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Hum BhojpuriaOctober 22, 20215min380

[ 18 अक्टूबर, 2008 के नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया का ओर से भोजपुरी भाषा और साहित्यविषय पर विहार माध्यमिक शिक्षक संघ, पटना के सभागार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में पठित आलेख।  –  संपादक ]

पत्र-पत्रिकन में भोजपुरी के प्रवेश के स्थिति तब बनल, जब कि भारतेन्दु मंडली के कुछ भोजपुरी भाषी साहित्यकार भोजपुरी में रचना करे लगले। रामकृष्ण वर्मा ‘बलवीर’, तेगअली ‘तेग’, खड्ग बहादुर मल्ल आ फेर, आगे चलके, दूधनाथ उपाध्याय, रघुवीर नारायण जइसन कवियन के भोजपुरी रचनन के प्रकाशन से लोगन के ध्यान भोजपुरी साहित्य का ओर आकृष्ट भइल। सन् 1886 के आसपास काशी से प्रकाशित पत्रिका ‘गोरस’ में राधाकृष्ण सहाय के भोजपुरी नाटक ‘दाढ़ के दरद’ प्रकाशित भइल। सितम्बर 1814 में महावीर प्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वती’ जइसन हिन्दी के प्रतिष्ठित पत्रिका में ‘अछूत की शिकायत’ शीर्षक से हीरा डोम के भोजपुरी कविता प्रकाशित कइले। हिन्दी के पत्रिकन में जब-तब भोजपुरी के रचना प्रकाशित करेके सिलसिला तबे से चलत आइल। आगे चलके कुछ द्विभाषिओ पत्रिका निकलली स, जवना में हिन्दी का साथे-साथे भोजपुरिओ के रचना प्रकाशित होत रहली स। आजो अइसन कुछ द्विभाषी पत्रिका प्रकाशित हो रहल बाड़ी स।

भोजपुरी में पत्रिका प्रकाशित करे के पहिलका प्रयास जयपरगास नारायण ‘बगसर समाचार’ नाम के पत्रिका से कइले। सरस्वती पुस्तकालय, बगसर से प्रकाशित ई पत्रिका पहिले कैथी अक्षर में छपल। दू अंकन के बाद ई भोजपुरी पत्रिका देवनागरी अक्षर में प्रकाशित होखे लागल। ई पत्रिका 1918 तक निकलला के बाद बन्द हो गइल।

भोजपुरी के पत्रिका निकाले के अगिला प्रयास आचार्य महेन्द्र शास्त्री द्विमासिक पत्रिका ‘भोजपुरी’ के सम्पादन करके कइले। भोजपुरी-कार्यालय कदमकुआँ, पटना से प्रकाशित एह पत्रिका में प्राय: हर विधा के रचनन के समावेश भइल रहे। बाकिर, सिर्फ एक अंक के प्रकाशन के बाद ई पत्रिका बंद हो गइल।

सन् 1949 में अवध बिहारी ‘सुमन’ के सम्पादन में ‘कृषक’ नाम के एगो साप्ताहिक पत्र भोजपुरी भाषा में प्रकाशित भइल! इहे अवध बिहारी ‘सुमन’ आगे चलके संन्यासी होके दण्डिस्वामी विमलानन्द सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध भइले, जे ‘बउधायन’ नाम के महाकाव्य भोजपुरी में लिखले। ‘कृषक’ असल में भोजपुरिया किसान-मजदर के पत्रिका रहे। एकर लोक-गीत विशेषांक एह पत्रिका के उल्लेखनीय उपलब्धि रहे। एक साल तक निकलला का बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल।

कुछ बरिस के चुप्पी का बाद, सन् 1952 में आरा से ‘भोजपुरी’ नाम के मासिक पत्रिका के प्रकाशन शुरू भइल। एकर प्रवेशांक अगस्त, 1952 में निकलल। क्राउन आकार के चालीस पृष्ठ के एह पत्रिका के पूर्ण साहित्यिक पत्रिका होखे के गौरव मिलल। एकरा पहिलका पाँच अंकन के सम्पादन प्रो. विश्वनाथ सिंह कइले रहले, बाकिर एह पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक आ कर्ता-धर्ता रघुवंश नारायण सिंह से वर्तनी के बारे में कवनो बिन्दु पर विवाद हो गइला का वजह से प्रो. विश्वनाथ सिंह एकर सम्पादन छोड़ दिहले आ रघुवंशे नारायण सिंह एकर सम्पादक हो गइले। एक सौ पृष्ठ के एकर लोक साहित्य अंक बहुते पुष्ट विशेषांक रहे, जवना का चलते एह पत्रिका के साहित्यिक स्वीकृति मिले लागल। सन् 1958 तक ई नियमित प्रकाशित होत रहल। भोजपुरी साहित्य के विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई।

आठ बरिस तक नियमित प्रकाशन के बाद, आर्थिक कठिनाई का चलते एकरा प्रकाशन में गतिरोध होखे लागल, आ आखिरकार, ई बन्द हो गइल।

कुछ बरिस बाद, पटना से सन् 1963 से 1965 तक एकर फेर से प्रकाशन होत रहल, बाकिर आर्थिक कठिनाई से एकरा प्रकाशन में फिर रुकावट हो गइल।

फेर, रघुवंश नारायण सिंह, तिसरका झोंक में एकर प्रकाशन 1973 से 1974 तक कइले। बाकिर, आखिरकार, समुचित साधन का अभाव में एकर प्रकाशन बन्दे हो गइल। भोजपुरी साहित्य के विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई। ई भोजपुरी के अनेक अइसन लेखक पैदा कइलस, जेकरा योगदान से भोजपुरी भाषा के अनुपम साहित्यिक समृद्धि सुलभ भइल।

आरा से ‘गाँव-घर’ नाम के पाक्षिक पत्रिका के नियमित प्रकाशन भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव ‘भानु’ के सम्पादन में दू बरिस ले होत रहल। ओकरा बाद, ई पत्रिका अनियमित होखत-होखत, आखिरकार, बन्दे हो गइल|

सन् 1960 में पटना में ‘भोजपुरी परिवार’ नाम के संस्था बनल, जवना के आचार्य शिवपूजन सहाय के आशीर्वाद प्राप्त रहे। एही भोजपुरी परिवार’ के तत्वावधान में त्रैमासिक ‘अँजोर’ के प्रकाशन सन् 1960 से शुरू भइल। एकर सम्पादक रहले पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय आ सहायक सम्पादक रहले अविनाश चन्द्र विद्यार्थी। डिमाई आकार के चालीस पृष्ठ के ई पत्रिका 1969 ई. तक लगातार प्रकाशित होखत रहल, बाकिर एकर प्रधान सम्पादक आ ‘भोजपुरी परिवार’ के अध्यक्ष पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय के निधन के बाद एकर प्रकाशन बन्द हो गइल। भोजपुरी साहित्य के सर्वतोमुखी विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान मानल जाई।

आनन्द मार्ग के सामाजिक संगठन ‘प्रोग्रेसिव फेडरेशन ऑफ इंडिया’ 1964 में गाजीपुर से ‘भोजपुरी समाचार’ नाम के एगो समाचार साप्ताहिक के प्रकाशन शुरू कइलस, जेकर सम्पादक रहले जरदारी। ईहे पत्रिका आगे चलके ‘भोजपुरी वार्ता’ नाम से गोरखपुर से प्रकाशित होखे लागल, जेकर सम्पादक रहले आचार्य प्रतापादित्य। कुछ समय बाद, एकर प्रकाशन मोतिहारी से अर्ध-साप्ताहिक रूप में होखे लागल आ तब एकर सम्पादक भइले देवदत्त। बाद में, पटना से एकर प्रकाशन दैनिक पत्र का रूप में होखे लागल। बाकिर, आनन्द मार्ग पर प्रतिबन्ध लाग गइला से प्रकाशन में गतिरोध आ गइल आ एकरा के बन्द कर देबे के पड़ल। कुछ साल बाद, 1993 ई. में, एकर फेर से प्रकाशन विनोद कुमार देव का सम्पादन में शुरू भइल, बाकिर साल-भर से आगे एकरा के चलावल सम्भव ना हो सकल।

वाराणसी के सुप्रसिद्ध भोजपुरी संस्था ‘भोजपुरी संसद’ 1964 ई. में ‘भोजपुरी कहानियाँ’ नाम से मासिक पत्रिका के प्रकाशन शुरू कइलस। पहिले एकर सम्पादक रहले डॉ. स्वामीनाथ सिंह। बाद में, प्रो. राजबली पाण्डेय आ गिरिजाशंकर राय ‘गिरिजेश’ एकर सम्पादक भइले। ‘गिरिजेश’ के सम्पादन में ई पत्रिका एक-से-एक कहानीकार त पैदा कइबे कइलस, भोजपुरी के पाठको-वर्ग तइयार कइलस। भोजपुरी के ई पहिलकी पत्रिका रहे, जवना के अपेक्षित मार्केटिंग भइल आ जवना के वितरण के बीड़ा ए.एच.ह्वीलर जइसन नामी कम्पनी उठवलस। सन् 1966 तक ई पत्रिका लोकप्रिय बनल रहल, बाकिर आगे एकर प्रकाशन कईएक वजह से बन्द हो गइल।

भोजपुरी संसद, वाराणसी सन् 1968 में त्रैमासिक ‘पुरवइया’ के प्रकाशन शुरू कइलस, जेकर सम्पादक रहले राजबली पाण्डेय। बाकिर उचित व्यवस्था के अभाव में ई पत्रिका एक साल बाद बन्द हो गइल।

सन् 1964 में, दूगो आउर मासिक पत्रिकन के प्रकाशन शुरू भइल- छपरा से ‘माटी के बोली’ आउर आरा से ‘भोजपुरी साहित्य’। ‘माटी के बोली’ के सम्पादक रहले सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’, बच्चू पाण्डेय आ विश्वरंजन। दू अंक निकलला का बाद ‘माटी के बोली’ के प्रकाशन बन्द हो गइल, त 1969 में एकर प्रकाशन विश्वनाथ प्रसाद का सम्पादन में फेर शुरू भइल, बाकिर कुछ अंकन के बाद एकरा के आउर आगे चला सकल आर्थिक कारण से सम्भव ना हो सकल।

आरा से डॉ. जितराम पाठक के सम्पादन में भोजपुरी साहित्य’ 1968 ई. तक प्रकाशित भइल। आगे चलके, भोजपुरी साहित्य मंडल, बक्सर के मुखपत्र के रूप में एकर प्रकाशन सन् 1975 से 1977 तक जितरामे पाठक के सम्पादन में होत रहल। ई पत्रिका भोजपुरी साहित्य के रचनात्मक स्तर के ऊँच उठावे में महत्वपूर्ण योगदान कइलस, जेकर श्रेय एकरा विद्वान् सम्पादक डॉ. पाठक के देवे के होई।

‘हमार बोल’ नामक बत्तीस पृष्ठ के पत्रिका मासिक रूप में निकलल रहे, जे दू-तीन अंक निकलला का बाद बंद हो गइल।

जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् के अनियतकालिक पत्रिका ‘लुकार’ के प्रकाशन सन् 1965 में शुरू भइल। अंक-1 से 19 तक, विभिन्न व्यक्तियन के सम्पादन में, एकरा के चक्रमुद्रित करके प्रकाशित कइल गइल। ओकरा बाद, अंक 20 से ई पत्रिका प्रेस में छपे लागल, जेकर सम्पादन गंगा प्रसाद ‘अरुण’ करे लगले। अट्ठाइसवाँ अंक से एकरा सम्पादन के भार अजय कुमार ओझा उठा रहल बाड़े आ गंगा प्रसाद ‘अरुण’ प्रधान सम्पादक के भूमिका निभा रहल बाड़े। सन् 2008 तक ‘लुकार’ के चौंतीस अंक प्रकाशित हो चुकल रहे। ओकरा बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल।

सन् 1966 में आरा से हरेराम तिवारी ‘चेतन’ के सम्पादन में ‘आँतर’ नाम के पत्रिका निकलल रहे, जवना के पाँच अंक प्रकाशित भइल रहे। फेर सन् 1999 में ‘चेतने’ के सम्पादन में राँची से एकर एगो अंक हस्तलिखित रूप में निकलल, जवना के सौ गो हस्तलिखित प्रति तइयार करा के वितरित कइल गइल रहे।

सन् 1968 में सर्वानन्द के सम्पादन में ‘जागल पहरुआ’ नाम के एगो पत्रिका, छपरा से, प्राउटिस्ट फोरम ऑफ इंडिया का ओर से प्रकाशित भइल रहे, जे कुछे अंक निकल के बन्द हो गइल।

‘भोजपुरी जनपद’ नामक पत्रिका के प्रकाशन सन् 1968 में भोजपुरी साहित्य मंदिर, वाराणसी से राधामोहन ‘राधेश’ के सम्पादन में शुरू भइल रहे। सन् 1970-72 के दौरान एह पत्रिका के नियमित प्रकाशन होत रहल। कुछ बरिस बंद रहला का बाद, 1977 से 1981 तक ले एकर चार-पाँच अंक निकल सकल। शुरुआत में, एकरा सम्पादन से सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’ भी जुड़ल रहले।

सन् 1971-72 के दौरान ‘राधेश’ जी ‘पहरुआ’ नाम के साप्ताहिक अपना सम्पादन में निकलले रहले। भोजपुरी साहित्य मन्दिर जइसन प्रकाशन संस्थान आ ‘भोजपुरी जनपद’ आउर ‘पहरुआ’ जइसन पत्रिकन के संचालक राधामोहन ‘राधेशे’ जी रहले, जे आपन पैत्रिक सम्पत्ति बेंच-बेंच के एह प्रकाशनन के आगे बढ़ावत गइले। इहाँ तक ले कि ऊ अपना गाँव के पैत्रिक घर तक ले बेंच दिहले आ भोजपुरी साहित्य के आपन जिनिगी समर्पित करत परलोकवासी हो गइले।

सन् 1969 में विनोदचन्द्र सिनहा के सम्पादन में वाराणसी से ‘काशिका’ नाम के पाक्षिक बड़ आकार में निकलल रहे। ओही साले, छिन्दवाड़ा (मध्यप्रदेश) से क्राउन आकार में अड़तालीस पृष्ठ के पत्रिका ‘भोजपुरी समाज’ भोलानाथ सिंह के सम्पादन में आ डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में ‘हिलोर’ नाम के पत्रिका आरा से प्रकाशित भइल रहली स। एह तीनों पत्रिकन के कुछुए-कुछ अंक निकल सकल, आ ई पत्रिका बन्द हो गइली स। हँ, ‘हिलोर’ के कुछ अंक 1979 में गयो से (गया से भी) निकलल रहे।

सन् 1971 में पटना से ब्रह्मानन्द मिश्र के सम्पादन में ‘भोजपुरी टाइम्स’ नाम के समाचार साप्ताहिक-प्रकाशित भइल, बाद में जवना के नाम ‘भोजपुरी संवाद’ कर दिहल गइल रहे। एक-डेढ़ बरिस ले अनियमित रूप में प्रकाशित होखत-होखत, आखिरकार, ई साप्ताहिक बन्द हो गइल। सन् 1972 में आरा से ‘टटका’ नाम के पाक्षिक रमाशंकर पाण्डेय के सम्पादन में निकलल। सन् 1976 से एकर नाम ‘टटका राह’ हो गइल रहे। कुछ समय बाद बन्द हो गइल।

सन् 1992 ई. में ‘सरायकेला अनुमंडल भोजपुरी समाज’ (अब झारखंड में) के मुखपत्र के रूप में ‘ललकार’ के प्रकाशन रामवचन तिवारी के संचालन में शुरू भइल, जेकर सम्पादक रहले डॉ. बच्चन पाठक ‘सलिल’ । सन् 1978 से एह पत्र के नाम ‘जनता ललकार’ हो गइल। 1982-83 तक ई पत्र निकलत रहल, बाकिर रामवचन तिवारी के निधन के बाद बन्द हो गइल।

सन् 1982-83 में बीरगंज (नेपाल) से श्री दीपनारायण मिश्र के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सनेस’ के प्रकाशन शुरू भइल। ओही घड़ी हुगली (पश्चिम बंगाल) से राममूर्ति पराग आ चन्द्रकान्त के सम्पादन में ‘अँजोरिया’ (द्विमासिक) के प्रकाशन शुरू भइल। ‘सनेस’ दू बरिस ले निकलत रहल, त ‘अँजोरिया’ के दुइये अंक निकल सकल।

