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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1460

डॉ. अमित कुमार मुन्नू

आज़ादी के लड़ाई में भोजपुरी माटी के बड़हन योगदान रहल बा l भोजपुरी के ई क्षेत्र वीर-बाँकुड़न के जन्मभूमिये रहल बा l भारत के पहिला राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, चंपारण आन्दोल के मुख्य यजमान बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद, बिहार के पहिलका ग़ैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा, आज़ादी पावे खातिर काला पानी के सजाय काटेवाला श्यामदेव नारायण, पटना सचिवालय पर तिरंगा झण्डा फहरावे के क्रम में शहीद उमाकांत सिंह, शहीद शिरोमणि फुलेना प्रसाद श्रीवास्तव, शहीद शुभलाल महतो, सीवान के शहीद सराय गोलीकांड में शहीद बच्चन विद्यार्थी, शहीद छट्ठू गिरि, टमटम हाँकेवाला शहीद झगड़ू साह l एकरे साथे सीवान ज़िला में शहीद सीताराम, बोधा बरई, रामसेवन राय, रामदेनी कुर्मी, मेवालाल पासवान, खखन डोम आ सीवान ज़िला के पहिला शहीद गंगा प्रसाद राय के साथे ‘बाबू’ (राजेन्द्र बाबू) के बड़ भाई महेन्द्र प्रसाद, श्रीमती प्रभावती देवी, वीरांगना तारा रानी श्रीवास्तव, श्रीमती राजवंशी देवी पर त बहुत लोग लिखल-पढ़ल आ एह लोगन के विषय में सब केहू जानेला, लेकिन आज़ादी के लड़ाई में सीवान के कई गो घटना, परिवार आ आदमी अइसनों बा जेकर जमीन पर काम आ योगदान त बहुत रहे बाकिर ओकरा के इतिहास के पन्ना में स्थान ना मिल सकल l एह से ओह लोगन के समर्पण के जानकारी क्षेत्रीय स्तर पर सिमट के रह गइल l काहेकि कवनों मन्दिर के चमकत कँगूरा त सबके ध्यान अपना ओर सहज ही आकृष्ट कर लेला l बाकिर ओह मन्दिर के नींव के मजबूती देबे खातिर ओह अँधकार के जवन ईंट आत्मसात कर लेले ओह ईंटन पर केकर ध्यान जाला ?

सन् 1921 में असहयोग आंदोलन के रचनात्मक पक्ष में दूगो काम बड़ा महत्त्व के करे के रहे-

1- राष्ट्रीय विद्यालय खोलल आ सरकारी स्कूलन के बहिष्कार

2- गाँव के झगड़न के अंगरेजन के कचहरी में ना भेज के पंचायत में ही ओकर निबटारा करावे के l

एही दूनू बातन पर आपन ध्यान केंद्रित करके सीवान ज़िला के कई लोग एह कामन में लाग गइल l सीवान में कई गो स्कूल खोलल गइल l जवना में ‘सीवान एकैडमी’ आ ‘कर्मयोगी स्कूल’ रहे l ‘सीवान एकैडमी’ स्कूल के अस्तित्व त आज नइखे l बाकिर ‘कर्मयोगी स्कूल’ आजो सरकारी स्कूल के रूप में चलता l

‘सीवान एकैडमी’ के संस्थापक आ सारण ज़िला परिषद के सदस्य बाबू बिलास बिहारी सहाय, वकील सन् 1921 में एह विद्यालय के राष्ट्रीय विद्यालय में परिणत कर देहनीं आ अपना उदेश्य के पूरा करे खातिर एह विद्यालय के प्रधानाचार्य अपना अनुज श्री रसिक बिहारी शरण, प्लीडर के बनवनीं l

बाबू रसिक बिहारी शरण देश-सेवा के काम में सुविधा होखे, एह खातिर उहाँ के छपरा के आपन चमकत वकालत के छोड़ के सीवान आ गइनीं आ उहईं वकालत करे लगनीं l इहाँ आके भी उहाँ के चैन से आपन वकालत ना कइनीं आ लगनीं देश के काम में गाँवा-गाईं के चक्कर लगावे l उहाँ के सीवान ज़िला के रघुनाथपुर थाना के पंद्रहियन गाँवन में ग्राम-पंचायत के काम खड़ा करे के बीड़ा उठवनीं l उहाँ के बड़ी लगन आ मेहनत से ओह काम के कइनीं आ ओह में सफल भी भइनीं l एतने भर ना उहाँ के दिघवलिया-सैचानी के पहिलका सरपंच भी भइनीं l ओह समय में इहाँ एतना पढ़ल-लिखल (एम. ए., एल. एल. बी.) सरपंच शायदे कोई दोसर बिहार में होखस l रसिक बाबू कांग्रेस के ‘मुठिया; (एक मुट्ठी अनाज कुल घर से) इकट्ठा करे में लोगन के हौसला बढ़ावनीं l कहल त इहाँ तक जाला कि इहाँ के जन-सम्पर्क एतना बेजोड़ रहे कि खाली सात-आठ गाँवन में पाँच महीना के भीतर चार-चार मन चाउर,आटा-दाल आदि ‘मुठिया’ के रूप में इहाँ के जमा क लेहनीं l जवना खातिर सारण ज़िला कांग्रेस कमिटी अपना सम्मेलन में इहाँ के विशेष धन्यवाद-पत्र देहलस l नमक-सत्याग्रह में रसिक बाबू आपन चमकत वकालत के छोड़ गाँव-गाँव में घूम-घूम के विदेशी वस्त्रन के बहिष्कार आ खादी के प्रचार के काम कइनीं l लोगन के खादी के इस्तेमाल करे खातिर प्रेरित कइनीं आ ओकरा पक्ष में जबरदस्त रूप से जनमत खड़ा कइनीं l इहाँ के एह कुल कामन में सर्वश्री रघुनाथ प्रसाद, धर्मनाथ मिश्र, बबन सिंह, गया दूबे आ वैदेही शरण दूबे के भरपूर सहयोग मिलल रहेl

एही तरह से राजेन्द्र बाबू के राष्ट्रपति के पद से सेवा-निवृत भइला पर सदाकत आश्रम में उहाँ के साहित्यिक-सचिव संत कुमार वर्माजी नमक आंदोलन के समय चैनपुर बाजार पर नमक बनावत, धरना देत बारह लोगन के साथे धरा गइनीं l पुलिस एह सब लोगन के बारह माइल उत्तर हसनपुरा बाजार पर अपना गाड़ी में बइठा के ले आइल आ एह बाजार में पहुँचला के बाद गाड़ी खराब के बहाना से गाड़ी ढकेले खातिर सबका के गाड़ी से उतार देहलस l एह लोगन के गाड़ी से उतरला के बाद एह लोगन के ओही जा छोड़ के पुलिस गाड़ी लेके भाग गइल l संत बाबू 13 अगस्त 1942 के जे पुलिस के डरे सीवान से भगनीं त अपना गाँवे दिघवलिया आ ओकरा बाद बलिया में जून 1943 तक फरारी के जिनगी बितवला के बादे सीवान लउकनीं l

सीवान में पटना कॉलेज जरवला के समाचार पढ़के विक्टोरिया मेमोरियल हाई इंग्लिश स्कूल आ डी. ए. वी. हाई स्कूल जरावे के काम युवा छात्रन के गुप्त संगठन ‘सिक्रेट सोसायटी’ के सदस्य लोग कइलस l एह दूनू स्कूलन के जरावे में सर्वश्री गोपीकृष्ण लाल दास, महेन्द्र कुमार, मोख्तार सिंह, विपिन बिहारी वर्मा, रामाधारप्रसाद अंशुमाली, रामचन्द्र प्रसाद, रवीन्द्रदत्त शुक्ल, श्याम किशोर तिवारी, नन्द कुमार उपाध्याय, परमानन्द यादव आ रमाकांत पाण्डेय के प्रमुख भूमिका रहे l

एह संगठन के संस्थापक सदस्य- गोपी कृष्ण लाल दास, महेन्द्र कुमार, रामचन्द्र प्रसाद, मोख्तार सिंह आ विपिन बिहारी वर्मा के सफल अगुआई में वी. एम. एच. इंग्लिश स्कूल में दू दिन ले हड़ताल करावे के काम अपना अंजाम तक पहुँचलl जवना के सफलता के उत्साह में आके ई लोगबबुनिया रोड के नीम के गाछ पर पुलिस के झाँसा देके झण्डा फहरवलसlओकरा बाद फौजदारी कचहरी पर झण्डा फहरावल गइल l जवना में श्री एस. सी. मुखर्जी एस. डी. ओ. साहेब राष्ट्रगान गइनीं आ ओकरा बाद उहाँ के लइकन पर लाठी चार्ज करा देहनीं l जवना में शंकर दास के गम्भीर चोट आइल l

एह संस्था के संस्थापकमहेन्द्र बाबू के अगुआई में पचरुखी आ सीवान में रेल लाइन आ ओकर खम्मा तुड़े के काम कइल गइल l एह काम में इहाँ के सहयोगी श्री रामनारायण प्रसाद रहनीं l सीवानजं. स्टेशन पर महेन्द्र बाबू आ श्याम किशोर तिवारी मिल के मढ़ौरा पुलिस के जवानन से रिवाल्वर छीन लेहलस आ भागे में सफल भी हो गइल l एह गुप्त संगठन के बइठक सीवान ज़िला के गाँवन में हमेशा होत रहे l बाद में एह संगठन के दिशा-निर्देश क्रांतिकारी नेता विद्या भूषण शुक्ल, वासुदेव नारायण सिन्हा, राजवंशी सिंह, जंगबहादुर सिंह (लाट साहेब) आ बिहार के टाइगर के रूप में चर्चित योगेन्द्र शुक्ल से मिले लागल l एही क्रम में सीवान के पंचमंदिरा के एह संगठन के एक गुप्त बइठक में जिलाभर के क्रांतिकारी लोग भाग लेहलस l जवना में योगेंद्र शुक्ल के देहल डायनामाइट से रेल पुलिया उड़ावे के काम के अंजाम तक पहुँचावे में रवीन्द्र नाथ शुक्ल, रामाधार प्र. अंशुमाली आ महेन्द्र कुमार सहित कुछ आउर लोग जान के बाजी लगा के पूरा कइलस l रवीन्द्र शुक्ल जी के पुलिस गिरफ्तार कइलस l अभी ई काम सेराइलो ना रहे कि सीवान थाना में राजेन्द्र गुप्ता के अगुआई में बम फेंक के ज़िला प्रशासन के चूल हिला देहल गइल l एह काण्ड में राजेन्द्र गुप्ता के बाकी सहयोगी श्याम किशोर तिवारी, महेन्द्र कुमार आ गोपीकृष्ण लाल दासत राजेन्द्र गुप्ता के साथ ही भाग गइल लोग l बाकिर थोड़े देर के बाद गुप्ता जी के घर से पुलिस उनका के धर दबोचलस आ ढंग से उनकर मरम्मत कइलस l गुप्ता जी पुलिस के ओतना मार बरदाश्त कर गइले l बाकिर अपना एह साथी लोगन के नाम ना बतवले l

एह संगठन के बाकी लोग भी अपना-अपना स्तर से सक्रिय रहे l जवना लोगन के नाम रहे-सर्वश्री वीरेन्द्र आज़ाद, रमा रमण, रामायण प्रसाद वर्मा, कपिलदेव श्रीवास्तव, पारसनाथ प्रसाद, बद्रीनाथ प्रसाद, रघुनाथ तिवारी, ललन प्रसाद, वीरेन्द्र, उमाशंकर द्विवेदी, सुरेन्द्र नाथ वर्मा, सूर्य नारायण सिंह (भोला बाबू), गणेश प्रसाद, नन्द किशोर, नारायण, विद्यानन्द दूबे, परमा यादव, किशोरी प्रसन्न सिंह, शुकदेव प्रसाद अग्रवाल, पुण्यदेव मिश्र, बद्री प्रसाद उर्फ बाबा, दीनानाथ, विश्वनाथ कलवार, राम अवतार प्रसाद, नगीना लोहार आ कौलेश्वर लोहार l एह में ई सब लोग राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ के स्वयं–सेवक भी रहे आ राष्ट्रीय-आंदोलन में भी सक्रिय रहे l

एह तरह से सीवान ज़िला स्वतंत्रता-आन्दोलन के क्रम में आपन भूमिका बखूबी निभवले बा l

(परिचय-  डॉ. अमित कुमार मुन्नू l एम ए., एल. एल. बी., पीएच. डी., स्वतंत्र पत्रकार )


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1490

भगवती प्रसाद द्विवेदी

जब 1857 में भोजपुरिया जवान मंगल पांडे के अगुवाई में सिपाही विद्रोह भइल, त सउंसे भोजपुरियन के लोहू उफान मारे लागल रहे आ जे जहवां रहे उहंवें से खिलाफत के सुर बुलंद कइल शुरू कऽ देले रहे। जन-जन में राष्ट्रीय चेतना के बोध करावे का गरज से देश के इतिहास, भूगोल, कुदरत, संस्कृति से लबरेज़ रघुवीर नारायण के ‘बटोहिया’ के सिरिजना भइल, जवन ‘भोजपुरी के वंदेमातरम्’ साबित भइल। बाकिर मुलुक के गौरवशाली इतिहास प पानी फेरेवाला अंगरेजन के करतूत प मनोरंजन बाबू के ‘फिरंगिया’ जब लिखाइल, त देश के-का छोट,का बड़-सभ केहुए के खून खौलि उठल आ घर-अंगना से खेत-खरिहान ले ओके गायन होखे लागल रहे। गांवागाईं भोजपुरी के कविताई गूंजि उठल रहे आ देश खातिर आपन जान तरहत्थी पर धऽके सभे मरि मिटे बदे तइयार हो गइल रहे। ‘बटोहिया’ आउर ‘फिरंगिया’ के तर्ज पर एगो अउरी गीत सिरिजाइल रहे ‘लुटेरवा’ आ ओकरा रचनिहार के नव महीना के कठोर जेहल के सजाइयो भुगुते के परल रहे।

‘लुटेरवा’ के अमर कवि रहलन गुंजेश्वरी मिश्र ‘सुजस’,जेकर जनम बिहार में ओह घरी के सारन जिला (अब सीवान) के बसंतपुर थानान्तर्गत गांव सैदपुर में भइल रहे। लरिकाइएं से कविताई में दिलचस्पी देखिके बाबूजी पंडित राजकुमार मिश्र उन्हुकर दाखिला छपरा के संस्कृत कॉलेज में करवा दिहलन। बाकिर गान्हीं बाबा के असहजोग आंदोलन में भागीदारी निभावत ‘सुजस’ जी पढ़ाई छोड़ि दिहलन। बाबूजी देशभक्ति से धियान भटकावे आ घर-परिवार से जोड़ेके दिआनत से शिवपुर सकरा थाना दरौली के केदारनाथ पाण्डेय के बेटी से उन्हुकर बियाह करवा दिहलन।

