , जेतना दुखी उ आपन जिनगी मे अपना देवर के एगो बात के मान लीहनी । उ घटना बुढ़िया माई के जीवन के अइसन घटना रहल जवना के उ कबों न भुला पवली । एक दिन अइसन भइल कि उनका देवर उनका के बोलवलन, आउर कहलन कि सुनत हऊ  हमरे लगे कुछ रूपिया हउवे , एके तू अपना  दिन रात खाति रख ला । कहे से कि हम अब कुछे दिन के मेहमान बानी , ई रूपिया तहरा काम आई । का पता बा कि जवने लइका पतोह में तू दिन रात एक कइले बालू , ओहनी के तोहरे बुढ़ाई मे तोहार सेवा टहल करिहन सन कि नाही । ई सुनते बुढ़िया माई रोवे लगलिन आउर उ अपने लइका के बोलाय के कहनी कि ए बचवा सुनत हउवा , तोहार छोटका बाबू कुछ रूपिया रखले बाड़न , उ तोहरा से छुपा के हमरा के देवल चाहत बाड़न । सुना ए बचवा , एगो तिल्ली लिया के ओह रूपिया मे तू आगी लगा द । हमरा के उ रूपिया ना चाही । अगर हमरा आपन ए लइका के पाले पोसे मे कवनों कमी होखल होई , त ऊपर वाला एगो आउर दुख दे दी , लेकिन उहो हमरा खाति कम्मे होखी । उनकर ई बात सुनके ओह घरी घर मे मौजूद सभे कोई रोवे लागल । अइसन रहनी उ बुढ़िया माई । अजुओ ले उनकर कहल कुल्हि बातन के लछिमन रेखा नीयन उनका घर मे मानल जाला । धन्य रहनी उ बुढ़िया माई आउर धन्य बा ओह घर के लोग जिनका के देवी नीयन बुढ़िया माई के सँग मिलल ।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min1180

लेखक: अजय कुमार पाण्डेय

बिहार के पश्चिमोत्तर, नेपाल-उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिला चंपारण के एगो भौगोलिक, ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक दृष्टि से मशहूर आ महत्वपूर्ण शहर । उत्तरे-दखिने लमा-लामी बसल हमनी के शहर में एगो रेलवे स्टेशन जेकर नाम हरीनगर रहे, एगो हाई-स्कूल, एगो संस्कृत हाई स्कूल, दु गो मिडिल स्कूल आ तीन-चार गो प्राइमरी स्कूल रल स। प्राइवेट स्कूल के कौनो नामो-निशान ना रहे ओ घरी। एगो सिनेमा घर, ” हिन्द-सिनेमा “, चीनी मिल आ सबसे मशहूर प्राचीन शिव मंदिर रहे। शिव मंदिर तबो रामनगर के पहचान रहे आ आजो पहचान बा।

मध्यकालीन सेन वंश के बनवावल मंदिर एतना भव्य बा कि कौनो तरे फोटो खिचला पर पांचों गुम्बद के फोटो एक साथे ना आवेला। रामनगर में राज घराना आ राज महल भी बा। नेपाल के राणा खानदान के लोग उहां के राजा रहल बा लोग आ आजो राजपरिवार के लोग रामनगर में रहेला।

ई सब त हो गइल हमरा शहर के एगो संक्षिप्त परिचय, अब कुछ हमरो बारे में जानी लोगन। बाबू जी हमार ओतहिए ” हरीनगर उच्च विद्यालय ” में शिक्षक रनी। हमनी के तीन भाई आ एगो सबसे बड़ बहिन रहे। हम माझिल रनी। माई-बाबू जी आ हमनी के चार भाई-बहिन के परिवार के बाबू जी अपना औकात भर ठीक-ठाक से चलावत रनी। भैया आ दीदी के जनम के बाद बाबू जी गांव से रामनगर आ गइनी। हमार आ हमर छोट भाई के जनम-करम एतहीये भइल।

बाबू जी मारवाड़ी मोहल्ला में एगो किराया के घर ले के हमनी के रखले रनी आ कहे के गरज नइखे कि हमनी के अधिकांश संघतीया मारवाड़ी समाज के हीं लइका रल स। ओहिमे कुछ गैर-मारवाड़ी लइका भी हमनी के मित्र मंडली में रहल लोग।

हमार लंगोटिया इयारन में, निर्मल, पप्पू, प्रदीप, सुशील ( टुनिया ), अरुण, सुमन, रमेश, रामायण, सुनील, पुरुषोत्तम आदि ढेर लइका रलन स। सब एक से एक खुराफाती आ करामाती।

सुशील ( टुनिया ) के त भगवान एके पीस बना के भेजले रलें। ओकरा दिमाग में खुराफात आ शैतानी के सिवा दोसर कुछु अइबे ना करे। ओकर खुराफत पर पूरा एगो किताब लिखा सकsता।

रामायण, सुमन आ रमेश के तिकड़ी रहे। ऊहो नमूने रहलन स।

निर्मल सामान्य लइका रहे आ पप्पू के हमेशा नाक बहत रहे। प्रदीप दु गो रलन स आ दूनू एक गोल के, शातिर बदमाश। पुरुषोत्तम आ अरुण शांत स्वभाव के लेकिन हमेशा ग्रुप में रहे वाला संघतीया रलन स। एकरा अलावे भी ढेर इयार-दोस्त रहे लोग लेकिन ई हमनी के कोर-ग्रुप रहे।

आज हम सुमन आ रमेश के एगो किस्सा सुनावतानी।

सुमन बहुत जिद्दी टाइप के रहे। जे दिमाग में आ जाए, कर डाले।

रमेश दुबर-पातर, सुमना जे कहे, ऊहे करे।

एक दिन सुमन शायद घर पर डटाईल-पिटाईल रहे। स्कूल दु किलोमीटर पर रहे। रोज रमेश ओकरा घरे आ जाए आ दुनु एके साथे स्कूल जा स। स्कूल के रास्ता में रेलवे क्रासिंग रहे।

ओह दिन सुमन के मुड खराब रहे। जब ऊ दुनू स्कूल चललs स त सुमन बड़ा गंभीर रहे। ओकरा दिमाग में कुछ चलत रहे।

आधा रास्ता गइला पर सुमन रमेश से कहलस,

” चल रमेश साधु बन जाइल जाव।”

रमेश अचकचाइल आ पूछलस ,

“काहे रे, साधु काहे बनल जाई?”

” घर में कौनो भैलू नइखे। जेकरे मन करsता, लतिया देता।

अइसन घर में रह के आदमी का करी।”

” बाक, घरे त हमु पिटानी त का घर-दुआर छोड़ के साधु बन जाइल जाई?”

रमेश, सुमन के समझावे के प्रयास कइलस। लेकिन सुमन ना मानल आ ऊ आपन बात आ तर्क से रमेश के भी साधु बने के तैयार क लेलस।

रेलवे क्रासिंग पर आ के दुनू आपन-आपन बस्ता नचा के क्रासिंग पर के गड्ढा में फेंकलसs आ लाइन ध के नरकटियागंज की तरफ चल पड़लस।

घर के लोग बुझत रहे कि बबुआ लोग पढ़े गइल बा लेकिन दुनू संघतीया वैराग्य के राह पर निकल पड़ल लोग।

रास्ता में रमेश कई बार सुमन से अभिओ से घर लौट चले के कहलस लेकिन सुमन रहल जिद्दी स्वभाव के, ऊ माने के तैयार ना रहे। साधु बने के बा त बने के बा।

करीब 18 किलोमीटर पैदले, लाइने-लाइने चल के दुनु नरकटियागंज स्टेशन पहुंच गइलन स। नरकटियागंज पहुंच के रमेश, सुमन के अंतिम बार बहुत समझावे के प्रयास कइलस लेकिन सुमन ना मानल, त ना मानल। नरकटियागंज 18 किलोमीटर पैदल चलत-चलत रमेश के दोस्ती निभावे के सारा जोश काफूर हो गइल रहे। ऊ आगे जाए के तैयार ना भइल आ ओतहिए से ट्रेन ध के रामनगर लौट आइल। घर लौट के रमेश चुपचाप खा-पी के सुत गइल।

एने सुमन नरकटियागंज से ठोरी ( भारत-नेपाल के बार्डर पर एक पर्वतीय पर्यटक स्थल, जेकरा से थोड़ा पहले गांधी जी के भितिहरवा आश्रम बा ) के लाइन पकड़ के साधु बने चल पड़ल। ओकरा मालूम रहे कि ठोरी में जंगल आ पहाड़ बा आ साधु बने ला जंगल आ पहाड़ सबसे सही जगह होला। आखिर वाल्मीकि जी भी त जंगल में हीं रहस जहां सीता जी जा के लव-कुश के जनम देली।

इहे सब सोचत सुमन बढ़े लागल। कबो रमेश के मन हीं मन गरिअबो करे कि डरपोक भाग गइल।

नरकटियागंज से ठोरी के दूरी करीब 25-30 किलोमीटर से कम ना रहे लेकिन सुमन भी धुन के पक्का रहे। पैदल चलत-चलत सांझ के सात बजे के आसपास ऊ ठोरी पहुचिये गइल। चारो ओर अंहार हो गइल रहे। वीरान स्टेशन आ आसपास जंगल आ पहाड़। कोढ़ में खाज ई हो गइल रहे कि मौसम खराब हो गइल आ बरखा बरसे लागल। अब सुमन के हिम्मत आ साधु बने के जोश डगमगाए लागल। रात के जंगल वाला रास्ता पर लौटलो मुश्किल रहे। स्टेशन मास्टर के ऑफिस में जाए में डर लागत रहे कि पूछला पर का बतइहें। पैदल चलत-चलत थकान से भी बुरा हाल रहे। भूख से अतडी अलगे कुलबुलात रहे। साधु बनला में एतना दुर्गत होई, ई पहिले पता रहित त माई-बाबू जी के दु लात खा के भी घरहीं रहते। भूख त केहू तरे बर्दास्त हो जाइत लेकिन रात के यदि बाघ-भालू आ जाए त बाघ-भालू के हीं भोजन बन जाए के पडीत।

एक त बरखा में भींजल देह, आ सांय-सांय बहत बेयार, रात बढ़त जात रहे आ सुमन बाबू लगातार बजरंग बली आ दुर्गा महारानी के गोहरावत रहे कि आज के रात जान बच जाई त बाप किरिया फेर कबो साधु बने के सोचबो ना करब।

एने सुमन के घर खोज-बीन शुरू हो गइल रहे। कई गो मोटर साइकिल सुमन के पता लगावे निकल गइल।

एने रमेश अपना घर दमी साध के सुतल रहे। ना त ऊ सुमन के घर कुछ बतवलस ना हीं अपना घर पर।

रात ले जब कुछ पता ना लागल त थाना में भी खबर भइल।

सुमन के कुछु ना बुझाइल त दुसरका लाइन पर लागल एगो पुरान माल गाड़ी के डिब्बा में घुस के चुका मुका बइठ गइलें। बाहर टप-टप बुनी पडत रहे आ भीतर सुमन के करेजा बैठल जात रहे। कइसे रात कटी, बुझाते ना रहे। अंहार में ना कुछु भीतरा लउकत रहे ना बहरा। आंख फार-फार के बस कुछ देखे के असफल प्रयास करत रले सुमन बाबू। पता ना कब ओकर आंख लग गइल आ ओतहिए ढिमला गइल।

केहू सुमन के गोजी के हुरा से खोद-खोद के जगावत रहे। कुनमुनात उठल सुमन त देखलस ओकरा के एगो सिपाही जगावत रहे। ऊ हड़बड़ा के उठल।

“इंहा काहे सुतल बाडs हो, कहां घर ह?

