राउर पाती

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Posted: December 29, 2021
Category: राउर पाती
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भोजपुरी जंक्शन के हरेक अंक संग्रहणीय आ संदर्भ सामग्री बा

भोजपुरी जंक्शन के जेतना भी अंक अब तक आइल बा, भोजपुरी भासा के उत्थान में बड़ी असरकारक उत्प्रेरक के काम कइले बा।

एक-एक अंक संग्रहणीय आ संदर्भ सामग्री बा। भोजपुरी के कौनो विधा होखे, शोध-परक लेख, कहानी, संस्मरण भा गीत-कविता, सबका के अपना में समेटले " भोजपुरी जंक्शन " के त हम " भोजपुरी के विश्वविद्यालय" कहल ज्यादा उचित बुझेनीं, काहे कि जे भी आपन माइभासा के साहित्यिक इतिहास आ भोजपुरी साहित्य के साधक लोग के जाने के चाहत होखे, ओकरा खातिर ई विश्वविद्यालय से बड़का कौनो विश्वविद्यालय नइखे।

ई जान के ताज्जुब होई कि " भोजपुरी जंक्शन " अब तक करीब 93 दिवंगत भोजपुरी साहित्यकार लोग से हमनी के परिचय करा चुकल बा आ अभी ई यात्रा जारी बा। एकरा अतिरिक्त प्रत्येक अंक में भोजपुरी भाषा के उत्कृष्ट साहित्यकार लोग के रचना आ परिचय हमनी पाठक के सोझा आवत रहेला आ ओकर लाभ हमनी के मिलत रहेला।

" भोजपुरी जंक्शन " संपादक श्री मनोज भावुक जी के संपादकीय त मन के मुग्ध आ " रिचार्ज " क देला। अबकी के संपादकीय के एक- एक लाइन दिल में सीधे प्रवेश क गइल। तनी पढ़ी जा,

"जरते दिया के मान बा। बुताइल दिया या त फेर से जरावल जाला या विसर्जन में चल जाला। 

पूजा-पाठ मन के शोधन करे खातिर होला। मन के रिचार्ज करे खातिर होला। कठिन से कठिन समय में भी सकारात्मक रहे खातिर होला, संभावना खोजे खातिर होला।"

एक जगह अपना संपादकीय में श्री मनोज जी लिखले बानी,

"प्राण यमराज के हाथ में जाये, ओकरा पहिले तक अपना हाथ में ठीक से रहे के चाही। एही खातिर साधना कल जाला।"

पत्रिका के सारा जान त संपादकीय में हीं बा।

"भोजपुरी जंक्शन" पिछला कुछ समय से विभिन्न विषय पर विशेषांक भी निकाल रहल बा। ई प्रत्येक विशेषांक अपना आप में ऊ विषय के करीब-करीब संपूर्ण जानकारी से भरल होला। कई गो विशेषांक त वषों तक सम्हाल के रखे वाला होला।

"भोजपुरी जंक्शन" के ई शानदार सफर जारी रहो आ हमनी पाठक ओकर यात्री बन के घुमत रहीं जा, इहे कामना बा।