बाकिर गुंजेश्वरी मिश्र ‘सुजस’ त खुद के जंगे-आजादी खातिर समर्पित कऽ देले रहलन। सन् 1921 शुरू हो चुकल रहे।

‘सुजस’जी एगो नया गीत के सिरिजना कऽ दिहलन आ बेगर केहू से किछु बतवले छपरा के कमला प्रेस में जाके रातोरात आपन गीत ‘लुटेरवा’ के एक हजार कॉपी छपवा लिहलन। गीतकार का रूप में ऊ आपन नांव ना डललन आ छद्मनांव छापिके रेलगाड़ी में गा-गाके जनता के सुनावे लगलन। ऊ गांव-गांव में जासु आ ‘लुटेरवा’ गावत जनजागरन के अभियान चलावसु। उन्हुका गीत आ गायकी सुनि-पढ़िके सुननिहारन के करेजा फाटे लागत रहे। लोग मातृभूइं खातिर तन-मन-धन अर्पित करे आ सर्वस्व होम करे के किरिया खात रहे।

बाकिर ‘सुजस’ जी के गीत अंगरेजी शासन के नींन हराम कऽ दिहलस। भलहीं ओह पर उन्हुकर नांव ना रहे, बाकिर पुलिस के असलियत के भनक मिलि गइल। उन्हुका घरे जब पुलिस के छापा परल,त गीत के मूल पांडुलिपि आ छपल प्रति बरामद भइल। ‘सुजस’जी के गिरफ्तार कऽ लिहल गइल। गांव-जवार के तमाम नामी-गिरामी संभ्रांत लोग जमानत लिहल। छपरा के जिलाधीश के इजलास में मोकदिमा चलल।

आखिरकार ‘सुजस’ जी के सश्रम कारावास के सजाइ सुनावल गइल-उहो नौ महीना के कठोर सजाइ। बाकिर उहवों कवि जी ‘लुटेरवा’ गीते के गायन करत रहलन।

दरअसल ‘लुटेरवा’ में देश में कारोबार करे आइल गोरन के लुटेरा साबित कइल गइल रहे। सांच बात कहला प सोझे जेहल के हवा खिआवल जात रहे। ‘लुटेरवा’ के शुरुआती पांती प अखियान कइल जाउ-

मक्का ओ मदीना अइसन जहान रहे,

पुन्न भूंइ भीत में मिलवले, लुटेरवा!

हमनी गरीब जब कुछ मंगलीं त

झट से तें जेहल देखवले,लुटेरवा!

कवि के कहनाम रहे कि लूट-खसोट करे का संगहीं अबोध लरिकन के जान लीहल आ संतसुभाव लोगन पर बर्बर अतियाचार भला केकर दिल ना दहला दी?

सब कोई मिलके दुखवा रोवत रहे

ताहि बीचे गोलवा गिरवले लुटेरवा।

चूनवा के गड़हा में साधुन के खड़ा कके 

ऊपर से पनिया गिरवले लुटेरवा।

छोट-छोट बालकन के घमवा में खेदि-खेदि 

सभनी के जमपुर भेजवले,लुटेरवा।

सुजस जी गीत में ओह घरी के किछु वारदातो के दिल के घवाहिल करेवाला चित्र उकेरत लिखले रहलन-

उहवां जो बृधा अरु सुशील सुदेव रहें 

लंगटहीं खाड़ तें करवले,लुटेरवा।

रायबरेली में दुखिया प्रजा के ऊपर

नाहक में गोलिया चलवले, लुटेरवा।

भारत के भाई-भाई के लड़वाके राज करेवाला ई लुटेरवा कतने कलाकारन के हाथ काटिके, आंखि फोरिके चउपट बना दिहलस। आगा के पांती में कवि कहत बा-

भाई में झगड़ा लगाइ ओ रिझाइकर 

पराधीन नामवा धरवले,लुटेरवा।

जहवां के लोग रहे ब्रह्मॠषि,राजॠषि,

सभनी के गदहा बनवले,लुटेरवा।

इहवां के शिक्षित सुजन शिल्पकार रहे,

पकड़ के भांड़ में झोंकवले,लुटेरवा।

कतना के हाथ काटि,कतना के आंखि फोरि

बिलकुल तें चउपट बनवले,लुटेरवा।

कपड़ा में चमड़ा के पालिस लगाइकर

साथहीं पलेगवा भेजवले,लुटेरवा!

 

बाकिर एकरा के विडंबने कहल जाई कि ‘बटोहिया’ आ फिरंगिया के गीतकार के जवन प्रसिद्धि मिलल, ऊ ‘लुटेरवा’ के गीतकार के ना मिलि पावल। बाकिर ना त कविवर गुंजेश्वरी मिश्र ‘सुजस’ जी के देश का प्रति सच्चा समरपन के भुलाइल जा सकेला, ना एह ‘लुटेरवा ‘ के यादगार पांती के। ‘सुजस’जी के सुजस जंगे-आजादी के इतिहास में दर्ज रही।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1510

आनन्द सन्धिदूत

पहिला स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर प्रदेश का गाजीपुर जिला आ पड़ोसी बिहार राज्य का अविभाजित आरा जिला शाहाबाद का रणभूमि में मैगर सिंह एगो अप्रतिम योद्धा हो चुकल बाड़न। कहल जाला कि ई महान स्वतंत्रता सेनानी वीरवर कुंवर सिंह के विश्वसनीय सरदार रहलन आ कुंवर सिंह बलिया, आजमगढ़ आ मिर्जापुर में अंगरेजन से युद्ध में जब व्यस्त रहलन तब उनका अनुपस्थिति में आरा जिला का कई गो मुठभेड़ में अंगरेजन से लोहा लेले रहलन आ ओमे विजयो हासिल कइलन। गाजीपुर गजेटियर में मैगर सिंह के जिला के आतंक (Terror of District) लिखल बा।

मैगर सिंह का बारे में ढ़ेर जानकारी उपलब्ध नइखे। उनका माता-पिता के नाम, विवाह वगैरह पारिवारिक जीवन के जानकारी उनकर जन्म तिथि आ निधन तिथि का बारे में कुछ साफ नइखे। उनका बारे में एतने मालूम बा कि मैगर सिंह के जनम गहमर गांव में भइल रहे। ऊ जाति से सिकरवार राजपूत रहलन आ पेशा से खेतिहर किसान रहलन। गहमर का अठारह-बीस गो पट्टी में एक पट्टी के नाम मैगरो सिंह का नाम से बा आ एह तरह ऊ गांव का अठारह-बीस गो नम्बरदारन में एगो नम्बरदार रहलन। कहल जाला कि उनकर फोटो लंदन का संग्रहालय में बा। एहर हाल का बरिसन में उनकर एगो तस्वीर गूगल एप पर डाल दिहल बा। इच्छुक व्यक्ति गूगल से तस्वीर निकाल सकेलन।

मैगर सिंह सांवर रंग आ गठीला बदन के युवक रहलन। ओह जमाना में गांव का नवयुवकन में शारीरिक ब्यायाम, कुश्ती, दण्ड बैठक वगैरह के सवख रहे। एक साथ शरीरिक अभ्यास कइले युवकन में एगो संगठन बन गइल रहे जेकर नेता मैगर सिंह रहलन। ई दल तीर धनुष तलवार आ गुरदेल का लड़ाई में माहिर रहे। एह दल का गुरदेल के कइल आक्रमण के सामना अंगरेज अपना बन्दूक से करे में असमर्थ रहलन स।

मैगर सिंह के अंगरेजन से निर्णायक युद्ध अविभाजित आरा जिला का खीरी गांव में भइल। एह लड़ाई के निर्णायक तत्व ई रहे कि खीरी गांव आ आसपास के जनता दिल खोल के मैगर सिंह का दल के साथ दिहलस। अगर मैगर सिंह के दल अंगरेजन का सैनिक टुकड़ी के बहका के गांव का गलियन में ले आइल त गांव के मेहरारू तसला में पानी खउला के मकान का खपड़ा-मड़ई का ऊपर से अंगरेजन पर फेंके सुरु कइली स। जवना अंगरेज आ ओकरा घोड़ा पर ई खउलत पानी पड़े ऊ घायल हो जात रहलन स। अगर कवनो तरह ऊ भागे के कोशिश कर स त गली का मोहाना-कोनचा मैगर सिंह के सैनिक गुरदेल आ तीर-धनुष से आक्रमण करत हालत बेदिन कइ द स। मैदान में अइलो पर अंगरेजन के खैर ना रहे। मैदान में पतलो (सरपत) के जंगल रहे जवना में स्वतंत्रता सैनिक छिपल बइठल रहसन आ मोका पवते अंगरेजन पर टूट पड़ सन। एह लड़ाई में अंगरेजन के बुरी तरह हार भइल आ मैगर सिंह का टुकड़ी के भारी मात्रा में लड़ाई के हरबा-हथियार आ अउरी युद्ध सामग्री हाथ लागल। लड़ाई का बाद मैगर सिंह गहमर वापस लवटि अइलन।

तब तक स्वतंत्रता संग्राम धीमा पड़त नजर आइल। बहादुर शाह जफर गिरफ्तार हो चुकल रहलन। लक्ष्मीबाई वीरगति के प्राप्त हो चुकल रहली। नाना साहब पेशवा कहां गइलन पता ना चलत रहे। कुंवर सिंह घायल अवस्था में सोन नदी का किनारे-किनारे मिर्जापुर जिला से चल के अपना गांव जगदीशपुर आके जीवन का अन्तिम पड़ाव पर रहलन। देश के अधिकांश राजा-रजवाड़ा अंगरेजन का पक्ष मे रहलन ओह में डुमरांव नरेश भी रहलन जेकर कुंवर सिंह से खून के रिश्ता रहल। गोरखा आ सिख सैनिकन के अंगरेजन का साथ दिहला से स्वतंत्रता संग्राम दिन पर दिन कमजोर होत जात रहे। अइसन में ना त मैगर सिंह के कहीं से दिशा निर्देश मिलत रहे ना कवनो उत्साहजनक खबर आवति रहे। ई जान के कि जिला के आतंक मैगर सिंह गहमर में छिपल बाड़न गहमर का जनता पर उनके गिरफ्तार करावे के दबाव बढ़ल जात रहे। जिला के पुलिस गहमर में रात दिन चौकसी में लागल रहे।  गांव के हरबा-हथियार सेना-पुलिस द्वारा जब्त करावल जात रहे। हालत ई रहे कि भाला-गंड़ासा जइसन लड़ाई के औजार त जब्त भइबे कइल, गांव में केहू का घरे पहसुल, हंसुआ आ चाकू-छुरी तक सब्जी-तरकारी काटे के ना रहि गइल। अंगरेज गांव में डुग्गी पिटवा के एलान करत रहलन स कि अगर मैगर सिंह के सेना-पुलिस का सुपुर्द ना कइल गइल त पूरा गांव के जरा के राख कइ दिहल जाई। लेकिन गांव के जनता हर जुल्म सहे के तइयार रहे मगर मैगर सिंह के अंगरेजन का सुपुर्द करे के तइयार ना रहे।

मैगर सिंह से ई स्थिति बरदास ना भइल। जवना क्षेत्र के स्वतंत्रता का कारन ऊ हथियार उठवले रहलन ओही क्षेत्र में उनका कारन अग्नि संहार हो ई आशंका उनकर अन्तरमन स्वीकार ना कइलस। ऊ तय कइलन कि कलकत्ता में गवर्नर जनरल विलियम वेन्टिंग का सामने ऊ आत्म समर्पण करिहन। अपना हरबा हथियार आ अश्व का साथ ऊ पनरह दिन यात्रा कइ के गहमर से कलकत्ता गइलन आ सीधे गवर्नर जनरल का बइठका में जाके खड़ा हो गइलन। विलियम बेंन्टिंग साधु स्वभाव के दयालु शासक रहे ऊ मैगर सिंह से उनकर परिचय पुछलस। मैगर सिंह शान्त भाव से आपन नांव बतावत कहलन कि ऊ आत्म समर्पण करे आइल बाड़न। मैगर सिंह के नाम सुनके बेन्टिंग के बीवी भीतर का कमरा से दउर के बइठका में आइलि। जेकरा आतंक से पश्चिमोत्तर प्रान्त (यू.पी. के पुरान नाम) के अंगरेज त्राहि-त्राहि करत रहलन स ओके ऊ अपना आंख से देखे चाहति रहे।

सारी कार्रवाई पूरी कर के मैगर सिंह के आजीवन कारावास के सजा भइल आ उनके बर्मा (अब म्यामार) भेज दिहल गइल। कहल जाला कि उनका मिलनसार व्यवहार आ सहयोगात्मक रवैया से प्रभावित होके सरकार उनके समय से पहिले छोड़ देले रहे। उनकर निधन गहमर में आके भइल। गहमर में उनकर स्मारक बनल बा जेकर उद्घाटन सन् 1961 में तत्कालीन रेलमंत्री बाबू जगजीवनराम द्वारा भइल रहे।


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1460

ज्योत्स्ना प्रसाद

ब्रजकिशोर तुम रहे हमारे, ब्रजकिशोर तुम रहे हमारे

राष्ट्रपिता के सहकर्मी हे मातृभूमि के प्यारेs !