सुमन बिना कुछ बोलले खाली सिपाही के मुंह ताकत रहे।

“बोलत काहे नइखs, काहे इहां सुतल बाड़s ?

सिपाही फेर पुछलें लेकिन जवाब फेर नदारद।

सिपाही सुमन के उठवलें आ स्टेशन मास्टर के ऑफिस में ले गइले।

ढ़ेर देर पूछताछ कइला के बाद सुमन धीरे-धीरे बतवलस कि के तरे ओकरा दिमाग में साधु बने के बात आइल आ केतरे ऊ घर से रमेश के साथे ठोरी ला चल पड़लें।

रात में सुमन के खिया-पिया के स्टेशने में सुतावल लोग आ दोसरा दिन सुबह पहिलका ट्रेन से एगो सिपाही सुमन के लेके चललें आ दुपहरिया ले रामनगर ओकरा घरे पहुंचा देहलें।

ए बीच सुमन के घर के लोग ओकरा के खोजत-खोजत हलकान हो गइल रहे लोग। सुमन के माई के रोअत-रोअत बुरा हाल हो गइल रहे।

सुमन के बाद में का हाल उनका बाबू जी कइलें, एकर बस कल्पना क लीं सभे, बाकी रमेश के घरे ओकरा केतना चइली के मार पड़ल ई हम ना बताइब।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min1130

लेखक: डॉ. रंजन विकास

गौरी हमार पैतृक गाँव हऽ। दरौली प्रखण्ड के अन्दर पड़ेला। हमार गाँव तीन नदी के बीच में घिरल बा। गाँव के पूरब में झरही नदी, दक्खिन में सरयू नदी आ पच्छिम में निकारी नदी बा। एकरा बादो हमरा गाँव में आज ले कबहूँ बाढ़ नइखे आइल। लगभग हर साल गर्मी आ बड़ा दिन के छुट्टी में गाँव जाए के सिलसिला स्कूली पढ़ाई ले बनल रहे। पचरुखी से हमरा गाँव जाए के तीन गो राहता बा। पहिला, पचरुखी स्टेसन से पसिन्जर गाड़ी से मैरवा स्टेसन आ उहाँ से दरौली वाला बस धके दोन चिमनी पर उतर के पूरब दिसा में एक कोस पैदल चलला के बाद हमनी गौरी पहुँची सन। एह राहे एगो बरसाती नदी “निकरी” हेले के पड़त रहे, जवन गर्मी के दिन में एकदम सूखल रहत रहे, बाक़िर बरसात के दिन में कहीं डांड़ भर त कहीं छाती भर पानी हेले के पड़त रहे। ओह समय नाव के कवनो सुविधा ना रहे। अब बड़की दोन के सोझा ओही नदी पर पुल बन गइल बा आ हमरा गाँव ले पक्की सड़क हो गइल बा। दोन में एगो बहुते पुरान किला के खण्डहर बा, जे महाभारत के कौरव आ पांडव के महान गुरु द्रोणाचार्य के रहे, अइसन लोग के मान्यता बा। दोसर राहता भारत के पहिलका राष्ट्रपति आ भारतरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के गाँव जीरादेई होत नरिनपुर आ शिवपुर होत झरही नदी हेलला के बाद बिसवनिया होके गौरी पहुँचल जाव। एह राहे पैदल चार कोस चले के पड़त रहे। जीरादेई से गाँव ले कवनो सवारी के सुविधा ना रहे। एही से एह राहे लोग के आइल-गइल कमे होत रहे। बाबूजी से सुनले रहनीं  कि पहिले पुरनिया लोग के आवे-जाए के इहे राह रहे, जहाँ अब सीवान से गाँव ले सवारी के सुविधा हो गइल बा। तिसरका राहता सीवान से हुसेनगंज, फरीदपुर, आन्दर होत असांव पहुँच के फेर उहाँ से पैदल एक कोस ज़मीन चलला के बाद नाँव से झरही नदी हेले के पड़े। ओकरा बादे गाँव पहुँचल जाव, बाक़िर सीवान से असांव के कवनों सीधा सवारी ना रहे। सवारी रहबो कइल त खाली आन्दर ले रहे। आन्दर से असांव पैदले नापे के पड़त रहे आ फेर असांव से गाँव के पैदल राहता अलगे रहे आ बीच में झरही नदी हेले के पड़त रहे। एही से एह राहे हमनीं के गाँव आइल-गइल कमें होत रहे। जादेतर पहिलके राहे गाँव आइल-गइल होखे।

ब्रिटिश शासन काल में एयर फ़ोर्स बेस, पानागढ़ में बड़का बाबूजी धर्मनाथ प्रसाद स्टोर सहायक के पद पर नोकरी करत रहनीं। कम पढ़ल-लिखल रहला के बादो खूब फर्राटेदार अंग्रेजी बोलत रहनीं। अमेरिकन सोल्जर बड़ी मानत रहले सन। दोसरका विश्व-युध्द के बाद जब अमेरिकन ट्रूप लवटे लागल, ओह घरी ओकनी के समझवला के बादो बड़का बाबूजी नोकरी छोड़ के गाँव लवटे के मन बना लेले रहनीं। गाँव लवटला के बाद खेती-बारी के सिलसिला शुरू कइनीं आ उहाँ के जिनगी के आखिरी समय ले खेती-बारी के सिलसिला बहुते बढ़िया से निबहल। बड़का बाबूजी के गाँव के राजनीति से कवनो मतलब ना रहत रहे। एकदम निष्पक्ष रहत रहनीं, जेकरा चलते हर जाति आ तबका से उहाँ के मधुर सम्बन्ध बनल रहल। गाँव-जवार के लोग का बीच में बड़का बाबूजी धर्मू लाल भा चाचा के नाम से जानल जात रहनीं। पता ना काहे तीन पीढ़ी के लोग जइसे कि दादा, बाप आ बेटा उहाँ के चाचा कहत रहे ? आज ले ई बात हमरा समझ में ना आइल।

जइसन गाँव के पुरनिया लोग बतावत रहे कि हमार दादा स्व० वंशीधर प्रसाद अपना जमाना के पहिलका ग्रेजुएट रहनीं  आ वर्मा देस के राजधानी रंगून में शिक्षक रहनीं। जब गाँव आईं त लोग के बीच में पढ़ाई के महत्त्व पर जोर देत रहनीं। दादाजी के देखल त दूर के बात रहे। कवनो फोटो भी ना रहे, जवना से उहाँ के आकृति के कवनो रूपरेखा के अंदाज लगावल जा सके। एगो किताब पर उहाँ के हस्ताक्षार ही एकमात्र स्मृतिशेष बाचल बा। बाबूजी आ बड़का बाबूजी के बचपने में हमार दादा आ दादी परलोक सिधार गइल रहे।

गौरी नाम के दूगो गाँव बा। दोन चिमनी के पच्छिम में मिसिर लोग के गौरी बा आ पूरब में हमार गाँव गौरी बा, जवन बाबू साहेब के गौरी नाम से जानल जाला। हमरा गाँव में राजपूत लोग के संख्या बेसी रहे। ओह समय लगभग बावन घर राजपूत के रहे। आउरो सब जाति रहे, बाक़िर एको घर ब्राम्हण आ भूमिहार ना रहे। गिन-चुन के कायस्थ लोग के दूगो घर रहे – एगो हमनी के घर आ दोसर हमनी के पटीदार बिकाऊ लाल के। आज कायस्थ जाति में एको परिवार गाँव पर नइखे। दुनू घर में ताला लटकल बा। रोजी-रोटी ख़ातिर सभे गाँव से बहरिया गइल।

साँच कहीं त ओह समय में हमार गाँव एकदम अटट देहात रहे। अगर कवनो राहगीर दरवाजा पर पहुँच जाव त गुड़ के भेली के एक टुकी आ एक लोटा पानी छोड़ के दोसर कवनो चीज से ओकर स्वागत कइल संभव ना होखे। बिजली, सड़क, आवे-जाए के कवनो सवारी, दउरी-दोकान भा स्वास्थ्य सुविधा त रहबे ना कइल। गाँव में खाना बनावे ख़ातिर गैस आ कोयला के भी कवनो सुविधा ना रहे। आमतौर पर रहर के खूंटी आ ओकर झांगी, मकई के ढाठा आ मकई के बाल के लेंढ़ा, धान के भूसी, लकड़ी आ गोंइठा जलावन के नाम पर रहत रहे, जवना के लोग पूरा साल भर ख़ातिर जमा कर के रखत रहे। अगर बरसात में जलावन भींज जाव त रसोई में खाना बनावत बेर बड़ दिकदारी होखे। चूल्हा जरावे ख़ातिर लोग एक दोसरा के घर भा घोनसार से कलछुल में आग के भउर माँग के ले आवत रहे आ ओही से चूल्हा जरावे। कई बेर हमहूँ घोनसार से कलछुल में आग के भउर ले आवत रहनीं। माचिस के उपयोग तबे होखे, जब कबो ढेबरी चाहे लालटेन जरावे के पड़े भा कवनो पूजा पाठ होखे। हमरा इयाद बा कि जादेतर घर में लोग कद्दू, नेनुआ आ तरोई के तरकारी बनावते ना रहे, काहेंकि ई सब तरकारी बनावत बेर कड़ाही में एतना जादे पानी छोड़ देत रहे, जवना के सुखावे में जलावन के खरचा जादे होत रहे। ओह समय हर घर में जलावन बहुत सीमित मात्रा में रहत रहे। अगर केहू के घर में कबहूँ कद्दू, नेनुआ आ तरोई के तरकारी कबो बनबो करे त ओह में छर-छर पानी रहत रहे।