अजय कुमार पाण्डेय, सहायक, सिविल कोर्ट, बगहा, पश्चिमी चंपारण, बिहार


भोजपुरी जंक्शन भोजपुरी साहित्य के गुलदस्ता बा

साँचो मानी भोजपुरी जंक्शन के 'मन के रीचार्ज करीं' अंक एगो गुलदस्ता नाहिन ही बा, जवन अपना में अलग-अलग तरह के रचना के खुशबू समेटले बा। हम बात शुरू करतानी भावुक जी के संपादकीय से। जवना के शीर्षक से रउआ पते ना लागी कि एकरा में कइसन गूढ़ बात कहल बा। भावुक जी पहिला प्रश्न उठवले बानी कि पूजा के रस्म अदायगी भर बा कि लोग-बाग पर एकर असरो बा? दोसर बिन्दु उहाँ के जे उठवले बानी ऊ ह पूजा के मायने। उहाँ के कहनाम बा कि पूजा के अर्थ भइल कि ओह में मन के दीया जले, जवना से कठिन से कठिन परिस्थिति में भी आदमी के सोच सकारात्मक रहे। काहेकि जिन्दगी के पर्याय राग आ लय ह। हमरा सामने कवनो प्रसंग के प्रदर्शित कइल जाला तब हम ओकरा के मनोरंजन के दृष्टि से देखेनी। बाकिर ओकर असली मर्म त उहे समझेला जे ओकरा के भोगले रहेला।

रवीन्द्र किशोर सिन्हा जी अपना लेख में राजनीतिक, समसामयिक एवं मानवीय दृष्टि से अफगानिस्तान के शरणार्थीयन के संदर्भ में प्रश्न उठवले बानी। उहाँ के प्रश्न करतानी कि का- ' इस्लामिक मुल्क के मुस्लिम प्रेम महज दिखावा बा?' डाॅ. ब्रजभूषण मिश्र जी आठ गो दिवंगत भोजपुरी लोगन के संक्षिप्त परिचय देहले बानी। जेकर आज जेतना महत्त्व बा, आवेला समय में ओकरा से भी अधिक महत्त्व होई। जब भोजपुरी साहित्य के इतिहास आपन सम्यक आकार ली। जन्मदिवस विशेष में ज्योत्स्ना प्रसाद के शैलजा जी पर लिखल लेख शैलजा जी पर चाहे भोजपुरी सेवी महिला पर शोध के क्रम में मील के पत्थर साबित होई।

प्रो.(डॉ.) जयकान्त सिंह 'जय' के आलेख भोजपुरी मातृभासाई अस्मिता के खोज एगो शोधात्मक आलेख बा। जवना में उहाँ के कहतानी कि भोजपुरी 'वैदिक परम्परा से आइल देसी प्राकृत भासा ह।' शशि प्रेमदेव जी के लघुकथा यू ट्यूब पर चलल एगो विडियो के प्रतिक्रिया स्वरुप लिखाइल बा। जवना के मूल में सर्व धर्म समभाव बा।

भावुक जी के सिनेमा पर लिखल लेख में एगो जायज मुद्दा उठावल गइल बा। उहाँ के कहतानी कि जवन हिन्दी सिनेमा, हिन्दी भाषा के विदेशन में लोकप्रियता दिलावे में एतना अहम् भूमिका निभवले बा, दुर्भाग्य से ओही हिन्दी सिनेमा खातिर कथा अंग्रेजी साहित्य से लेहल जाला। एतने भर ना जे लोग हिन्दी सिनेमा बनावता भा ओकरा में अभिनय करता ओकरा ना  हिन्दी कथा-साहित्य के पर्याप्त जानकारी बा आ ना ही ओकरा कथाकार के। हिन्दी सिनेमा के स्थिति त अइसन हो गइल बा कि ओकर स्क्रिप्ट तकले अंग्रेजी में ही लिखाता। हिन्दी सिनेमा के एकरा से बड़ा दुर्भाग्य का होई। हाँ, ई बात सही बा कि हिन्दी के कुछ उपन्यासन पर सिनेमा बनलो बा। जे 'बड़ उपन्यास भा कहानी से लेहल गइल बा।' भावुक जी के एही बात के आगे बढ़ावत हम गुलशन नंदा जी के नाम लेबे के चाहेब। जेकरा उपन्यास में 'बड़' विशेषण लागल होखे भा ना, बाकिर उहाँ के उपन्यासन पर लगभग दू दर्जन हिट सिनेमा बनल बा। जवना में कुछ के नाम लेबे के हम चाहेब। जइसे-काजल, नीलकमल, खिलौने, कटी पतंग, नया जमाना, महबूबा, शर्मीली, झील के उस पार इत्यादि। पत्रिका के एही खण्ड में सुरभि सिन्हा झारखंड के उभरत निर्देशक बंटी सिन्हा के प्रतिभा के रेखांकित करत एगो लेख लिखले बाड़ी।