भोजपुरी साहित्य सदन, सीवान से पहिले त्रैमासिक आ बाद में मासिक रूप में प्रकाशित ‘माटी के गमक’ विमल कुमार सिंह ‘विमलेश’ के सम्पादन में सन् 1973 से प्रकाशित होत रहल। दू-तीन बरिस के उमिर वाला ई त्रैमासिक/मासिक जबतक निकलल, नियमित निकलल। सन् उनइस सौ तिहतरे में चितरंजन के सम्पादन में आरा से ‘चटक’ निकलल। 1974 में कांचरापाड़ा (पश्चिम बंगाल) से रवीन्द्र कुमार शर्मा के सम्पादन में मासिक ‘भिनसार’ निकलल, जेकर उमिर दू अंक के प्रकाशन तकले सीमित रहल।

सन् 1975 में पाण्डेय कपिल आ नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में ‘लोग’ त्रैमासिक के प्रकाशन भइल। तीन अंक निकलला का बाद पाण्डेय कपिल एकरा सम्पादन से अलग हो गइले, त नागेन्द्र प्रसाद सिंह 1979 से ‘भोजपुरी उचार’ नाम से एकर प्रकाशन आगे बढ़वले आ कुछ अंक के प्रकाशन के बाद ई बन्द हो गइल। एही साले, ‘गोहार’ नामक पत्रिका राकेश कुमार सिंह के सम्पादन में आरा से निकलल। आगे चलके एकर दूगो अंक लखनऊ से प्रकाशित भइल।

सन् 1976 के साल भोजपुरी में पत्र-पत्रिका के प्रकाशन का दिसाई विशेष महत्व के रहल, काहे कि एह साल कईगो पत्रिका कई जगह से निकलली स। एह समय तक अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के गठन हो चुकल रहे आ एकर पहिलका अधिवेशनो प्रयाग में, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के मंच पर, डॉ. उदय नारायण तिवारी के अध्यक्षता में आयोजित हो चुकल रहे। बिहार विश्वविद्यालय के लंगट सिंह कॉलेज में भोजपुरी के पढ़ाइओ शुरू हो चुकल रहे। एह सब वजहन से भोजपुरी के साहित्यकार लोगन में नया उत्साह आइल रहे।

एही साल (1976) से पटना से भोजपुरी संस्थान के तत्वावधान में ‘उरेह’ त्रैमासिक पाण्डेय कपिल का सम्पादन में प्रकाशित होखे लागल, जवना का माध्यम से भोजपुरी में नवलेखन के बढ़ावा मिलल। पाँच बरिस ले नियमित निकलला का बाद एकर प्रकाशन अर्थाभाव का चलते बन्द हो गइल।

अनियतकालिक पत्रिका ‘अहेरी’ के प्रकाशन अवधेश नारायण आ शंभुशरण राम के सम्पादन में मुजफ्फरपुर से भइल। वीरगंज (नेपाल) से दीपनारायण मिश्र के सम्पादन में ‘समाद’ प्रकाशित भइल। मुजफ्फरपुर से ओमप्रकाश सिंह के सम्पादन में मासिक ‘भोजपुरिहा’ के प्रकाशन शुरू भइल। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के वार्षिक मुखपत्र ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ डॉ. वसन्त कुमार के सम्पादन में प्रकाशित भइल। वार्षिक रूप में एह पत्रिका के दू अंक निकलल, जवना से भोजपुरी में शोध के प्रवृत्ति के बढ़ावा मिलल।

सन् 1980 से ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ के त्रैमासिक रूप में निकाले के आउर शोध-समीक्षा का अलावे एकरा में रचनात्मको साहित्य के बढ़ावा देवे के निर्णय लिहल गइल। एकर प्रधान सम्पादक ईश्वरचन्द्र सिनहा आ सम्पादक पाण्डेय कपिल भइले। सन् 1984-85 का दौरान एकर चार गो अंक निकलल आ ई पत्रिका आपन पहचान कायम कर लिहलस। फेर, दिसम्बर, 1986, दिसम्बर, 1987 आ अक्टूबर, 1988 में एकरे एक-एक विशेषांक-क्रमश: रघुवीर नारायण जन्मशताब्दी विशेषांक, भिखारी ठाकुर जन्म शताब्दी विशेषांक आ सम्मेलन-अध्यक्ष-विशेषांक का रूप में प्रकाशित भइल।

जनवरी, 1990 से ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ मासिक रूप में नियमित निकले लागल, जेकर प्रकाशन आजो जारी बा। जनवरी, 1990 से दिसम्बर, 2001 तक ले एह पत्रिका के सम्पादन पाण्डेय कपिल कइले। एह बारह बरिस का दौरान एह पत्रिका के अनेक महत्वपूर्ण विशेषांक निकलल, जइसे- राहुल सांकृत्यायन रचनावली-विशेषांक, हाइकू-विशेषांक, लघुकथा-विशेषांक, गीत- विशेषांक, दोहा-विशेषांक, भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका संदर्भ-विशेषांक।

जनवरी, 2002 से एह पत्रिका के सम्पादन प्रो. ब्रजकिशोर कर रहल बाड़े आ सह-सम्पादक बाड़े डॉ. जीतेन्द्र वर्मा। प्रो. ब्रजकिशोर के सम्पादन-काल में अबतक एह पत्रिका के कई गो महत्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित भइल बा, यथा- डॉ. विवेकी राय-विशेषांक, डॉ. आंजनेय-विशेषांक, संत दुनिया राम-विशेषांक। भोजपुरी के रचनात्मक सक्रियता के आगे बढ़ावे में ई पत्रिका महत्वपूर्ण योगदान करत रहल बा।

सन् 1977 में लगभग नौ गो भोजपुरी पत्रिकन के शुरुआत भइल। जमशेदपुर से माधव पाण्डेय ‘निर्मल’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी संसार’ के दू अंक निकलल। पटना में अवस्थित गैर-सरकारी भोजपुरी अकादमी का ओर से समाचार बुलेटिन का रूप में भोजपुरी समाचार’ के कई अंक निकलल, जेकर सम्पादन हवलदार त्रिपाठी ‘सहृदय’ आ भैरवनाथ पाण्डेय कइले रहले। कलकत्ता से ऋषिदेव दूबे आ अनिल ओझा ‘नीरद’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी मिलाप’ के तीन अंक निकलल। आरा से डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में मासिक ‘कलश’ निकलल, जे आगे चलके अनियतकालिक हो गइल। ब्रजकिशोर दीक्षित ‘ब्रजेश’ के सम्पादन में सीवान से ‘मोजर’ के प्रकाशन भइल, जे तीन अंक के बाद बन्द हो गइल। पटना से प्रो. तैयब हुसैन ‘पीडित’ के सम्पादन में ‘डेग’, मोतिहारी से रजनीकान्त ‘राकेश’ के सम्पादन में ‘डगर’ (बाद में जेकर नाम ‘डहर’ हो गइल रहे), आ इलाहाबाद से शशिभूषण लाल के सम्पादन में ‘चोट’ जइसन प्रगतिशील विचारधारा के पत्रिका निकललीसन, जे कुछ-कुछ अंक निकल के बन्द हो गइलीसन।

एही साल (1977 ई.) कलकत्ता के पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद् का ओर से त्रैमासिक ‘भोजपुरी माटी’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सम्पादक रहले कृष्णबिहारी मिश्र। सन् 1980 से ई पत्रिका प्रो. शिवनाथ चौबे के सम्पादन में मासिक रूप से प्रकाशित होखे लागल। भोजपुरी साहित्य के रचनात्मक विकास में एह पत्रिका के अनुपम योगदान भइल। ई मासिक पत्रिका लगभग लगातार निकलत जा रहल बिया। पिछला कई बरिस से एह पत्रिका के सम्पादन अनिल ओझा ‘नीरद’ करत रहले। कई बरिस बाद, अब ई पत्रिका सभाजीत मिश्र के सम्पादन में प्रकाशित हो रहल बा। भोजपुरी में रचनात्मक साहित्य के श्रीवृद्धि में एह पत्रिका के अनुपम योगदान के नकारल नइखे जा सकत।

सन् 1978 में भोजपुरी के चार गो नया पत्रिकन के प्रकाशन शुरू भइल। पटना से प्रो. ब्रजकिशोर के सम्पादन में ‘भोजपुरी कथा-कहानी’, बिहार सरकार द्वारा गठित भोजपुरी अकादमी के पत्रिका ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’, जेकर सम्पादक आचार्य विश्वनाथ सिंह भइले, लखनऊ से राकेश कुमार सिंह के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सनेहिया’, आउर ढोंढस्थान (सारन) से प्रो. वैद्यनाथ विभाकर के सम्पादन में अनियतकालिक ‘पपीहरा’। ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’ कुछ समय तक अकादमी के कार्यकारी निदेशक चित्तरंजन के सम्पादन में, फिर आगे चल के अकादमी के उपनिदेशक नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में प्रकाशित भइल आ फेर बंद हो गइल। एकर अंतिम कुछ अंक काफी दबीज आ विशिष्ट रहले स। नागेन्द्र प्रसाद सिंह के सेवा-निवृत्ति के बाद एकर प्रकाशन बंद रहल ह, बाकिर, एह साल 2008 में फेर से एकर प्रकाशन डॉ. शिववंश पाण्डेय के सम्पादन में शुरू भइल रहे। अबहीं ई पत्रिका बन्द बा।

सन् 1979 में दू गो नया पत्रिका अइली स- दिघवा दुबौली (गोपालगंज) से गौरीकान्त ‘कमल’ के सम्पादन में पाक्षिक ‘लाल माटी’ आ बलिया से डॉ. अशोक द्विवेदी के सम्पादन में ‘पाती’ । शुरू में ‘पाती’ के चार अंक निकलला का बाद गतिरोध आ गइल आ पत्रिका बन्द हो गइल। फेर अगिला साल 1992 से नया कलेवर में एकर प्रकाशन होखे लागल। डॉ. अशोक द्विवेदी के सम्पादकीय ऊर्जा ‘पाती’ के जे विशिष्टता प्रदान कइले बा, ऊ भोजपुरी साहित्य खातिर महत्वपूर्ण अवदान साबित भइल बा। अबतक प्रकाशित ‘पाती’ के पचास-साठ अंक भोजपुरी के अनेक प्रतिभाशाली रचनाकारन के उजागर कइले बा।

जनवरी, 1980 से अप्रैल, 1987 तक नोखा (रोहतास) के साहित्य-कला-मंच के तत्वावधान में ‘झनकार’ नाम के पत्रिका के प्रकाशन जवाहर लाल ‘बेकस’ के व्यवस्था में भइल रहे, जेकर सम्पादक रहले फणीन्द्रनाथ मिश्र। ई हिन्दी आ भोजपुरी के मिलल-जुलल पत्रिका रहे। ओकरा बाद एह मासिक के प्रकाशन पटना से ‘पनघट’ के नाम से, जवाहर लाल ‘बेकस’ के सम्पादन में, होखे लागल आ एकरा में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड होखे लागल। सन् 1996 में ‘पनघट’ के प्रकाशन बंद हो गइल रहे। बाकिर, जनवरी, 1999 से त्रैमासिक रूप में फेर से एकर प्रकाशन ‘बेकस’ के सम्पादन में होखे लागल, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खंड पहिलहीं जइसन रहे लागल। एही त्रैमासिक रूप में ‘पनघट’ के नियमित प्रकाशन इनके सम्पादन में आजो जारी बा।

सन् 1980 में भोजपुरी के कुछ आउर नया-नया पत्रिका प्रकाश में अइली स- मुजफ्फरपुर से वाल्मीकि विमल के सम्पादन में पाक्षिक ‘भोजपुरी के गमक’; पटना से शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी के सम्पादन में भोजपुरी समाचार’; कुल्हड़िया (भोजपुर) से महेन्द्र गोस्वामी के सम्पादन में मासिक ‘आपन गाँव’; मोतिहारी से साँवलिया विकल के सम्पादन में मासिक ‘जोखिम’ आ जमशेदपुर से परमेश्वर दूबे शाहाबादी के सम्पादन में अनियतकालिक ‘साखी’ । एक-दू अंक निकल के ई सब पत्रिका बन्द हो गइली सन। ‘साखी’ के ‘परमेश्वर दूबे शाहाबादी स्मृति विशेषांक’ के सम्पादन डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘निर्भीक’ कइले रहलें।

सन् 1981 में छपरा से डा. धीरेन्द्र बहादुर चाँद के सम्पादन में ‘झकोर’, मठनपुरा (सीवान) से श्रीवास्तव प्रदीप कुमार ‘प्रभाकर’ के सम्पादन में ‘कचनार’ आउर दिनारा (भोजपुर) से अरुण भोजपुरी के सम्पादन में ‘तरई’ नाम के पत्रिका निकललीसन, जिनकर कुछ-कुछ अंक निकल पावल आ ई सब प्रत्रिका बन्द हो गइली सन।

सन् 1982 में छपरा से रामनाथ पाण्डेय आ डॉ. वीरेन्द्र नारायण पाण्डेय के सम्पादन में कहानी-पत्रिका ‘चाक’ के कुछ अंक निकलल, जवना से भोजपुरी में कहानी-लेखन के गतिविधि में सकारात्मक हलचल भइल बाकिर कुछए अंक के प्रकाशन का बाद ई विशिष्ट पत्रिका बन्द हो गइल।

एही साल (1982 में) गोरखपुर से मैनावती देवी श्रीवास्तव ‘मैना’ के सम्पादन में त्रैमासिक ‘सोनहुला माटी’, भलुनीधाम (रोहतास) से डॉ. नंदकिशोर तिवारी के सम्पादन में त्रैमासिक ‘माई के बोली’ आउर बडकी नैनीजोर (भोजपुर) से महेश्वराचार्य के सम्पादन में त्रैमासिक ‘दियरी’ के प्रकाशन शुरु भइल। बाकिर ई तीनू पत्रिका अल्पजीवी साबित भइली स। एही साल, पतरातू थर्मल पावर के वार्षिकी ‘भोजपुरी परिवार पत्रिका’ के प्रकाशन भइल रहे, जवना के सम्पादक रहले अनिरुद्ध दूबे, विपिन बिहारी चौधरी आ ब्रजभूषण मिश्र।

सन् 1983 में बीरगंज (नेपाल) से ‘सगुन’ नाम के पत्रिका विजय प्रकाश बीन के सम्पादन में निकलल, बाकिर आगे ना चल सकल। एही साल, छपरा से प्रो. हरिकिशोर पाण्डेय के सम्पादन में ‘कसौटी’ नाम के समीक्षा-पत्रिका निकलल। एह पत्रिका के सिर्फ चारे-पाँच अंक त निकल सकल, बाकिर भोजपुरी में समीक्षा के विकास का दिसाईं आपन अमिट छाप छोड़ गइल। एही साल, छपरा से अर्द्धन्दु भूपण के सम्पादन में बालोपयोगी त्रैमासिक ‘नवनिहाल’ के प्रकाशन शुरू भइल, जवना के उमिर कुछुए अंक ले सीमित रहल।

हरिद्वार (उत्तरप्रदेश) से डॉ. सच्चिदानन्द शुक्ल के सम्पादन में ‘भोजपुरी सनेस’ के प्रकाशन 1984 में शुरू भइल। एक अंक के बाद एकर नाम बदल के भोजपुरी आँगन’ कर दिहल गइल। तीन-चार अंक के बाद ई पत्रिका बन्द हो गइल। उनइस सौ चौरासिये में आरा से डॉ. रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’ के सम्पादन में ‘आपन भाषा’ के त्रैमासिक प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर एकर दुइये अंक निकल सकल। एह पत्रिका के महिलांक निकाले के योजना रहे, जे कार्यान्वित ना हो पावल।

सन् उनइस सौ तिरासिये में, पटना से कुशवाहा कुसुम के सम्पादन में त्रैमासिक ‘पुजारिन’, दिघवारा (सारन) से प्रियव्रत शास्त्री ‘प्रीतेश’ के सम्पादन में ‘भोजकंठ’ आउर पटना से शास्त्री सर्वेन्द्रपति त्रिपाठी आ रासबिहारी पाण्डेय के सम्पादन में भोजपुरी भाषा सम्मेलन पत्रिका’ के प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर दू-तीन अंक निकलत-निकलत ई तीन पत्रिका बंद हो गइलीसन। बाद में, सन् 1993 में रासबिहारी पाण्डेय देवघर से ‘भोजपुरी भाषा सम्मेलन पत्रिका’ के फेर से शुरूआत कइले आ उनका जिनिगी-भर ई पत्रिका नियमित निकलत रहल, हालाँकि एकर भाषा-नीति विवादास्पद बनल रहल।

सन् 1985 में हरविलास नारायण सिंह के सम्पादन में पटना से ‘लटर-पटर’ आ विश्वनाथ भोजपुरिया के सम्पादन में ‘दिआ’ मासिक के प्रकाशन होखे लागल, बाकिर एह पत्रिकन के उमिर कुछुए अंक ले सीमित रहल।