स्वतंत्रता की रंगीनी में रंग तुम्हारा रंगा हुआ था

इंक़लाबी इतिहास तुम्हारे कर-कमलों का गढ़ा हुआ है

तेरी प्रतिभा से भास्वर है नीले नभ की सीमा पार

ब्रज किशोर तुम रहे हमारे, ब्रजकिशोर तुम रहे हमारे l’

प्राचार्य स्व. रामचन्द्र त्रिपाठी के एही पंक्तियन से हम ब्रजकिशोर बाबू के स्मरण करत आपन बात आगे बढ़ावे के चाहेब l जब कई दशकन से भारत माता अंगरेजन के गुलामी के जंजीर में बंधल छटपटात होखस तब ब्रजकिशोर बाबू जइसन एक संवेदनशील आ कर्मठ बेटा हाथ पर हाथ रख के कइसे बइठल रह सकेला ? जबकि स्वतंत्रता-आन्दोलन के यज्ञ में औकातभर आपन कर्म-समिधा डाले खातिर भारतमाता के हर विवेकी संतान छटपटा रहल होखे l

भारतीय स्वतंत्रता–संग्राम के दौरान वर्तमान सीवान ज़िला स्वतंत्रता-संग्राम के प्रमुख केन्द्रन में से एक रहे l इहाँ के किशोर-युवा ‘सिक्रेट सोसायटी’ के तहत सुभाषचन्द्र बोस आ भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद से प्रभावित हो अपना काम के अंजाम देत रहले त अधिकांशत: सयान आ अनुभवी लोग गाँधीजी से प्रभावित रहे l सीवान ज़िला के उल्लेखनीय नामन में से बा- सर्वश्री डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, महेन्द्र प्रसाद (राजींदर बाबू के बड़ भाई), मौलाना मज़हरुल हक़ आ फुलेना प्रसाद इत्यादि l

ब्रजकिशोर प्रसाद के जन्म वर्तमान सीवान जिला के श्रीनगर में 14 जनवरी 1877 में एगो कायस्थ परिवार में भइल रहे l इहाँ के बाबूजी के नाम रहे रामजीवन लाल आ माई के नाम रहे समुद्री देवी l इहाँ के माई बहुत ही सरल आ सात्विक प्रवृति के महिला रहनीं l ब्रजकिशोर बाबू के परिवार अपना इलाक़ा के सम्पन्न परिवार में गिनल जात रहे l जमीन-जायदाद के साथ ही इहाँ के बाबूजी नौकरी भी करत रहनीं l एह से इहाँ के शिक्षा में कभी कवनों आर्थिक व्यवधान ना आइल l

ब्रजकिशोर बाबू के प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही भइल l जहाँ उहाँ के उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी आ संस्कृत भाषा के शिक्षा ग्रहण कइनींl उहाँ के ओह घड़ी के प्रचलन के मोतबिक सन् 1888 में, यानी बहुत कमे उमिर में फूल देवी से बिआह हो गई l बाकिर उहाँ के बिआह से पढ़ाई में कोई व्यवधान ना पड़ल l

ब्रजकिशोर बाबू के बाबूजी गया में नौकरी करत रहनीं l एह से ब्रजकिशोर बाबू के माध्यमिक शिक्षा गया के ज़िला स्कूल से भइल l कलकत्ता प्रेसीडेंसी कॉलेज से उहाँ के बी. ए. आ एम. ए. कइनीं l एकरे बाद उहाँ के बाबूजी के स्वर्गवास हो गइल l बाकिर एह से उहाँ के घबड़इनीं ना बल्कि ओह विपरीत परिस्थिति में भी आपन आगे के पढ़ाई जारी रखनीं आ सन् 1898 मे क़ानून के पढ़ाई पूरा कइनीं l

जवना घड़ी ब्रजकिशोर बाबू के पढ़ाई-लिखाई चलत रहे ओह घड़ी बिहार में आधुनिक शिक्षा के अर्थ रहे जमींदार लोगन द्वारा खोलल ऊ स्कूल-कॉलेज, चाहे ओह तरह के स्कूल-कॉलेज जवना केमाध्यम अँग्रेज़ी होखे l चाहे शिक्षा में अँग्रेज़ी भाषा पर बल देहल जात होखे l जवना के मूल उद्देश्य ई रहे कि जमींदार लोगन के बच्चा अइसन पढ़ाई पढ़े जवना से ओह लोगन के अँगरेजी सम्राज्य आ शासन-पद्धति से परिचय हो सके आ ओकरा के ठीक-ठीक समझे के परिस्थिति उत्पन्न हो सके l ताकि ऊ लोग ब्रिटिश सरकार के सही-सही आंकलन करते हुएसोच-विचार के ई निर्णय ले सके कि ओह परिस्थिति में ओह लोगन के ब्रिटिश सरकार से आपन सम्बंध कइसन बनावे के चाहीं ? ओकरा खातिर कइसन रणनीति बनावल जाव ? इत्यादि-इत्यादि l

ब्रजकिशोर बाबू अपना दूरदृष्टि के परिचय देत स्त्री आ पुरुष दूनू के अँग्रेज़ी पढ़े खातिर प्रोत्साहित करत रहनीं आ उच्च शिक्षा खातिर लोगन के विदेश जाये के बढ़ावा देत रहनीं l एकरा खातिर उहाँ के संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठके जे लोग विदेश से आपन पढ़ाई पूरा करके वापस आवत रहे ओह लोगन के सम्मान में भारत लौटला पर रात्रिभोज के आयोजन भी करत रहनीं आ एह तरह के  आयोजन में शामिल भी होत रहनीं l

ब्रजकिशोर बाबू एक ओर विद्वान, उदार, परोपकारी, न्यायविद्, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी रहनीं उहईं दोसरा ओर उहाँ के एक न्यायप्रिय आ निर्भीक सेनानी भी रहनीं l एह से गाँधीजी के चंपारण आवे के पहिले से ही उहाँ के क़ानून के माध्यम से चंपारण के किसानन के दुख-दर्द ब्रिटिश सरकार तक पहुँचावे के भरसक कोशिश करत रहनीं l हालाँकि ओह कोशिश से किसानन के कवनों बहुत लाभ ना भइल l बाकिर एतना त जरूरे भइल कि किसानन के दुख आ शिकायत ब्रिटिश सरकार के नजर में आ गइलl एतने भर ना जवना घड़ी लोग अंग्रेजन के नाम लेबे से डेरात रहे ओह घड़ी भी उहाँ के आपन बात रखे के साहस रखत रहनीं l

ब्रजकिशोर बाबू के समय छपरा वकालत खातिर बहुत मशहूर रहे l एह से ब्रजकिशोर बाबू भी आपन वकालत छपरा से ही शुरू कइनीं आ देखते ही देखते काफी प्रसिद्ध हो गइनीं l बाकिर डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के सुझाव पर छपरा छोड़ के दरभंगा में वकालत करे लगनीं l एही बीच इंपीरियल कौंसिल के चुनाव में दरभंगा महाराज के विरुद्ध सिन्हा साहेब खड़ा भइनीं l एह चुनाव में ब्रजकिशोर बाबू खुलके सिन्हा साहेब के साथ देहनीं l एही घटना के बाद से ब्रजकिशोर बाबू सियासी जीवन के ओर आपन क़दम बढ़वनीं आ खुलके सियासत में दिलचस्पी लेबे लगनीं l एकर परिणाम ई भइल कि उहाँ के सन् 1910 ई. में दरभंगा नगर परिषद के सदस्य निर्वाचित भइनीं आ एही साले बंगाल विधान परिषद के निर्वाचित सदस्य भी बन गइनीं l ई बात तब के ह जब बिहार एक अलग राज्य ना रहे आ बिहार के अलग राज्य के दर्जा दिलावे खातिर ज़ोर-शोर से आन्दोलन चलत रहे l ओह आन्दोलन के ब्रजकिशोर बाबू एगो प्रमुख नेता रहनीं आ बिहार प्रांतीय सम्मेलन में लगातार हिस्सा लेत रहनीं l ई आन्दोलन लम्बा चलल आ सन् 1912 में बिहार के अलग राज्य के दर्जा मिलल l ब्रजकिशोर बाबू बिहार आ उड़ीसा विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित भइनीं l एही साले बांकीपुर में कांग्रेस पार्टी के सलाना अधिवेशन भइल, जबना के कामयाब बनावे खातिर ब्रजकिशोर बाबू बहुत मेहनत कइनीं l ई बात जवना घड़ी के ह ओह घड़ी भारत के बॉयसराय रहले लॉर्ड हार्डिंग l संयोग से ऊ बिहार के अलग राज्य के दर्जा दिलावे में व्यक्तिगत तौर से दिलचस्पी लेहले रहले l एह से बिहार राज्य के स्थापना खातिर संघर्षरत लोगन के मन मे ई विचार आइल कि लॉर्ड हार्डिंग के एह सहयोग खातिर उनका सम्मान में एगो स्मारक के स्थापना कइल जाव l सन् 1913 में हार्डिंग मेमोरियल समिति बनावल गइल l जेकरा द्वारा हार्डिंग पार्क के स्थापना भइल l एह कमिटी के ब्रजकिशोर बाबू एगो महत्वपूर्ण सदस्य रहनीं l

ब्रजकिशोर बाबू किसानन के स्थिति से बहुत दुखी रहनीं l एह से उहाँ के 10 अप्रैल सन् 1914 में बिहार प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण में भी किसानन के मुद्दा पर ही बल देहनीं l सन् 1916 में लखनऊ में कांग्रेस के सलाना बैठक भइल l जवना में पटना यूनिवर्सिटी के स्थापना के लेके चर्चा भइल l एह चर्चा में ब्रजकिशोर बाबू बढ़-चढ़ के हिस्सा लेहनीं आ रामचन्द्र शुक्ल के साथे गाँधी जी के चंपारण के किसानन के स्थिति बतावत चंपारण आवे के निवेदन भी कइनीं l

गाँधीजी जब चंपारण में सत्याग्रह शुरू कइनीं तब ओह सत्याग्रह के कामयाब बनावे खातिर ब्रजकिशोर बाबू, राजेन्द्र बाबू आ अनुग्रह नारायण के साथे बहुत मेहनत कइनीं l ब्रजकिशोर बाबू ओह आन्दोलन के समय गाँधीजी के साया के तरह रहनीं l कई बार त एने गाँधीजी अंगरेज अधिकारी से बात करत रहनीं आ ओने ब्रजकिशोर बाबू ओही सिलसिला में पटना, राँची आ कलकत्ता के लगातार दौरा करत रहनीं l एकरा साथ ही उहाँ के एह विषय पर कईगो लेख भी लिखनीं l सन् 1918 में सच्चिदानंद सिन्हा आ हसन इमाम मिलके जब ‘सर्चलाइट’ अख़बार निकललस लोग तब ओकर हिन्दी संस्करण ‘देश’ के जिम्मेदारी ब्रजकिशोर बाबू अपना ऊपर ले लेहनीं आ ओकर संपादक बन गइनीं l

सन् 1920 में असहयोग आ ख़िलाफत आन्दोलन में भी ब्रजकिशोर बाबू बड़ा मनोयोग से हिस्सा लेहनीं आ अपना देश के आज़ादी खातिर आपन चलत वकालत के त्याग के पूर्ण कालिक आंदोलनकारी बन गइनीं l

गाँधी जी जब अंगरेजन के खिलाफ़ असहयोग आंदोलन शुरु कइनीं तब गाँधी जी के आह्वान पर छात्रन-द्वारा अंग्रेज़ी–शिक्षा के भी बहिष्कार भइल l एह छात्रन के भारतीय पद्धति से शिक्षा दिलावे खातिर पूरा देश में तीनगो विद्यापीठ- काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ आ बिहार विद्यापीठ के स्थापना भइल l बिहार के राजधानी पटना में 6 फरवरी सन् 1921 में स्वतंत्रता सेनानी ब्रज किशोर बाबू, मौलाना मज़हरुल हक़, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आ स्वयं गाँधी जी मिलके एकर स्थापना कइनीं l एकरा उद्घाटन में गाँधी जीकस्तूरबा गाँधी आ मोहम्मद अली के साथे पटना आइल भी रहनीं आ बिहार विद्यापीठ के विधिवत उद्घाटन भइल lगाँधी जी मौलाना मज़हरुल हक़ के बिहार विद्यापीठ के प्रथम चांसलर बनवनीं आ ब्रज किशोर बाबू के प्रथम वाइस चांसलर के पद के शोभामान कइनीं l एकरा साथ ही ब्रज किशोर बाबू काशी विश्वविद्यालय आ पटना यूनिवर्सिटी के सीनेट के सदस्य भी रहनीं l

सन् 1922 में गया में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन भइल जवना के ब्रजकिशोर बाबू स्वागताध्यक्ष रहनीं l ओह अधिवेशन के सफल बनावे में उहाँ के बहुत परिश्रम कइनीं l हालाँकि एही अधिवेशन में कांग्रेस के अंतर्विरोध खुल के सामने आ गइल आ कांग्रेस दू भाग में बँट गइल l बावजूद एकरा ब्रजकिशोर बाबू देश के प्रति आपन सकारात्मक भूमिका निभावत सदा सेवारत रहनीं l सन् 1928-29 में बिहार प्रांतीय कांग्रेस समिति के जब गठन भइल तब उहाँ के दीप नारायण आ शाह मो. ज़ुबैर के साथे ओह समिति के उपाध्यक्ष चुनल गइनीं l

सन् 1930 में गाँधीजी के नमक आन्दोलन के बिहार में कामयाब बनावे खातिर ब्रजकिशोर बाबू बहुत प्रयत्न कइनीं l जब 26 जनवरी सन् 1931 में सम्पूर्ण भारत में स्वतंत्रता दिवस मनावल गइल तब पटना के भँवरपोखर पार्क में बाबू अनुग्रह नारायण राष्ट्रीय झण्डा फहरवलन l ओही झण्डा के नीचे उहाँ उपस्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, ब्रजकिशोर बाबू, प्रो. अब्दुल बारी आदि सभे क़सम खइलस कि भारत के स्वतंत्रता मिले तक ऊ लोग संघर्षरत रही l

3 जनवरी सन् 1932 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा सदाक़त आश्रम में एगो मीटिंग बुलावल गइल l ओही मीटिंग के दौरान सदाक़त आश्रम में छापा पड़ गइल आ ब्रजकिशोर बाबू सहित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जगत नारायण लाल, मथुरा प्रसाद, प्रजापति सिंह, कृष्ण वल्लभ सहाय के गिरफ़्तार कर लेहल गइल आ सरकार द्वारा सदाक़त आश्रम पर आपन क़ब्ज़ा करके यूनियन जैक फहरा देहल गइल l

ब्रजकिशोर बाबू के पहिले बांकीपुर जेल मे रखल गइल फेर उहाँ के हज़ारीबाग़ भेज देहल गइल l उहाँ के पाँच महीना के क़ैद के सज़ा भइल l जेल के सज़ा में उहाँ के शरीर टूट गइल रहे l एह से जेल से बाहर अइला के बाद भी सेहत में सुधार ना आइल l अपना ओही स्थिति में आपन क़सम भी निभावे के रहे l एह से उहाँ के स्वास्थ्य में सुधार ना हो पावत रहे l आज़ादी खातिर संघर्ष करे वाला ब्रज किशोर बाबू आज़ादी के सवेरा देख ना पइनीं आ अपना आँखन में भारत के आज़ादी के सपना लेहले सन् 1977 में एह दुनिया से विदा ले लेहनीं l