अभाव त बहुते रहे, तबो आपसी मेल-मिलाप आ भाईचारा के चलते सामाजिक तानाबाना बहुते नीक रहे। खरीद फरोख्त करे के अवकात बहुते कम लोग के रहत रहे। निहायत जरुरी सामान जइसे नून, तेल, मसाला, साग–सब्जी, मछरी भा आउर कवनो चीज के खरीदारी करे के होखे त अनाज से बदलेन होत रहे। ओहू में अगर मोट अनाज होखे त जादे अनाज देबे के पड़त रहे। गृहस्थ परिवार में केतनो संपन्नता रहत रहे, बाक़िर नगदी के अभाव त रहबे कइल। गाँव-जवार में बहुते लोग अइसनो रहे, जेकरा गोड़ में चपल रहल त दूर के बात रहे। देह पर सही-सलामत कवनो कपड़ा भी ना रहत रहे। जाड़ा के मौसम त एह लोग ख़ातिर सराप जइसन ही रहे। जब देह पर ही मोसलम कपड़ा ना रहत रहे त ओह लोग के ओढ़ना-बिछौना के बारे में का कहे के बा ? आमतौर पर पुअरा ही बिछौना के काम करत रहे। बोरा ओढ़ना आ बिछौना दुनू के कामे आवत रहे। केहू-केहू धोती भा एगो पातर चादर से ही ओढ़ना के काम चलावे। रात में जब जाड़ सेके लागे भा पाला बर्दास से बहरी हो जाव त लोग उठके कऊड़ा तापत रात बितावे। जे संपन्न किसान रहे, ओकरो लगे अइसन कवनो सुबहित कपड़ा ना रहत रहे, जे पहिर के हित-नाता में कवनो शादी-बियाह के मोका पर जा सके। हमरा आजो इयाद बा कि लगन में जब गाँव-जवार के लोग के कहीं भी हित-नाता में शादी-बियाह भा आउर कवनो मोका पर जाए के पड़त रहे त अक्सर बड़का बाबूजी से धोती-कुर्ता आ जूता पहिरे ख़ातिर माँग के ले जात रहे लोग। ऊ लोग अपना कंधा पर धोती-कुर्ता धइले आ हाथ में जूता लेहले अपना रिश्तेदारी जाए ख़ातिर निकल जात रहे। पैदल चलत-चलत जब कुटुम्ब के गाँव नियरा जाव त कवनो इनार भा चापाकल पर जाके आपन हाथ आ गोड़ रगड़-रगड़ के धोवे आ कुल्ला-गलाला करे। एह से सऊँसे राहता के थकान तनी कम हो जात रहे। ओहिजा आराम से धोती-कुर्ता आ जूता पहिर के तइयार होखे। ओकरा बादे रिश्तेदार में पहुँचत रहे। रिश्तेदारी से लवटला के बाद धोती-कुर्ता धोवा के आ जूता झार-झुर के बड़का बाबूजी के वापस लवटा देत रहे। एही सब काम ख़ातिर बड़का बाबूजी अलगे से एक-दू सेट धोती-कुर्ता रखत रहनीं।

हमनी के दुआर पर एगो बड़हन इनार रहे, जे चाचा के इनार नाम से जानल जात रहे। एह इनार के चारू ओर गोलाहे बड़हन चबूतरा बनल रहे, जवन ज़मीन से लगभग तीन फीट ऊँच रहे। एह चबूतरा पर रोज एक भोरे से देर रात ले एक से एकाल रोचक नजारा देखे-सुने के मिलत रहे। भोरहीं से चहलकदमी शुरू हो जाव। अड़ोस-पड़ोस के घर में पानी पीये, बर्तन धोवे, खाना बनावे आ औरतन के नहाए ख़ातिर डोल से पानी भर के ले जाए के सिलसिला दिनों भर लागल रहत रहे। दतुअन करत लोग एक भोरे इनार पर पहुँच जात रहे आ चबूतरा पर घंटों बइठकी होखे। बतकही के ना त कवनो ओर रहत रहे आ ना कवनो छोर। ओही में खूब हँसी-ठाठा के बात होखे। पूरा जवार के सगरी खबर एहीजा सुने के मिल जाव। कबो-कबो अइसन मजगर बात होखे कि दुआर से हटे के मन ना करे। जब तनी धूप निकले त एही चबूतरा पर लोग के नहाइल शुरू होखे। ओहिजा कुछ लोग लोटा में जल लेहले सूरज भगवान के जल ढ़ारे। ई सिलसिला रोजे दूपहरिया ले चलत रहे। दिन में गाँव के कुछ औरत सब चबूतरा पर अनाजो सुखावत रहे। साँझ होते चबूतरा पर लोग के जुटान शुरू हो जाव आ फेर शुरू होखे उहे बतकही, हँसी-ठाठा के बात आ हेने-होने के गरमा-गरम खबर। गर्मी में जब बइठकी खतम होखे, तले इनार के चबूतरा पर सूते ख़ातिर अगल-बगल से दस से पन्द्रह आदमी रोजे पहुँच जात रहे। साँच कहीं त ई इनार आ एकर चबूतरा हमनी के दुआर के एगो बड़हन रौनक रहे।

एही इनार के एगो रोचक प्रसंग याद आ रहल बा। एगो रहली बीजू बो। सऊँसे गाँव के भउजाई लागत रहली। उनका से लोग खूबे हँसी-ठाठा करे, बाक़िर ऊ अकेले ही सब पर बीस पड़त रहली। अकेले में उनका से केहू मज़ाक करे के जल्दी हिम्मत ना करे। रोज सबेरे-साँझ के बेर हमनीं के इनार पर डोल से पानी भरे आवस। जसहीं इनार में आपन डोल डलले रहस, ठीक ओही बीचे गाँव के कवनो लइका दूरे से उनका के रिगा देव – ‘लड्डू लाते मारेली आ जिलेबी दांते काटेली।‘ ई बात सुनते बीजू बो आपन डोल आ ओकर रसरी ओसहीं इनारे में छोड़-छाड़ के ओह लइका के पीठियावे लागस। लइका आगे-आगे भागल जाव आ ई ओकरा के पीछे-पीछे चहेटत रहस। बीजू बो से केहू के जीतल एतना आसान ना रहे। ऊ त अपने दस गो मरद के बराबर रहली। आखिर में ऊ लइका आपन हार मान लेव। तब जाके ओकरा के छोड़स। लगभग रोजे इनार में काँटा डाल के उनकर डोल निकलाव।

हमरा गाँव में कवनो तरह के सरकारी भा प्राइवेट स्वास्थ्य सेवा के सुविधा ना रहे। दू किलोमीटर के दूरी पर बिसवनिया गाँव बा। ओही से सटले झरही नदी के बाँध पर एगो सरकारी स्वास्थ्य उपकेंद्र रहे, जहाँ एगो केरालियन ए०एन०एम० रहत रहे। ओहिजा कवनो दवाई रहते ना रहे। गाँव से आठ किलोमीटर के दूरी पर दरौली प्रखंड मुख्यालय में एगो सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रहे, जहाँ एम०बी०एस० डॉक्टर उपलब्ध रहे, बाक़िर पूरा जवार भर में कतहूँ एम०बी०एस० डॉक्टर ना रहे। कहीं-कहीं आर०एम०पी० डॉक्टर जरुर भेंटा जात रहे। गाँव भा आसपास में दवाई के कवनो दोकान भी ना रहे। अगर कवनो दवाई के जरूरत पड़ जाव त ख़रीदे ख़ातिर दरौली भा शिवपुर जाए के पड़त रहे। हमरा गाँवे सप्ताह में एक भा दू दिन नागा पर एगो आर०एम०पी० डॉक्टर आपन राजदूत मोटरसाइकिल से आवत रहले। उनकर मोटरसाइकिल भी एतना पुरान रहे कि चलते-चलते बीचे में बन्द हो जाव। हमेसा खराबे रहत रहे। गाड़ी स्टार्ट करे ख़ातिर डॉक्टर साहेब किक मारत-मारत एकदम फेनेफेन हो जात रहले, तबो उनकर मोटरसाइकिल जल्दी स्टार्टे होखे के नामे ना लेव। आखिर में हारपाछ के गाँव के लइकन से ठेलवावस, तब जाके उनकर मोटरसाइकिल स्टार्ट होखे। डॉक्टर साहेब जाति के तेली रहले। उनकर असली नाम केहू जानतो ना रहे। सभे उनका के तेलिया डॉक्टर साहेब के नाम से जानत रहे आ एही नाम से उनका के बोलइबो करे। उनका मुँहो पर सभे तेलिया डॉक्टर साहेब कहे, बाक़िर एह सम्बोधन के ऊ कबहूँ बाउर ना मानत रहले। कवनो लइका आके बोले ए तेलिया डॉक्टर साहेब ! माई बेराम बिया, चल के तनीं देखलीं। डॉक्टर साहेब जाके देखस आ अपना पास से दवाई भी देस। अगर पानी चढ़ावे भा सुई देबे के जरुरत होखे त उहो काम करस। अइसे डॉक्टर साहेब फीस के नाम पर अलगा से रुपया-पइसा ना लेत रहले, बाक़िर सुई, दवाई आ पानी चढ़ावे के जवन चार्ज होखे, ओही में आपन फीसो हनठ के जोड़ देत रहले।