सन् 1986 में बरौली (गोपालगंज) से दिनेश कुमार पाण्डेय ‘दिवाकर’ के सम्पादन में मासिक ‘आरती’, ढोंढस्थान (सारन) से प्रो. वैद्यनाथ विभाकर के सम्पादन में ‘भोजपुरी भारती’ आउर अरदेवा (सारन) से रामाज्ञा प्रसाद सिंह ‘विकल’ के सम्पादन में त्रैमासिक ‘कलेवा’ के प्रकाशन शुरू भइल, बाकिर एह सब पत्रिकन के उमिर कुछ-कुछ अंक तकले रहल।

सन् 1987 में साहेबगंज (मुजफ्फरपुर) से डॉ. ब्रजभूषण मिश्र के सम्पादन में ‘कोइल’ के मासिक प्रकाशन शुरू भइल। डॉ. धीरज कुमार भट्टाचार्य के आर्थिक सहयोग से ई पत्रिका अप्रैल, 1992 तक नियमित निकलत रहल।

एह अवधि में पटना से पशुपतिनाथ सिंह के सम्पादन में भोजपुरी कलम’ नाम के पत्रिका निकलल। प्रगतिशील विचारधारा आ तेवरदार भाषा-शैली का वजह से ई पत्रिका चर्चा में रहल, बाकिर आर्थिक वजहन से एकर प्रकाशन कुछुए अंक के बाद रुक गइल। सन् 1989 में मुजफ्फरपुर से कुमार विरल के सम्पादन में ‘हिरामन’ नाम के पत्रिका के दू अंक निकलल। एकरा बन्द भइला पर कुमार विरले के सम्पादन में ‘भोजपुरी आवाज’ नाम के पत्रिका निकलल, जें एके अंक ले सीमित रह गइल।

मई 1988 में लखनऊ से ‘भोजपुरी लोक’ नाम के मासिक पत्रिका डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य के सम्पादन में निकलल आ बारह बरिस ले निरन्तर निकलत रहल। ई हिन्दी आ भोजपुरी के द्विभाषी पत्रिका रहे, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड रहत रहे। हिन्दीओ खण्ड में भोजपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति विषयक सामग्री छपत रहे।

सन् 1988 में छपरा से बैकुण्ठ नारायण के सम्पादन में ‘पाँति-पाँति’ आउर जमालपुर से अशोक ‘अश्क’ के सम्पादन में ‘बटोहिया’ के प्रकाशन शुरू भइल। ‘बटोहिया’ के कथा-अंक बहुत सफल आयोजन रहे। अनियतकालिक रूप में ‘बटोहिया’ के कुछ अंक जब-तब निकले, बाकिर, आखिरकार, ई पत्रिका बंद हो गइल। 1989 में बेतिया (पश्चिमी चम्पारण) से चतुर्भुज मिश्र के सम्पादन में ‘हालचाल’ निकलल, बाकिर दू-तीन अंक से आगे ना चल सकल।

सन् 1990 में गोरयाकोठी (सीवान) से सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ के सम्पादन में ‘बिगुल’ के प्रकाशन शुरू भइल आ बरिसन ले निकलत रहल। एकर कविता-अंक आ लघुकथा-अंक विशेष चर्चित भइले सन। श्री अक्षयवर दीक्षित पर एकर विशेषांको बहुत अच्छा निकलल। ‘बिगुल’ का प्रकाशन से सैकड़न लेखक प्रकाश में अइलन। एही साल, साहेबगंज से ‘भोजपुरी त्रैमासिक’ नाम के पत्रिका कमलेश्वर प्रसाद पाठक का सम्पादन में निकलल रहे, जवना के उमिर दू अंक ले सीमित रहल।

सन् 1991 में बक्सर से विजयानन्द तिवारी के सम्पादन में त्रैमासिक ‘जगरम’ के प्रकाशन शुरू भइल, जे काफी अरसा ले जारी रहल। एह पत्रिका के ‘खोलकदास’ शीर्षक स्थायी स्तम्भ खूब चर्चित रहल। एह पत्रिका के लोक-साहित्य अंक बहुत पुष्ट आ स्तरीय रहे।

सन् 1991 में ही, बोकारो स्टील सिटी से ‘इंगुर’ नाम के त्रैमासिक रामनारायण उपाध्याय के सम्पादन में प्रकाशित भइल रहे। ई त्रैमासिक अल्पजीवी त जरूर रहे, बाकिर जवने दू-तीन अंक निकलल, ऊ साहित्यिक दृष्टि से स्वस्थ आ पुष्ट रहे।

सन् 1992 में बक्सर से प्रभंजन भारद्वाज के सम्पादन में ‘लहार’ आ 1993 में लखनऊ से सत्येन्द्रपति त्रिपाठी के सम्पादन के भोजपुरी के बोली’ नाम के पत्रिका प्रकाशित भइली स, जे कुछ अंक निकलला का बाद बंद हो गइली सन।

सन् 1994 में बरौली (गोपालगंज) से सच्चिदानन्द श्रीवास्तव के सम्पादन में त्रैमासिक ‘बायेन’ के प्रकाशन भइल, जेकर दू गो अंक निकलल। एही साल, आशापड़री (बक्सर) से चन्द्रधर पाण्डेय ‘कमल’ के सम्पादन में ‘भोजपुरी लहर’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सात गो अंक निकलल रहे।

सन् 1995 में बीरगंज (नेपाल) से गोपाल ‘अश्क’ के सम्पादन में ‘गमक’ के प्रकाशन भइल रहे, जेकर चार-पाँच अंक निकलल रहे। एही साल, हीरालाल अमृतपुत्र, मदन प्रसाद आ जयकान्त सिंह ‘जय’ के सम्पादन में ‘उगेन’ नाम के पत्रिका के कईगो अंक निकलल रहे।

सन् 1996 में सेतु न्यास (मुम्बई) द्वारा संचालित विश्व भोजपुरी सम्मेलन, देवरिया (उत्तरप्रदेश) के त्रैमासिक पत्रिका ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के प्रकाशन डॉ. अरुणेश ‘नीरन’ के सम्पादन में शुरू भइल। सुन्दर, सुभेख आ पृथुलकाय एह विशिष्ट त्रैमासिक के सन् 2008 तक अट्ठाईस गो अंक प्रकाशित हो चुकल बा, जवना में कहानी-विशेषांक, धरोहर-विशेषांक, स्त्री-विशेषांक, कविता-विशेषांक आउर संस्मरण-विशेषांक अतिशय महत्व के बाटे। भोजपुरी भाषी क्षेत्र के हिन्दी आ संस्कृत के विद्वान आ साहित्यकार लोगन के कलम से भोजपुरी के रचना लिखवावे में एकर सम्पादक का बहुते सफलता मिलल बा, जेकरा खातिर ऊ बधाई के पात्र बाड़े।

एही साल, कॉलेज शिक्षकन के भोजपुरी संस्था ‘भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद’ का ओर से एही नाम के एगो पत्रिका डॉ. प्रभुनाथ सिंह का सम्पादन में प्रकाशित भइल रहे। बाकिर आगे एकर प्रकाशन ना हो सकल।

1997 में भगवान सिंह ‘भास्कर’ के सम्पादन में सीवान से ‘बयार’ नाम के पत्रिका निकलल रहे, जेकर छव गो अंक प्रकाशित भइल रहे।

सन् 1998 में दिल्ली से महेन्द्र प्रसाद सिंह के सम्पादन में नाटक आ रंगमंच पर केन्द्रित एगो अनियतकालिक पत्रिका ‘विभोर’ के प्रकाशन शुरू भइल, जेकर सात-आठ अंक सन् 2008 तक प्रकाशित हो चुकल बा।

सासाराम (रोहतास) से डॉ. नन्दकिशोर तिवारी के सम्पादन में ‘सुरसती’ नाम के पत्रिका सन् 1999 से ही प्रकाशित हो रहल बा। सन् 2008 तक एकर लगभग पचीस अंक प्रकाशित हो चुकल रहे। अबो जब-तब एकर अंक देखे में आवेला।

एह अवधि में निकलेवाली एगो विशिष्ठ मासिक पत्रिका रहे बलिया से प्रकाशित होखे वाली ‘भोजपुरी विकास चेतना’, जेकर सम्पादक रहले डॉ. राजेन्द्र भारती। अइसे त ई पत्रिका बरिसन पहिले शुरू भइल रहे, बाकिर तुरन्ते बंद हो गइल आ फेर कई बेर शुरू आ बन्द होत रहल। बाकिर राजेन्द्र भारती के सम्पादन में एकर निरन्तरता एगो लम्बा समय तक बनल रहे आ एकर साहित्यिक स्तरो श्लाघनीय बनल रहल।

जुलाई, 1999 से ‘कविता’ नाम के त्रैमासिक पत्रिका भोजपुरी साहित्य प्रतिष्ठान, पटना से नियमित रूप में प्रकाशित होत रहल बा, जेकर सम्पादक हवे कविवर जगन्नाथ आ सह-सम्पादक हवे भगवती प्रसाद द्विवेदी। अबतक एकर बावन गो अंक प्रकाशित हो चुकल बा। वित्त-पोषण के अभाव का चलते 52 अंक के लोकार्पण का बाद, एकर त्रैमासिक प्रकाशन बंद कर दिहल गइल बा, एह संकल्प का साथे कि एकर वार्षिक प्रकाशन कइल जाई। विविध भावबोध आ विविध शिल्प-शैली के उत्कृष्ट कवितन का अलावे कविता-विषयक लघु निबन्ध आ कविता-पुस्तकन के समीक्षा से लैस ई पत्रिका भोजपुरी कविता के उत्कर्ष के प्रति समर्पित रहल बा।

अगस्त, 2000 में सीवान से भगवान सिंह ‘भास्कर’ के सम्पादन में ‘उड़ान’ नामक पत्रिका प्रकाशित भइल रहे, मगर दू अंक से आगे ना बढ़ सकल। जनवरी-मार्च 2001 में ‘महाभोजपुर’ नाम के पत्रिका विनोद कुमार देव का सम्पादन में सज-धज से निकलल, बाकिर आगे ओकर प्रकाशन ना बढ़ सकल।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय इकाई के तत्वावधान में पटना से ‘भोजपुरी विश्व’ नाम के पत्रिका के प्रकाशन कई बरिस ले रहल बा, जेकर प्रधान सम्पादक रहले डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय आ सम्पादक बाड़े डॉ. लालबाबू तिवारी। डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय के निधन के बाद ई पत्रिका देखे में ना आइल।

जमशेदपुर से अजय कुमार ओझा के सम्पादन में ‘निर्भीक संदेश’ नामक त्रैमासिक पत्रिका सन् 2002 से प्रकाशित हो रहल बा। ई द्विमासिक पत्रिका ह, जवना में हिन्दी आ भोजपुरी के अलग-अलग खण्ड रहेला। सुरुचिसम्पन्नता आ नियमितता एह पत्रिका के विशेषता बा।

सन् 2006 से लखनऊ से ‘भोजपुरी संसार’ नामक त्रैमासिक के नियमित प्रकाशन होत रहल। श्रीमती आशा श्रीवास्तव एकर सम्पादक बाड़ी आ मनोज श्रीवास्तव एकर समन्वयक सम्पादक बाड़े। सुरुचिसम्पन्नता आउर सुन्दर गेटअप-मेकअप के ई मनोहारी पत्रिका आम लोगन में बहुत लोकप्रिय रहल बा। भोजपुरी के कुछुए पत्रिका अइसन बाड़ी सन, जवना के उत्तर भारत के विभिन्न शहरन के पत्रिका का स्टालन पर देखल जा सकेला। ‘भोजपुरी संसार’ अइसन कुछ पत्रिकन में से एगो रहे। बाकिर अब ई पत्रिका देखे में नइखे आवत।

सन् 2007 में मुजफ्फरपुर से ‘भोर’ नाम के एगो त्रैमासिक के प्रकाशन शुरू भइल, जवना के चार गो अंक निकल सकल। एह पत्रिका के प्रधान सम्पादक रहले डॉ. ब्रजभूषण मिश्र आ सम्पादक रहले डॉ. जयकान्त सिंह ‘जय’। एकरा प्रकाशन में तत्काल गतिरोध हो गइल बाकिर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर में भोजपुरी के पढ़ाई होखे का चलते एह पत्रिका में छात्रोपयोगी सामग्री के समावेश से उमेद कइल जा सकेला कि एकर प्रकाशन में आइल गतिरोध जल्दिए खतम हो जाई।

जुलाई-सितम्बर, सन् 2008 से ‘परास’ नाम के एगो त्रैमासिक के प्रकाशन तेनुघाट (झारखण्ड) से होत रहल। निबन्ध, कहानी, कविता आदि सब विधन से लैस एह पत्रिका के सम्पादक बाड़े डॉ. आसिफ रोहतासवी। एकर स्तरीय प्रकाशन जारी बा, जेकर श्रेय एकरा सम्पादक के बा।

एह पत्र-पत्रिकन का अलावे, भोजपुरी के सम्मेलनन के अवसर पर प्रकाशित स्मारिको सभन अनियतकालिक पत्रिकन खानी बढ़िया सामग्री पाठकन खातिर परोसत रहल बाड़ी सन।

हिन्दी के दैनिक पत्र ‘आज’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘राँची एक्सप्रेस’, ‘नवभारत’, ‘प्रभात खबर’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘जनसत्ता’, ‘दैनिक जागरण’, ‘भोजपुरी फोरम’ जइसन अखबार समय-समय पर भा धारावाहिक रूप से भोजपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति विषयक ज्ञानवर्धक आ रोचक सामग्री परोस के भोजपुरी के पत्रकारिता के आ भोजपुरी के साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्कर्ष के प्रोत्साहित कइले बाड़े स। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के बिलासपुर (मध्यप्रदेश) में आयोजित आठवाँ अधिवेशन के अवसर पर ‘बिलासपुर टाइम्स’ नामक दैनिक पत्र आपन विशेषांक त निकललहीं रहे, पूरा-के-पूरा विशेषांक भोजपुरिए- भाषा में निकलले रहे।

एह पत्र-पत्रिकन के अलावा नवंबर, 2008 से श्री विनोद कुमार तिवारी के संपादन में जमशेदपुर से मासिक समाचार-पत्रिका ‘गाँव-घर’ के प्रकाशन हो रहल बा। एगो आउर नया तिमाही ‘भोजपुरिया अमन’ के भी प्रकाशन उहें से होत रहल, बाकिर अब ओकर अंक देखे में नइखे आवत।

भोजपुरी पत्रकारिता के विवेचन से एक बात साफ बा कि भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन में साहित्यिके सामग्री प्रस्तुत करे पर विशेष ध्यान दिहल जात रहल बा। साहित्येतर समाचार, सूचना, रपट आदि के समावेश भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन में कमे होत रहल बा। कुछेक समाचारप्रधान पत्रिका निकललो बा, त ओह में भोजपुरी के साहित्यिके प्रगति भा गतिविधि के स्थान मिलल बा। देश-दुनिया के साहित्येतर खबरन के समावेश इन्हनी में ना के बराबर होत रहल बा।

बाकिर, एह अभाव के पूर्ति का दिसाईं एगो अत्यन्त महत्वपूर्ण डेग एही साल 2008 में अरिन्दम चौधरी उठवले बाड़े ‘द संडे इंडियन’ के भोजपुरी संस्करण प्रकाशित कइके। ई समाचार-साप्ताहिक पत्रिका अंग्रेजी, हिन्दी, उर्द, बंगला, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयानम, गुजराती, मराठी, असमिया, उड़िया आ पंजाबी का साथे-साथे भोजपुरिओ में प्रकाशित होखे लागल बा। ‘द संडे इंडियन’ जइसन समाचार-साप्ताहिक के भोजपुरीसंस्करण प्रकाशित करके भारत के संविधान-स्वीकृत भाषा सभन का पाँत में भोजपुरी के प्रकारान्तर से प्रतिष्ठित करेके जे महत्कार्य कइल गइल बा, ओकरा खातिर भोजपुरीभाषी जनता सदैव आभारी रही। उमेद कइल जा सकेला कि एह से प्रेरणा पाके भोजपुरी में कुछ समाचार-साप्ताहिक आउरो प्रकाशित होइहेंसन। भोजपुरी में कवनो दैनिको समाचार पत्र प्रकाशित होखे, एकर कल्पना त आउरो सुख देबेवाला बा।

(सभारलेखाञ्जलिसे )


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Hum BhojpuriaOctober 12, 20211min1430