सन् 1934 में बिहार में भयंकर भूकम्प आइल l अइसन समय में ब्रजकिशोर बाबू अपना शरीर के चिंता छोड़ के भूकम्प पीड़ित लोगन के सेवा में जुट गइनीं l बाकिर उहाँ के शरीर उहाँ के साथ ना दे पावत रहे l एह से रह-रह के उहाँ के बीमारी पटक देत रहे l उहाँ के अपना जीवन के अन्तिम दस बरिस ले बीमारी से बड़ा कष्ट भइल l

ब्रजकिशोर बाबू के चारगो संतान रहे l जवना में दूगो बेटा रहले आ दूगो बेटी रहली l उहाँ के बेटा लोगन के नाम रहे- विश्वनाथ प्रसाद आ शिवनाथ प्रसाद l बेटी लोगन के नाम रहे- प्रभावती देवी आ विद्यावती देवी l विद्यावती देवी के बिआह डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बड़ बेटा मृत्युंजय बाबू से भइल रहे l एह तरह से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद उहाँ के समधी रहनीं l ब्रजकिशोर बाबू के बड़की बेटी प्रभावती देवी के नाम त इतिहास में दर्जे बा l

ब्रजकिशोर बाबू अपना ज़िंदगीभर सिर्फ़ स्त्री शिक्षा आ परदा-प्रथा के विरोध ही ना करत रहनीं बल्कि अपना बेटीयन के भी एकर महत्त्व समझवनीं आ अपना एक काम में आगे बढ़े खातिर अपना बड़ बेटी प्रभावती जी के भी लगवनीं l

प्रभावती देवी ब्रजकिशोर बाबू के पद चिन्ह पर चलत स्वयं एगो स्वतंत्रता सेनानी रहनीं l उहाँ के बिआह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता आ जेपी आन्दोलन के पुरोधा जयप्रकाश नारायण जी से भइल रहे l इहाँ के चंपारण में गांधीजी के प्रथम सहयोगी ब्रजकिशोर बाबू के पुत्री त रहबे कइनीं साथ ही गाँधीजी के मानस-पुत्री के गौरव भी इहाँ के प्राप्त रहे l

चंपारण के किसान आंदोलन, जेकर ब्रजकिशोर बाबू के यजमान कहल जाला, ऊ आंदोलन गाँधीजी के भारत में लोकप्रियता दिलावे में बहुत योगदान कइले बाl सन् 1917 के ई चंपारण सत्याग्रह गाँधी जी के साथ एह तरह से जुड़ गइल बा कि गाँधी जी के जीवनी एकरा बिना पूर्णता ना पा सकेला l काहेकि ई भारत में गाँधी जी के दक्षिण अफ्रीका में आजमावलसत्याग्रह के पहिला प्रयोग रहे l एकर महत्त्व एही से समझल जा सकेला कि गाँधी जी के जीवनी चंपारण सत्याग्रह के बिना पूरा ही ना हो सकेला आ गाँधी जी के बिना चंपारण सत्याग्रह के त कल्पना भी ना कइल जा सकेला l एही सत्याग्रह के बाद गाँधी जी के लोकप्रियता के ग्राफ में काफी उछाल आइल l तत्कालीन समाचार पत्रन में गाँधी जी के एह सफलता के काफी प्रमुखता से स्थान मिलल l जवना के बाद ब्रिटिश शासन के

गाँधी जी अपना आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के पाँचवा भाग के बारहवाँ अध्याय ‘नील का दाग’ में लिखतानीं- ‘लखनऊ कांग्रेस में जाने से पहले तक मैं चंपारण का नाम तक न जनता था l नील की खेती होती है, इसका तो ख्याल भी न के बराबर था l इसके कारण हज़ारों किसानों को कष्ट भोगना पड़ता है, इसकी भी मुझे कोई जानकारी न थी l’ एही किताब में गाँधी जी आगे लिखतानी- ‘राजकुमार शुक्ल नाम के चंपारण के एक किसान ने वहाँ मेरा पीछा पकड़ा । वकील बाबू (ब्रजकिशोर प्रसाद, बिहार के उस समय के नामी वकील और जय प्रकाश नारायण के ससुर) आपको सब बतायेंगे, कहकर वे मेरा पीछा करते जाते और मुझे अपने यहाँ आने का निमंत्रण देते जाते l’ ओही अधिवेशन में ब्रजकिशोर बाबू चंपारण के दुर्दशा पर आपन बात रखनीं l चूँकि गाँधी जी चंपारण के दुर्दशा से अनभिज्ञ रहनीं एह से ब्रजकिशोर बाबू ही उहाँ के सामने चंपारण के परिस्थिति के चित्र उकेरनीं l ब्रजकिशोर बाबू के संगठनात्मक क्षमता, कानूनी कौशल से गाँधी जी के किसानन के दुख दूर करे में मदद मिलल l

गाँधी जी के उहे चंपारण सत्याग्रह जवना के ब्रज किशोर बाबू के यजमान कहल जाला ऊ सिर्फ़  भारतीय इतिहास में ही ना बल्कि विश्व इतिहास में भी आपन नाम दर्ज क लेहलस l काहेकि इतिहास के ई घटना ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खुलल चुनौती रहे l ई घटना से गाँधी जी के ‘महात्मा’ बने के मार्ग भी प्रशस्त भइल l एह घटना से गाँधी जी के एक ओर लोकप्रियता बढ़त गइल उहईं दोसरा ओर ब्रिटिश सरकार पर जीत के ओर उहाँ के एक-एक सीढ़ी चढ़त गइनीं l पहिला जीत रहे निलहन के जाँच कमिटी के गठन, ओह कमिटी में गाँधी जी के सदस्य बनना दूसरा जीत रहे आ तीसरा जीत ‘तीन कठिया-प्रथा’ के समाप्त कइल रहे l किसान अपना जमीन के मालिक बन गइले l ई सब एक-एक कड़ी मिलके भारत में गाँधी जी के सत्याग्रह के पहिला विजय-शंख फूँकाइल आ देखते-देखते चंपारण गाँधी जी के भारत में सत्याग्रह के जन्म-स्थली बन गइल l गाँधी जी के एह सत्याग्रह में कानून से लेके ज़मीन तक में ब्रजकिशोर बाबू के साथ मिलल l उहाँ के गाँधी जी के साथे साया नाहिंन लागल रहनींl जवना से प्रभावित होके गाँधी जी अपना आत्मकथात्मक किताब ‘द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरीमेंट्स विथ ट्रूथ’ में ‘द जेंटल बिहारी’नाम से एओ पूरा अध्याय ही लिख देले बानीं l दोसरा ओर एह घटना के ओह क्षेत्र खातिर दूरगामी परिणाम भी निकलल l क्षेत्रीय-विकास के पहल भइल जवना के अन्तर्गत पाठशाला, चिकित्सालय, खड़ी संस्था, आश्रम आदि के स्थापना भइल l

ब्रज किशोर बाबू के कर्मयोग के ऋणी बिहार समय-समय पर उहाँ के अपना तरह से श्रद्धांजलि भी अर्पित करेला l 21 अगस्त, 2016 में पटना बीट्स स्टाफ द्वारा ‘ब्रजकिशोर प्रसाद द फॉर्गाटन हीरो ऑफ बिहार’ के नाम से एगो किताब छपल बा जवन एक तरह से सिर्फ़ एगो ऐतिहासिक दस्तावेज ही ना ह बल्कि एक शोधात्मक ग्रंथ भी हl ‘द नेशनल बुक ट्रस्ट,’ इण्डिया द्वारा हाल ही में सचिदानंद सिन्हा द्वारा ब्रजकिशोर बाबू पर लिखल पुस्तक ‘द हीरो ऑफ द बैटल’ प्रकाशित भइल बा l देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साहित्यिक सलाहकार संत कुमार वर्मा द्वारा ब्रजकिशोर बाबू के जीवनी ‘बाबू ब्रज किशोर प्रसाद’ के नाम से दशकों पहिले छप चुकल बा l ब्रजकिशोर स्मारक संस्था द्वारा भी ब्रज किशोर बाबू के जीवनी प्रकाशित भइल बा l

चूँकि ब्रज किशोर बाबू के ई मत रहे कि शिक्षा के अभाव में ही चंपारण के किसानन के अधिक दुरगती भइल l एह से उहाँ के स्कूल के जरूरत पर आ गाँवा-गायीं बालक-बालिका के शिक्षा पर भी बहुत बल देत रहनीं l एह से उहाँ के स्मृति में भी पुरनका सारण ज़िला में कई गो शैक्षणिक संस्था खोलल गइल बा l उहाँ के जन्मस्थली श्रीनगर में सीवान के स्वतंत्रता सेनानी महेन्द्र कुमार (सीवान ज़िला के पहिला डब्बल एम. ए. आ शिक्षाविद् ) ब्रज किशोर बाबू के आकांक्षा आ शिक्षा के महत्त्व के ठीक-ठीक पहचानत रहनीं l एह से ब्रज किशोर बाबू के स्मृति में उहाँ के प्राइमरी से लेके इण्टर मीडिएट तक दू गो स्कूल खोलले बानीं l उहें के प्रयत्न आ स्थानीय लोगन के सहयोग से ब्रज किशोर बाबू के जन्म शताब्दी के बहुत बड़ा पैमाना पर मनावल गइल l ओह समारोह के मुख्य अतिथि रहनीं अनेक बार केन्द्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुकल जगजीवन राम, जेकरा प्रथम दलित उपप्रधान मंत्री के गौरव भी प्राप्त बा l

अंत में हम स्व. शैलजा कुमारी के कविता के चंद पंक्तियन से ब्रज किशोर बाबू के श्रद्धांजलि देत आपन बात खत्म करतानीं l-

‘वे थे स्वतंत्रता के अग्रदूत भारत के वीर सपूतों में

नव भारत भाग्य-विधाता थे, स्वराष्ट्रव्रती उद्भूतों में l

हे जन-मानस के राजहंस अब भी उठती मन में हिलोर

कैसे दर्शाएँ भाव-विमल शत-नमन तुम्हें हे ब्रज किशोर l’

 


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Hum BhojpuriaSeptember 27, 20211min1450

डॉ. ब्रजभूषण मिश्र

राष्ट्रीयता के भाव एतना प्रबल होले कि ओकरा आगे आन स्थायी भाव फीका पड़ जाला। बाकिर ई भाव स्थायी ना होखे,कुछ समय खातिर होला। राष्ट्रीयता सर्वकालीन आ सार्वलौकिक भाव ना ह। बाकिर क्षणे भर खातिर काहे ना होखे, ई भाव पैदा होके भगत सिंह जइसन नवही के एसेम्बली में बम फेके खातिर प्रेरित कर सकत बा, चन्द्रशेखर आजाद से डाका डलवा सकत बा, उधम सिंह से गोली चलवा सकत बा।

सवाल इहो उठत बा कि राष्ट्रीयता के कवना रस के अंन्तर्गत स्थान दिआई। उत्तर में कवनो एक रस के नाम लिहल कठिन बा। जब राष्ट्र खातिर प्रेम के भाव उमड़ी, त एकरा के ‘श्रृंगार’ के अंन्तर्गत मानल जाई। जब देश के दुर्दशा से मन दुखित हो जाई, त ई ‘करुण रस’ के अन्तर्गत आई। जब देश माता रूप में लउकी त ‘भक्ति रस’; राष्ट्र खातिर लड़े-भिड़े के भाव जनमी, त ‘वीर रस’ आ ओही तरह ‘भयानक ‘,’वीभत्स’ आ ‘रौद्र ‘ सबके अंन्तर्गत एकर समावेश हो सकत बा। एकरा जड़ में आत्म-रक्षा, आत्म-गौरव के रक्षा, आपन राष्ट्र आ जाति का रक्षा के भाव लागल रहेला, एह से ई वीरे रस के अन्तर्गत मुख्य रूप से आई आ एह ‘वीर रस’ के भाव अधिका बाहरीये संकट से आवेला।

विद्वान लोग के मत बा कि राष्ट्रीयता का भावना के आधुनिक रूप के विकास यूरोप में भइल। बाद में ई धीरे-धीरे सँउसे संसार में फइल गइल। यूरोप में एकरा उद्भावना के कारण रहे। ऊहां छोट-छोट राज्य बहुत रहे। आपन धर्म, सभ्यता, संस्कृति के बरकरार राखे खातिर इहाँ बराबर प्रयास होत रहल। एही से राष्ट्रीयता का भावना के विकास भइल।

कुछ लोग के इहो मान्यता था कि एह भावधारा के सूत्र वैदिको साहित्य में मिलत बाटे-

“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या:।” ऊ लोग जे फ्रांस के राज्यक्रांति से राष्ट्रीयता के जनम मानत बाड़े,का एह बैदिक ॠचा में राष्ट्रीयता के भाव नइखन पावत। संध्या उपासना करेवाला लोग एगो श्लोक से जल शुद्ध करेलन-

गंगे च यमुने चैव गोदावरी! सरस्वती!

नर्मदे! सिन्धु! कावेरि! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।

का एह श्लोक में राष्ट्रीयता के अभाव लउकत बा?