एगो रोचक घटना इयाद पड़ रहल बा। घर के आँगन के दक्खिन छोर पर चउका रहे। बड़की अम्मा खाना बनावत रहली। चउका के ठीक सामने आँगन में हमनी के बाल-मण्डली के गपशप चलत रहे आ खेल भी होत रहे। एही में हमार चचेरा भाई पुनु माने रंजन आलोक कुछ खुटचाली करत रहले। चउका में बइठल बडकी अम्मा उनकर सब खुटचाली देखत रहली आ ओहिजा से उनका के बार-बार मना भी करत रहली। कतनो मना करस बाक़िर पुनु मनबे ना करस। उनकर खुटचाली खतम होखे के नामे ना लेव। आजिज़ आके खीस में बड़की अम्मा उनका ऊपर छोलनी चला देहली। छोलनी हवा में लहरात आलोक के नाक से लागत थोड़े दूर पर जाके गिरल। उनकर नाक के एगो कोना कट गइल। खून बहे लागल। खून देख के सभे घबरा गइल। घर में अफरा-तफरी मच गइल। सभे परेसान रहे। विचार भइल जे शिवपुर लेजा के डॉक्टर से मरहम-पट्टी करावल जाव। उनका साथे पैदले एक कोस ज़मीन चल के झरही नदी हेलत हमनी के शिवपुर पहुँचनीं सन। उहाँ एगो आर०एम०पी० डॉक्टर भेंटाइल। दूगो टाँका पड़ल आ एगो सुई घोंपाइल। डॉक्टर खाए के कुछ दवाई भी देहलस। दवा लेके फेर पैदले झरही नदी हेलत बिसवनिया होत हमनीं के गाँवे पहुँचनीं सन। शिवपुर के बात आइल त एगो आउर प्रसंग इयाद पड़ गइल। पहिले हमरा गाँव में कवनो आटा चक्की ना रहे, जवना के चलते गेहूँ पिसवावे ख़ातिर शिवपुर जाए के पड़त रहे। बाद में जब हमरा गाँव में सरल लोहार के घरे आटा चक्की बइठल त गेहूँ पिसवावे में तनी सुबहिता हो गइल।

बड़का बाबूजी के एगो लंगोटिया इयार रहले धारी सिंह। उनका के हमनी सभे धारी बाबा कहत रहनीं। रोज साँझ आ सबेरे दुनू आदमी के मिलल-जुलल होत रहे। कवनो समस्या के एक-दोसरा से साझा करत रहे लोग। बुझाव जइसे एह लोग के एक दोसरा में परान बसेला। आपस में अइसन भुनुर-भुनुर बतियावे लोग कि बगले में बइठल आदमी के ना त कुछ सुनाई पड़े आ ना कुछुओ बुझाव जे का बतियावता लोग। कतहीं भी जाए के होखे त एके साथे जात रहे लोग। पूरा गाँव-जवार में धारी-धर्मू के जोड़ी बहुते नामी रहे। जर-जमीन के खरीद-बिक्री दरौली में होत रहे, काहेंकि सबसे नजदीक रजिस्ट्री कचहरी दरौली में रहे, जे हमरा गाँव से करीब आठ किलोमीटर के दूरी पर रहे। आवे-जाए ख़ातिर पैदल छोड़ के दोसर कवनो सवारी के साधन ना रहे। जवार में केहू के भी जमीन के जब खरीद भा बिक्री होखे त ऊ लोग अपना साथे बड़का बाबूजी के रजिस्ट्री कचहरी जरूर लेके जात रहे। साथे-साथे धारी बाबा जात रहले। बड़का बाबूजी के जर-जायदाद के दस्तावेज के बढ़िया जानकारी रहे। रजिस्ट्री कचहरी के प्रक्रिया आ दस्तावेज के लिपि से परिचित भी रहनीं। हमरा इयाद बा जे गर्मी के दिन में बड़का बाबूजी दरौली से लवटत बेर गोड़रा मछरी जरुरे लेके आवत रहनीं। दरौली में सरयू नदी रहला के चलते गोड़रा मछरी आसानी से मिल जात रहे। ओह समय गोड़रा मछरी दस रुपया में एक सेर मिलत रहे। नाप-तौल ख़ातिर बटखरा में छटाक, सेर, पसेरी आ मन चलत रहे। किलोग्राम के कवनो चलन ना रहे।

हमार गाँव के जमीन बहुते उपजाऊ रहे। जादेतर धनहर खेत रहे। धान के पैदावार भी जादे होत रहे। एकरा अलावे मकई, मसुरिया, टंगुनी, कोदो, मडुआ, चिना, अरहर, मटर, सरसों, तीसी, पटसन, गन्ना, आलू, पियाज आ साग–सब्जी के उपज भी बढ़िया होखे। गेहूँ के फसल लगभग नाहिए के बराबर होत रहे। बाकिर जौगोजई के खेती खूब होखे। जौगोजई में जौ के मात्रा जादे रहत रहे आ गेहूँ नाम भर के रहत रहे। दवनी-ओसवनी के बाद जब जौगोजई घरे आवे त ओह में से औरत लोग बइठल-बइठल लगभग दस किलो ले गेहूँ चुन के अलगे निकालत रहे आ ओकरा के छठब्रत ख़ातिर नेमहा रख देत रहे। छठ पूजा के समय एही गेहूँ के जांत में पिस के आटा तइयार कइल जाव, आ ओकरे ठेकुआ पाके, जवन अरघ पर चढ़ावल जाव। हर घर में असहीं होत रहे। जौगोजई के आटा के रोटी होखे त तनी मोटाह, बाक़िर खाए में खूबे मीठ आ सवदगर लागे। रफेज भी बहुते रहत रहे, जवन स्वास्थ्य के लिहाज़ से बढ़िया रहत रहे। एगो अइसन समय आइल कि जौ के खेती साफे बन्द हो गइल। जौ के जगह पर लोग गेहूँ बोए लागल। अब त पूरा गाँव-जवार में खोजलो पर पूजा-पाठ ख़ातिर जौ ना भेंटाला। बाजार से ही खरीदे के पड़ेला।

कबो-कबो अंधविश्वास के सामाजिक मान्यता मिल जाला, जवना के कवनो वैज्ञानिक आधार ना होखे। तबो लोग एगो परम्परा के रूप निभावे लागेला। एही परम्परा के निभावे में पहिले हमरा गाँव में कबहूँ चना ना बोआत रहे। आमलोग के अइसन धारणा रहे कि हमनी के गाँव में चना बोअल ना सहेला। एक बेर हम बड़का बाबूजी से चना बोए ख़ातिर बहुते जिद कइनीं। बड़का बाबूजी मनबे ना करीं आ हम रहनीं जे अपना जिद पर अड़ल रहनीं। बड़का बाबूजी के लगे लरिआइल रहत रहनीं आ बार–बार एके गो रट लगवले रहनीं। आखिर में हार पाछ के बड़का बाबूजी चना बोए ख़ातिर तइयार भइनीं। ओही साल नवरा के गढ़ई के बगल वाला खेत में चना बोआइल। पूरा गाँव-जवार में कानाफूसी शुरू हो गइल। लोग तरे-तरे के बात करे लागल। धारी बाबा आके सब बात बड़का बाबूजी से बतावस। एक दिन धारी बाबा घरे आइल रहले। बड़का बाबूजी से कहत रहले – ‘धर्मू ! काहें अइसन काम कइलऽ हऽ ? पूरा जवार में हल्ला बा। लोग तरे-तरे के बात करत बा। तू जानते बाड़ऽ कि गाँव-जवार में चना बोअल ना सहेला। तहरा ना बोए के चाहत रहे।‘ बड़का बाबूजी कहनीं – ‘अरे लइका के मन रखे ख़ातिर छव कट्ठा में चना बोवा देहनीं। जइसे आउर सब फसल बोआला, ओसहीं चना भी एगो फसल हऽ। अगर बोआइए गइल त एह में हरजे का बा ? छोड़ऽ गाँव के लोग के बात। अब त बोआ गइल बा। अब अगिला साल देखल जाई।‘ चना त खूबे लहलहाई। देख के मन गदगद हो जाव। चना के साग भी खूब खाए के भेंटाइल। गाँव के लोग भी खूब चना के साग खोंट के खइले रहे। गाँव-जवार के लोग मोटा-मोटी आधा खेत के चना के झांगी उखाड़ के खा गइल रहे। ओकरा बादो बहुते चना भइल। अगिला साल से पूरा गाँव-जवार में चना बोआए लागल।

बात ओह समय के हऽ, जब भैया आ हम पटना में पढ़त रहनीं। छठ में सभे पचरुखी से गाँव चल गइल रहे। हमनी के भी पटना से गांवे जाए के विचार भइल। ओह समय पटना में गंगा नदी पर कवनो पुल ना बनल रहे। उत्तर बिहार जाए ख़ातिर स्टीमर से गंगा नदी हेले के पड़त रहे। भैया आ हम सबेरहीं गाँव जाए ख़ातिर पटना से निकलनी सन। बाँसघाट पहुँचला के बाद बच्चा बाबू के स्टीमर से गंगा नदी हेल के पहलेजा पहुँचनी सन। पहलेजा घाट से सरकारी बस स्टैंड पैदल जाए में पाँच से सात मिनट लागत रहे। ओहू में बस धरे ख़ातिर आपन बक्सा-पेटी माथा पर भा हाथ में लेहले धउर के जाए के पड़त रहे। ना त बस में बइठे के जगह ना भेंटाव। बस में खड़े-खड़े जाए के पड़े। उहाँ से सरकारी बस से सीवान आ सीवान से दरौली के प्राइवेट बस धराइल। दोन पहुँचे से पहिलहीं किरिन डूब गइल रहे। हमनी के आगपाछ में पड़ल रहनीं  कि अंधेरा में निकरी नदी कइसे हेलल जाई ? एक त एकदम सूनसान राहता आ ओह पर से किरिन डूबला के बाद नदी के विकराल रूप देख के असहीं भयावह लागे। भैया कहलन कि बड़की दोन में ही उतर जाए के आ ओहिजा बच्चा बाबू के इहाँ रात में ठहर जाव। बच्चा बाबू दोन के नामी आदमी रहले। उनकर कई गो बस चलत रहे। ऊ बाबूजी आ बड़का बाबूजी से परिचित रहले। हमनी दुनू भाई उनका इहाँ पहुँच के आपन परिचय देहनी। बहुते खुश भइलन। बाबूजी आ बड़का बाबूजी के हालचाल पुछलन आ हमनी के रात में रुके के इन्तजाम भी करवले। रात के मछरी-भात खइला के बाद आराम से सूतनीं सन। एक भोरे उठ के फ्रेश भइला के बाद भरपेटाहे नाश्ता भइल। ओकरा बाद हमनी के गाँवे जाए ख़ातिर निकल गइनीं। निकरी नदी के गहराई त जादे ना रहे, बाक़िर नदी बड़ी छितनार रहे। कहीं डांड़ भर त कहीं छाती भर पानी हेलत करीब नौ बजे सबेरे हमनी के गाँव पहुँचनीं सन।