आकृति विज्ञा अर्पण

जब भारत क सुराज क सपना अकुलाहट के संघरी जन जवार के बीचे एठो आंदोलन के रूप में आइल त अंग्रेजन के भी भीतर मने बुझाइये गइल रहे कि अब दाल ढेर दिन ना गली।

ओह बेरी पूरे भारत में अलग अलग नायक लोग उभरत रहो ताकि माटी के पूतन के एक जोड़े सुराज क नींव रखास आ गुलामी क दिन बीतस।

मेहरारु स चाकी जाता चरखा सब पे सुराजी गीत गावे जां, सुराजी गीत कहीं त ऊ गीत जवना में सुराज क सपना, सुराज क मरम और सुराज बदे लड़ाई क चरचा होखस।

सुनीले कि तर तीज मेहरारु स चूड़ी बिंदी कीनल,सजल संवरल छोड़-छोड़ के लइका मरद सब के खिआवे पीयावे में लगली ताकि जुद्ध करेके पड़ो त तइयारी कम न पड़ो।

अगर केहूं क नाम लेब आ केहूं छूटी त अपना के अंखरी एही से एह बतकही में ओह कथवन क चर्चा रख रहल बानी जवन सुराजी भाव जगावत मेहरारु स के तप जोग सामने रखी,मन भीजि जाला आ माथा सम्मान में झुकि जाला कि अस अस महतारी एह सुराजी धेय में लगल रहली स।

गोरखपुर में वनसप्ति जंगल लगे मेहरारू स बिटुरके दुपहर बाद सुराजी गीत गांवे आ जेल में बंद कैदी लोगन खातिर थईली सीअत रहें। मेहरारू स क ई गतिविधिन क भनक जब अंग्रेजन के लगल त ऊ लोग अपना मुलाजिम से सनेसा भेजवा क मेहरारुन क इकट्ठा होखला पर रोक लगा देहलस। ओकरे बाद भी ई लो चुप्पे से इकट्ठा होत रहें।  अंग्रेजन क शक भइल त ऊ सब खुदे देखे पहुंचलन। ओ कुल क गोल गुजरत देखि के मेहरारू स गोल ही घेर लेहली आ लगली गीत गावे। अंग्रेज स बूझि न पावस त ऊ लोग अपना चतुरबुद्धि से बइठा क पहिले बगले में एठो ऊंचहा जगही के लगली पूजे आ बगली के (थोड़े दूर) पंडिजी के कोठरी से पिसान आ महीया मिला के गुलगुला बनावे लगली आ लगली पिंडी पे चढ़ावे। अंग्रेज स एके कौनो पूजा समझलें। मेहरारु सब ओहू सन के ख़ूब गुलगुला खिअवली। ओह गुलगुला बनावत बेरी  में मुंशीआइन एक ठो जड़ी पिसि के मिला देहली। अंग्रेज सबके गुलगुला नीक त लागल बाकि ओही बाद ऊ लोग बेहोश हो गइलन आ ओकरे बाद मेहरारु स हाथ गोड़ बान्हि के कप्तान के घरे ले गइली। बादे  में कप्तान ओ लोग क बटुर के गीत गवनई क मांग मान लेहलन।

उहां  मेहरारु बाद में गांव गांव बटोरे लगली और ओह में कलकत्ता क एठो बैद जी क मेहरारु सबके भाला चलावल भी सीखावे लगली। बगलिये के एठो मुखबिरी के कारण मेहरारुन क गोल टूट गइल  बाकि उहां से बहुत सूत कताईल, बहुत चानी के सिक्का मेहरारु स सुराजी बैठकी क खरचा बदे देहली, जहां सेनानी लोग आपन योजना गढ़े।

रहिह कुआंर ए ननदि रनिया

करिह बीआह जो त जनिह सपूतवा

सुराज के निछार ए ननदि रनिया

एक पूत भेजिके दूसरा तू पोसिह

ऊहो रही तईयार ए ननदि रनिया………

जब ई गीत हम बचपन में रहरी क दाल दरात बेरी सुनि के गाईं त मन भीजी जात रहे कि अस त्याग तप से ई आपन धरती नसीब बा त एहके खातिर हमें भी करतब निबाहे के बा जवना बदे हम तैयार बानी।

न जाने केतना केतना कहानी स घरे घरे से जुड़ल होईहें जे लोग भारत के स्वाधीनता बदे खानदान खानदान मिट गइलन। धन्य बानी हमनी जां कि ई धरती आपन धरती ह।

जय भारत माई,वंदे मातरम्……..


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1680

लेखक- मनोज भावुक

1857 के क्रांति के बारे में सभे पढ़ले बा, सुनले बा, जनले बा। अंग्रेज आ ओकनी से प्रभावित अधिकतर इतिहासकार एह महान क्रांति के सैनिक विद्रोह के नाम दे के भुलवावे के कोशिश कइलें बाकिर भारत के लोग एकरा के पहिला स्वतंत्रता संग्राम कहल। एह संग्राम में अइसे त एक से एक लड़ाका लोग रहे बाकिर एगो योद्धा जे अपना बुढ़ापा में भी जवान लेखां लड़ल आ अंतिम सांस तक अंग्रेजन के ग़ुलामी ना मनलस, ओकरा जीवन के आखिरी लड़ाई के जीत के उपलक्ष्य में 23 अप्रैल के विजय दिवस के रूप में मनावल जाला। ओह योद्धा के नाम रहे वीर बांकुड़ा बाबू कुँवर सिंह। कुँवर बाबू 23 तारीख के अपना कटल हाथ पर पट्टी बान्ह के युद्द मैदान में कूद गइलें, 80 बरिस के बूढ़ शरीर रहे बाकिर जोश अइसन कि अंग्रेज के एगो जाँबाज कर्नल ली ग्रांड के सेना समेत भुजरी-भुजरी काट देहलें आ जगदीशपुर के अपना कब्जा में कर के आजाद करा देहलें। कुँवर बाबू के वीरता के इतिहासकार अनदेखी कइलें, लोग उनके भुला देहलस। बाकिर, उनके शौर्य गाथा के सुनला के बाद रोआँ रोआँ फड़फड़ा जाला आ यकीन हो जाला कि उनके समकालीन आ उनका से कई बार आमना सामना के युद्ध करे वाला एगो अंग्रेज अफसर डगलस उनका बारे में साँचे लिखले बा कि “कुँवर अगर जवान होता तो उसने कब का अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ दिया होता”।

कंपनी सरकार भारत व्यापार करे के बहाने आइल आ इहाँ अधिकार जमा लेहलस। देश के अधिकतर रियासत अंग्रेजी हुकूमत के अधीन रहे बाकिर कुछ रियासत अइसन भी रहे जवन अंग्रेजन के लगान देव बाकिर अपना मर्जी से राज पाट चलावे आ बाहरी हस्तक्षेप कम होखे देव। अइसने एगो रियासत रहे जगदीशपुर। जगदीशपुर के एगो जमींदार रहलें साहिबज़ादा सिंह आ उनके चार गो बेटा रहलें, कुँवर सिंह, दयाल सिंह, राजपति सिंह, अमर सिंह। साहिबज़ादा सिंह के चाचा आ चचेरा भाई लोग उनसे जगदीशपुर धोखाधड़ी से हड़प लेले रहे जवन उ बाद में अदालती लड़ाई लड़ के हासिल कइलें। ई सब घटना ह 18वीं शताब्दी के सातवाँ दशक से लेके 19वीं शताब्दी के पहिला दशक के बीच के। साहिबज़ादा सिंह के जब जगदीशपुर मिलल त उ कर्जा में नाक तक डूबल रहे। उ कर्जा भरे खातिर खूब कोशिश कइलें बाकिर ना भर पवलें। उनका मृत्यु के बाद सन 1826 ईसवी में जगदीशपुर के हुकूमत उनके सबसे बड़ बेटा कुँवर सिंह के मिलल आ फेर जगदीशपुर के भाग्य चमकल।

कुँवर सिंह व्यवहार कुशल रहलें, मृदुभाषी रहलें अउरी बहादुर रहलें जेकरा चलते अंग्रेज अफसर उनके मुरीद रहलें आ ओकर फायदा उनके ई मिलल कि कुँवर सिंह के राज के शुरुआती समय में अंग्रेज जगदीशपुर के आंतरिक मामला में कम दखल देहलsसन। पटना के कमिश्नर विलियम टेलर के साथे त उनके मित्रता भी चलल। कुँवर बाबू बड़ा परोपकारी रहलें। उ अपना जीवन में एतना दान पुण्य कइलें, सदाव्रत चलवलें कि उनके रियासत के लोग हमेशा कुँवर सिंह के आपन प्यार आ समर्थन देहलस। उनके शासन बेवस्था एह बेरा के लोकतांत्रिक शासन के जइसन रहे। सभके समान अधिकार रहे, सभके बोले के आजादी रहे, सभे खुश आ संतुष्ट रहे। कुँवर के राज से पहिले जगदीशपुर के दिन-दशा बड़ा खराब रहे, रियासत पर लगभग 18 लाख के कर्ज लदाइल रहे, सालाना मालगुजारी से कमाई होखे 6 लाख रुपया के आस पास। कुँवर अइलें, नहर तालाब, बांध के निर्माण करवलें, कृषि के सुधार भइल, लोग में जगदीशपुर के विकास खातिर उम्मीद जागल, जंगल बसावल गइल, सड़क बनल, पाठशाला बनल, पढ़ाई-लिखाई में लोग होशियार होखे लागल आ मेन बात कि अंग्रेजन के हस्तक्षेप कम रहे, एह के परिणति ई भइल कि उहे जगदीशपुर जवन बेहाली में रहे, तरक्की के राहे चले लागल। सालाना मालगुजारी से कमाई सीधे 8-9 लाख के लगे पहुँच गइल आ आज से दू-सवा दू सौ बरिस पहिले एकर मोल अरबों में रहे।

कुँवर सिंह के लोकप्रियता अइसन कि आस पास के जमींदार जरे लगलें, अंग्रेज उल्टा उनके सलामी दागे लगलें। ओह बेरा कंपनी सरकार के अत्याचार चरम सीमा पर रहे, देश भर में विद्रोह के आगि सुनुगत रहे। कुँवर बाबू भी विद्रोहियन के संपर्क में रहलें, 1845 में सोनपुर मेला में एगो बड़हन गुप्त बैठक भी कइले रहलें। जब विद्रोह के आग धीरे-धीरे उपरियाइल त ओकर गर्मी अंग्रेजन तक पहुंचल, ओकनी का चिहुंक गइलन सन। ओहू ओर से तैयारी होखे लागल। जब दक्षिण के दक्कन से लेके उत्तर के दिल्ली, पच्छिम के मराठा से लेके पुरुब के सभ क्रांतिकारी राजा, महाराज, जमींदार, देशी सैनिक में गँठजोड़ भइल कि सुराज पा लेबे के बा त एगो दिन तय भइल। 1 जून 1858 के पूरा देश में अंग्रेजन के खिलाफ जंग होई आ ओकनी के कहीं बाहर से मदद ना लेबे दिहल जाई, सभके एही भारत भूमि में गाड़ दिआई। बाकिर एगो घटना 1857 में बैरकपुर छावनी में घटल। सूअर आ गाय के चर्बी से बनल कारतूस के विरोध में मंगल पांडे नाम के सैनिक के अगुआई में ब्रिटिश आर्मी के देसी पटलन गोरन पर गोली चला देहलस। विद्रोह के ई चिंगारी रहे जवन आग बनल जब मंगल पांडे के फांसी दिआ गइल आ फेर एकाएक चारों ओर क्रान्तिकारियन के मारल जाए लागल।

एने कुँवर बाबू भी तैयारी में रहलन। उ एगो दूरदर्शी सोच के जमींदार रहन। भले उनका लगे छोट रियासत रहे बाकिर उ आपन सेना के गठन कइलें, सेना के ट्रेनिंग खातिर बाहर से ट्रेनर मंगवलें, हथियार के गुपचुप निर्माण खातिर कारखाना बनवलें। दानापुर छावनी में भी विद्रोह भइल आ 25 जुलाई 1857 के तीन गो बटालियन 7वीं, 8वीं अउरी 40वीं बटालियन कुँवर सिंह से मिल गइल। कुँवर सिंह के आपन लड़ाका दल रहबे कइल, बाकी जगदीशपुर रियासत के किसान, मजदूर, सवर्ण जाति के लोग सभ उनसे मिल गइल आ उनके लगभग 5000-8000 के संख्या में सेना बल हो गइल। कुँवर बाबू के नेतृत्व में आरा पर चढ़ाई भइल आ जेलखाना, खजाना, कलक्टर ऑफिस आ थाना सभ पर कब्जा हो गइल। उहाँ के सगरो अंग्रेज अफसर जाके बॉयल हाउस (आरा हाउस) में लुका गइलें आ 6-7 दिन से बंद रहलें। ई कुँवर सिंह के जंग में पहिला लड़ाई रहे। ओकरा बाद कुँवर सिंह डनबर के हरवलें। बाकिर हथियारन के कमी अउरी अत्याधुनिक तोप आ बंदूक के सामने उनकर सेना तितर-बितर हो गइल अउरी एगो अंग्रेज कमांडर विन्सेंट आयर से हार गइलें आ आपन युद्ध रणनीति बदल देहलें। उ बाकी क्रान्तिकारियन से मिले आ अंग्रेजन के खिलाफ लड़ाई करे खातिर दोसरा रास्ता चल देहलें।

2 अगस्त के बाद कुँवर सिंह के अपना सेना के साथे जवन मार्च निकलल त सासाराम, रॉबर्ट्सगंज, रीवा, कलिंजर, बांदा, काल्पी होत कानपुर, लखनऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, बलिया, अतरवलिया होत फेर 21 अप्रैल के जगदीशपुर लवटल। एह बीच कुँवर सिंह लगभग 20 गो से अधिका अंग्रेज कमांडर, योद्धा आ अफसरन के नाक से चना चबववलें, कईगो के मउगत के घाट उतरलें, कईगो के जीवन दान देहलें। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अइसन कवनो बीर बलवान ना भइल जे 80 बरिस के उमिर में 9 महीना के लमहर संग्राम-यात्रा पर निकलल होखे आ एतना क्रांति के आग सभमें भड़कवले होखे। उ अइसन समय रहे कि बड़ बड़ लड़ाका लोग खाली अपने किला आ रियासत खातिर लड़ल। बाकिर एगो भोजपुरिया योद्धा जहां गइल ओकरा खातिर लड़ल। एह क्रम में उनका आँखी के सामने आपन पोता, बेटा, मित्र के जान गइल बाकिर उ लड़त रहलें एह भारत के माटी खातिर, अंग्रेजन के जुल्म मिटावे खातिर। एह लड़ाई में आरा के मशहूर नर्तकी धर्मन बाई भी उनका साथे रहली। कुँवर आ धर्मन के केमेस्ट्री अलग से फेर कबो।

21 अप्रैल के गंगा नदी पार करत बेरा डगलस नाम के एगो अंग्रेज सेना अफसर उनके दाहिना बांह में गोली मार देहलस। कुँवर बाबू बिना हिचक के उ बाँहिए काट के गंगा मइया में दहवा देहले। अगिला दिने उनके घाव पर मरहम पट्टी भइल। तले एगो स्थानीय अंग्रेज अफसर ली ग्रांड के जगदीशपुर पर चढ़ाई करे के खबर आइल। ई घायल बूढ़ शेर फेर दहड़लस आ 23 अप्रैल के अपना प्रिय भाई अमर सिंह, सेनापति हरीकिशन सिंह आ कुछ और योद्धा के लेके ली ग्रांड के मटिया मेट क देहलें। ई उनकर आखिरी लड़ाई रहे, ओह दिन ब्रिटिश झण्डा यूनियन जैक उतरल, परमार वंश के झण्डा लहराइल आ अमर सिंह नया जमींदार बनलें अउरी उनके लइका उत्तराधिकारी। कुँवर बाबू के कटल हाथ के घाव में संक्रमण बढ़ल, बूढ़ शरीर रहे, उनके तबीयत बिगड़े लागल आ ऊ 26 अप्रैल के स्वर्ग के अनंत यात्रा पर चल गइलें। बाकिर, आपन प्रण निभा गइलें कि ना अंग्रेजन के गुलामी स्वीकार करब ना ओकनी के हाथे मरब। बारम्बार नमन बा माँ भारती के सच्चा सपूत वीर बाँकुड़ा कुँवर सिंह के।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2420