एह तरह से ई कहल जा सकत बा कि हमनी किहाँ आज के साहित्य भा कविता में जे राष्ट्रीयता के भाव आइल बा ओकर परम्परा वैदिक साहित्य से आइल बाटे, ऊ भाव खाली यूरोप के देखा-देखी नइखे पैदा भइल।

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भोजपुरी कविता में जब राष्ट्रीयता का भाव के बात उठत बा, त एकर उद्भव अंग्रेजी राज्य के  प्रतिक्रिया के रूप में सामने आइल बाटे। बीसवीं सदी के प्रथम चरण में रघुवीर नारायण आ प्राचार्य मनोरंजन बाबू भोजपुरी में देश-प्रेम आ देश के दुर्दशा के वर्णन कइलें। जन सामान्य के जगावे खातिर ई लोग के राष्ट्रीयता के स्वर मुखर कइल। सन् 1912 ई० में रघुवीर नारायण जी के लिखल आ प्रसिद्धि पावल गीत ‘बटोहिया’ के प्रकाशन 1917 ई० में हो गइल रहे। ई गीत भोजपुरी राष्ट्रगीत के रूप में सनमान पवलस। एह गीत में सउँसे भारत के मन हर लेवे वाला प्रदेश के चित्र खिंचाइल बाटे। एह में राष्ट्रीय एकता के स्वर प्रमुख रूप से गूँजल बाटे। भारत के नक्शा खींच के, ओकरा विशेषता के वर्णन कइल गइल बा। पर्वतराज हिमालय, गंगा, यमुना, सोन के प्राकृतिक दृश्य देखे लायक बा-

सुन्दर सुभूमि भइया भारत के देसवा से,

मोरा प्राण बसे हिमखोह रे बटोहिया।

एक द्वार घेरे रामा हिम कोतवालवा से,

तीन द्वार सिन्धु घहरावे रे बटोहिया।

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गंगा रे जमुनवां के झगमग पनिया से,

सरजू झमकि लहरावे रे बटोहिया।

ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निसिदिन,

सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया।

एतने ना, एह गीत में बुद्ध, विक्रमादित्य, शिवाजी, व्यास, वाल्मीकि, गौतम,  कपिल, रामानुज, रामानंद, विद्यापति, कालिदास, कबीर, सूर, तुलसी, जयदेव के इयाद कराके, एह धरती के प्रति भक्ति-भाव जगा के, एगो प्रेम पैदा करे के सफल प्रयास बाटे।

जब महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन शुरु भइल, तब मनोरंजन बाबू ‘फिरंगिया’ के रचना कइलन। एकर तर्ज बटोहिया वाला बाटे बाकिर भाव-भूमि अलग राष्ट्रीयता के भाव इहाँ करुण रस के माध्यम से प्रकट भइल बाटे-

जहँवा थोड़े ही दिन पहिले ही होत रहे

 लाखोमन गल्ला ओ धान रे फिरंगिया

ऊहें आज हाय रामा, मथवा पर हाथ हरि

बिलखि के रोवेला किसान रे फिरंगिया।

आगे चल के एह कविता में जालियाँवाला बाग में भइल अत्याचार के मार्मिक वर्णन कवि एह प्रकार से करत बा-

भारते के छाती पर भारते के बचवन के

बहल रकतवा के धार रे फिरंगिया

छोटे-छोटे लाल सब बालक मदन सब

तड़पि-तड़पि देवे जान रे फिरंगिया।

फेर कवि आगे अंग्रेज शासकन के चेतावत बा-

चेति जाउ चेति जाउ भइया रे फिरंगिया

छेड़ि दे अधरम के पंथ रे फिरंगिया।

×           ×         × 

दुखिया के आह तोर देहिया के भरम करी

जरि भूनि होई जइबे छार रे फिरंगिया।

ई फिरंगिया गीत एतना प्रसिद्ध होखे लागल कि कवि का जेल मिलल आ कविता जपत हो गइल।

बाबू कुँवर सिंह के राष्ट्र-प्रेम के भावना आ ओकरा मर्यादा खातिर अंग्रेजन के लड़ाई पर केतना फुटकर रचना के प्रणयन त भइलहीं बाटे, कई एक प्रबंध काव्यन के रचना भइल बाटे। एह काव्यन में श्री हरेन्द्र देव नारायण आ पंडित चन्द्रशेखर मिश्र के महाकाव्य ‘कुँवर सिंह’ नाम से बहुत मशहूर भइल।

स्व. प्रसिद्ध नारायण सिंह जी के ‘बलिदानी बलिया’ (दूसर संस्करण-भोजपुरी वीर काव्य) में सन् 42 के राष्ट्रीय आन्दोलन में बलिया जिला के योगदान के बरनन आइल बाटे।

भारत के संगे चीन के एगो लड़ाई आ पाकिस्तान के सन् 65 आ 71 में लड़ाई पर आ राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत सैकड़न रचना सामने आइल बाड़ी स। एह में से त कुछ के बाद में संग्रहो प्रकाशित भइल, जइसे चीन के साथ लड़ाई पर आचार्य महेन्द्र शास्त्री के ‘धोखा’। रधुवंश नारायण सिंह जी के ‘भोजपुरी के ललकार’, त्रिलोकी नाथ उपाध्याय के ‘समय की पुकार ‘, लक्ष्मण पाठक प्रदीप  सम्पादित ‘जागरण के स्वर ‘, बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव के ‘वतन का तराना’, डा०मुक्तेश्वर तिवारी ‘बेसुध ‘(चतुरी चाचा) के ‘हिमालय ना झुकी कबहूँ ‘, मणीन्द्र भूषण त्रिपाठी ‘मधुर ‘के ‘बिगुल’, दूधनाथ शर्मा श्याम के ‘हिमगिरि के नेवता’, कृष्ण मुरारी शुक्ल गोरखपुरी के ‘बलिदान की बारी ‘ आ गणेश दत्त किरण के ‘बावनी’ अइसने संग्रह बा जवना में चीन के साथ लड़ाई के अवसर पर रचाइल रचनन के समावेश बा।

एह रचनन में गणेश दत्त किरण के ‘बावनी ‘ त बहुते प्रसिद्ध भइल। बानगी रूप में ‘बावनी’ के एगो कवित्त सोझा बाटे-

धई के कचरा, लथारबि हम पटकि-पटकि

बान्हब मुसुक दुनों बाहिन से चउर-चउर

छरपट छोड़ाई देबि, हुमच-हुमच ठउर-ठउर

हिन्द महासागर में चीन के दरोरबि जब

बाँची तब जान ना लुकाइला से दउर-दउर।

भोजपुरी के प्रतिभावान युवा कवि कुमार विरल के ‘वंदना भारती’ नामक रचना के कुछ  पाँति देखल जाय-

ऊँच बा तिरंगा धज झूम रहल आदमी

सुरखुरा रहल हिया, उतान भइल आदमी

हमार देश ह हमार ई रही

करोड़ हाथ आरती उतारते रही।

अइसन कतेक उदाहरण बा जे भोजपुरी में राष्ट्रीयत के प्रतीक बा। ई कहल जा सकत बा कि भोजपुरी में राष्ट्रीयता के भाव से भरल-पूरल कवितन के कमी नइखे। भोजपुरी कवि राष्ट्रीय संकट आ समस्या से मुँह नइखे मोड़ले।


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Hum BhojpuriaJune 3, 20211min4400

मनोज भावुक

26 अप्रैल 1858 के रात कुँवर सिंह के आखिरी रात रहे। तीन दिन पहिले 23 अप्रैल के 80 बरिस के एह घायल शेर के कटल हाथ पर कपड़ा बन्हाइल, ओकरा ऊपर से चमड़ा के पट्टा से ढ़ाल के बान्हल गइल, तिलक लगावल गइल। फेर त ई राजपूती तलवार अंगरेजन के गाजर-मूली के तरह काटल शुरू कइलस।   ली ग्राण्ड के जान गइल आ बाकी बाँचल अंग्रेज सैनिक जान बचा के भगलन सन। जगदीशपुर आजाद हो गइल। यूनियन जैक के झंडा उतार के परमार वंश के भगवा पताका लहरावल गइल। लोग खुशी के मारे पागल रहे आ कुँवर सिंह भी। 23 तारीख के कुँवर बाबू के सबसे छोट भाई आ युद्ध में उनके सबसे मजबूत हाथ बनके तैनात रहल अमर सिंह के जगदीशपुर के जमींदारी सौंप दीहल गइल। अमर के बेटा रिपुभंजन के उत्तराधिकारी बनावल गइल। सभा समाप्त भइल। बाबू कुँवर सिंह महल के भीतरी गइलें त उनका कटल हाथ में होत असह्य दर्द के ध्यान आइल। अचानक उ लड़खड़इलें, भाई आ भतीजा उनके सम्हारल लोग आ ले जा के उनका बिछौना पर सुता दिहल लोग।

विजय दिवस से मृत्य दिवस के बीच एक-एक पल उ जिंदगी खातिर मौत से लड़त रहलें। जिनगी के बीतल पन्ना सिनेमा के रील के तरह पलटत रहलें। जब इंसान अपना जिनगी के सफर के अंतिम पड़ाव पर रहेला त ओकरा आपन हीत-मीत, मोखालिफ़, जानकार सभे इयाद आवेला। उनका आँखिन का सोझा उनकर बाबूजी साहबजादा सिंह, माई पंचरत्ना, पत्नी देवमूंगा, भाई अमर सिंह, साथी हरीकिशन सिंह, बंसुरिया बाबा, अंग्रेज अफसर विलियम टेलर, विन्सेंट आयर, डगलस आ ना जाने केतना लोग के तस्वीर नाचत रहे। ओही में सबसे तेजी से नाचत रहली धर्मन बाई।

त ई धर्मन बाई के रहली आ कुँवर सिंह से इनकर का नाता रहे? धर्मन बाई आरा शहर के एगो नर्तकी रहली; बहादुर स्त्री, अप्सरा लेखां सुंदर, मध जइसन गला वाली, नृत्य अउरी गीत गवनई में मँझल, वीरांगना आ कीचड़ के बीच रहे वाली कमल। बहुत लोग कहेला कि उ त नाचे वाली रहली बाकिर उ लोग ई ना जानेला कि उ माटी के रक्षा खातिर कुँवर सिंह के स्वतंत्रता अभियान में शामिल हो गइली आ अपना शरीर पर गोली, तलवार, भाला के घाव लेहली बाकिर पीछे ना हटली। धर्मन बाई अपना बहिन करमन के साथे रहत रहली आ नाच गाना उनकर पेशा रहे। उनके प्रसिद्धि पूरा शाहाबाद क्षेत्र में फइलल रहे।

उनके कुँवर सिंह से मुलाकात तब भइल जब एगो उत्सव में उ अपना बहिन के साथे प्रस्तुति देबे आइल रहली। उनके सुरीला कंठ से मार्मिक गीत अउरी भाव भरल नृत्य देखके बाबू साहेब काफी प्रभावित भइलें।  बाबू साहब एगो कुशल शासक त रहबे कइलें, साथे गीत-संगीत के पारखी रहलें। कुँवर बाबू खुद गावे-बजावे में निपुण रहलें आ साल भर में फगुआ, चइता जइसन कवनो आयोजन ना छोड़ें जहां गीत-संगीत के उपासना होत होखे। उहाँ के नजर में हर एक कलाकार महादेव के रूप नटराज के उपासक रहे। एही से ओह कलाकार के कला के सराहना ईश्वर के उपासना से कम ना रहे। कुँवर बाबू धर्मन के एह प्रस्तुति खातिर खूबे बड़ाई कइलें। धर्मन कुँवर बाबू के बारे में सुनले रहली। आज उनका बात-विचार से बहुते प्रभावित भइली। इ दुनू जाना के पहिला मुलाकात रहे।  

एक बार धर्मन आ करमन जंगल में घूमे गइल रहे लोग। उहवें एगो अंग्रेज दुनू बहिन से छेड़खानी करे के कोशिश कइलस। भाग्य से ओही जंगल में कुँवर सिंह अपना दल बल के साथे शिकार खेले गइल रहलें।  उ समय पर आके दुनू बहिन के सम्मान आ प्राणरक्षा कइलें जवन धर्मन के मन में कुँवर सिंह के बहादुरी के प्रति अनुराग जगा देहलस। एकरा बाद कुँवर सिंह से उनके एक दू मौका पर अउरी भेंट भइल।  धर्मन के नृत्य देखे कई गो अंग्रेज अफसर आवsसन आ उनका सामने मदिरा के नशा में बहुत कुछ अइसन बक द सन जवना गुप्त जानकारी होखे। धर्मन एगो सहृदय देशभक्त नारी रहली। उनका अंदर भी भारतीय लोग पर हो रहल अंग्रेजन के अत्याचार खातिर खीस रहे। जब उ कुँवर सिंह से मिलली त एह आक्रोश के आग के हवा मिलल। धर्मन कुँवर के अंग्रेजन के अत्याचार आ ओकनी के प्रपंच के जानकारी देबे लगली। कुँवर सिंह शुरुए से बागी रहलें, आ अपना सीना में कंपनी सरकार खातिर गुस्सा दबवले रहलें। उ धर्मन के एह राष्ट्रभक्ति से बड़ा खुश भइलें।

ओह समय कुँवर क्रांतिकारी नेता आ  जमींदारन के संपर्क में रहलें। सभे कंपनी सरकार के खदेड़े खातिर गोलबंदी करत रहे, योजना बनावत रहे, संसाधन जुटावत रहे। धर्मन धीरे-धीरे कुँवर के नजदीक होत गइली। कुँवर के आपन पारिवारिक जीवन बहुत उथल-पुथल अउरी नकारात्मकता से भरल रहे। कुँवर अक्सरहाँ एकांत में समय बितावे जितौरा जंगल के अपना शिकारगाह में आ जास। धर्मन सहृदय त रहबे कइली, जीवन दर्शन के बड़ा समझ रहे उनका। उहो अक्सरहा जितौरा चलि आवस। कुँवर बाबू के अंतरमन में बरिसन से लागल जाला साफ करे लागस। इंसान कई बार अपना उलझन के हल जानेला आ ओकरा से निकलहूँ के चाहेला बाकिर निकल ना पवेला। ओकरा एगो अकुंसी लगावे वाला के गरज होला जवन ओकरा माछी जइसन छटपटात मन के विचारन के मकड़जाल से बाँहि पकड़ के बाहर निकाले। धर्मन उहे अँकुसी रहली।

धर्मन त बाते बात में कुँवर बाबू के प्रति अपना अनुराग के प्रकट कs देहले रहली बाकिर कबो बदले में बाबू साहब से कवनो मोह आ माया के इच्छा ना कइली। ई निःस्वार्थ प्रेम ही रहे कि कुँवर बाबू हमेशा धर्मन के साथ देहलें। उनसे कबो बियाह ना कइलें बाकिर उनके ओसहीं सम्मान देहलें जइसे उ अपना परिवार के देत रहलें। कुँवर बाबू साहेब के चरित्र के ई बड़प्पन रहे कि सगरो समाज खातिर जे धर्मन बाई रहली, उनका खातिर उ धर्मन देवी रहली; उ धर्मन जे बाबू साहब के हर छोट-बड़ फैसला में सलाह देस, उ धर्मन जे बाबू साहब के देश खातिर लड़ाई में साथे साथे चलली, उ धर्मन जे कबो उनके पत्नी त ना बनली बाकिर कुँवर बाबू के रास्ता में आवे वाला बाधा के सामने खुद खड़ा होखे खातिर तैयार रहली।  