गाँव गइला के एगो अलगे मज़ा रहत रहे। आजो ओसहीं लागेला। खेत-खरिहान घूमल, गर्मी के दिन में आन्ही-बतास अइला पर एके सांस में नवरा के गढ़ई वाला बगइचा में धउर के आम आ जामुन चुनल, हल से जोतल खेत हेंगावत बेर हेंगा पर बड़का बाबूजी के दुनू गोड़ के बीच बइठ के मज़ा मारल, बैल से गेहूँ के दवनी कइल, चलत पछुआ में ओसवनी के नजारा, खेत पटावत बेर इनार पर चलत राहट भा ढेकुल के ठंढा-ठंढा पानी पीअल, सीजन में मकई के खेत के बीच मचान पर बइठ के होरहल भुट्टा के सवाद लिहल, जाड़ के रात में दुआर पर कउड़ा तापे के बेरा बइठल-बइठल तीन-चार गो उँख चाभल, ओही कउड़ा में कोन पका के ओकरा के खपड़ैल के ओरी पर रात भर ओस में छोड़ल आ होत भिनसहरे ओकर सवाद लिहल, कोल्हू से पेरात उँख के रस पीअल आ एह रस के बनल रसिआव के सवाद लिहल, ताजा-ताजा महिया खाइल, धान के खेत में लागल पानी में बन्सी से टभका पर मछरी मारल, ढेकी के कुटल सुरका चिउरा के सवाद लिहल, लगन के दिन में चोरी-छिपे लौंडा नाच देखल, जतरा पार्टी के अइला पर रामलीला देखल आजो इयाद बा। एह सब में जवन मज़ा मिलत रहे, ओकर बाते कुछ आउर रहे। समय के साथे सम्पन्नता त बहुते बढ़ल, बाक़िर ओइसन मज़ा फेर कबहूँ ना भेंटाइल। साँच कहीं त ऊ सब एगो अलगे दुनिया रहे, जे अब सपना जइसन लागेला। कतनों अभाव रहे, बाक़िर “मन चंगा त कठउती में गंगा” कहावत सोरहो आना सही रहे। ओह ज़माना में सीमित संसाधन के साथे आदमी के जरूरत भी सीमित रहत रहे। थोड़-थाड़ जवने साधन रहत रहे, ओही में खूब मस्ती रहत रहे। बाबूजी के कहल एगो बात हमरा आजो इयाद बा कि जे आदमी आपन जरूरत के जेतने सीमित रखी, ओकरा ओतने कम मानसिक तनाव रही आ ओतने जादे सुखी रही। आज आदमी भले भौतिकवादी सुख-सुविधा से संपन्न त हो गइल, बाकिर पहिले जवन मन के सुख मिलत रहे ऊ त अब गूलर के फूल हो गइल। अब बुझाला जे बाबूजी के जवन सोच आ विचार रहे ऊ केतना सार्थक रहे।

हमार गाँव बाबू साहेब के गाँव हऽ। जातिगत सोभाव के चलते ओह लोग के दबंगई कवनो नया बात ना रहे। पहिलहूँ थोड़-बहुत दबंगई त रहते रहे, बाक़िर एगो सीमा के भीतरे रहत रहे। लोकलाज आ मान-मार्यादा के तनी खेयाल रहत रहे। साँच कहल जाव त एही भावना के चलते समाज के तानाबाना मजबूत रहत रहे। जब समाज-परिवार बा त लोग के सोच-विचार में अंतर भइल स्वभाविक बा। बाकिर मतभेद जब मनभेद के रूप में बदल जाला त उहाँ अहम् आ आन के जनम होला, जवन सामाजिक संरचना के तार-तार करे में कवनो कसर ना छोड़े। अइसने कुछ हालत हमरा गाँव के हो गइल रहे। देखते-देखते बाबू साहेब लोग दू खेमा में बँट गइल। एकरा बादो हमरा गाँव के जादेतर लोग के राजनीति से कवनो सरोकार ना रहत रहे। एगो रहले गोविन्द सिंह, जे हमरा गाँव के राजनिति के असली केंद्र बिंदु रहले। साँच कहल बा कि अगर टोकरी के एगो आम सड़ जाव त पूरा टोकरी के आम के सड़ा देला। कुछ अइसने हाल हमरा गाँव के भी रहे। एकाध आदमी के सवारथ के चलते सँउसे गाँव के परिवेश बदरंग हो गइल। देखते-देखते गाँव में पहिले जइसन ना त माहौल रह गइल आ ना पहिले जइसन सोच वाला लोग। सब कुछ उलट-पलट हो गइल।

सन् 1973 आवत-आवत हमरा गाँव–जवार के राजनीति एगो अलगे राह धलेले रहे। हमरा गाँव में चरमनी के गड़हा पर कब्जा करे के चक्कर में एके दिन में तीन आदमी के लाश गिरल। अब लोग गोलबंद होखे लागल रहे, जवना के पूरा फायदा माले पार्टी के कुछ नेता लोग उठावल। हमरा गाँव में माले के एगो अलगे खेमा तइयार हो गइल। गाँव में कुछ नया नेता भी पैदा हो गइलन। देखते-देखते पूरा दरौली प्रखंड माले के गढ़ बन गइल। हमरा गाँव में माले के कुछ नेता लोग के आवाजाही बढ़े लागल। बाबू साहेब लोग के खिलाफ पूरा गाँव में लोग लामबंद होखे लागल। लमहर समय ले दुनू तरफ से ह्त्या के सिलसिला चलत रहल। माहौल एतना खराब हो गइल रहे कि गाँव जाए में डर लागे। साँझ होते लोग अपना-अपना घर के भीतर बन्द हो जात रहे। हालत अइसन हो गइल कि आपन जान बचावे ख़ातिर कुछ बाबू साहेब लोग त हमेसा ख़ातिर गाँव छोड़ दिहल आ फेर कबहूँ लवट के ना आइल। सब बिमारी के इलाज हो सकत बा, बाक़िर गलतफहमी आ शक के कवनो इलाज नइखे। एही बेमारी के चलते हमरा गाँव में कुछ निर्दोष लोग के भी ह्त्या हो गइल, जवना में एगो रहले नथुनी सिंह। उनकर मकान हमरा घर के ठीक सामने रहे। नथुनी सिंह गहिलापुर हाई स्कूल में हेडमास्टर रहले। लम्बा आ छरहरा बदन पर सफ़ेद धोती-कुर्ता में उनकर व्यक्तित्व बहुते निखरत रहे। रोज साइकिल से स्कूल जात-आवत रहले। सालो भर नाव से झरही नदी हेले के पड़त रहे। घर से स्कूल आ स्कूल से घर अइला के अलावे गाँव में उनकर कहीं भी बइठकी ना होत रहे आ गाँव के राजनीति से कवनो खास सरोकार भी ना रखत रहले।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min1370

लेखक: मनोज भावुक

हमरा ईयाद बा जब हम छठवां-सातवाँ में पढ़त रहीं त माई हर साल गरमी आ जाड़ा के छुट्टी में बहरा से गाँवे निकल जाय। एकरा अलावे भी महिना-दू महिना पर गाँवे चलिए जाय। ओकर परान गाँवे में बसत रहे।

हम नया-नया शहर में आइल रहीं। शहर माने रेनूकूट, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश। हमरा बुझाय जे गाँव में बुरबक भा मजबूर लोग रहेला। जे चाल्हाक बा, तेज बा, सफल बा, प्रतिभावान बा उ शहर भागेला, शहर में बसेला। शहर में ओकरा बिल्डिंग पिटाला। उ हमार लड़िकबुद्धि रहे, बाद में त मजबूरी। कबो पढ़े खातिर, कबो नोकरी खातिर, कबो कुछ त कबो कुछ खातिर शहरे-शहर छिछिअइनी। अफ्रीका-यूरोप ले गइनी। धावते बानी, ना जाने कहिया से।

बस कोरोना में गोड़ तूड़ के बइठे के पड़ल बा। एकरा के लॉकडाउन कहाता। लॉकडाउन में ढेर लोग के गाँवे भागल देखनी ह। ढेर लोग के कहल सुनत बानी कि अब गाँवे में रहल ठीक बा।

कबो-कबो हमरो मन करsता कि गाँव के दुआर पर एगो कोना में खोंपी आ पलानी होखे। खूँटा पर गाय-बछरू बान्हल जाय। खाँटी दूध मिले। गाय के गोबर वाला खाद से फरहरी लागे आ ताज़ा तरकारी मिले। दुआर पर एगो-दूगो पेड़ लागे आ प्राणवायु ऑक्सीजन मिले। त हमार माई ठीके कहत रहे कि बबुआ हो जनमधरती से ना कटे के, ना छोड़े के, बुरा वक्त में ओही जी लौटे के पड़ेला।

आज जब मानव जीवन संकट में बा त सब बुझाता। बुझाता कि पंच तत्व जवना से जीवन बनल बा, देह बनल बा, ओकरा से जुड़ के रहल केतना जरूरी बा। माटी में रहल भा रोज माटी के छूअल केतना जरूरी बा। नीम, बरगद, पीपल के छाँव में रहल केतना जरूरी बा। घाम लोढल केतना जरूरी बा।

साँच कहीं त माई के बतिया बेर-बेर मन परsता आ मन परsता हमार गाँव। हमार स्टेशन दिमाग में नाचsता।

ई सिवान, रघुनाथपुर थाना के कौसड़ स्टेशन ह मगर आजो इहां से ना कवनो ट्रेन गुजरेला, ना  बस। आजो ई गाँवे बा। हमार गाँव। सरयू (घाघरा नदी) के किनारे गाँव के दक्षिण में जवन बांध बा उ 20 फीट चौड़ी पक्की सड़क में तब्दील हो गइल बा। एह से विकास के कई गो अउर गुंजाइश बनत बा। बिजली बत्ती भी कम से कम बीस घंटा रहते बा। पानियो लोग  खरीद के पीये लागल बा। कुछ घर में एसियो लागल बा। ओसारा भा बगइचा में बेना डोलावत लोग अब नज़र नइखे आवत।