विश्वजीत शेखर

देश के आज़ादी के पचहत्तर बरीस पूरा होखे वाला बा आ सरकार का ओर से ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ नाँव से एगो कार्यक्रम चल रहल बा। एह कार्यक्रम में इतिहास में विस्मृत आज़ादी के नायक-महानायक लोग के भी चिन्हित क के उचित सम्मान देहला के योजना बा। ए कार्यक्रम के नज़र से अगर हमनी का पूर्वी उत्तर प्रदेश आ पश्चिमी बिहार के इतिहास के देखल जाव त अठारहवीं सदी के सारण्य क्षेत्र के राजा आ राजतमकुही के संस्थापक महाराजा फ़तेह बहादुर शाही के संघर्ष गाथा बहुत प्रासंगिक लागी।

महाराजा फ़तेह बहादुर शाही के राजधानी हुस्सेपुर रहे जवन ए बेरा के गोपालगंज जिला में भोरे प्रखंड के लगे पड़ेला। इनका राज्य के चौहद्दी ए बेरा के गोपालगंज, सारण (छपरा), सिवान आ कुशीनगर जनपद में रहे। राजा साहेब के शासन काल में ए बेरा के बिहार राज्य सूबा-ए-बंगाल के हिस्सा रहे जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र सूबा-ए-अवध के अंतर्गत स्थापित रहे। महाराजा फतेह बहादुर साही द्वारा बंगाल क्षेत्र के मालगुज़ारी पटना स्थित बंगाल नवाब के कार्यालय में जबकि अवध क्षेत्र के मालगुज़ारी गोरखपुर स्थित नवाब अवध के कार्यालय में जमा करावल जाव।

बक्सर के लड़ाई में कंपनी सरकार से अवध आ बंगाल के सम्मिलित हार के बाद भइल सन 1765 ईसवी के इलाहाबाद संधि के अनुसार बंगाल क्षेत्र पर कंपनी सरकार के हुकूमत कायम हो गइल आ एइजा के मालगुज़ारी के मालिकान हक़ कंपनी सरकार के मिल गइल। महाराज फतेह बहादुर साही गजब के वीर आ स्वातंत्र्यचेता पुरुष रहनी। उहाँ के कवनो विदेशी शक्ति के मालगुज़ारी दिहल उचित ना लागल आ उहाके सन 1765 में कंपनी सरकार से विद्रोह क देहनी। महाराजा फ़तेह साही के विद्रोह ईस्ट इण्डिया कंपनी के सत्ता स्थापित होखे के बाद कइल पहिला विद्रोह रहे। अक्षयवर दीक्षित जी सहित अनेक विद्वान लोग फतेह साही के स्वतंत्रता संग्राम के पहिला नायक के रूप में वर्णित कइले बा।

जयचंद आ मीर जाफ़र से भरल भारत के इतिहास में हर स्वतंत्रता प्रेमी के अपना विद्रोह के कीमत चुकावे के पड़ल बा। महाराजा फ़तेह साही अंग्रेजन से मिलके राज चलावे के स्थान पर उनसे लोहा लेबे के ठान लिहलीं। अंग्रेज जब कवनो कीमत पर उहाँ के राज्य में मालगुज़ारी ना वसूल पवलें सन तब ऊ राजधानी हुस्सेपुर के तबाह कर दिहले सन। अवध पर कंपनी हुकूमत के अधिकार ना रहे, एकर लाभ उठाके राजा साहब अपना राज्य क्षेत्र के अवध वाला हिस्सा में झरही नदी के किनारे, बाकजोगनी जंगल में (वर्तमान तमकुही, कुशीनगर) आपन कैंप लगवलीं आ गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से कंपनी हुकूमत से लड़े लगलीं। राजा साहब सन 1790 के आसपास तमकुही के राजधानी बना के राज तमकुही के स्थापना कइलीं जवन वर्तमान में एगो नगर पंचायत, विकास खंड अउर तहसील मुख्यालय बा।

महाराजा फ़तेह शाही जी कंपनी हुकूमत के खिलाफ 23 बरिस तक लगातार संघर्ष कइलीं जेकरा चलते उहाँ का जियते कम्पनी सरकार तमकुहीराज का क्षेत्र में कर वसूली ना करे पाइल। अंगरेज अपना पत्र अउरी गजट में लिखले बाड़े सन कि “बाजीराव पेशवा जेतना परेशान हमनी के सिपाहिन के ना कइलन, ओसे कई गुना अधिका फतेह बहादुर शाही कर दिहलन। प्रसिद्ध विद्वान महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी फतेह शाही के महाराणा प्रताप के समकक्ष योद्धा लिखले बानी। ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ कार्यक्रम के माध्यम से महाराजा फ़तेह बहादुर शाही के चिन्हित कs के यथोचित सम्मान दिहल, इहाँ के गौरवशाली इतिहास अउरी महाराजा के संघर्ष के जन मानस में स्थापित करे के एगो सशक्त कदम होई जेसे आवे वाली पीढ़ी स्वतंत्रता के ए महानायक के जीवन से प्रेरणा ले सकी।

परिचय : विश्वजीत शेखर राय के मूल निवास कुशीनगर जनपद के सलेमगढ़ ग्राम ह। हैदराबाद में एगो बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी में कार्यरत बानी। भोजपुरी भाषा आ साहित्य में रूचि के कारण तमकुही समाचार इ पत्रिका के संपादक बानी। 


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1030

भगवती प्रसाद द्विवेदी

महल के कंगूरा त अनसोहातो सभकरा के लोभावेला, बाकिर नेंव में दबल ईंटा के ना त केहू कीमत बूझेला, ना ओने निगाहे धउरावे के जरुरत महसूस करेला। इहां ले कि कंगूरो के एह तथ के एहसास ना होला कि नेंव के ईंटे के बदउलत ओकर माथ गरब से उठल बा। देश के आजादी के लड़ाई में जे आपन तन-मन-धन, सउंसे जिनगी हंसते-हंसत निछावर कर दिहल आ आखिरी दम ले गोरन के दमन-चक्र के खिलाफ जमिके लोहा लिहल, ओकरा के आजु  हमनीं के कतना जानेलीं जा! हालांकि ओह लोगन के ई मनसो ना रहे कि लोग ईयाद रखो, बाकिर हमनिओं के त कुछु फरज बने के चाहीं। चंपारण के गान्हीं पं.राजकुमार सुकुल नेंव के ओइसने ईंटा रहलन, जेकर लगातार उपेक्षे होत आइल बा। निलहा गोरन के अमानवी अनेति-अतियाचार ना खाली ऊ अपना आंखी देखलन, बलुक खुद ओकर भुक्तभोगियो रहलन। उन्हुके पहल कदमी से गान्हीं जी आ सउंसे  देश के धियान एह अमानवीयता के ओर गइल अउर तब ओह आन्दोलन के लुत्ती दुनिया-जहान में जंगल के आगी जइसन फइलल। इहे कारण बा कि अहिंसक आन्दोलन के ओह पहिलका प्रेरणास्रोत के केहू ‘चंपारण के गान्हीं’ कहेला, केहू ‘सतवरिया के संत’ संबोधित करेला, त केहू बिहार के अख्यात गान्हीं कहेला। उन्हुकरे भागीरथ प्रयास के परिणाम रहे कि गान्ही जी ना सिरिफ पहिलका बेर बिहार आ चंपारण के धरती पर अइनी बलुक उहवां अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन के अगुवाई क के शोषित किसान-मजूरन के ऐतिहासिक जीतो दियववनी। एह दिसाई लोकनायक जयप्रकाश नारायण के कहनाम रहे-‘स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में श्री राजकुमार शुक्ल का नाम अमिट रहेगा, क्योंकि इन्हीं के द्वारा गांधी जी को चंपारण में निलहे गोरों के अत्याचारों की कहानी मालूम हुई और उन्होंने चंपारण पहुंचकर सत्याग्रह छेड़ने का निश्चय किया। चंपारण सत्याग्रह गांधी जी की अहिंसक लड़ाई का पहला अध्याय राजकुमार शुक्ल की प्रेरणा से शुरू हुआ।’

चंपारण में निलहा साहेबन के दइती अनेत के पराकाष्ठा। नील के खेती करे खातिर अलचार छोड़ सभे छोट-बड़ किसान- रैयत गाहे-बगाहे किसिम-किसिम के ‘कर’ के भरपाई के भार, इचिकियों चूं-चपड़ कइला, मुंह खोलला भा अलचारी जाहिर कइला पर कठोर सजा। नील के खेती ना सिरिफ ओह उपजाऊ जमीन खातिर, बलुक सउंसे मनुजातो खातिर सराप रहे। तबे नू एह भावभूईं पर मंचित नाटक ‘नील दर्पण’ देखते ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी अगिया बैताल हो गइल रहलन आ निलहा गोरा बनल कलाकारे के जूता से पिटाई कइले रहलन।

आगा चलिके राजकुमार सुकुल जब 1916 में 26-30 दिसंबर के आयोजित लखनऊ कांग्रेस में उहां के दुरदसा आ उत्पीड़न के दारुण दास्तान सुनवले रहलन, त शर्म-शर्म के आवाज गूंजि उठल रहे आ पहिला बेर राष्ट्रीय मंच पर ई ममिला रोशनी में आइल रहे। निलहन के आतंक के करुण कहानी पं. राजकुमार सुकुल के भाषन के जबानी-‘चंपारण के निलहों और रैयतों के बीच संबंध बहुत दिनों से सौहार्द्रपूर्ण नहीं रहा है। निलहे पहले तो रामनगर और बेतियाराज से जमीनों के ठेके प्राप्त करते है और नील की खेती आरंभ करते है। अनुबंध की शर्तों के अनुसार, किसान के प्रत्येक बीघा में तीन कट्ठा जमीन रैयतों द्वारा नील की खेती के लिए अलग कर दी जाती है, लेकिन निलहे ये शर्तें पूरी करने पर भी संतुष्ठ नहीं है। निरीह रैयतों को अपने खेतों में बेगार करवाने के लिए मजबूर करते है और जब कभी रैयत किसी कारणवश उनके किसी हुक्म का पालन नहीं कर पाते है, तो वे उनकी प्रताड़नाओं के शिकार होते है। निलहे इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि खुद ही दीवानी और फौजदारी मुकदमों के फैसलें करते है तथा जिस तरह चाहते है, गरीब रैयतों को दंडित करते है। इस बात की जांच करने के लिए सरकार को कई बार अनुरोध किया गया, लेकिन बहुत दिनों तक हमारी कोशिशे बेकार साबित हुई। निलहों के अत्याचार के कारण 1908 ई. में बहुत बड़ी अशांति हुई। बंगाल सरकार ने इस बात की जांच करने के लिए एक अधिकारी को प्रतियुक्त किया, लेकिन इस जांच का परिणाम सार्वजनिक नहीं किया गया है और सैंकड़ों की संख्या में गरीब रैयतों को जेल भेज दिया गया है। मैं चंपारण का एक रैयत हूं। मैं नहीं जानता कि जब मैं चंपारण वापस जाउंगा तो यहां आने तथा आप सबों को यह सुनाने के कारण मुझे क्या-क्या भुगतना पड़ेगा….(‘शर्म-शर्म’ के आवाज)।’

पच्छिमी चंपारण के जिला मुख्यालय बेतिया। उहां से दस बारह किलोमीटर उत्तर-पच्छिमी दिशा में मौजूद बा सतवरिया गांव। पांच हजार के आबादी वाली बस्ती। नजदीक के रेलवे स्टेशन चनपटिया। ओही सतवरिया गांव के ब्रह्मभट्ट साधारण किसान कोलाहल सुकुल के एकलउत पूत का रुप में 23 अगस्त,1875 के राजकुमार सुकुल के जन्म भइल रहे। कबों ऊ गिरहत्त परिवार धनी-मनी आ खुशहाल मानल जात रहे, जब बीस गो बैल, तीस-पैंतीस गो गाय आ सैकड़न भइंस दुआर के शोभा बढ़ावत रहली स, बाकिर निलहा सभ कुछु तहस-नहस कर के धर देले रहलन स।

होस सम्हारते राजकुमार निलहा गोरन के बर्बरता अपना खुलल आंखि से देखले रहलन आ भीतरे-भीतरे उन्हुका बालमन में बगावत के लुत्ती ज्वालामुखी बनिके दहके लागल रहे। आभाव में इस्कूली पढ़ाई कायदा से ना हो पावल। बस जइसे-तइसे लिखे-पढ़े भर के ज्ञान हासिल भइल। ब्रह्मभट्ट के कारण जजमनिको ना अपना सकत रहलन। एह से एगो मामूली किसान बनल नियति रहे।

गोर रंग, दुबर-पातर काया, मझिला कद-काठी। रुखल-सूखल बार। गाढ़ा के अंगरखा, ठेहुन ले सस्ता धोती आ कान्ह पर अंगवछा। आगा चलिके माथे पर टोपियो सोभे लागल। कुल्हि मिलाके एगो ठेठ गंवई के सूरत रहे सुकुल जी के, जेकरा टूटल-फूटल हिन्दी आ भोजपुरी के अलावा अउर कवनो भाषा ना आवत रहे।

सुकुल जी ना चहलो पर अपना पनरह फीसदी उपजाऊ जमीन प नील के खेती करे आ मनमाना ढंग से लदाइल सिंचाई, बपही-पुतही, बेंटमाफी, मड़वच, कोल्हुआवन, चुल्हियावन बेचाई फगुअही, दशहरी, अमही, कटहरी, दस्तूरी, हिसाबान, तहरीर, महापात्री नियत अनिगत कर भरे खातिर अलचार रहलन। मजबूर रैयत किसान सुकुल जी बेलवा कोठी के अधीन मुरली भरहवा में खेती करत रहलन। कोठी के मैनेजर मिस्टर ऐमन बड़ा सख्त आ क्रूर अंगरेज अफसर रहे। ओह घरी घर आ कोला के जमीन पर लगान ना लागत रहे। सुकुल जी खूब मेहनत-मशकत्त करके तैयार कइले, त मि. ऐमन के कारिन्दा के हुकुम दे दिलहन स।

‘ई त सरासर नाइंसाफी बा। जब कोला के जमीन लगान- मुक्त बा, त अइसन आदेश काहें?’ सुकुल जी हाथ जोडि़के पुछलन।

‘यह मेरा हुक्म है!’ मिस्टर ऐमन उहां पहुंचिके फरमान जारी कइलस, ‘अगर ऐसे नहीं मानता, तो इसके घर के सारे सामान नष्ट कर दो और झोपड़ी में आग लगा दो’।

सुकुल जी गलत आदेश माने खातिर कतई तइयार ना रहलन। फेरु त उन्हुका आंखिए के सोझा सभ कुछु तहस-नहस कर

दिहल गइल। पलानी के आगी त कुछु देर बाद बुता गइल रहे, बाकिर उन्हुका भीतर आक्रोश आ नफरत के आग लगातार धू-धू कर जरते गइल रहे। ओइसे त सुकुल जी के लरिकाइएं में बतावल गइल रहे कि ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए गोरन के अतियाचार 1600 ई. से चंपारण में बदस्तूर जारी रहे आ उनइसवीं सादी के पहिलहीं से उहां के रैयतन के माली हालत लगातार खस्ता होत चलि गइल रहे, बाकिर मैनेजर ऐमन के ओकरा कारिन्दन के कारगुजारी त उन्हुका के हिला के राखि देले रहे। उन्हुका आंतर में अंगरेजन के खिलाफ विदरोह के चिनगारी के बिया बोआ गइल रहे।

फेरु का रहे! सुकुल जी ‘जो घर जारे आपनो, चले हमारे साथ’ के ऐलान करत रैयत किसान-मजूरन के संगठित करे के अभियान शुरू कर दिलहन। निलहा गोरन के अमानुषिक अतियाचार-अनेति के जरी-सोरी उखाडि़ फेंकल उन्हुका जिनिगी के मकसद बनि गइल रहे। बाकिर ऐमन के एह बात के भनक मिलि गइल रहे आ ऊ खिसिया के राजकुमार सुकुल पर एगो झूठ मुकदमा दायर करके तीन महीना के जेहल के सजा दियवा दिहलस। बाकिर जेहल से राजकुमार चट्टान नियर मजबूत-दीढ़ होके बहरी निकललन। ‘याचना नहीं, अब रण होगा’ के दीढ़ संकल्प कर के।

ऊ हजारन किसानन के संगठित कइलन। अगुवाई में आपन दूगो इयार शेख गुलाब, शीतल राय के संघतिया बनवलन। एह सांगठनिक विदरोह के विस्फोट तब भइल, जब 1911 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम नेपाल में शिकार के लुत्फ उठवला के बाद नरकटियागंज पहुंचलन। उहंवा पनरह-बीस हजार किसान उन्हुका के घेरि के दरद भरल दास्तान सुनवलन आ खुलेआम विरोध के ऐलान कइलन। जनजागरण अभियान में तेजी आवे लागल। अप्रैल,1915 में जब बिहार सूबा के राजनीतिक सम्मेलन छपरा शहर में आयोजित भइल, त राजकुमार सुकुल  उहवां चंपारण के किसानन के बदहाली आ व्यथा-कथा सुनाके सभका के मरमाहत कर दिलहन।