साल 1857 के आखिरी में ग्वालियर के नजदीक काल्पी में अंग्रेजन से आमना-सामना के लड़ाई में धर्मन दुश्मन से खूब लोहा लेहली।  एक ओर से कुँवर लड़त रहलें, एक ओर से उनके साथी लोग लड़त रहे।  घमासान युद्ध मचल रहे। काल्पी के बगइचा लड़ाई के खून से पाटल मैदान हो गइल रहे। अचानक एगो अंग्रेज के गोली चलल आ सामने के तोप पर तैनात कुँवर के एगो सिपाही मर गइल। तोप से आग गरजल बंद भइल त अंग्रेजन के ओह साइड से कुँवर सिंह के बनावल चक्रव्यूह में घुसे के राह लउकल।  तले धर्मन बिजली के रफ्तार से गोलियन के बीच से ओह तोप के लगे पहुँच गइली आ मोर्चा सम्हार लेहली। गोला पर गोला दगली आ अंग्रेजन के आगे ना बढ़े देहली। तले कुँवर सिंह अउरी उनके सेनापति आके अंग्रेजन के घेर लिहल लोग। अंग्रेज तीन ओर से घेरा गइलन सन अउरी उलटे पाँव भाग गइलन सन। तोप गरजल शांत भइल। धर्मन अपना जगहि से उठे के चहली बाकिर बेजान होके बइठ गइली। कुँवर बाबू दउड़ के अइलें, धर्मन के सर अपना गोदी में रखलें। उ धर्मन के जल्दी ठीक होखे के ढाँढ़स देत रहलें, उनका आँखी में लोर भरल रहे, सभे अकबकाइल रहे। धर्मन कहे चहली कि बाबू साहब अब हम जा तानी, माफ करब रउआ साथे अउरी दूर तक ना चल पवनी। बाकिर कहि ना पवली, कई गो गोली आ तीर के चलते उनके ढेर खून बही गइल रहे, देह में हूब ना रहे। हाथ उठवली, कुँवर बाबू के लहलहात गलमुछ छुअली, एक बार पीला पड़त चेहरा पर मुस्कुराहट लिअवली आ एगो सच्चा वीरांगना अउरी प्रेयसी के जइसन एह माटी अउरी कुँवर बाबू के आलिंगन में आपन प्राण छोड़ दिहली। कुँवर बाबू के आँख से झर झर लोर गिरत रहे।

बिस्तर पर सुतले-सुतल करवट बदललें कुँवर बाबू। बाबू साहब के आँख से लोर झर झर गिरत रहे जइसे अचानके सुखल झरना में पहाड़ से पानी आके झरे लागल होखे।


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Hum BhojpuriaJune 2, 20211min3930

कृष्ण कुमार

      देवनागरी लिपि के पहिला व्यंजन ‘क’  से शुरू होखे वाला कुँवर सिंह आ 1857 के सिपाही विद्रोह के भीष्म पितामह बाबू वीर कुँवर सिंह एगो अइसन वीर पुरूष रहीं जे अन्याय, अत्याचार आ शोषण के खिलाफ ना कबो आंख मूंदनी आ ना कबो सिर झुकवनी। राउर जनम बिहार के पुरान आ सबसे बड़ जिला शाहाबाद आ नयका जिला भोजपुर के जगदीशपुर में 23 अप्रैल 1977 के भइल रहे। रावां मालवा के राजा भोज के वंशज रहीं। शाहाबाद के आन-बान-शान के प्रतीक राउर बाबूजी महाराजा साहबजादा सिंह आ माई महारानी पचरतन देवी रहनी। रउआ भारत के पहिला स्वतंत्रता संग्राम में आपन अतुलनीय धीरज आ अलौकिक वीरता के परिचय देनी। ईस्ट इंडिया कंपनी के फौजन के साथे अनेक लड़ाईअन में विजय प्राप्त कइनी। रउआ छापामार युद्ध में महारत हासिल रहे। रउआ रणनीति आ युद्ध कौशल के समतुल्य ओह समय मे केहू ना रहे। रउआ रणकौशल के समझे में अंग्रेजी सेना हमेशा असफल रहल। रउआ सोझा अंग्रेजी सेना के अइला के बाद ओकरा मात्र दू गो राह रहे–चाहे त तलवार के धार  से कटा जाये के चाहे सोझा से भाग जाये के।

बंगाल के बैरकपुर छावनी के सिपाही वीर मंगल पांडे अंग्रेज अपसरन के परेड मैदान में गोली मार देनी, जवना के चलते 8 अप्रैल 1857  के मंगल पांडे के ओहिजे अंग्रेज कोर्ट मार्शल  क देलें स। मंगल पांडे के मृत्यु समूचा भारतवर्ष के ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ खउला देलस। जगह-जगह सिपाही विद्रोह शुरू हो गइल। 25 जुलाई 1857 के दानापुर के सिपाही विद्रोह क देलें आ आरा के तरफ चल देलें। ऊ लोग जगदीशपुर पहुंच के कुँवर सिंह से संपर्क कइलें। ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ अस्सी साल के उमिर में रउआ बगावत कइनी। विद्रोही सिपाही लोग के एगो मात्र नारा रहे- ‘जगदीशपुर चलीं जा….। ‘ रउआ रते राति आरा जेल के फाटक तुरि के सब कैदी लोग के मुक्त कइनी आ ओह लोग के साथे एगो सेना तइआर कइनी आ ओहि राति आरा के आजाद कराके आपन शासन व्यवस्था कायम क लेनी। बीबीगंज, कायमनगर, नारायणपुर आ दुलौर के लड़ाई में अंग्रेजन के बुरा तरह से पराजित कइनी। बाकिर बाद में कंपनी सरकार रउआ के रियासत से बेदखल कर देलस। तब रउआ एलान कइनी–‘जहंवा कुँवर सिंह, ओइजे जगदीशपुर ….।’ – ई अइसन घोषणा रहे जेकरा वजह से अन्त दाव तक राउर फौज रउआ से बन्हाइल रहल…।

रउआ एगो बेटी आ दू गो बहादुर बेटा रहे लोग –दलभंजन सिंह आ ब्रजभंजन सिंह। दलभंजन सिंह के एगो बेटा रहन वीरभंजन सिंह जे 8 अक्टूबर 1857 के उत्तरप्रदेश के बांदा में अंग्रेजन के साथे लड़ाई में मारल गइले। ब्रजभंजन सिंह के कवनो बाल बच्चा ना रहे। राउर बेटा दलभंजन सिंह भी 7 नवंबर 1857 के गोरा सरकार के साथे महासमर में कानपुर में शहीद हो गइले। रउआ प राउर बाबूजी महाराजा साहबजादा सिंह के अधिका प्रभाव रहे। 1857 के क्रांति के विद्रोही सिपाहियन के रावा सबसे बड़का नायक रहीं। इतिहास गवाह बा, रउआ नौ महीना तक लगातार पैदल चलल रहि गइनी। ब्रितानी फौज के सामने कबो घुटना ना टेकनी। पोता आ बेटा के शहीद भइला के बादो पांच महिना तक लगातार अंग्रेजन से लोहा गाहत रहि गइनी। बलिया (उ.प्र.) से जगदीशपुर लवटे के बेरा गंगा नदी में शिवपुर घाट से तनिका दूर अंग्रेजन के गोली से घाही हो गइनी। बांहि में गोली लागल रहे। बीच गंगा में अपने तलवार से आपन बांहि काटि के रउआ गंगा  मइया में अरपि देनी। देहि से बहुत खून निकल गइल रहे। कसहूं जगदीशपुर अइनी। 26 अप्रैल 1958  के रउआ अपना तीन पिढियन के शहादत के बाद आपन प्राण तेयाग देनी। अंग्रेजन के हाथे राउर लाश तक ना भेंटाइल। एकरा सबूत में शाहाबाद के कलक्टर एच. आर. मैडाक्स एस्कायर के ऊ पतरी बा, जेवना में ऊ लिखले बाड़े- “जगदीशपुर से आठ मील दूर बाबूसाहेब का दाह संस्कार कर दिया गया। गोरा सैनिक उनकी लाश तक हासिल करने में असफल रही.।”

जिला मुख्यालय आरा नगर से तीस किलोमीटर दूर पच्छिम आ जगदीशपुर में स्वाधीनता संग्राम के लड़ाई के अमर योद्धा बाबू वीर कुँवर सिंह के विराट किला, झंझरिअवा पोखरा, राजा के पोखर के ईदगाह,  किला परिसर में शहीद बाबा दाता करीम शाह रहमतुल्लाह अल्लोह के मजार आजुवो मौजुद बा, जवन देखे लायक बा। आरा शहर में राउर ऐतिहासिक स्थल के रूप में आरा हाउस, रावा समक्य के अस्तबल (मौजूद समय में आरा जेल), बाबू बाजार में स्थित काली मंदिर, पाकशाला (मौजूद समय में जिला स्कूल), लोगन खातिर धरोहर के रूप में स्थापित बा। एकरा अलावे रावा सेना के वीरांगना बहिन करमन  बाई आ धरमन बाई के नाम पर करमन टोला आ धरमन चौक प मस्जिद, महाराजा कालेज में स्थित राउर कार्यालय विभिन्न सम्प्रदाय, वर्ग आ बुद्धिजीविअन खातिर आजुओ श्रद्धा आ अस्था के केंद्र बनल बा। रउआ हिंदू मुस्लिम एकता के हिमायती रहीं। एहि से किला मैदान परिसर में मजार, राजा के पोखरा में ईदगाह, आरा के धरमन चौक प विशाल मस्जिद मौजूद बा। राउर स्मृति धरोहर बिहार के अलावे अवरू जगहा प भी देखे लायक बा। जइसे देवघर के शिधारघाट, कौंरा के विश्राम दलान, बीबीगंज के हाता, दुसाधी बाजार पीरो, दलीपपुर गढ़, कैथी कोठी, मिठहां कोठी, भदवर गढ़, बराढ़ी गढ़, राज श्मशान घाट, जगदीशपुर से आरा के भुजावरा, मोर्चा के जंगी मैदान आ शिवपुर घाट …।

गौतम ऋषि के घरनी अहिल्या लेखा ई सब जगहा अपना जीणोद्धार के बाट निहारता आ न्याय के गुहार लगावत बा कि बाबूसाहेब के स्मृति के राष्ट्रीय स्तर प पर्यटन के दर्जा आजु ना काल्हु कवनो ना कवनो देशभक्त जरूर दीहें। रउवा जीवन आ संघर्ष से जुड़ल कतना लेख-अभिलेख, अस्त्र-शस्त्र आ दुर्लभ समान रख रखाव के अभाव में बिला गइलें स। तबो राउर ढ़ेर निशानी अबहिं जगदीशपुर किला संग्रहालय में प्रशासन के कृपा दृष्टि से अगोरात हमनी के बाट खोजत बा।

भारतवर्ष आ वीर कुँवर सिंह:–-कवनो-कवनो  राति बड़ा अकरावन होला। कतनो कोशिश करीं नींन आंखिन से कोसहन फरका परा जाला। अनभुआर अस लागेला। बुझाला, कुछ भुला गइल होखे। अन्हरिया रात रहला प अवरू अखड़ेला। अइसने राति से हमरा एक बे सबाका परल। इ मकान मई डाढ़े दउरे लागल। हमरा कान में काल्हु सांझि के बारिश के पहिले ओला तेज हवा के सांय-सांय ठांठ मारे लागल।

एका एक भारतवर्ष आ वीर कुँवर सिंह हमरा जेहन में पइसि गइनी। पहिले 1857 के सिपाही विद्रोह आ 1947 के भारतवर्ष के आजादी वाला साल दिमाग प दस्तक देलसि। एह दूनों साल के जोड़-घटाव में भीरनी –1857—1+8+5+7=21,  1947—-1+9+4+7=21, दूनों साल के सभ अंकन के जोड़ एक बराबर(21)। एह सासे बढ़ोतरी आगा बढ़ल। सोच के नया वितान खुलल। नियति के धन्यवाद देनी। दिमाग लम्मी लेलस। वीर कुँवर सिंह के जनम वर्ष 1777 पर गौर कइनी। एक साथे तीन गो सात। आगे बढ़नी। वीर कुँवर सिंह के जनम 1777,  सिपाही विद्रोह -1857, भारतवर्ष के आजादी-1947—–सवाल-दर-सवाल आ जवाब-दर-जवाब बदरी लेखा दिमाग में उमड़े घुमड़े लागल। एह तीनों साल प गौर कइनी। तीनों साल के अंतिम अंक –7 मिलल। फेरू तीन गो सात। ऊपर के दूनों साल 1857 आ 1947 के योगफल 21 में एह तीनों साल के 3 से भाग देनी—21÷3=7,  यानि भागफल 7 मिलल। गणित के अंक 7 भारतवर्ष खातिर अद्वितीय अंक मानल जाला। सात अंक के ई सुखद संयोग हमनिन के भारतीय संस्कृति आ विज्ञान से संबंधित ह। अंकशास्त्र के अनुसार नवंबर सात के लक्की अंक मानल जाला। जइसे— सप्ताह के सात दिन, सात चक्र बीज मंत्र, सात न्यायाधीश लोग के द्वारा दिहल गइल सलाहकार मत, इसलाम के सात आसमान, हिन्दू के सात लोक, शादी के सात फेरा, सात वचन, सात जनम, सात सुर, सात समुद्र, इन्द्रधनुष के सात रंग, सप्तऋषि मंडल, देवी जी के सात बहिन आ भारतवर्ष के ऊ सात महिला, जे परिस्थिति से हार ना मनली, चुनौतिअन के कबूल कइली, ओकरा के पूरा क के दोसरा खातिर मिसाल रखली, जेकरा के साल 2020  के अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस प प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी आपन सोशल मीडिया अकाउंट सौंपि देनी आदि……। शायद एहि बात के ध्यान मे राखि के नवरात्र में दुर्गा माता के पट सप्तमी तिथि के ही खुलेला। फेरू कुँवर सिंह के जनम 1777 आ मृत्यु 1858 और दिमाग दउरल। ओह दूनों साल के योगफल निकलनी —-1777—-1+7+7+7=22, 1858—1+8+5+8=22, फेरू एगो साम्य बाइस। एकइस के बाद बाइस आवेला। नियति वीर कुँवर सिंह आ भारतवर्ष के बीचे साल-वर्ष के ममिला में एगो तारतम्यता स्थापित कइले बिया। एह स्थापना के अंजोर में ले आवे खातिर ओहि राति हम “वीर कुँवर सिंह सोहर” रचनी आ अपना बेटा पुष्कर कुमार के यूट्यूब चैनल प 8 अक्टूबर 2019 के लोड करववनी। ऊ सोहर अपने सभे के अवलोकनार्थ एह आलेख के साथे प्रस्तुत कर रहल बानी। रउआ पाठक लोगन के बेबाक प्रतिक्रिया के इन्तज़ार हमेशा रही……