एह पत्रिका में दूगो गीत भी बा। पहिला सुनील कुमार तंग जी के 'प्रीत के गीत भइल अनमोल' एगो मधुर गीत बा जवना में उपमा, रूपक आ मानवीकरण अलंकार के मदद से प्रकृति के मोहक छवि उकेरल गइल बा। एह गीत के अमर प्रेम के रागिनी के मिसिरी के घोल कहल गइल बा। दोसर गीत बा मनोज भावुक जी के 'पास बोलावे गाँव रे आपन' एह गीत में भावुक जी उपमा अलंकार के सहारा से गाँव के बहुत सुन्दर झाँकी प्रस्तुत कइले बानी। एह कविता के मूल भाव बा कि अगर भारत के समग्रता में जाने के बा त भारत के गाँव के जाने के पड़ी।

एह तरह से ई पत्रिका एगो संपूर्ण पत्रिका बा। जवना में हर तरह के रचना बा।

ज्योत्स्ना प्रसाद, वरिष्ठ लेखिका, पटना, बिहार


भोजपुरी में काम कइल बहुत कठिन बा

पत्रिका मिलल! उपर-झापर हर अंक देखत रहनी ह, बाकिर एह अंक के पूरा पढ़नी। मनोज भाई के संपादन के छाप हर अंक में लउकेला। मन के रिचार्ज करीं- संपादकीय के हेडिंग से लागल कि भोजपुरी भाषा के भी बोलचाल के भाषा से जोड़के रखल आ प्रगतिशील बनावे के कोशिश चलत रहे के चाहीं। रवींद्र किशोर सिन्हा जी के आलेख में बांग्लादेश के उर्दू भाषी मुसलमान भाई लोग के पीड़ा के चरचा बा, जे बड़ा उछाह से पाकिस्तान गइल रहे। क्रिकेट में पाकिस्तान के जितला पर पटाखा फोरे वाला हिंदुस्तानी मुसलमान भाई लोगन के आंख खुले के चाहीं। भोजपुरी के गौरव सिरीज भी बड़ाई करे लायक बा। भोजपुरी में काम कइल केतना कठिन बा, हम खूब समझ सकेनी। लटत-बूड़त तीन-चार साल ले पहरुआ पत्रिका निकलले रहनी, बड़ा कठिन समय रहे।

जयकांत सिंह जी के आलेख भोजपुरी…… अस्मिता खोज में शहराइल  भोजपुरिया भाईलोग के खबर लिहल गइल बा, जे खुद आ अपना लइका- लइकिन के भोजपुरी सिखावे व ओ लोग के संगत में भोजपुरी बोले में सकुचाला। आज काल के पतोह लोग के बाते छोड़ दीं, सास भोजपुरी में और पतोह अंग्रेजियाइल हिंदी में दनदना रहल बा लोग, बड़ा रोचक लागेला अइसन सीन। दादी अगर नाती-नातिन के ओका-बोका तीन-तड़ोका–सुनावेली, त पतोह लोग या त ओ लोग के उठा ले जाली भा मुंह चोनियावे लागेली। जयकांत सिंह के लेख में भोजपुरी भाषा के विषय में ढेर सारा जानकारी दीहल बा। भोजपुरी सिनेमा पर जानकारी के ममिला में त मनोज भाई के जइसे कॉपीराइट बा। बस आगे बढ़त रहीं, आप लिखे खातिर कई बार कहनी, अब सोच रहल बानी कि कुछ भेजीं।