9 जनवरी,1915 के दक्खिन अफ्रीका से रंगभेद के खिलाफ सत्याग्रह कर के जब मोहनदास करमचंद गान्हीं भारत लवटलन, त लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन ले उन्हुका चंपारण के जनता पर निलहन के दमनचक्र के जानकारियों ना रहे। सुकुल जी अपना भाषन में ऊ हिरदय बिदारक दास्तान सुनवले रहलन, जवना पर ‘शर्म-शर्म’ के आवाज गूंजल रहे। ऊ बेरि-बेरि गान्हीं जी के धियान खींचल चहलन आ गिड़गिड़ा के एक हाली अपना आंख किसानन के दयनीय दसा देखे के विनती कइले रहलन। गान्हीं जी भरोसा दियवले रहलन कि कोलकता से लउटत, ऊ चंपारण के जातरा जरुर करिहन। अधिवेशन से बेतिया लवटि के ऊ गान्ही जी के एगो एतिहासिक चिट्ठी लिखले रहलन। 27 फरवरी,1917 के लिखल ऊ चिट्ठी एहू से एतिहासिक रहे कि ओह में सबसे पहिले आ पहिलकी बेरि ऊ मोहनदास के ‘महात्मा’ संबोधित कइले रहलन। फेरु त गान्ही जी के बिहार के भूइं पर 10 अप्रैल,1917 के उतरहीं के परल रहे। इहंवे से चंपारण का रुप में देश में पहिलका हाली गान्हीं जी अहिंसक आन्दोलन के शुरूआत कइले रहलन, जेकर प्रेरना सुकुल जी से मिलल रहे। फेरु चंपारण में गान्ही जी के देखे खातिर जब भीड़ उमड़लि रहे, त ऊ हुलसा से जनसमुदाय के संबोधित करत भोजपुरी में कहले रहलन- ‘देख लिहीं सभे! ‘महात्मा’ जी आ गइली।

कइसन अद्भुत पारखी रहलन सुकुल जी! आगा चलिके कविन्द्र के खातिर ना, सउंसे दुनिया खातिर गान्ही बतौर ‘महात्मा’ विख्यात हो गइल रहलन।

आखिरकार सुकुल जी के अथक मेहनत, निहोरा रंग ले आइल। गान्ही जी के सुकुल जी के कोलकाता बोलावन आ नौ अप्रैल,1917 के रात खा दूनों जना हावड़ा से रेलगाड़ी धइलन। दस अप्रैल के सबेरे दस बजे पटना जंक्शन पर उतरलन। ओही रात खा मुजफ्फरपुर खातिर रवानगी। उहवां चार दिन के ठहराव। पनरह अप्रैल के मोतिहारी खातिर प्रस्थान। मोतिहारी के जसौलपट्टी गांव में गान्हीं जी के जाए पर ब्रिटिश सरकार के रोक। मुकदमा बाजी गान्हीं जी के खुदे ममिला के पैरवी कइलन। नतीजन मुकदमा उठा लिहल गइल।

आखिर गान्ही जी के नजर में राजकुमार सुकुल के का अहमियत रहे? गांधी जी अपना आत्मकथा में चंपारण, उहां के अहिंसक आन्दोलन के प्रेरना-स्त्रोत राजकुमार सुकुल के विस्तार से चरचा कइले बाड़न। उन्हुकर कहनाम रहे-‘…इस अपढ़, परन्तु निश्चयवान किसान ने मुझे जीत लिया…उनका और मेरा मिलाप पुराने मित्रो सा जान पड़ा। इससे मैंने ईश्वर का, अहिंसा का और सत्य का साक्षात्कार किया, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि अक्षरश: सत्य है। इस साक्षात्कार में अपने अधिकार का विचार करता हूं तो लोगों के प्रति प्रेम के सिवा कुछ नहीं मिलता। प्रेम और अहिंसा में मेरी अचल श्रद्धा के सिवा कुछ नहीं। चंपारण का वह दिन मेरी जिंदगी में ऐसा था, जो कभी भुलाया नहीं जा सकता।

ई राजकुमार सुकुल के दीढ़ निश्चय आ भीस्म प्रतिज्ञा रहे कि गान्ही जी के चंपारण के जातरा करे के परल। खाली उन्हुके ना, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मजहरुल हक, जे. बी कृपलानी, महादेव देसाई वगैरह नामी-गिरामी नेतनो के चंपारण पहुंचे के परल। गान्ही जी एक-एक करके परत-दर परत किसानन के शोषन-दमन के तहकीकात शुरू कर देले रहलन। फेरु त आग-बबूला होके अंगरेज अफसर उन्हुका के चंपारण छोड़े का फरमान जारी कर दिहलन स। बाकिर गान्ही जी जब हुकुम के अवहेलना करत खुदे मोकदमा लड़े आ सजाई काटे के निरनय लिहलन, त मजबूरन सरकार के ना खाली आपन आदेश रद्द करे के परल, बलुक एगो जांच कमेटी गठित कर के गान्हियो जी के ओकर सदस्य बनावे के परल। अंतत: चंपारण के किसानन के दुरदसा के समूल खात्मा भइल, जब 4 मार्च, 1918 के विधान परिषद् से एह आशय के विधेयक पारित भइल कि फसल उपजावे के ममिला में सभ कुछु रैयतन के मरजी पर निर्भर रही। एह तरी से चंपारण में महात्मा गान्ही के पहिल सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कामयाबी राजकुमार के प्रेरना से हासिल भइल।

बाकिर सुकुल जी के गोरन के खिलाफ विदरोह त जिनिगी भर जारी रहल, काहेंकि ब्रितानी सरकार झूठा आरोप मढि़के निरीह किसानन आ आम जनता के प्रताडि़त कइल बन्न ना कइले रहे। सन् 1929 के मई महीना में ऊ साबरमती आश्रम पहुंचल रहलन आ बापू से उन्हुकर भेंट आखरी भेंट साबित भइल रहे, काहेंकि साबरमती सेवाग्राम के संत के दर्शन कर के सतवरिया के ऊ संत 20 मई,1929 के मोतिहारी के ओही ठेकाना पर हरदम-हरदम खातिर आंखि मूंदि लेले रहे, जहवां चंपारण अइला पर गान्ही जी ठहरल रहलन। चंपारण के उनइस लाख जनता ‘चंपारण के गान्ही’ के लोर भरल आंखि से

फफकि-फफकि के आखिरी विदाई देले रहे। इहां ले कि उहां के क्रूरतम अंगरेज अफसर मिस्टर ऐमन मरमाहत होके सुकुल जी के दामाद के पुलिस महकमा में बहाली की चिट्ठी आ आर्थिक मदत देत कहले रहे- ‘उस आदमी की कीमत दूसरे लोग क्या समझेंगे! चंपारण का वह अकेला मर्द था, जो मुझसे पचीस वर्ष लड़ता रहा’।

सांच त ई बा कि पं. राजकुमार सुकुल के मंशा ना त कवनो आन्दोलन के अगवाई करे के रहे आ ना राष्ट्रीय नेतृत्व सम्हारे के। ऊ त चंपारण के किसानन, रैयतन पर सदियन से बजड़त निलहन के अनेति-अतियाचार के बजरपात से घवाहिल रहलन आ ओह असह दु:ख-दरद के समूल नाश कइल-करवावले उन्हुकर एकमात्र मकसद रहे। एह काम खातिर ऊ गान्ही जी के उत्प्रेरित कइलन आ मुक्ती के सांस लिहलन। चूंकि ऊ खुदे महात्मा रहलन, एह से गान्ही जी में ऊ महात्मा के दरसन कइलन। पं. राजकुमार सुकुल जी के अमरता गान्ही जी के पहिला हाली ‘महात्मा’ के संबोधन देवे में ना, वरन चंपारण सत्याग्रह के बहाना से देश में अंगरेजन के खिलाफ सबसे पहिले अहिंसक आन्दोलन के सूत्रपात करे खातिर प्रेरना-स्रोत के भूमिका अदा करे में बा।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min2090

अनुराधा कृष्ण रस्तोगी

आपन भारत के इतिहास में इनल–गिनल महान परोपकारी शासक भइल बाड़न । ओकरा में एगो शेरशाह सूरी भी रहलें । इनकर दादा इबराहीम खां सूरी आ बाबू हसन खां सूरी सुल्तान बहलोल लोदी के शासन काल 1451-1989 में अफगानिस्तान से भारत आइल रहलें । शेरशाह के जन्म  कब कहां भइल रहे एकर ठीक–ठीक पता नइखे । विसवास बा की 1472 के आस–पास बजवाड़k परगना में भा 1486 के आस–पास नारनौल भा हिसार फिरोजा में शेरशाह के जनम भइल रहे । इनकर लड़काइये के नाव  फरीद खां सूरी रहे । फरीद खां बचपन में अपना बाबू के साथ सासाराम में रहत रहलें । पहिले सासाराम बिहार के शाहाबाद जिला में रहे उ अब रोहतास में बा जेकरा आज सासाराम के नाव से जानल जाला । सासाराम में इनकर बाबू के जागीर रहे, जे में सासाराम आ खवासपुर टांडा के परगना में सामिल रहे ।

बचपन में फरीद खां के पढाई खातीर जौनपुर भेजल  गइल । ई प्रकृति से ही चल्हांक आ प्रतिभाशाली रहलें । जौनपुर में फारसी अउर अरबी  भाषा के नीमन अभेयास कर लेले रहन । शेरशाह सूरी सत्ता पा के 1538 में गौड़ बंगाल नगर में आपन ताजपोशी के जसन मनवालन । ओंह  मोका प ऊ आपन दृढ़ संकल्प के एलान कइलें  की हम मुगलन के खदेड़ के अफगान के सत्ता फिन से स्थापित करब ।आपन कुशल राजनित अउर  सैनिक नेतृत्व में उ आखिर दिल्ली के जीत लेलन । आपन दृढ़ निश्चय के मोताबिक उ 1540 में मोगल बादशाह हुमायू के गंगा आ बिलग्राम के लड़ाई में हरा देलन । इतिहास में ई लड़ाई कनौज के लड़ाई के नाव से बड़ा प्रसिद्ध बा । येह जीत के उपरांत उ दिल्ली प  कब्ज़ा कर लेलन अऊर ओकरे के राजधानी बनवलें ।

भारत के अफगान शासक शेरशाह खातिर मुगल सम्राट हुमायू के साथे सम्राज के लड़ाई में अनुपम प्राकृतिक दिरिस के बीच बिन्ध्य पहाड़ प स्थित भारत के सबसे बड़ एगो मात्र पहाड़ी किला, सत्यवादी हरिश्चंद्र पुत्र रोहिताश्व द्वारा निर्मित रोहतासगढ़ किला बहुते उपयोगी साबित भइल रहे जे रोहतास जिला के डेहरी ओन सोन से दखिन 60 कोस के दूरी प तूटल-फूटल अवस्था में आजो खाड़ बा । जेकरा नाव प रोहतास जिला के नाव भईल । एगो किला पाकिस्तान में भी झेलम नदी के जरी लाहौर के 60 कोस के दूरी प खुरासान मार्ग प मौजूद बा । ऐह किला के शेरशाह जीर्णोधार क के मजबूती प्रदान कइलन अउर ऐह दुर्ग के असमिता  के कायम कईलें । रोहतास फोर्ट के सम्मान में पाकिस्तान 25 सितम्बर 1984 में 10 पै० के डाकटिकट जारी रहलें ।

शेरशाह सूरी बड़ उत्कृष्ट शासक रहलें । उनकर शासन बहुत ही छोट 1541-1545 पांच बरीस से कुछ अधिक रहे बुत कम उमिर में ही आपन उदारता अउर कर्मठता के परिचय देहलन । उ आपन शासन में जनता के हित में कईगो सुधार कइलें  जेकरा में राजस्व, मुद्रा अउर शुल्कदर दर के सुधार प्रमुख बाटे । उ केंद्रीय अउर प्रांतीय शासन के भी पुनर-गठन क के डाक व्यवस्था के मजबूत बनवलन अउर सेना के पुनरगठन कइलन । शेरशाह उपेक्षित अउर शोषित किसानन  के भलाई के कामो  में भी बहुते रूचि लेख । शेरशाह के शाही फरमान के वजह से राजस्व अधिकारी निर्धारण के समय काफी उदारता से काम लेत रहन।

उ चानी के नया सिक्का चलवलें जेकरा के ‘रुपिया’ कहल जात रहे ई सिक्का तांबा के चालीस पइसा के बराबर रहे । एकरा पाहिले उ बंगाल में जवन सिक्का चलवले रहन ओकरा में सबसे पहिले  सिक्का प देवनागरी अउर फारसी लिपि में उनकर नाव ‘सिरी सैर साहि’ (श्री शेरशाह) अंकित बा । शेरशाह सड़क के बहुते बड़ निर्माण कर्ता के रूप में बहुते प्रसिद्ध बाड़े । उनकर आदेश से बनल सबसे बड़ सडक ‘शाहराह-इ-आजम’ कहलात रहे । ग्रांड ट्रंक रोड के नाम से चर्चित एह सड़क के आधुनिक नाम राष्ट्रीय राज मार्ग – 2 बा । बंगाल से सुनार गाँव से शुरू होके आगरा, दिल्ली अउर लाहौर होखते सिंध नदी तक जाला । उनकर बनावल दूसर सड़क आगरा, बुरहानपुर के सड़क जवन ओकरा से आगे मांडू तक जाला । आगरा से जोधपुर अउर चितौड़ के सड़क अउर लाहौर से मुल्तान के सड़क प्रसिद्ध बाटे ।

शेरशाह आपन शासन काल में राष्ट्रीय आधार प सुसंगठित डाक व्यवस्ता के नींव रखलें । उत्तर भारत के कइगो भाग के बीच राजपथ के भी निर्माण से यातायात में जवन सुधार भइल ओकरा से एह काम में बहुते मदद मिलल । ग्रांड-ट्रंक रोड के निर्माण करइलें बुत जगह-जगह प सड़क के बीच में डाक चौकी, सराय भी बनवलें  जेकरा से डाक देश के एक भाग से दूसरा भाग में पहुंचात रहे । हर सराय प दुगो घोड़ा तैयार रहत रहे, जेमें डाक (चिठ्ठी) के आवा जाही आसानी से होत रहे । ओहीजे से भारत में मुख्य रूप से डाक व्यवस्था के विकास भइल ।

एहिसे शेरशाह सूरी के भारतीय डाक के जनक कहल जाला । कालिंजर के चढ़ाई में शेरशाह के जीत भइल रहे । बारूद खाना में बिस्फोट भइला से घायल होखे 22 मई 1545 में शेरशाह के मृत्यु हो गइल ।

सन्-1146 में बगदाद के खलीफा सुल्तान नारदिन अपना पूरा राज्य में नियमित रूप से कबूतर से खबर भेज के व्यवस्था कइले रहन ।

बलुक भारत में डाक व्यवस्था सन-1296 में चालू रहे , सेना के समाचार निरंतर पावे खातीर पठान शासक अलाउदीन खिल्जी घोड़ा अउर पैदल डाक व्यवस्था कायम कइले रहन । अकबर के शासन काल में 1556-1605 परिवहन के व्यवस्था में एगो अउर सुधार भइल रहे । अब घोड़ा के अलावा ऊँट के भी परयोग भइल रहे । कहल जाला की मैसूर के राजा चिक्कदेव सन–1672 में अपना पूरा राज्य में नियमित डाक सेवा में व्यवस्था देले रहन । आज के जिनगी में डाक के बहुत बड़ स्थान बा । एह समय भारतीय डाक के नेटवर्क में सबसे बड़ प्रणाली बा । शेरशाह सूरी के शासन काल में भारतीय डाक व्यवस्था के एगो नया स्फूर्ति अउर दिशा मिलल ।

 