वीर कुँवर सिंह सोहर “

जगदीशपुर नगरिया बड़ा नामी, त जाने सभ लोग नु हो ।

ए साहेब ऊहंवा के बाबू कुँवर सिंह, बड़ा बलवान रहनी हो ।।

तेईस अप्रैल शुभ दिनवा, त साल सतरह सत्तहतर रहे हो।

ए साहेब पंचरतन के अंगना फुलइलें त बाबूजी साहबजादा सिंह हो ।।

मलवा के नामी राजा भोज रहन, उनके वंशज कुंवर सिंह हो ।

ए साहेब बड़हन जगिरवा के मालिक, जगदीशपुर में किला बाड़ें हो ।।

गोरन के नजर पलटि गइलें, जगिरवां छिनाई गइलें हो ।

ए साहेब बड़ा ए धीरजवा से काम लेलें, तनि ना अधीर भइलें हो ।।

बलिया के बागी मंगल पांडे, त अगिआ लगाई देलें हो ।

ए साहेब बैरकपुर छवनिआ लागल लहके, त संउसे देशवा जागि गइलें हो ।।

आठ अप्रैल काला दिनवा, त साल अठारह सनतावन रहे हो ।

ए साहेब मंगल पांडे फंसिआ प झुलि गइलें, भारत खउलि गइलें हो ।।

लखनऊ से बेगम हजरत महल, त कानपुर से नाना साहेब हो ।

ए साहेब लियाकत अली खाड़ भइलें इलाहाबाद से, झांसी से लछमी बाई हो ।।

बिहार से खाड़ भइले कुँवर सिंह, साथवा में पीर अली हो ।

ए साहेब गोरिला लड़ईआ के बीरवा, त हाथें तलवार लेलें हो ।।

दानापुर छवनिआ के सैनिक, आपन नेता चुनि देले हो ।

ए साहेब अस्सी ए बरिसवा के कुँवर सिंह, फेरू से जवान भइलें हो ।।

जगदीशपुर से बिज्जू घोड़ा कसइलें, त गोरन के काटे लगलें हो ।

ए साहेब आरा हाउस मचल घमसनवा, त डगलस पराई चलल हो ।।

आजमगढ़ से चलल रहे डगलस, लाव-लश्कर साथ रहे हो ।

ए साहेब शिवपुर घाटवा मलिन भइलें, कुँवर सिंह घाही भइलें हो ।।

छब्बीस अप्रैल अठारह स अठावन रहे, कुँवर सिंह अमर भइलें हो ।

ए साहेब खोजत रहि गइलें अंग्रेजवा, त फुलवों ना भेंटाइल हो ।।

सनतावन-सैंतालीस के मति फरक करीं, कुँवर सिंह के इआद करीं हो ।

ए साहेब उहें के प्रभुतइया से भारत, सैंतालीस में आजाद भइल हो।।

जगदीशपुर के नियरे बराढ़ी गांव, ओहिजे के निर्मल सिंह हो ।

ए साहेब कुँवर सिंह फाउंडेशनवा के माध्यम से कुँवर के जिअवले बानी हो ।।

 


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Hum BhojpuriaMay 21, 20212min4490

मनोज भावुक

ई चइत के महीना हऽ. भगवान श्रीराम के जनम के महीना. अब राम से बड़ा नायक के बा ? जेतना राम पर लिखाइल बा, कहाइल बा, गवाइल बा आ मंचन भइल बा, सीरियल-सिनेमा बनल बा, ओतना कवना नायक पर काम भइल बा ?…आ बात खाली भइला के नइखे, भावना के बा. जवना भावना से लोक में राम के स्वीकार कइल गइल बा, उ भाव दोसरा कवनो नायक के नइखे भेंटाइल. साँच कहीं त जीवन के हर भाव में राम बाड़े. राम हर काल में प्रासंगिक बाड़े. कोरोना काल में भी.

लोक में राम, भोजपुरी साहित्य में राम, भोजपुरी कविता में राम, सिनेमा में राम, लोकगीतन में राम, हमनी के जीवन में राम, जीवन शैली में राम, अयोध्या में राम अउर हमनी के धड़कन में राम. हमनी के रोंआ-रोंआ में राम बाड़े, इहे एह लेख के सुर बा. राम के एही तरे के मौजूदगी कोरोना होखे चाहे दोसर कवनो आफत ओकरा से उबरे खातिर धैर्य, सबल अउर सकारात्मक सोच के दिशा सुनिश्चित करेला.

हमनी के लोकगीतन में राम जनम से लेके मृत्यु तक बाड़े. सोहर से लेके ‘ राम नाम सत्य है’ तक. हमनी के हर संस्कार में राम बाड़े. व्यवहार में राम बाड़े. गणना-गणित में राम बाड़े. भोजन-भजन में राम बाड़े. साँच पूछीं त राम रसायन आजो सब समस्या के समाधान बतावे में सक्षम बा. रामलीला आ रामचरित मानस आजो सबसे आसानी से समझ में आवे वाला दर्शन शास्त्र बा. सिनेमा-सीरियल खातिर सबसे इंटरेस्टिंग एक्शन बा, ड्रामा बा, इमोशन बा. मानी भा मत मानी राम के बिना राउर काम चले वाला नइखे.

भजिलऽ ए मनराम नाम ना तऽ फेर पाछे पछितइबs हो !

एह लोकप्रिय भजन से साफे पता चलsता कि भारतीय जनमानस के राम पर केतना भरोसा बा. विद्वान् लोग कहेला कि ऋग्वेद में भी राम के जिक्र बा लेकिन राम के स्थापित करे वाला पहिलका काव्य ‘वाल्मीकि रामायण’ ह. महर्षि वाल्मीकि राम के महापुरुष मनले बाड़े.

त्रेता युग में भगवान विष्णु राम का रूप में राजा दशरथ के बेटा बनके उतरलें, ई बात सबका पता बा. अब एह कथा के आ राम के चरित्र के गोस्वामी तुलसीदास अइसन गढ़लें कि राम ग्रन्थ के पन्ना से निकल के घर-घर में समा गइलें. तुलसी के राम चमत्कारी राम ना, गृहस्थ जीवन वाला राम, लोक के चिंता करे वाला राम बनलें. एही से उ लोक के चित प चढ़ के मन, प्राण आ  आत्मा में समा गइलें. गीत-संगीत में समा गइलें. राग-सुर पर उतर गइलें. ठेकान बा कि राम पर केतना भजन बा.

भजु राम जी के नाम भइया रेअति सुखदाई
एगो उहे अइहे काम भइया रेअति सुखदाई

भजने ना, बिआह-शादी के माड़ो तक ले राम गूँजे लगलें. अब राम से बढ़िया दूल्हा भारतीय जनमानस में दोसर केहू नइखे-

साजी बरात चलेलें राजा दशरथ
गगन गरद उड़ि जाए
आजु देखों कोसिला के गोद, रामचंद्र दूलहा बनें

अतने ना, फगुवा-चइता तक ले राम गवाये लगालें-

होरी खेले रघुवीरा अवध मेंहोरी खेले रघुवीरा
केकरे हाथ कनक पिचकारीकेकरे हाथ अबीरा
राम के हाथ कनक पिचकारीलछुमन हाथ अबीरा

चइता के त सब लइनिये रामा आ ए हो रामा से ख़तम होला.

संस्कार गीतन के बात करीं त सोहरे से राम जी के जय-जय होखे लागेला-

धनि धनि अयोध्या रउरो भाग त परम सुहावन हो, ललना कहवां जनमले राम त केकरा ही लछुमन नूँ हो।। केकरा जनमले भरत….उठे सोहर हो / कोसिला के जनमले राम, सुमित्रा के लक्ष्मण हो, ललना केकई के भरत अब त अयोध्या उठे सोहर नूँ हो”…

देखीं, चईत के रामनवमी पर ई सोहर त खूब गवाला-

चइत अंजोरिया के नवमी, त राम जनम लिहले हो, ललना बाजे लागल अवध बधाव, महलिया उठे सोहर हो”

बतावत चलीं कि भोजपुरी के पहिलका महाकाव्य रामे पर बा- ‘ अपूर्व रामायण ‘ . पूरबी पुरोधा महेन्दर मिसिर एकर रचना कइले बाड़े.

रउरा जान के ताजुब्ब होई कि भोजपुरी भाषा में पहिलका समीक्षा-आलोचना के पुस्तक भी रामेकथा से जुड़ल बा- कमला प्रसाद मिश्र ‘ विप्र ‘ के ‘ रामकथा परम्परा में मानस ‘.

गद्य में  गणेश दत्त ‘ किरण’ रचित उपन्यास ‘रावन उवाच ‘ के कवनो जबाब नइखे.

राम पर भोजपुरी काव्य पुस्तक त खूब लिखाइल बा. अविनाश चन्द्र ‘ विद्यार्थी ‘ के ‘ कौशिकायन’ आ ‘ सेवकायन ‘, कुंज बिहारी ‘ कुंजन ‘ के ‘ सीता के लाल’, राम बचन लाल श्रीवास्तव के ‘बनवासी की शक्ति साधना’, रामबृक्ष राय ‘विधुर’  के ‘सीता स्वयंवर’, तारकेश्वर मिश्र ‘ राही’ के ‘ लव कुश ‘ , विश्वनाथ प्रसाद ‘ शैदा ‘ के ‘ रावण-अंगद संवाद’, वीरेश्वर तिवारी के प्रबंधकाव्य ‘ लंका विजय ‘ , श्रद्धा नंद पांडेय के ‘ श्री रामकथा ‘, व्रतराज  दूबे ‘ विकल ‘ के  ‘ केकई माई ‘ , अनिरुद्ध त्रिपाठी ‘ अशेष ‘  के ‘ प्रेमायन’ , हीरा ठाकुर के  ‘ अंजनी के लाल ‘ , अमर सिंह के प्रबंधकाव्य ‘ मर्यादा पुरुषोत्तम ‘ आ ‘ विश्वामित्र ‘ , अनिरुद्ध त्रिपाठी ‘संयोग’ के ‘ रामप्रिया बनवासिनी ‘, ब्रजभूषण मिश्र के ‘ महावीर जी सदा सहाय ‘ , हीरालाल हीरा के ‘केने बाड़ी सीता ‘ , कुंज बिहारी ‘ कुंजन ‘ के  कुंजन रामायण, राम सुरेश पांडेय के ‘ रावन चरित मानस ‘ ,  भगवान मिश्र ‘ श्रीदास ‘ के ‘ बालकांड रामायण ‘ , बद्रीनारायण दूबे ‘ बक्सरी ‘ के ‘ राम रसायन ‘ , शिव भजन राय  ‘ वैरागी ‘ के ‘ कवित रामायण’ आ ‘ भजन रामायण ‘, भगवान सिंह ‘ भास्कर ‘ के ‘ भास्कर लोक रामायण ‘, रामलाल गजपुरी के ‘ रामचरित दर्शन ‘ , रामप्रवेश शास्त्री के ‘ रामभक्त हनुमान’ ,  हीरा प्रसाद ठाकुर के ‘ सबरी ‘ आ ‘ रामजी के बिआह ‘, बद्री नारायण दूबे के ‘ श्री राम चालीसा ‘ , गोरखनाथ शर्मा के ‘ सीताहरण’ आ व्रतराज दूबे ‘ विकल ‘ के ‘ सती उरमिला’ आदि प्रमुख बा.

भोजपुरी के राष्ट्रगीत ‘ बटोहिया ‘ के कवि बाबू रघुवीर नारायण जी के कृति ‘कुंवर विजयी रामायण’ में  युद्ध के प्रसंग देखीं –

राम यहि ठैयां भीम भय भरना हो ना

राम मारि डरलीं दैत्य कुम्भकरना हो ना

राम यहि ठैयां कैलीं घोर रनवां हो ना

राम मारि डरलीं विकट रवनवा हो ना

 

भिखारी ठाकुर रामभक्त रहलें. अपना नाटक में राम के खूब गवलें. ठाकुर जी के लिखल हई चौपाई देखीं-

राम नाम के भक्त जगत से तरि जालन तत्काल

कुतुबपुर के कहत भिखारी‘, बूढ़ जवान बाल

बहुत कुछ त वाचिक परम्परा में बा. मतलब लिखाइल नइखे बाकिर मंदिर पर झलकूटन में भा खेत-बधार आ नदी तीरे सुने के मिल जाई. कहे के मतलब कि हरवाही-चरवाही से लेके विद्वत मंडली तक राम के सत्ता बा. हमनी किहां एगो लोकप्रिय कहावत बा-

अन्हरी गइया के राम रखवइया

जेने ताकब ओने एह कहावत के एगो नया अर्थ खुली. अइसहूँ राम के जेतने जानब ओतने जाने के मन करी. उनकर महिमा अपरमपार बा. कोरोना काल में उ अउर करीब आ गइल बाड़े. कई जगह सब कुछ राम भरोसे बा. कवनो बात नइखे, दवा-बीरो के साथे ‘ राम रसायन तुम्हरे पासा’ के महामंत्र भी ईयाद रखीं अउर एह कोरोना महामारी से सम्पूर्ण विश्व आ मानवता के मुक्त करावे खातिर राम के नाव लेत रहीं. जय श्रीराम!