हालाँकि कुछ लोग के माली हालत अभियो बहुत खराब बा। हमरा आपन एगो शेर मन पड़त बा-

कहीं शहर ना बने गाँव अपनो ए भावुक

अंजोर देख के मड़ई बहुत डेराइल बा

गाँव में हम बहुत कम रहल बानी बाकिर गाँव हमरा भीतर हमेशा रहल। हमरा हर रचना, हमरा हर संस्कार, हमरा जीवन शैली में रहल। इहाँ तक कि जवना महानगर भा महादेश में गइनी, आपन गाँव लेले गइनी। 1993 में हम अपना गाँव के बायोग्राफी लिखनी- कौसड़ का दर्पण। ओकर सारांश पोस्टर के रूप में तब होली के आस-पास कई गो गाँव के देवाल पर चिपकल रहे। तब हम आईएससी पास कइले रहनी। हमरा गाँव में 29 गो जाति के लोग रहेला। गाँव के बॉयोग्राफी के बहुत सारा हिस्सा हम पद्य में भी लिखनी। ओह में जातियन के जिक्र कुछ अइसे बा –

अहीर, गोंड़, नोनिया, बनिया, डोम, दुसाध, चमार

भर, भांट, कमकर, कुर्मी, बरई और लोहार

ततवा, तेली, तीयर, बीन, नट, कोइरी, कोंहार

महापात्र, मुस्लिम, मल्लाह, धोबी और सोनार

नाउ, पंडित, लाला, ठाकुर।

 

29 जातियों का ये झुंड

सीधा-शरीफ, हुंडा तो हुंड

कौसड़ के दर्पण में निहार

मन बोल रहा है बार-बार

हे कौसड़ तुमको नमस्कार !

लमहर कविता बा जवना में कौसड़ के लोग के जनजीवन के विभिन्न बिंदुअन के छूवे के प्रयास कइल गइल बा।

1993 में हम जवन जनगणना कइले रहनी, उ हमार खुद के शौकिया प्रोजेक्ट रहे। गाँव के जाने के रहे ठीक से। 3 महीने तक लागल रहनी। गर्मी के महीना रहे। कई बार सिवान के चक्कर लगावे के पड़ल गाँव से संबंधित कागजात खातिर।

हमरा से 20 साल पहिले ई काम हमरे गाँव के एगो वैज्ञानिक फूलदेव सहाय जी कइले रहनी।  उहाँ के आत्मकथा में एगो अध्याय ‘’ मेरा गाँव कौसड ‘’ भी बा। हालाँकि तब ओह किताब के भा जनगणना के बारे में हमरा कवनो जानकारी ना रहे। जब हम आपन काम शुरू कइनी आ लोग से मिलल-जुलल शुरू कइनी त हमरा गाँव के गणेश सिंह ओह किताब के जानकारी दिहले, बल्कि उ किताबो उपलब्ध करवले। गणेश जी ओह जनगणना में फूलदेव सहाय के सहयोगी रहलें।

अपना गाँव के चौहद्दी के बात करीं त पूरब में गभिराड़, पश्चिम में बड़ुआ, उत्तर में पंजवार आ दक्षिण में घाघरा नदी बा। पंजवार हीं मुख्य सड़क बा जवन सिवान या छपरा, पटना से कनेक्ट करेला। पंजवार से डेढ़-दू किलोमीटर अंदर बा गाँव के लोग के रेसिडेंशियल एरिया। पंजवार रोड से लेके रेसिडेंशियल एरिया तक खेत बा। एही खेतन के बीच एगो खाड़ी बा जे दक्षिण में घाघरा नदी से कनेक्ट हो जाला। खाड़ी के निर्माण खेत के सिंचाई खातिर कइल गइल बा। एह खेत के कुछ भूभाग के चंवरा कहल जाला। खाड़ी ओह पार (पूरब दिशा में) के खेत के डीह पर के खेत कहल जाला आ दक्षिण में घाघरा नदी के किनारे वाला खेतन के दियर / दियारा कहल जाला। गेहूँ, धान, अरहर, जौ, बाजरा, मक्का, तरकारी आ दियर में ऊंख (गन्ना) के खेती होला। मक्का या मकई के बाल अगोरे खातिर मचान पर रात में सूते या दिन भर गपियावे के बचपन के कई गो संस्मरण जेहन में बा। हल अउर हेंगा के कहानियो ईयाद बा जवना के आज ट्रैक्टर रिप्लेस कर देले बा। गाय आ भईंस खातिर सांड़ आ भईंसा के ‘’ कर छो-कर छो ’’ कर के तलाशे के रोचक किस्सा-कहानी आ बचपन के जिज्ञासु मन में एह बाबत उठत तमाम सवालन के जबाब अपना बालमण्डली में खोजे आ विचित्र-विचित्र जबाब के ठहाकन से गुलजार याद भी बा हमरा साथे जवन शहर आ मेट्रो के बच्चा लोग खातिर त दुर्लभे बा।

तब खाना बनावे खातिर लगभग सभ घर में माटी के एक मुंहा आ दू मुंहा चूल्हा हीं होत रहे जवना में ईंधन के रूप में रहेठा या चइली लवना के रूप में प्रयोग कइल जात रहे। अब त मोदी जी घर-घर गैस के चूल्हा पहुंचा देले बाड़े। शौच करे खातिर अब शायदे केहू घर से दू किलोमीटर दूर खेत में जात होई। घर-घर शौचालय बा। अब कवनो माई, बहिन, भइजाई के शौच खातिर पेट दबाके अन्हार होखे के इंतज़ार ना करे के पड़ेला।

हमरो गाँव में कई गो अंग्रेजी मीडियम स्कूल खुल गइल बा। तब पंजवार से कौसड़ आवे वाली सड़क के अंतिम छोर, टी पॉइंट पर एगो सरकारी प्राइमरी स्कूल रहे, जवन आजो बा।  बस बिल्डिंग थोड़ा बड़ा आ नंबर ऑफ रूम्स बढ़ गइल बा। हमरा नइखे मालूम कि अब के मास्टर जी हमनी के समय के पंडीजी के तरह रोज पेड़ के नीचे समूह में खड़ा करके पनरह का पनरह, पनरह दूनी तीस, तिया पैतालीस, चऊके साठ करवावेले कि ना। उ गाँवे के गिनती पहाड़ा के बेस रहे कि हम रेनुकूट, सोनभद्र (तब मीरजापुर) उत्तर प्रदेश में चौथी कक्षा में एडमिशन लेहनी तब से हाई स्कूल तक गणित में 100 परसेंट अंक मिलत रहल। ओही स्कूलिया पर हर मंगर आ शनिचर के साँझी खानी बाज़ार लागेला।

गाँव में चिक्का, कबड्डी, गुल्ली-डंडा के खेल अब ना के बराबर रह गइल बा। (बल्कि ई दुर्लभ खेल गाँव से पार्लियामेंट में सिफ्ट हो गइल बा। ) बच्चन में मोबाइल गेम इहवों हावी बा।

गाँवों में अब डायन ना के बराबर पावल जाली। पहिले त बाते-बात पर डायन अस्तित्व में आ जात रहली ह। केहू के बुखार भइल ना कि घर के लोग उचरल शुरू कर दी,  डायन कइले होई। फेर डॉक्टर से ज्यादा ओझा के महत्त्व रहे आ दवा से ज्यादा करियवा डांरा के। हर बच्चा के कमर में एगो काला धागा होखे। केहू के इहां चोरी भइला पर पुलिस के पास लोग बाद में पहुँचे, पहिले पहुँचे गाँव के खुशी भगत के पास। खुशी भगत के बांध के किनारे देव स्थान रहे। उहवें ऊ भाखस आ बता देस कि केकर पाड़ा के चोरा के ले गइल बा। केकरा हाड़े कब हरदी लागी। केकर गाय गाभिन बिया आ केकरा कब लइका होई। सब सवालन के जबाब रहे खुशी भगत के पास। उनका पर परी आवत रहे लोग। उ बीड़ी पीयत रहस आ परी के आवते बीड़ी फेंक देस आ भाखे लागस, समाधान बतावे लागस। अब खुशी भगत ना रहलें।

गाँवो पहिले वाला ना रहल। हमरा याद बा तब जाड़ा के दिन में दियारा गइला पर लोग पूछ-पूछ के ऊँख के रस पियावे, महिया खियावे। अब एक दूसरा के पूछे आ मिले-जुले के रवायत कम हो गइल बा। बरगद के पेड़ भी अब पहिले जइसन छाँव नइखे देत। इंफ्रास्ट्रक्चर त बढ़ रहल बा बाकिर दिल के कंनेक्शन कमजोर हो रहल बा। गाँव त गाँव पड़ोसी गाँव भी ईर्ष्यालु आ आत्ममुग्ध हो गइल बा। उ रउरा काम के मान ना दी। एह से ओकरा अस्तित्व के खतरा बा। उ हज़ार, दू हज़ार, छह हजार किलोमीटर दूर कवनो आका खोज ली आ ओकरा के पूजी आ रउरा बड़ से बड़ उपलब्धि के नकार दी।

गाँव जहां भारत के आत्मा बसत रहे उहाँ के जड़ में सियासी घुन लाग गइल बा। जनकवि कैलाश गौतम के एगो कविता बड़ा लोकप्रिय बा, ” गाँव गया था, गाँव से भागा” ..  स्थिति ओहू से बदतर होत जा रहल बा।

क्रिएटिविटी खातिर जरूरी बा कि गाँव आ चौहद्दी के गांवन में सौहार्द्र, सहयोग आ एक-दूसरा के आगे बढ़ावे के प्रवृति जागृत होखे। सहयोग हीं गाँव के मूल आत्मा रहे आ एही के बल पर बड़ से बड़ अनुष्ठान होत रहल बा।

एही सहयोग आ सौहार्द के पुनर्स्थापित करे के जरूरत बा। सबका आंगन में सूरज स्थापित हो, अइसन कोशिश होखे।