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1740

सुरेन्द्र कृष्ण रस्तोगी

आपन देश भारत के इतिहास में शेरशाह सूरी के एगो बिशेष स्थान बा। सासाराम  (रोहतास) में इनकर बाबू हसनशाह  सूरी के जागीर रहे । शेरशाह लड़कईयें से आपन बाबू के साथ रहत रहलें । समय के ऊतार-चढ़kव के दौरान शेरशाह सन् 1538 में बंगाल के गौड़ नगर में आपन ताजपोसी के जशन मनइलन । ऊ कइगो बड़ लड़kई लड़लन आ जितलें । बिहार के शासक जमाल खां के हरा के बिहार के शासक बनलें आ फिन हुमायू के हरा के  दिल्ली के बादशाह बनलें जेकरा के आपन राजधानी बनवलें । शेरशाह के सम्राज चारो दिशा में फैइलल रहे, आपन कृतित्व अउर व्यक्तित्व के बल प हमेशा आगे बढ़त रहलें । ऊ बहुते बड़ उत्कृष्ट शासक रहलें । पांच साल के उमिर में आपन उदारता आ कर्मठता  के परिचय देलन । जनता के हित में कईगो एतिहासिक काम कईलें । केंद्रीय अउर प्रांतीय शासकन के प्रति भी ढेरे रुचि लेतरहन । आपन काम काज के दौरान सासाराम में तलाब के बीचो-बीच एगो सुग्घर, निक मकबरा बनवलें जे ताजमहल से तेरह फुट ऊँच बा । लड़ाई के दौरान सैनिकन  के सही स्तिथि के पता करे आ सूचना के आदान-प्रदान करे खातिर कइगो मीनार के निर्माण करवलें । जेमें  औरंगाबाद, भभुआ (कैमूर), बारे के आस-पास मौजूद बा आ केतना टूट फूट के इतिहास के पन्ना में दफ़न हो गइल। सरकार के एकरा प ध्यान राखेके चाहीं।

शेरशाह सड़क के बहुते बड़ निर्माण करता के रूप में परसिद्ध बाड़न।  आपन शासन काल (1541-45) में हजार कोस में खूबे लमहर ग्रैंड ट्रंक रोड बनवलें। एकरा साथे सड़क के बीच में डाक चौकी आ 1700  सराय के निर्माण करवलें, जवना से चिठ्ठी-चपाठी के आदान–प्रदान अउर आराम घर खातिर उपयोग होत रहे । ई पहिला सम्राट रहलें जे ‘माउन्टेड पोस्ट’ के शुरूआत कइलें । घोड़सवार डाकिया कायम क के एक मजबूत आ कुशल प्रशासन  के तहत एकर सुरक्षा सुनिश्चित होखला से डाक व्यवस्था के संचालन में खूबे मदद मिलल । एहिजे से भारत में मूल रूप से डाक व्यवस्था के विकास भइल। एहिसे शेरशाह सूरी के भारतीय ‘डाक के जनक’ कहल जाला ।

आज के दउर में भले मोबाईल अउर इंटरनेट आदि के फइलाव भइल होखे  बाकिर डाक के नेटवर्क के दुनिया में सबसे बड़ प्रणाली बा । आज के जीनगी में डाक के बहुत बड़ भूमिका बाटे । शेरशाह भारतीय डाक व्यवस्था के एगो नया दिशा देलें  जेकरा के भुलावल न जा सके ।

भारत सरकार के संचार मंत्रालय के डाक बिभाग एह राष्ट्रीय सेवा के अग्रदूत आ क्रांतिकारी जोधा अउर लोकप्रिय कुशल शासक शेरशाह शूरी के सम्मान में डाक टिकट, कवर आदि जारी क के अपना के सौभाग्यशाली समझत बाटे ।

सबसे पाहिले  भारत सरकार शेरशाह सूरी प 22 मई 1970 में 20  पइसा  के एगो डाक टिकट जारी क के सरधा सुमन अरपित कइलस । एह टिकट में शेरशाह के गद्दी  प बइठल छबिचित्र छपल आ एगो आवरण (लिफाफा) निकलल जेकरा प शेरशाह के मकबरा अंकित बा । 29 अक्तूबर 1976 में बिपेक्स 76 के मोका प विशिष्ट आवरण प्रकाशित भइल जेपर मकबरा के  फोटो  के साथे प्राचीन घोड़ा  डाक के टिकट प डाक हरकारा  के मोहर लगावल गइल जे डाक व्यवस्था के जनक  के याद के ताजा करता ।

सन् 1989 में एगो हवाई पत्र  (पोसकाड) 4 रूपया के निकलल जे पर शेरशाह समाधि सासाराम छपल बा।

करीब साड़े चार सौ वारिस पहिले शेरशाह सूरी के ओरि से शुरु  भइल डाक व्यवस्था के स्मृति में डाक विभाग एगो विशिष्ट आवरण जारी कइलस। आवरण पत्र के डाकिया घोड़ सवार रातो रात सासाराम से  पटना रवाना भइल ।

जइसे शेरशाह के समय में डाक घोड़ा एक स्थान से दूसरा स्थान प चिठ्ठी लेके जात रहे। ठीक ओंसही  डाक के थइला औपचारिक रूप से भेजल गइल जे राज्यपाल शरीफ  कुरैशी के सउपलस । एह आवरण प कबूतर डाक सेवा के टिकट लगा के अश्वरोही सम्वाहक के मुहर लगावल गइल जेकरा प पूर्व मंत्री लालू प्रसाद के दस्खत बा ।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत 28 जनवरी 2012 में एगो आवरण जारी भइल। कइगो धरोहर के साथे शेरशाह के मकबरा के भी  दरसावल गइल बा। फिन  एही साल 2 फरवरी 2012 में एगो विशेष आवरण बिहार के डाकटिकट प्रदर्शनी के मोक़ा प जारी भइल जेकरा प शेरशाह के फोटो के साथे शुरू से अब तक के डाकियन के बदलत भेष-भूषा, लेटर बॉक्स, कइगो डाक घोड़सवारन के चित्र अउर पृष्टभूमि में मकबरा के देखावल गइल बा अउर प्रदर्शनी के मोहर लगावल गइल


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1570

अजय कुमार पाण्डेय

साल 1939 ,
बेतिया ( प. चंपारण ) बिहार ,
बेतिया के बड़ा रमना मैदान
मैदान में भारी जन सैलाब
जोश में भरल युवा ।

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के बेतिया आगमन आ उहां के भाषण सुने  खातिर  भारी भीड़ उमडल रहे ।

नेता जी के जिंदाबाद के नारा गुंजल आ उहां के मंच पर अइनी। भीड़ हर्ष आ जोश के अतिरेक में चीखे लागल आ ” नेता जी जिन्दाबाद , भारत माता के जय , वन्देमातरम ” के नारा लागे लागल ।

नेता जी हाथ हिला के सबकर अभिवादन कईनी आ शांत रहे के इशारा कईनी । लोग शांत हो के एक टक उहां के निहारे लागल ।
नेता जी के चेहरा हजार वाट के बल्ब लेखा चमकत रहे आ कपार त साफा बुझात रहे कि सीसा ह ।

नेता जी के नस – नस में गरम लावा दौउडावे वाला भाषण शुरू भइल । बीच – बीच में लोग के जोश ना माने आ जिंदाबाद , वन्देमातरम के नारा गूंजे लागे ।

जब भाषण ओराये पर आइल त नेता जी आपन चिरपरिचित नारा बुलंद कईनी ,

” तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हे आजादी दूंगा ।”

लोग फेर नारा लगावे लागल ।

अचानक नेता जी हाथ से सबका के शांत रहे के इशारा क के भीड़ से मुख़ातिब भइनी आ पूछनी ,

” तुममें से कौन देश की आजादी के लिये अभी इसी मंच पर मुझे खून देगा ?”

भीड़ में सन्नाटा छा गइल आ सभे एक – दूसरा के मुंह देखे लागल ।

ताले , पीछे से भीड़ के चीरत एगो हट्ठा – कट्ठा नौजवान आगे अइलन आ सीना तान के चिलइले ,

” हम खून देंगे नेता जी , हम खून देंगे ।”

सब लोग उ युवक के जोश आ हिम्मत देखे लागल ।
नेता जी उ युवक के मंच पर बोलावले आ पीठ थपथपा के नाम पुछलें । उ नौजवान आपन नाम ” धनराज पुरी  ” बतवलें ।

बिहार के वर्तमान पश्चिमी चंपारण जिला के रामनगर प्रखंड स्थित सिकटा – बेलवा गांव के ” महंथ धनराज पुरी  ” के नेता जी ओकरा बाद कबो ना छोड़नी ।

प्राप्त जानकारी के अनुसार जब नेता जी अंगरेजन के आँखी में धूल झोंक के कलकत्ता से पलायन कईनी त महंथ जी के सिकटा – बेलवा स्थित घर पर आपन कुछ विश्वस्त सहयोगी लोग के साथ रात्रि में कुछ समय खातिर आइल रनी । नेता जी के साथे महंथ जी के  ओ समय के बड़ी पुरान फोटो मिलल बा जेमें नेता जी के साथे महंथ जी खड़ा बानी ।

नेता जी जब आपन पार्टी ” फारवर्ड ब्लॉक ” बनवनी त महंथ धनराज पुरी जी के पार्टी के  राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष बनवनी । नेता जी के देश से पलायन आ गुमनाम हो गइला तक महंथ जी सक्रिय रूप से ” फॉरवार्ड  ब्लॉक ” पार्टी के क्रिया कलाप में रहनी आ गुप्त रूप से देश के आजादी खातिर काम कईनी ।

महंथ जी के घर देश के आजादी मिले तक विभिन्न राजनीतिक आ साहित्यिक गतिविधि के केंद्र भी रहल ।

महंथ जी हिंदी , संस्कृत , अंग्रेजी आ उर्दू के उद्भट विद्वान रहनी आ बेहतरीन कवि आ लेखक भी रनी ।

सन 1938 – 40 के दौरान जब साहित्यिक आ काव्यात्मक अभिव्यक्ति पर भी ब्रितानी हुकूमत के पहरा रहे , महंथ जी रामनगर में एगो विराट कवि सम्मेलन के आयोजन कईनी जेमे देश भर के क्रांतिकारी कवि लोग आइल रहे । महंथ जी उ कवि सम्मेलन में आपन ” ओस ” नामक काव्य – संकलन एगो कविता पढ़ले रनी , जेकर कुछ पंक्ति बा ,

” डमरू आज बजे , वीणा न बजाएं
गीत न गायें आज
आज तो गीता गायें
भभके ज्वाला
जाल व्योम तक
पहुँच जाए “.

बाकी कवि लोग भी आपन कविता आ गीतन के माध्यम से लोग के जगावे के प्रयास कइल लोग ।

महंथ जी चंपारण में पहिला बार कविता के माध्यम से क्रांति के बिगुल  फुकले रनी जेकर आंच ब्रितानी हुकूमत तक पहुँच गइल  ।  महंथ जी भूमिगत हो गइनी । अंगरेज उहां के पकड़ पवलsस कि ना , एकर कौनो पुष्ट प्रमाण नइखे उपलब्ध हो सकल लेकिन अंत – अंत तक उहां के अंग्रेजन के आंख के किरकिरी बनल रनी ।

महंथ जी नेता जी के लागातार सम्पर्क में रहनी आ अपुष्ट सूचना के अनुसार कुछ समय तक ” आजाद हिन्द फ़ौज ” के अति गोपनीय शाखा ख़ातिर बर्मा ( वर्तमान म्यांमार ) में भी रहनी ।

दुर्भाग्य से उहां के कौनो चिट्ठी – पत्री भा दस्तावेज उहां के वारिस लोग सहेज के ना रख सकल । जौन फोटो भी उपलब्ध भइल उ बहुत हीं खराब अवस्था में बा ।

महंथ जी के साहित्यिक पक्ष भी बहुत विराट रहे । ओम्हर के बहुत उच्च कोटि के कवि आ साहित्यकार रनी । विशेष रूप से उहां के शिकार कथा बहुत लोकप्रिय बाड़न स । उहां के देश भर के जंगल आ पहाड़न के बड़ी भ्रमण कइले रनी आ शिकार के शौकीन रनी ।
शिकार कथा लेखक स्व. वृंदावन लाल वर्मा आ स्व. श्री राम शर्मा जी के साथे शिकार कथा लेखक के रूप में ओम्हर के राष्ट्रीय पहचान रहे ।

महंथ जी के ” इला ” खण्ड काव्य उहां के मशहूर किताबन में बा ।
इला उहां के आपन बेटी के याद में लिखले रनी , जे युवावस्था में हीं विधवा हो गइली आ खुद भी कुछ दिन बाद चल बसली ।

महंथ जी के सामाजिक आ खोजपूर्ण कार्य भी बहुत उल्लेखनीय बा ।
उहां का आदि कवि महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के खोज कईनी आ उहें के शोध आ अथक प्रयास से वर्तमान पश्चिमी चंपारण के काश्मीर ” भैसालोटन ” के नाम ” वाल्मीकिनगर ” पड़ल ।  ये खातिर महंथ जी के बहुत भाग – दौड़ आ लिखा – पढ़ी करेके पड़ल ।

जंगल में भ्रमण के दौरान सीमावर्ती नेपाल के घनघोर जंगल में उहां के एगो आश्रम जइसन जगह पवनी , जहां यज्ञशाला , हवन कुंड , कुंआ , प्राचीन काला पत्थर के मूर्ति आ अनेक अइसन प्रमाण पवनी जे उ स्थान के महर्षि वाल्मीकि के आश्रम सिद्ध करत रहे जहां सीता माता रहल रनी । ये खातिर महंथ जी बहुत सा प्राचीन ग्रन्थ आ साहित्य के अध्ययन कईनी आ आपन शोध के सम्बंध में दु गो किताब लिखनी , ” महर्षि वाल्मीकि का आश्रम कहां था ?” आ ” वाल्मीकि आश्रम – वाल्मीकि नगर ” ।

उहां के प्रयास रंग लाइल आ 14 जनवरी ‘ 1964 के ” भैसालोटन ” के नाम सरकारी आ आधिकारिक स्तर पर ” वाल्मीकिनगर ” हो  गइल । एकर घोषणा बिहार के तत्कालीन राज्यपाल स्व. अनंत स्थानम  आयंगर , नेपाल नरेश आ दुनु देश के अधिकारियन के उपस्थिति में भइल । वाल्मीकि आश्रम के भी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के रूप में मान्यता मिलल आ आज देश भर के लोग वाल्मीकिआश्रम के देखे आवेला ।

दुर्भाग्य के बात ई बा कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के अनन्य सहयोगी आ उहां के पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष स्व. महंथ धनराज पुरी जे राष्ट्रीय स्तर के कवि आ कथाकार के आज लोग भुला गइल बा ।
उहां के गृह जिला में भी उहां के जन्म या मृत्यतिथि पर कौनो आयोजन ना होला ।

हमरा त ई शेर अब एकदम अप्रासंगिक बुझाला ,

” शहीदों के चिताओं  पर लगेंगे हर बरस मेले ,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ”

स्व. महंथ धनराज पुरी जी के उपलब्ध साहित्य इहे बा ।

1- अविरल आंसू ( आंचलिक उपन्यास )
2- आखेट ( शिकार कथा )
3- इला  ( काव्य )
4- ओस ( काव्य
5- उच्छ्वास ( रचना – संग्रह )
6- आओ सुनो कहानी ( बाल साहित्य )
7- टुनमून                   ( बाल साहित्य )
8- लेफ्टिनेंट               ( कहानी संग्रह )
9- मौत की मांद में  ( शिकार कहानियां )
10-महर्षि वाल्मीकि का आश्रम कहाँ था ?
11-वाल्मीकिआश्रम ; वाल्मीकिनगर ( शोध प्रबंध )
12- मृत्यु से मुठभेड़ ( शिकार कहानियां )
13 -तमुरा               ( बाल साहित्य )
14-जंगल में दंगल    ( बाल साहित्य )

( परिचय- अजय कुमार पाण्डेय सिविल कोर्ट, बगहा, पश्चिमी चंपारण, बिहार में सहायक बानी. 


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डाॅ० भोला प्रसाद आग्नेय

११ मई १८५७ के अभी भोर के किरिन दिल्ली के सड़कन पे उतरहीं वाली रहे तवले मेरठ से आइल सिपाहियन के एगो दल जमुना पार क के दिल्ली में घुस गइल. एक दिन पहिले इहे दल मेरठ में आपन अंग्रेज अफसर के आदेश माने से इनकार करत ओकर हत्या क देले रहे.ई दल लालकिला में जा के मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर से रहनुमाई करे खातिर अपील कइलन. अपील स्वीकार करत बहादुर शाह जफर खुद के शहनशाह-ए- हिंदुस्तान घोषित क दिहलन.

ईस्ट इंडिया कम्पनी के पाले कुल २ लाख ३२ हजार २२४ सिपाही रहलन जवना में से तकरीबन आधा सिपाही रेजिमेंट छोड़ के विद्रोही हो गइल रहलन. आ ३४ वीं नेटिव इन्फैन्ट्री के जवान बलिया निवासी मंगल पांडे त अपना सार्जेंट मेजर के गोली मार दिहलन जवना के कारण अंग्रेज उनके फांसी दे दिहलन स  . ए तरे दिल्ली पे कब्जा होते विद्रोह के लहर कानपुर, लखनऊ, बनारस , इलाहाबाद, बरेली, जगदीश पुर, पूणे, झांसी तक ले फइल गइल. अंग्रेजन के गोड़ के नीचे से धरती सरके लागल. स्थानीय सामन्त, नवाब भा राजा लोग नेतृत्व के जिम्मेदारी ले लिहल लोग. अंग्रेजी हुकूमत के हाथे ई लोग बहुते सतावल जा चुकल रहे लोग. एसे सभे असंतुष्ट रहे लोग. मोका मिलते सभे विद्रोहियन के साथे आ गइल.