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Hum BhojpuriaMay 21, 20211min6100

मोहन पाण्डेय

भारतीय शास्त्र आ पुराण में लिखल बा कि जब-जब धरती पर अत्याचार, अधर्म, अउर पाप बढ़ि जाला तब-तब-भगवान कवनो ना कवनो रूप में अवतार लेके धरम के रक्षा करेलीं अउर पपियन के नास कइके धरती माई के भी दुख हरेलीं। अपने देश में मान्यता हवे कि असुरन के नाश करे खातिर भगवान समय-समय पर अवतार लिहले बानी। त्रेता युग में जब धरती अधरम आ अत्याचार से काँपि गइली आ असुरन के मायावी शक्ति से लोग बेहाल हो गइल तब भगवान खुद रघुकुल में माई कोशिल्या के गर्भ से अवतार लिहलीं। ऊ तिथि रहल चईत शुक्ल पक्ष के नवमी अउर भगवान अभिजीत नक्षत्र में अवतार लिहलीं। चारू ओर अपार खुशी फइलि गईल। बधाई बाजे लागल।

महल में तमाम तरह से खुशी के आयोजन कइल गइल।

रामचरित मानस के महान कवि भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी एह समय के बहुते निम्मन बखान कइले बाड़ें-

नवमी तिथि मधुमास पुनीता। सुकल पक्ष अभिजित हरिप्रीता।

     मध्य दिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक विश्रामा।।

 

जब ब्रह्मा जी जनलीं कि अब भगवान के परगट भइले के समय आ गइल त सब देवता लोग विमान सजा-सजा के चलल। निरमल आकाश देवतन के समूह से भरि गइल। गन्धर्व लोग भगवान के गुणगान गावे लगल-

 

“सो अवसर विरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि विमाना।।

गगन विमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गन्धर्व बरूथा।।

 

गोस्वामी जी प्रभु के अवतार के बहुते मनभावन भाव लिखले बाड़ें-

“भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी।

हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।

 

लोचन अभिरामा तन घनश्यामा निज आयुध भुज चारी।

भूषन बनमाला नयन विसाला सोभासिंधु खरारी।।

बालकाण्ड, पृष्ठ176,रामचरित मानस, गीताप्रेस, गोरखपुर।।

आखिर भगवान के राम रूप में अवतार काहें भइल ए बाति पर चर्चा कइल जरूरी बा।

भगवान भोलेनाथ से माई पार्वती पूछली कि हे भोलेनाथ भगवान के राम अवतार के कारण बताईं आ पूरा कथा बताईं।

“बालकाण्ड मे गोस्वामी जी लिखलीं। माई पार्वती पूछति हईं-

पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बाल चरित पुनि कहहु उदारा।।

कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं।।

 

(बालकाण्ड पृष्ठ 107रामचरित मानस, गीताप्रेस, गोरखपुर)

 

तब भोलेनाथ कहलन कि-

तस मैं सुमुखि सुनावऊँ तोहीं। समुझि परइ जस कारन मोही।।

जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।

तब तब धरि प्रभु बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

 

(बालकाण्ड, पृष्ठ 117।रामचरित मानस, गीताप्रेस, गोरखपुर।।

 

मतलब इ कि जब जब धरम के हरास होला, नीच, अभिमानी, राक्षस बढ़ि जालें, अउर अइसन अन्याय करेलें कि ओकर वर्णन नाहीं कइल जा सकेला, तब तब कृपानिधान प्रभु अनेक दिव्य रूप में शरीर धारण करके सज्जन लोग के पीड़ा दूर करेलें।

भगवान शिव माई पार्वती से कह रहल बानी कि श्री हरि असुरन के मारि खातिर देवगण के स्थापित करेलीं अउर संसार में आपन निरमल यश फइलावेलीं। इहे कारण हवे श्री राम जी के अवतार के-

 

  असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।

  जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।

 

(बालकाण्ड,121) पृष्ठ 117

फिर आगे कहत बानीं कि ओही यश के गाके भगत लोग भवसागर पार क जालें। किरपा सिंधु भगवान भगत जन के हित के खातिर शरीर धारण करेलीं। भगवान के जनम के अनेक कारण बा जवन एक से बढ़ि के एक बा-

सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं।कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।।

राम जनम के हेतु अनेका।परम बिचित्र एक तें एका।।

 

(बालकाण्ड, पृष्ठ118,रामचरित मानस, गीताप्रेस, गोरखपुर)

भगवान भोलेनाथ माई पार्वती जी से कहत बानी कि एक कल्प में भगवान बैकुण्ठनाथ, अपने द्ववारपाल विजय के असुर योनि से मुक्ति दिलावे खातिर वाराह अवतार लेके हिरण्याक्ष के अउर नृसिंह अवतार लेके हिरण्यकशिपु के नाश कइलीं। जवन जय विजय, सनकादि ब्रह्मर्षि गण के शाप से असुर कुल में जन्म लिहले रहलें। सनकादि ब्रह्मर्षि गण के शाप रहल कि जय विजय (श्री हरि के द्ववारपाल) तीन जनम तक असुर योनि में जन्म लिहें। रावण कुंभकर्ण के रघुकुल मणि के रूप में अवतार लेके नाश कइलीं।

राम जनम के हेतु अनेका।परम विचत्र एक ते एका।।

जनम एक दुइ कह ऊँ बखानी।सावधान सुनु सुमति भवानी।।

 

(मानस रहस्य पृष्ठ15,हनुमान प्रसाद पोद्दार, गीताप्रेस गोरखपुर)।

एगो प्रसंग अउर आवेला कि नैमिषारण्य में मनु अउर उनके पत्नी शतरूपा के तपस्या से खुश होके दर्शन दिहलीं तब श्री हरी जी वर माँगेके कहलीं तब मनु जी विनती कइलें कि हे कृपानिधान! रउवाँ से का छिपावे के बा, हम आप ही के समान पुत्र चाहत बानी-

दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कह ऊँ सति भाउ।

चाह ऊँ. तुम्हहिं समान सुत प्रभु सन कवन दुराऊ।।

 

( रामचरित मानस, बालकाण्ड, पृष्ठ140गीताप्रेस गोरखपुर।।)

तब भगवान लक्ष्मीनारायण कहलीं कि अपने जइसन पुत्र कहाँ खोजे जाइब हम खुद तोहरे पुत्र के रूप में जन्म लेब। एह तरह से अयोध्या में राजा दशरथ अउर कौशल्या के पुत्र के रूप में भगवान अवतार लिहलीं। पहिले जन्म में इहे दशरथ अउर कौशल्या मनु व शतरूपा के रूप में रहलें।

उहवें नारद जी के श्राप के मान रखे के कारण भी भगवान नारायण के श्री राम के रूप में अवतार लेवेके पड़ल।

*भले भवन घर बायन दीन्हा।पावहुगे फल आपन कीन्हा।।

*बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा।सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।।

कपि आकृति तुम कीन्हि हमारी।करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।।

मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी।नारि बिरह तुम्ह होब दुखारी।।

 

*।।बालकाण्ड, पृष्ठ130।।रामचरित मानस।।

 

भक्त वत्सल भगवान जी तुरंत भक्त के श्राप स्वीकार क लीहलीं अउर रघुकुल शिरोमणि के रूप में श्री अयोध्या में अवतार लीहलीं।।

अनेक कारण बा भगवान के अवतार के लेकिन सबके मूल में इहे बा कि जब-जब धरती पर अधरम बढ़ेला, धरती माई पाप के बोझ से व्याकुल हो जाली तब-तब भगवान नारायण, अनेक रूप में अवतार लेके भगत लोग के सुख देलीं अउर पपियन के नाश करेलीं।

भगवान नारायण के अवतार के ई कथा लोक में कल्याणकारी बा सुने अउर सुनावे वाला सबके कल्याण होखेला।

(परिचय- मोहन पाण्डेय हाटा, कुशीनगर में शिक्षक अउर वरिष्ठ साहित्यकार बानी)

 

 


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Hum BhojpuriaMay 20, 20211min4840

लेखक- मनोज भावुक

गाँवे आइल बानी. गाँवे माने कौसड़, सिवान, बिहार. बड़का बाबूजी के तबीयत सीरियस बा. 94 साल के उम्र भइल. उम्र के असर बा. बाकी त चारो तरफ कोरोना के असर बा. कोरोना देश-दुनिया के तबाह कइले बा. लोग तड़प-तड़प के मुअता. उत्सव के एह महिना में चारो तरफ मातम बा.

रउरा सभे त जानते बानी. फागुन-चइत पूर्वांचल खातिर उत्सव के महिना ह. फगुआ-चइता गूँजत रहेला. बड़का बाबूजी भैरवी आ रामायण के बेजोड़ गायक. नाम ह- जंग बहादूर सिंह. गायत्री ठाकुर, बिरेन्द्र सिंह (आरा) आ बिरेंदर सिंह धुरान (बलिया) के समकालीन. आसनसोल, झरिया-धनबाद में साठ-सत्तर के दशक में गायिकी के क्षेत्र में एगो बड़ा नाम. भरत शर्मा व्यास जी जइसन गायक इहाँ के शागिर्दगी में गवले-बजवले बानी. प्रशंसक रहल बानी.

बाबूजी आसनसोल सेनरेले साईकिल फैक्ट्री में नोकरी करत रहीं बाकिर फागुन-चइत में कुछ ना कुछ बहाना कके गाँवे आ जाईं. दू महिना झलकूटन होखे.

भर फागुन दुआरे-दुआरे फगुआ. फगुआ के दिने दिनभर फगुआ आ 12 बजे रात के बाद उहे गोल, उहे समाज, उहे दरी, उहे तिरपाल, उहे ढोलक, उहे झाल, उहे हुड़का, उहे मजीरा, उहे पखावज, उहे झांझ, उहे तासा, उहे नगाड़ा, रंग-अबीर से पोतल, भांग में डूबल उहे लोग…ए हो रामा शुरू. माने फागुन खतम. चइत शुरू….नया साल के आगाज.

बाकिर, फगुआ-चइता के बीच पर साल से एगो कोरोना आ गइल बा. रंग में भंग के रूप में ई कोरोना संउसे दुनिया आ  मनुष्यता खातिर एगो खतरा बा. एकरा से निपटे खातिर एहतियात बरतल बहुते जरूरी बा.

हमहूँ एहतियात बरतत दिन में अपना बंद कोठरी में भा रात में छत प लेटल आसमान में टिमटिमात जोन्हियन के निहारत बानी. हज़ार-हज़ार गो सवाल दिमाग के देवाल से टकरा के लौट जाता. बिजुरी-बत्ती आ गइल बा. खपरैल के जगह पक्का पिटा गइल बा. शहरो में जंगल काट-काट के अपार्टमेंट खड़ा हो गइल बा. अब एह पक्का मकान आ अपार्टमेंट के भीतर आदमी छटपटाता, तड़पता, घड़ी-घड़ी ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन लेवल चेक करsता. ई गाँव के बगइचवा भा शहर के जंगलवा काहे कटवा देलs ए चनेसर? इहे नू ऑक्सीजन देलs सन. जंगले नइखे त कोयल का कूकी ? का होई चइता ?

छत से उतर के बड़का बाबूजी के पास आ गइल बानी. रात के 2 बजsता. उहो जागले बाड़े. कुछ सोचते होइहें. आदमी के पास भगवान दिमाग देलें. एह से ई सर्वश्रेष्ठ प्राणी बन गइल. आदमी के पास भगवान दिमाग देलें. एही से ई सर्वश्रेष्ठ परेशान प्राणी भी बन गइल. नींन ना आवे, ओवर थिंकिंग, स्ट्रेस, फ्रस्ट्रेशन, डिप्रेशन ई सब दिमगवे के चलते नू बा. बड़का बाबूजी एक घंटा दुनिया भर के कथा-संस्मरण सुनवलें. कहीं के बात के तार कहीं जुड़ जाता. स्मृति भंग में इहे सब होला. कसहूँ सुता के फेर छत पर आ गइल बानी. बड़का बाबूजी के बतिया दिमाग में चलsता. सुतिये नइखीं पावत. उनका जीवन सफ़र आ संगीतिक यात्रा पर एक बार लमहर बात कइले रहनी. ओह समय के कई गो नामी-गिरामी गायक के सफ़र भी ओह इंटरव्यू में समेटाइल बा. बइठ के देखे लागल बानी. ली लिंक रउरो के देतानी. मन होई त देखब –

https://www.youtube.com/watch?v=JdSJcv1nJl0

आकाश साफ़ हो गइल बा. कउआ बोले लागल बाड़न स. कहाँ त भिनुसहरे कोयल के बोले के चाहीं बाकिर सगरो कउअने के राज बा. बड़का बाबूजी के इंटरव्यू वाला वीडियो ख़तम होते एगो नया वीडियो खुल गइल बा जवन चैता-चैती पर जानकारी देता.

चइता के बोल के शुरुआत अमूमन ‘रामा’ आ अंत ‘हो रामा’ से होला. रउरा अगर चइता सुनीं त रउरा ओहमें प्यार खातिर निहोरा चाहे विरह में होखे वाला वेदना मिली. चइता के मैथिली में चइती कहल जाला. हालांकि चइती आपन शास्त्रीय पहचानो बनइलस अउर हिंदुस्तानी गायन में ई एगो लोकप्रिय विधा बनल. बनारस घराना चइती खातिर मशहूर बा. ठुमरी सम्राज्ञी गिरिजा देवी चइतियो गायन खातिर जानल जाली. चइती संगीत के जानकार चइती के ठुमरी के करीब मानेले, काहेकि एह गाना के शैली में समानता बावे.

चइता में रउरा लोकजीवन के तात्कालिक रूपो लउकेला जइसे गेहूं के कटनी, टिकोरा से लदल गाछ, लइकन-लइकियन के बियाह खातिर अकुलइनी आ बेचैनी आदि. चइता सामूहिक गायन के विधा हवे, जवन आपस के मेलजोल के प्रेरको हवे.

चइत में भगवान श्रीराम के जनम भइल रहे, एह से रउरा चइता में उनका जनम के ले के प्रसंगो सुने के मिलेला. हालांकि बधाइयो एगो गायन शैली हवे बाकिर रउरा चइता शैली में अइसन गाना सुन सकत बानी.

हई देखीं अब खेसारी लाल यादव के चइता के लिंक खुल गइल-

घाम लागऽता ए राजा, घाम लागऽता

तू तऽ बहरा में करेलऽ अराम

चइत में हमरा घाम लागऽताहो रामा

एही लगले पवनो सिंह के चइता के लिंक आँखी का सोझा आ गइल –

चइत में जाइब द्वारिका जल भरी ले आइब हो रामा

अरे शिव जी पऽ जलऽवा चढाइब हे रामा.. घूमि-घूमि

फिल्म हमार प्रिय विधा ह. अब हम फिलिम में चइता खोजे लागल बानी-

मनोज तिवारी के फिलिम ‘दामाद जी’ में एगो चइता बा विनय बिहारी के लिखल आ लाल सिन्हा के संगीतबद्ध कइल. ‘गंगा’  फिल्म में भी एगो चइता बा अशोक घायल के लिखल आ संगीतबद्ध कइल.  मनोज तिवारी के स्वर में एह चइता के बोल बा-

हे रामा गोरी-गोरी बंहिया ए रामा….

में हरी-हरी चुडि़या हे रामा होचइत मासे

अरे! चइत मासे झुलनी गढ़ाइब हो गोरी

ए रामा गोरी-गोरी बंहिया ए रामा….

बड़का बाबूजी के भैरवी नीचे शुरू हो गइल बा. रहि-रहि के साँस ऊपर नीचे होता. एह संसार में सब साँसे के खेला बा. जब तक साँस सुर में बा जिंदगी लय में बा. बड़का बाबूजी के लयदारी में सानी नइखे रहल. जिंदगी के उतार-चढ़ाव में भी उहाँ लय-सुर-ताल में रहल बानी. उहाँ के हाथ हमरा माथ पर बा- ‘’ बबुआ तू दिल्ली से आ गइलs, अब हम ठीक हो जायेम. बाप खातिर बेटा के साथ संजीवनी बूटी होला‘’. हमार आँख भर आइल बा.



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