दूसर जरुरी बात गाँव के प्रति नज़रिया बदले। गाँव में महत्त्वपूर्ण काम करे वाला भी कुछ लोग के नज़र में बुरबक या लड़बक होला आ शहर में गोबर पाथे वाला भी होशियार। ई घटिया सोच बदले के चाहीं। अइसे कोरोना ढेर लोग के दिमाग दुरुस्त कइले बा। लोग के बुझाए लागल बा कि अब गाँव के ओर हीं लौटे के होई। शहर के आबोहवा जहरीला हो गइल बा। हमनी के  मुखनली आ श्वासनली दुनों से जहर ले रहल बानी सन। एह से जीवन के बचावे के बा त गाँव के ओर लौटहीं के परी, बाकिर जीवन में जीवन रहे एकरा खातिर प्रेम आ सौहार्द्र के भी स्थापित करे के होई।

भागवान करस, हमार ई शेर झूठा साबित हो जाय –

लोर पोंछत बा केहू कहां

गाँव अपनों शहर हो गइल


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min1030

लेखक- महेन्द्र प्रसाद सिंह

सन 1990 के बात ह। हमार पहिलकी किताब, भोजपुरी नाटक, “बिरजू के बिआह” खातिर हमरे अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का ओर से जगन्नाथ सिंह पुरस्कार लेबे खातिर नेवतल गइल रहे।  हमरा 26 मई 1990 के रेणुकोट पहुंचे के रहे। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 11वां अधिवेशन के आयोजन उंहवे भइल रहे। पुरस्कार, सम्मेलन के अध्यक्ष डा. विद्या निवास मिश्र का हाथे मिले वाला रहे। विज्ञान आ विधि के विद्यार्थी रहल हमरा अइसन इस्पात उद्योगकर्मी के साहित्य सृजन खातिर पुरस्कार मिलल बहुते बड़ बात रहे। खुशी आ उत्साह से भरल हम बोकारो स्टील सिटी से 25 मई  के चल के 26 के रेणुकोट पहुँच गइल रहीं। दिनभर साहित्यकार मित्र लोगिन से भेंट मुलाक़ात में समय बीतल। आपन जवारी आ सबसे  प्रिय कवि, कुमार विरल संगे कुछ बेसी समें बीतल। सांझ होते रेणुकोट के स्टेडियम खचा-खच भर गइल रहे। ओह दिन के आकर्षण रहे दिल्ली से आवे वाली आर्केस्ट्रा दल के प्रस्तुति।

पुरस्कार के आखिरी कड़ी पर हमार नाम रहे। रात के करीब आठ बज के बीस मिनट होखे वाला रहे। पुरस्कार मिलते पाण्डेय कपिल जी हमरा कान में गते से कहनी, “महेंद्र जी, दिल्ली से जवन आर्केस्ट्रा टीम पाँच बजे सांझ के पहुँचे वाला रहे ऊ अभी ले आइल नइखे। गाड़ी पाँच घंटा लेट बिया। रउआ “बिरजू के बिआह” के कुछ डायलग सुना देब? हम अनाउंस कर दिहीं ? कपिल जी “बिरजू के बिआह” नाटक, सम्मेलन के अमनौर (7वां) अधिवेशन, सन 1982 में,रांची (9वां) सन 1985 में, बोकारो (10वां) सन 1988 में आ ओकरा अलावे पटना, रवीन्द्र भवन में देख चुकल रहीं। उहाँ के लागल कि ओह नाटक के संवाद सुना के, हम लोग के शांत कर लेब। सांच बात त ई रहे कि आयोजक लोगिन खातिर दर्शक के ओतना देर तक सम्हारल एगो भारी चुनौती रहे। हमरो खातिर एकल अभिनय से करीब 7 हजार से बेसी लोग के मनोरंजन कइल, आ ऊहो लगातार डेढ़ घंटा तक, बड़हन चुनौती रहे बाकि एगो बहुत बड़ अवसरो रहे- आपन हुनर देखावे के। कपिल जी के आँख में हम देखनी आ समस्या के गंभीरता आ अपना खातिर अवसर भांपत कहनी, “एनाउंस कर दिहीं ।”

कपिल जी के आवाज़ गूंजल, “अब रउआ सभे के महेंद्र जी आपन “बिरजू के बिआह” नाटक के डायलाग सुनाइब जवन नाटक खातिर इहाँ के अबके पुरस्कार भेंटल हा।”

देखते-देखत, भरल-पूरल मंच खाली होखे लागल। मंच पर खड़ा रहे एगो माइक ओकरा पीछे हम। सोझा दर्शक के शोर शराबा आ हुटिंग के मिलल-जुलल तेज आवाज, “आर्केस्ट्रा-आर्केस्ट्रा” से स्टेडियम गूंजत रहे। मंच खाली हो गइल रहे आ हम शुरू हो गइल रहीं। माइक का सोझा खाड़ बोलत जात रहीं, बिना आवाज निकसले। बोले के माइम चलते रहे, तबले दर्शकदीर्घा से साफ साफ आवाज सुनाये लागल।

….चुप…चुप… सुन स ना, का बोलता। थोरहीं देर में सन्नाटा छा गइल। हम गुरु गंभीर आवाज़ में कहनी, “त अब बोलीं ?” जोरदार ठहाका गूंजल। लोग हँसत-हँसत लोट पोट हो गइल। हा हा हा हा……अरे तबे ले चुप रहे!

बिना कुछ बोलले ऑडिएंस के अइसन ठहाका हम पहिलहूँ देख चुकल रहीं। बोकारो ट्रेनिगं सेंटर के वार्षिकोत्सवन में जब हम आपन एकल प्रस्तुति खातिर  मंच पर खड़ा होत रहीं त अइसहीं लोग बिना कुछ बोलले हँसत रहे।अब हम ओही आत्मविश्वास से भरल मंच पर आपन  गोड़ जमा चुकल रहीं। लोग हँसत रहल हम मुस्कात रहनी। फेनु आपन अलग-अलग नाटकन के अंश सुनावत गइनी। लोग एक-एक शब्द पर ठहाका लगावत रहल। दस बज गइल रहे आने डेढ़ घंटा पर। कपिल जी गते से आ के कहनी। गाड़ी पहुँचहीं वाली बिया। आउर आधा घंटा घींची। हम उहाँ के चिंता मुक्त करत कहनी, “ठीक बा” आ कुछेक हास्य व्यंग्य आ अनुकृति सुनइनी। आधा घंटा बीतल आ दिल्ली से आइल गायन मंडली आपन साज-बाज मंच पर रखे लागल। हम विदा लेवे के अंदाज में लोग के तसल्ली देनी कि जेकर इंतज़ार में रउआ सभे रहीं ऊ दल पहुँच गइल बा। अब रउआ… तब तक गायक दाल के मुखिया (नाम इयाद नइखे) आके कान में कहलें, “दस मिनट आउरी सम्हारी हमनी के बस नेहा के आवत बानी जा। “हम समझ सकत रहीं कि गर्मी का मौसम में दिनभर के ट्रेन सफर के थकान क बाद नेहाइल केतना जरूरी बा। आ उहो जब रात भर गावे-बजावे के होखे तब। हम ओही साहस से आगे बढ़नीं । 30 मिनट बीत गइल। मण्डली के कलाकार मंच पर आके आपन-आपन साज बाज मिलावे के शुरू कर देले रहन।10 मिनट का बाद जब दल प्रस्तुति खातिर तैयार हो गइल, हम बिदा लेबे लगनी। आडिएंस के शोर उठल, “एगो आउर- एगो आउर”, 5 मिनट आउरी कुछ सुना के खानपुरी कइनी आ विदा लेनी। मने-मने कहनी, “रन जीतलअ ए महेंद्र सिंह”। ई हमार पहिलका आ आखिरी अवसर रहे जब हम अकेले सवा दू घंटा ले लोग के हंसावत रहनी। एकल नाटकन में कुछ रिकॉर्डेड म्यूजिक के भा टीम  के नेपथ्य से भा  मंच से सपोर्ट रहेला। एह में त ओइसन कुछ रहे ना। खैर सभे दिल खोल के सराहल। लखनऊ से आइल भोजपुरी लोक के संपादक श्रीमती डा राजेश्वरी शांडिल्य आ उनकर पति डा राम बिलास तिवारी जी हमरे लखनऊ में दू महीना बाद आयोजित होखे वाला आपन सांस्कृतिक कार्यक्रम के संचालन आ एकल प्रस्तुति खातिर नेवता दिहल लोग। आवे-जाये के ac 2 टियर के टिकट कटा के भेजलें आ कार्यक्रम के बाद सम्मानजनक उपहारो दिहलें। खैर ऊ त बाद के बात भइल। रेणुकूट में दोसरका दिने सांझ के कवि सम्मेलन रहे। कवि लोग से मंचो खचाखच ओइसही भरल रहे जइसे कि स्टेडियम। संचालन एगो वरिष्ठ कवि के हाथ में रहे। हमहूँ मंच के पिछला भाग में कविता सुनावे के अपना पारी के इंतज़ार में बइठल रहीं। कवि सम्मेलन नियम के उद्घोषणा भइल। पहिला राउंड में हर कवि के आपन बस एकेगो कविता सुनावे के बा। संचालक महोदय जेकर नाम पुकरलें ऊ कवि आके माइक संभार लिहलें। बाकि ऑडिएंस सुने के तैयारे ना रहे। ज़ोर-ज़ोर से लोग चिचियात रहन, “बोकारो-बोकारो”। पाण्डेय कपिल जी हस्तक्षेप कइनीं । संचालक महोदय से निहोरा कइनीं कि महेंद्र जी के लोग सुनल चाहत बा। उनहीं के पहिले बोला लिहीं। संचालक जी दर्शक के बुद्धिहीनता के आ कुरुचि के खूब कोसनी आ फेनु हार के हमरे आपन कविता सुनावे खातिर आमंत्रित कइनीं। जोरदार थपरी बजा के लोग स्वागत कईलस। हम आपन एगो हास्य व्यंग्य के कविता सुनइनीं आ अपना जगहा पर लवट अइनीं। लोग चिचियाइल, “एगो आउर- एगो आउर”। संचालक के पारा गरम भइल त कपिल जी खाड़ भइनी आ लोग के समझावे के कोसिस कइनी। बाकि सब बेकार। उहाँ के फेनु संचालक से कहनीं कि महेंद्र जी के बोला लिहीं। हमार फेनु बोलाहट भइल संगहीं उहाँ का दर्शक लोग से भी बहुते परेम से कवि सम्मेलन के नियमपूर्वक चलावे में सहयोग के मांग कइनी। दर्शक मान गइलें। हम आपन दोसरको हास्य व्यंग्य कविता सुनाके रेनूकूट के माटी आ उहाँ के दर्शक लोगिन के मनहीं मने प्रणाम कइनीं जे आजो हमरा जिनगी के एगो सबसे प्रेरक संस्मरण का रूप में ताज़ा रहेला। ओहि रेणुकोट में पढ़ल-बढ़ल मेधावी संपादक मनोज भावुक जी के पहल पर हम आपन संस्मरण के कागज पर उतारत बानी। उमेद बा कि उहाँ के एह संस्मरण के आपन पत्रिका में स्थान देब।