बिमल राय, वरिष्ठ पत्रकार, हुगली, बंगाल


रोचक, तथ्यपरक आ सराहनीय अंक

'भोजपुरी जंक्शन' ई पत्रिका के 16 से 31 अक्टूबर के अंक पढ़े के मिलल। ई पत्रिका अपना गरिमा के अनुरूप आपन छवि बरकरार रखले बा। सम्पादक महोदय मनोज भावुक जी के सम्पादकीय 'मन के रिचार्ज करीं' पाठकगण के ऊर्जावान बनावे, मनोबल बढ़ावे आ सकारात्मकता के जड़ मजबूत करे में तनिको कसर नइखे छोड़ले। आर.के.सिन्हा साहब के आलेख' शरण देवे से कन्नी काटत इस्लामिक देश' में अफगानी शरणार्थी के प्रति इस्लामिक देशन के नकारात्मक रवैया बड़ा ढंग से पेश कइल गइल बा।

दिवंगत साहित्यकार समाज पर ई पत्रिका विशेष सम्मान देवे के भरसक कोशिश करत ओ सबके संक्षिप्त परिचय प्रकाशित करे के क्रम जारी  रखले बा। प्रो. (ड़ा.)जयकांत सिंह जय जी अपना आलेख' भोजपुरी मातृभासाई अस्मिता के खोज' में माई भासा के सही अर्थ विभिन्न स्रोतन के माध्यम से बहुत सुंदर ढंग से समझावे के प्रयास कइले बानीं।

शशि प्रेम देव जी के लघुकथा  'ईंट क जवाब पत्थर से' बड़ा हीं रोचक बा।

बॉलीवुड पर संपादक मनोज भावुक जी के साथे साथ अन्य लोगन के विचार सराहे लायक बा। श्री सुनील कुमार तंग साहब आ सम्पादक जी के गीत बड़ा ही उम्दा आ बहुत हीं मनभावन लागल। कुल मिला के ई पत्रिका बड़ा हीं रोचक, तथ्यपरक आ सराहनीय बा।

अखिलेश्वर मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार, बेतिया, बिहार


एगो पूर्ण पत्रिका बा भोजपुरी जंक्शन  

भोजपुरी जंक्शन के टटका अंक अपने आप में एक पूर्ण अंक बा। एह पत्रिका के सबसे बड़ा खासियत ई बा कि एह पत्रिका के हर आर्टिकल सकारात्मक उर्जा से भरपूर बा। एकरे साथे हर रचना में रचनाकार खुल के आपन विचार रखले बा। बाकिर एह अंक में कवनों अइसन आर्टिकल नइखे जे केहू के प्रति आक्रोश पैदा करत होखे।

भावुक जी के लिखल संपादकीय 'मन के रिचार्ज करीं' में पूजा के सही मायने बतावल गइल बा। रवीन्द्र किशोर सिन्हा जी के लेख में मुस्लिम देशन के मुस्लिम प्रेम के दिखावा पर कलम चलावल बा। एही तरह से प्रो.

जयकान्त सिंह जी के आलेख में भोजपुरी शब्दन के स्वरूप पर चर्चा भइल बा त डॉ. ब्रजभूषण मिश्र आ डॉ. ज्योत्स्ना जी के लेख भोजपुरी के दिवंगत रचनाकार लोगन के लेखा-जोखा ह। फिल्म जगत् से संबंधित दूगो आर्टिकल बा जवना में एगो में हिन्दी फिल्म जगत् के लोगन के अंग्रेजी से मोह आ हिन्दी के अल्प ज्ञान के बात उठावल बा त दोसरा में झारखंड के एगो छोट जगह के उभरत निर्देशक पर चर्चा कइल गइल बा। एकरा साथ ही एक लघुकथा बा आ सुनील कुमार तंग जी के आ मनोज भावुक जी के एक-एक गो गीत बा जे बहुत बढ़िया बा। सब मिलाजुला के ई अंक बहुत बढ़िया आ अपना आप में पूर्ण बा। अंत में एह पत्रिका के उज्ज्वल भविष्य के कामना करत  एह पत्रिका के संपादक मनोज भावुक जी के बधाई देतानी।

अमित कुमार मुन्नू, युवा साहित्यकार, सीवान, बिहार  

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