कानपुर में अंतिम मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक बेटा लखनऊ में बेगम हज़रत महल आ बरेली में रुहेलखंड के पहिले के शासक के उत्तराधिकारी खान बहादुर रहनुमाई कइलन. झांसी में सिपाहियन के नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई अपना हाथ में ले लिहलिन. विद्रोह के ई लहर उत्तर भारत, पश्चिम आ मध्य भारत के कुछ हिस्सन में चल पड़ल. खाली दक्षिण भारत एसे अलग थलग रहल. ओने के सिपाही अपना के अंग्रेजन के प्रति निष्ठावान बनवले रहलन.

ए विद्रोह के कारण ई रहल कि अंग्रेजन के जवन सेवा शर्त रहल ओसे हिन्दू मुस्लिम दूनों के धार्मिक भावना के ठेस पहुंचत रहे. एकरे अलावे वेतन आ पदोन्नति में गोरा काला के भेद रखल जात रहे. टैक्स के वसूली में जनता पे तरह तरह के अत्याचार होत रहे. एसे आम जनता अंग्रेजन के विरोधी हो उसेउ हो गइल रहे.

बिहार के जगदीशपुर के जमींदार बाबू कुंवर सिंह के अंग्रेज अपना कूटनीति के जरिये दिवालियेपन के कगार पर पहुंचा देले रहलन. इनकर मय सम्पत्ति छीन लेले रहलन स, इनके बार बार अपील कइलो पर उन्हनीं पे कवनो असर ना पड़त रहे. एसे बाबू कुंवर सिंह भीतरे भीतर अंग्रेजन के विरोधी हो गइल रहलन आ मोका के तलाश में रहलन ओ घरी इनके उमिर अस्सी साल रहे.

१२ जून १८५७ के बिहार रेजिमेंट के तीन गो सिपाही कमांडर के आदेश माने से इनकार क दिहलन. ओ तीनों सिपाहियन के अंग्रेज हाथी के पीठ पे बइठा के नीचे ढकेल के मुआ दिहलन. एकरे जवाब में ०३ जुलाई १८५७ के पटना में सेना के एगो टुकड़ी कैप्टन डी० आर० लायल के हत्या क दिहलस. एसे खिसिया के अंग्रेज १६ गो देश भक्तन के फांसी दे दिहलन स एकर नतीजा ई भइल कि २५ जुलाई १८५७ के दानापुर सैनिक छावनी में विद्रोह हो गइल आ अइसने मोका के तलाश में बाबू कुंवर सिंह रहलन.

वीरवर बाबू कुंवर सिंह के नेतृत्व में आजादी के दीवाने वीर सैनिक जगदीशपुर से आरा आ के खजाना लूट लिहलन आ बंदी गृह के नष्ट क दिहलन. पूरा शाहाबाद बाबू कुंवर सिंह के अधीन हो गइल. २९ जुलाई १८५७ के कैप्टन डनवर के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना आरा पहुंचल बाकिर बाबू कुंवर सिंह वृकयुद्ध शैली अपना के अपना के बचा लिहलन. आधी रात में आक्रमण क के कैप्टन डनवर के साथे अनेक अंंग्रेजी सिपाहियन के मौत के घाट उतार दिहलन. एकरे बाद बंगाल से अंग्रेजी सेना के मेजर विसेंट आयर आपन सेना के साथे आरा पहुँच गइलन. बाबू कुंवर सिंह के साथे मेजर आयर से घमासान युद्ध भइल आ २-३ अगस्त के आरा पर फिनु अंग्रेजन के कब्जा हो गइल.

मेजर आयर के जीत से बाबू कुंवर सिंह हतोत्साहित ना भइलन. अपने सेना के नया आयाम देवे खातिर सासाराम, रोहतास, मिर्जापुर, रीवां, बांदा, कालपी आ कानपुर होत मार्च १९५८ में लखनऊ पहुँच गइलन. अवध के नवाब आजमगढ़ के शासनाधिकार के साथे आजमगढ़ भेज दिहलन. २२ मार्च १९५८ के बाबू कुंवर सिंह कोलोनल मिलमैन के सेना के पराजित क के आजमगढ़ के अंग्रेजन से मुक्त करा दिहलन.१५ अप्रैल १९५८ के घात लगा के जनरल लुगाई बाबू कुंवर सिंह पे आक्रमण क दिहलस बाकिर ओहू के कुंवर सिंह भारी शिकस्त दिहलन.

अगिला दिने बाबू कुंवर सिंह अपना गृह जनपद आरा आवे के प्रोग्राम बनवलन. बलिया जनपद के नगरा, सिकंदर पुर होत मनियर आ के आपन पड़ाव डललन. २० अप्रैल १९५८ के कैप्टन डगलस जवन नगरा से इनकर पीछा करत रहे आक्रमण क दिहलस. ओइजो बाबू कुंवर सिंह ओके पराजित करत अपना सेना के साथे शिवपुर घाट के ओर चल दिहलन. रास्ता में पचरुखी देवी मंदिर पे कुंवर सिंह के ताक में अंग्रेजी सेना बइठल रहे. ओइजो घमासान युद्ध भइल. ए युद्ध में बाबू कुंवर सिंह अपना साथी सिद्धा सिंह के साथे १०६  गो अंग्रेज सिपाहियन के मूड़ी काट काट के एगो नाला में फेंकत गइलन. ओह नाला ओही से आजुवो मूड़ कटला नाला कहल जाला.

२१ अप्रैल १९५८ के बाबू कुंवर सिंह शिवपुर घाट से गंगा पार करत नाय से जात रहलन तवले अंग्रेजन के सेना नाय पर गोली चलावे शुरू क दिहलस. बाबू कुंवर सिंह के बायां हाथ में गोली लाग गइल. अंग्रेजन के गोली के जहर पूरा शरीर न फइले पावे एसे भारत माँ के वीर आ साहसी सपूत बाबू कुंवर सिंह आपन बायां हाथ काट के गंगा मइया के समर्पित क दिहलन.आ ओह पार जा के हाथी से अपन गांवे जगदीशपुर पहुँच गइलन.

बाबू कुंवर सिंह के घायल जान के कैप्टन ली ग्रैंड २३ अप्रैल १९५८  के जगदीशपुर पर आक्रमण क दिहलस बाकिर अंग्रेजी सेना के पराजित होखे के पड़ल आ कैप्टन ली ग्रैंडो मरा गइलन. भारत माता के अइसन वीर सपूत बाबू कुंवर सिंह अपने बीमारी से २६ अप्रैल १९५८ के सदा के नींद सुत गइलन. उनके वीरता के अइसन अमिट छाप पड़ल बा कि आजुवो भोजपुर आ ओकरे आस पास के लइका खेल खेल में गावेलन स  – चल कबड्डी आरा जहाँ कुंवर सिंह मरदाना.

सुप्रसिद्ध कवि मनोरंजन प्रसाद सिन्हा अपना कविता में कहले बाडन—

अस्सी वर्ष की हड्डी में जागा जोश पुराना था.

सब कहते हैं कुंवर सिंह बड़ा वीर मरदाना था.

( परिचय- डाॅ० भोला प्रसाद आग्नेय, कवि, कथाकार, नाटककार, निबंधकार एवं कलाकार, आकाशवाणी व दूरदर्शन तथा पूर्व प्रवक्ता, मुरली मनोहर टाउन इंटर कॉलेज बलिया उ०प्र०)


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लेखक – मनोज भावुक

बिहार से सटल पूर्वी उत्तरप्रदेश के एगो जिला बा, बागी बलिया। आधिकारिक नाम त बलिया ही ह बाकिर लोग शान से बागी बलिया कहेला। एकर कई गो कारण बा, पहिला त इहें 1857 के संग्राम के क्रांतिकारी मंगल पांडे जनमलें आ दुसरका कि आजादी से 5 साल पहिले 1942 में ही 14 अगस्त के लगभग 300 आजादी के मतवाला मिलके बैरिया थाना पर तिरंगा फहरा दिहलें। बलिया के माटी में सनाइल देशभक्ति के खूने ह कि 1857 में ब्रिटिश सेना में सिपाही के पद पर तैनात एगो सामान्य आदमी के अंदर अंग्रेजन के क्रूरता अउरी गुलामी के खिलाफ बगावत के आग धधक गइल। मंगल पांडे के बग़ावत के बाद जवन चिनगारी चारू ओर भड़कल, उ सम्पूर्ण भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी आ ब्रिटिश राज के खिलाफ राजा, नवाब, जमींदार, सिपाही, युवा, किसान, रैयत, मजदूर सभके लामबंद कर देलस आ 1857 के भीषण क्रांति भइल। हालांकि अंग्रेज भारतीय लोगन के आपसी फूट आ अपना कूटनीति के चलते 1858 के मध्य आवत-आवत ई क्रांति के दमन कर देहलsसन बाकिर आजादी के बिआ त ओहि बेरा बोआ गइल रहे जवन 1947 में पूर्ण स्वतंत्रता के फल के रूप में मिलल।

1857 क्रांति के बम के सुतली में आगि लगावे वाला मंगल पांडे के जन्म 19 जुलाई 1827 में भइल रहे। उनके पिता जी के नाम दिवाकर पांडे रहे अउरी माई के नाम अभय रानी। युवा मंगल के 18 साल के उम्र में आजीविका चलावे खातिर ईस्ट इंडिया कंपनी के सेना में भर्ती होखे के पड़ल। ओह बेरा अंग्रेजन के कब्जा भारत के अधिकतर हिस्सा में हो गइल रहे आ ओकनी के अत्याचार दिन पर दिन बढ़ल चालू हो गइल रहे। पैदावार से ज्यादा लगान आ कठोर नियम कानून के चलते भारतीय लोग के मन में अंग्रेजन के प्रति गुस्सा बढ़े लागल रहे। मंगल पांडे के नियुक्ति बैरकपुर सेना छावनी में भइल रहे। उ 34वीं बंगाल नेटिव इंफॅन्टरी के पाँचवा कंपनी में सिपाही रहलन।

ओ बेरा देसी सैनिकन में अफवाह उड़ल रहे कि बहुते अंग्रेज सैनिक समुद्री मार्ग से आवत बाड़े सन आ इहाँ के भारतीय सैनिकन के मार दिहे सन। ओहि बेरा सैनिक के बीच बाइबल बँटला के अउरी ईसाई धर्म अपनवला पर विशेष सुविधा अउरी भत्ता देहला के भी खबर फइलल रहे। मंगल पांडे जइसन हजारों सिपाही ई सब के चलते ब्रिटिश राज से नाखुश रहलें। तबे सिपाहियन के नया राइफल एनफील्ड पी 53 के इस्तेमाल करे के फरमान आइल। एह राइफल में कागज के बनल कारतूस के फाड़ के ओकरा भीतर के बारूद राइफल में भर के चलावे के रहे। ई खबर फइलल कि ओह कारतूस में गाय अउरी सूअर के चर्बी से बनल ग्रीज लगावल बा। हालांकि ग्रीज ओह कागज के हर मौसम में नरम बनावे खातिर आ कारतूस के खराब होखे से बचावे खातिर लगावल गइल रहे। अब बात ई रहे कि एनफील्ड राइफल के एक हाथ पकड़े के पड़े, दूसरा हाथ से कारतूस धर के दांते से फार के नाली में भरे के पड़े। इहे बात सिपाहियन के खटक गइल। अधिकांश सिपाही हिन्दू-मुसलमान संप्रदाय के रहलें आ सबमें ई राय बन गइल कि अंग्रेज हमनी के धर्म भ्रष्ट करे खातिर ई खेल रचले बाड़ें सन। एने ईसाई में धर्मान्तरण के हल्ला सुनाते रहे।

हिन्दुस्तानी सिपाही लामबंद होखे लगलs सन। कुछ इतिहासकार के इहो मान्यता बा कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़त दबदबा के खिलाफ बगावत करे खातिर देश के राजा, जमींदार, धार्मिक नेता एकजुट होके के तैयारी करत रहलें। सभे के योजना रहे कि 31 मई 1858 के महाक्रांति होई आ एक साथे सगरो देश में अंग्रेजन के ऊपर धावा बोलाई जेकरा चलते ओकनी के पाँव उखड़ जाई। सच कहल जाव त जदि अइसन भइल रहित त देश 90 साल पहिलही आजाद हो जाइत। केतन मेहता त अपना फिलिम मंगल पांडे – द राइज़ींग में इहो देखवले बाड़ें कि मंगल पांडे कुछ अइसन नेता से मिलबो कइलें जे महा-क्रांति के योजना में शामिल रहे।

अकेले बोल देहलें अंग्रेज अफसरन पर धावा

29 मार्च 1857 के दुपहरिया में बैरकपुर में नियुक्त लेफ्टिनेंट बाग के पता चलल कि उनके कंपनी के कुछ सिपाही जे के मंगल पांडे अगुवाई करत रहलें, क्वार्टर बिल्डिंग के ओर आ रहल बाड़ें। सगरी परेड ग्राउन्ड में जमा बाड़ें आ भांग के नशा में धुत्त बाड़ें। मंगल पांडे सबसे विद्रोह करे के कहत बाड़ें आ जवन भी अंग्रेज सिपाही लउकी ओकरा के मार देबे के कहत बाड़ें। अबे इहे होत रहे तले लेफ्टिनेंट बाग घोड़ा पर चढ़ के परेड ग्राउन्ड में आ गइल। मंगल पांडे अकेले ओकरा से भिड़ गइलें आ ओकरा पर गोली चला देहलें। बाग बाँच गइल बाकिर ओकरा घोड़ा के गोली लाग गइल एही से घोड़ा आ बाग नीचे गिर गइलें। बाग अपना पिस्तौल से मंगल पर गोली चलवलस। मंगल पांडे खुद के बचा लेहलें अउरी तलवार लेके बाग पर हमला कर देहलें। कई जगह ओकर के काट के खूनम खून कर देहलें। ओहिजा सर्जेन्ट मेजर ह्यूसन भी पहुँच गइल आ मंगल पांडे ओकरो पर तलवार से वार करे लगलें। ह्यूसन जमादार ईश्वरी प्रसाद से मंगल पांडे के गिरफ्तार करे के कहलस। ईश्वरी पहिले से मंगल के पार्टी में रहलें, उ माना कर देहलें।

एतने में एगो सिपाही शेख पलटू मंगल पाण्डेय के डाँड़ में बांह डाल के पीछे से पकड़ लेहलस। मंगल पांडे तभियो तलवार चलावते रहलें। उहाँ बहुते देसी सिपाही रहलें लेकिन सब मूक दर्शक बनल रहलें। तब तक जनरल हीअरसे के एकर खबर लाग गइल रहे आ उ अपना दू गो अफसर बेटा के साथे अइलस आ सब सिपाहियन के धमकवलस कि मंगल पांडे के तुरते पकड़sलोग। जे ऑर्डर ना मानी, ओकर जान जाई। मंगल पांडे के जब लागल कि अब हम पकड़ा जाएब त उ खीस में अपना साथी सिपाहियान के गरीअवलें आ आपन बंदूक के नली छाती पर लगा के गोड़ के अंगूठा से ट्रिगर दबा देहलें। गोली फायर हो गइल, मंगल पांडे घायल होके धरती पर गिर गइलें। हालांकि कुछ दिन बाद जब उ ठीक भइलें त उनका पर मुकदमा चलल आ 18 अप्रैल के फांसी के दिन तय भइल। बाकिर एह घटना के बाद से चारु ओर मंगल पांडे के बग़ावत के चर्चा आगि लेखां फइलल आ उनका बहादुरी के तारीफ होखे लागल। एह से घबरा के अंग्रेजी हुकूमत मंगल पांडे के 8 अप्रैल के ही सरेआम फांसी पर लटका देहलस कि एगो नजीर पेश होखो आ फेर से कवनो सिपाही भा क्रांतिकारी बगावत करे से डेराव।

बाकिर भइल एकरा उल्टे। इतिहास गवाह बा कि मंगल पांडे के फांसी भारतीय दिल-दिमाग़ में आजादी के आग धधका देहलस आ ओकरा बाद पूरा भारत में जवन धमाका भइल, ओह से लंदन ले हिल गइल।



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