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Hum BhojpuriaDecember 14, 20211min630

लेखक- विनय बिहारी सिंह

तीन गो एकदम सांच आ रोचक घटना हमनी के भोजपुरिया समाज के लौह पुरुषता के उदाहरण बाड़ी सन। अइसे त अनगिनत घटना बाड़ी सन, बाकिर आजु तिनिए गो प्रेरक घटना पढ़ीं।

 पहिला घटना

उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के कौनो गांव के घटना ह। लइकाईं में ई घटना सुनाके हमार ईया (दादी) सीख देसु कि कौनो प्रण कइला के बाद पीछा ना हटे के चाहीं आ अपना दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर प्रण कइल काम पूरा क देबे के चाहीं। ईया घटना बतावत का घरी ईहे कहसु कि दक्खिन का ओर एगो गांव रहे। ओइजा एगो मंदिर बनावे के प्लान बने आ कौनो ना कौनो कारन से रुकि जाउ। जमीन तक तय हो चुकल रहे। एह गांव में एगो परम भक्त आदमी रहले जिनकर नांव लोग साधु जी रखले रहे। उनुकर असली नांव से ज्यादा पुरुब टोला के साधु जी बड़ा प्रसिद्ध रहे। त मंदिर के प्लान बने आ रुकि जाउ। साधु जी अचानके एक दिन प्रण कइले कि जब तक मंदिर ना बनी, हम अन्न ना खाइब। एह प्रण का बाद ऊ सबकरा से मंदिर खातिर चंदा बटोरे लगले। भोजन में ऊ कबो आलू उबाल के खा लेसु त कबो कंद- मूल। कबो दही त कबो दूध। नाम मात्र के मजदूरी लेके मंदिर बनावे खातिर दू गो मजूरन के साधु जी तय क दिहले। मंदिर के नींव खोदा/कोड़ा गइल। कौनो ईंटा के भट्ठा वाला मालिक उनुका के एक हजार ईंटा दे दिहलस। नींव डला गइल। मंदिर बने शुरू हो गइल। एही बीच में साधु जी के मलेरिया हो गइल। मंदिर के काम रुकि गइल। काहें से कि दोसर केहू मंदिर बनावे में साधु जी जतना सक्रिय ना रहे। मलेरिया उग्र रूप ले लिहलस आ साधु जी के टायफाइड हो गइल। बोखार में ऊ का जाने का बड़बड़ासु आ देह तावा नियर जरे। लागल कि साधु जी मरि जइहें। जब तनी बोखार कम भइल त डॉक्टर कहलस कि मांस- मछरी खाईं। अनाज खाईं, तब देह में ताकत आई। बाकिर साधु जी कहले कि मरि जाइब बाकिर आपन प्रण ना छोड़बि। बेमारी में गांव के सक्षम लोग उनुकरा पर रुपया- पइसा खरच करेके तेयार रहे लोग। तीन महीना ले मृत्यु से लड़ाई कके साधु जी जीत गइले। आखिर ले ऊ अन्न टच ना कइले। दूध- दही आ फल के बल पर स्वस्थ हो गइले। मांस- मछरी उनुका खातिर आजीवन निषिद्ध चीज हो चुकल रहे। मंदिर त छोटहने बनल बाकिर ओकरा बने में दस साल लागि गइल। ओमें भगवान शिव के स्थापना भइल। गांव के लोग कहल कि साधु जी ओह मंदिर के पुजारी बनसु। साधु जी विवाहित रहले। उनुकर पत्नी भी सरल, सहज आ साधु स्वभाव के रहली। जब गांव के लोग आपन जिद्द ना छोड़ल त साधु जी बात मान लिहले। मंदिर के पुजारी बनि गइले बाकिर मंदिर बनला का बादो ऊ अनाज ना खइले। कहसु कि अब त अनाज का ओर ताकहूं के मन नइखे करत। बिना अनाज के जीए के आदत परि गइल बा। सचहूं मलेरिया से ठीक भइला का बाद साधु जी फेर बेमार ना परले। अनाज छोड़ला का बाद उनुकर चेहरा में का जाने कइसे निखार आ गइल। नब्बे साल के उमिर ले जियला का बाद अंतिम सांस लिहले।

  दोसरकी घटना-

हम बलिया रेलवे स्टेशन पर भोर में उतरनी आ अपना बड़ भाई का घरे जाए खातिर एगो रिक्शा कइनीं। रिक्शा वाला बड़ा धीरे- धीरे चलावत रहे। हम रिक्शा वाला के कहनीं- अरे भाई तूं रेक्सा चलावतार कि बैलगाड़ी? एतना धीरे- धीरे चलबs त घरे हम दुपहरिया खान पहुंचब। रिक्सा वाला जवान लइका रहे, कहलस- जी बाबू। आ पैडल पर पैर मरलस त ठक दे बाजल। हम हैरान। पैर मरला पर ठक दे त बाजे ना। ओकरा गोड़ का ओर तकनी त हमार छाती धक्क दे हो गइल। ई का? रिक्सा वाला के एगो गोड़ के जगह पर डंटा/लाठी बांन्हल रहे। हमरा बड़ा अफसोस भइल। अपना पर ग्लानि भइल। ओह रिक्सा वाला के एकही गोड़ रहे। दोसरका गोड़ जांघ तक रहे। ओही जांघ में डंटा बान्हि के ऊ रिक्सा चलावत रहे। हम ओकरा से पुछनी कि तोहार गोड़ कइसे कटाइल? रिक्सा वाला कहलस कि ओकरा गोड़ में गैंगरीन हो गइल रहे, एही कारन से गोड़ काटे के परल। कहलस- “हमरा घर में हम बानी आ हमार माई बिया। आय के कौनो साधन नइखे। खाए- पीए आ माई के दवाई खातिर धन चाहीं। ओही खातिर हम रिक्सा चलावतानी।” हम त अपराध बोध से चुप रहनीं। घरे पहुंचि के ओकरा के बीस रुपया का बदला चाली गो रुपया देबे लगनी बाकिर रिक्सावाला बीस रुपया लौटा दिहलस। कहलस कि रउरा से त बीसे रुपया किराया तय भइल रहल ह। त हम चालीस रुपया काहें लेब। हमरा पर दया मत देखाईं। बस राउर प्रेम बनल रहो, ईहे चाहीं। रिक्सावाला पढ़ल- लिखल रहे। अगिला दिने ओकरा के खोजे निकललीं बाकिर फेर ओकरा से हमार भेंट ना भइल।

   तिसरकी घटना-

ओह घरी ट्रेक्टर के नांव बहुते कम लोग सुनले रहे। आजकाल नियर ट्रेक्टर से खेत जोतल आम घटना ना रहे। रबी के फसल बोआई के समय रहल। तले एगो किसान के बैल मरि गइल। किसान के नांव रहे अयोध्या। अयोध्या के चिंता भइल कि खेत कइसे जोताई? रबी के फसल कइसे बोआई? अयोध्या सबका से बैल मंगले। बाकिर सबका आपन खेत बोए के रहे। त बैल के उधार दी। पहिले आपन खेत बोई कि बैल उधार दी। एक दिन रात खान अयोध्या प्रण कइले कि पूरा तीन बीघा/बिगहा खेत फरुहा/फावड़ा से कोड़ देब। अगिला दिने फरुहा लेके खेत कोड़े शुरू कइले अयोध्या। लोग हंसे आ कहे कि पागल भइल बाड़े अजोध्या। आरे आधा कट्ठा, एक कट्ठा के बात रहित त कौनो बात रहल ह। ई तीन बिगहा खेत कइसे कोड़िहें। बाकिर अयोध्या सबकर बात अनसुना कके खेत कोड़े लगले। आ उनुका धुन के प्रणाम बा कि 15 दिन में तीन बिगहा कोड़ि दिहले। अब जे फरुहा भा कुदारी/कुदाल चलवले नइखे ऊ का जानी कि खेत कोड़े में कतना कठिन परिश्रम के जरूरत बा आ कतना एनर्जी लागेला। कहाला कि खेत कोड़ला पर हाड़ के पसीना निकलि आवेला। हाड़ से पसीना एगो मुहावरा ह। त एतना कठिन काम कके अयोध्या हंसते हंसत खेत के बो दिहले। ओकर विधिवत सिंचाई क दिहले आ उनुकर रबी के फसल लहलहाए लागल। आसपास के गांव में शोर हो गइल कि अयोध्या त लोहा के आदमी बाड़े। उनुकर मुकाबला के करी।

ई तीन गो कहानी सुनि के आजुओ हमार मन जुड़ा जाला। हम आजकाल अइसन कौनो लौह पुरुष के नइखीं देखत जौन एहतरे के उदाहरण मनुष्य के सामने राखत होखे। पहिले के लोग उदाहरण राखि देत रहल ह। मीडिया में आवे के ओकर कौनो इच्छा ना रही। बस हम आपन प्रण पूरा क दिहनी, एही के खुशी ओकरा खातिर पर्याप्त रहल ह। आजकाल त सुनाता कि बिना कौनो पराक्रम के ही लोग चाहता कि हमार नांव होजा, यश होजा। अइसना लोगन के अपना पुरनियन से सीख लेबे के चाहीं। लोहा बने खातिर एह लोगन के उदाहरण काफी बा।



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भोजपुरी के थाती, भोजपुरी के धरोहर, भूलल बिसरल नींव के ईंट जइसन शख्सियत से राउर परिचय करावे के बा। ओह लोग के काम के सबका सोझा ले आवे के बा अउर नया पीढ़ी में भोजपुरी  खातिर रूचि पैदा करे के बा। नया-पुराना के बीच सेतु के काम करी भोजपुरिआ। देश-विदेश के भोजपुरियन के कनेक्ट करी भोजपरिआ। साँच कहीं त साझा उड़ान के नाम ह भोजपुरिआ।


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